जानिए क्या आज भी प्रासंगिक है महात्मा गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत

जानिए क्या आज भी प्रासंगिक है महात्मा गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत

महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत की प्रासंगिकता | Relevance of Mahatma Gandhi’s doctrine of trusteeship in Hindi | relevance of mahatma gandhis trusteeship doctrine india

गांधीवाद के चार प्रमुख आयाम माने जाते हैं: सत्य, अहिंसा, स्वालंबन और ट्रस्टीशिप। गांधीवाद महात्मा गांधी के उन राजनीतिक एवं सामाजिक विचारों पर आधारित है जिनको उन्होंने सबसे पहले व्यवहार में प्रयोग किया तथा उनको व्यवहार में उपादेय पाने पर सिद्धान्त का रूप देकर सार्वजनिक किया। उदाहरण के लिए सत्य के प्रयोग नाम से महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा का प्रकाशन 1927 में किया था। स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों के विरूद्ध अहिंसक सत्याग्रह गंाधीजी का प्रमुख अस्त्र रहा है जिसने भारत को आजादी दिलाई।

स्वालंबन का प्रयोग भी गांधीजी ने पहले अपने आप पर किया। इसके बाद उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्वालंबन और ग्राम स्वराज की, का सिद्धान्त विकसित किया। चरखा, तकली, और खादी स्वालंबन के प्रतीक बन गए। गांधीजी का कहना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवाओं को स्वालंबी बनाए। इसीलिए उन्होंने बुनियादी तालीम पर जोर दिया। गांधीवाद का चौथा प्रमुख आयाम ट्रस्टीशिप है इस पर बहुत कम लेखन हुआ है। वर्तमान भारत के सन्दर्भ में इसकी प्रासंगिकता के बारे में चर्चा करना जरूरी है।

गांधीवादी अर्थशास्त्र (Gandhian economics) इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले उनके प्रसिद्ध अनुयायी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा ने किया था। उनके अनुसार गांधी का अर्थशास्त्र एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था का अवधारणा पर आधारित है जिसमें वर्ग को कोई स्थान नहीं है। गांधी का अर्थशास्त्र सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित है।

गांधीवादी अर्थशास्त्र के प्रणेता जे.सी. कुमारप्पा ने मद्रास से अपनी स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इंग्लैंड और अमेरिका में अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। अध्ययन के दौरान उन्होंने अपने एक आलेख में प्रमाणों सहित यह सिद्ध किया था कि भारत की गरीबी का प्रमुख कारण अंग्रेज सरकार की शोषणवादी नीतियां हैं।

जे.सी. कुमारप्पा की यह विशेषता रही है कि उन्होंने स्वयं जमीनी सर्वेक्षण करके अपनी अर्थशास्त्र की पुस्तकें एवं आलेख लिखे। उन्होंने यंग इंडिया के संपादन में महात्मा गांधी के सहयोगी के रूप में कार्य किया था।

गांधी जी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत कब दिया ?

महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में थे तब 1903 में उन्होंने ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था।

गांधीजी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत क्या था?

गांधीजी के ट्रस्टीशिप (Gandhian Concept of Trusteeship) अर्थात न्यासिता के सिद्धान्त के मूल में यह है कि पूंजी का असली मालिक पूंजीपति नहीं बल्कि पूरा समाज है, पूंजीपति तो केवल उस संपत्ति का रखवाला है।

गांधीजी का यह मानना था कि जो संपत्ति पूंजीपतियों के पास है, वह उसके पास धरोहर के रूप में है।

महात्मा गांधी का कहना था कि पूंजीवाद के कारण दुनिया भर में बेरोजगारी बढ़ी है और श्रम की महत्ता कम हुई है। बेरोजगारी ने समाज की सबसे छोटी इकाई को कमजोर किया है। अगर धनवानों ने अपनी धन-दौलत और उससे प्राप्त शक्ति का स्वेच्छा से त्याग नहीं किया और आम जनता को उसके हित में साझीदार नहीं बनाया तो निश्चित रूप से एक दिन हिंसक और रक्तरंजित क्रांति हो जाएगी।

महात्मा गांधी का कहना था कि इन सारी समस्याओं का समाधान ट्रस्टीशिप सिद्धांत में निहित है।

गांधीजी ने ट्रस्टीशिप सिद्धांत का प्रतिपादन कैसे किया?

महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धान्त के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं से अधिक संपत्ति एकत्रित करता है, उसे केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संपत्ति के उपयोग करने का अधिकार है, शेष संपत्ति का प्रबंध उसे एक ट्रस्टी की हैसियत से देखभाल कर समाज कल्याण पर खर्च करना चाहिए।

महात्मा गांधी मानते थे कि सभी लोगों की क्षमता एक सी नहीं होती है, कुछ लोगों की कमाने की क्षमता अधिक होती है तो कुछ लोगों की कम होती है, इसलिए जिनके कमाने की क्षमता अधिक है उन्हें कमाना तो अधिक चाहिए किंतु अपनी जरूरतों को पूरी करने के बाद शेष राशि समाज के कल्याण पर खर्च करना चाहिए।

महात्मा गांधी के अनुसार पूंजीपति और अधिक व्यवसायिक आमदनी वाले व्यक्तियों को अपनी जरूरतों को सीमित करना चाहिए तभी बची हुई आमदनी जरूरतमंदों पर खर्च की जा सकेगी।

कितना व्यावहारिक है महात्मा गांधी का न्यासिता सिद्धान्त?

महात्मा गांधी के न्यासिता सिद्धान्त को बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने काल्पनिक आदर्शवाद निरूपित करके अव्यवहारिक करार दिया। अनेक लोग उनके ट्रस्टीशिप सिद्धान्त की खिल्ली उड़ाते थे। किंतु गांधीजी को अपने ट्रस्टीशिप सिद्धांत पर विश्वास था। इसलिए उन्होंने पूंजीपतियों और धनी व्यक्तियों से ट्रस्टीशिप सिद्धान्त समझाने के लिए बैठकें प्रारंभ की तथा उन्हें समझा-बुझाकर इसके परिपालन के लिए सहमत करवाने में बड़ी हद तक सफलता पाई।

महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धान्त से सहमत सैकड़ों उद्योगपतियों ने चैरिटेबल ट्रस्ट व फाउंडेशन स्थापित करके दर्जनों शिक्षण संस्थान, चिकित्सालय, तालाब का निर्माण करवाया। ट्रस्टीशिप सिद्धान्त का पालन करने वाले सैकड़ों उद्योगपतियों में परिवार सहित सादगीपूर्ण रहन-सहन अपनाने वाले जमनालाल बजाज को महात्मा गांधी का सबसे प्रिय उद्योगपति शिष्य माना जाता है। दूसरी ओर जमशेदजी टाटा ने 1903 से पहले ही ट्रस्टीशिप को व्यवहार में प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था।

सवाल उठता है कि क्या आधुनिक भारत में जहां बड़े-बड़े पूंजीपति अपनी विलासिता खर्च का न केवल प्रदर्शन करते हैं बल्कि मीडिया का उपयोग करके उसें प्रचारित भी करते हैं, ऐसी स्थिति में क्या ट्रस्टीशिप को प्रासंगिक माना जा सकता है?

वर्तमान में ये पूंजीपति कॉरपोरेट उद्योगपति बन गए हैं और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व्यय (Corporate Social Responsibility Expenditure) को कॉरपोरेट टैक्स में छूट (corporate tax exemption) पाने के लिए करते हैं। इस सबके बावजूद आज भारत में हजारों उद्योगपति ऐसे हैं जिन्हें महात्मा गांधी से मिलने का सौभाग्य तो नहीं मिल पाया किन्तु वे चैरिटेबल फाउंडेशन और ट्रस्ट स्थापित करके सहर्ष अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, चिकित्सा, देशी खेलों के विकास एवं लोक कल्याण कार्यों पर निरन्तर व्यय कर रहे हैं। प्रासंगिकता बताने के लिए जीवंत उदाहरण देना जरूरी है।

ट्रस्टीशिप अपनाने में आईटी उद्योग की प्रमुख कंपनी विप्रो के मुखिया अजीम प्रेमजी का नाम उदाहरणीय है, जिन्होंने पिछले दिनों 53 हजार करोड़ रुपए मूल्य की अपनी आधी शेयर संपत्ति अजीम प्रेमजी फाउंडेशन (Azim Premji Foundation) को दान कर दी। यह फाउंडेशन मुख्यत: भारत के 6 राज्यों व एक केन्द्र शासित प्रदेश में स्कूली शिक्षकों की शिक्षण क्षमता निर्माण हेतु महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

पश्चिम की विलासतापूर्ण दिखावे के युग में पूंजीपतियों में विलासिता के प्रदर्शन की होड़ लगी है। ऐसी स्थिति में आज देश के लगभग 5 प्रतिशत उद्योगपति स्वेच्छा से ट्रस्टीशिप सिद्धान्त का व्यवहार में प्रयोग समाज सेवा हेतु सफलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं, तो यह सिद्धान्त को व्यावहारिक माना जा सकता है तथा इसको आधुनिक भारत में प्रासंगिक कहा जा सकता है।

डॉ. हनुमंत यादव

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