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56″ मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना शाहीन बाग आंदोलन!

देश में अपनी बात रखने और विभिन्न मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए भले ही जंतर-मंतर को जाना जाता हो पर आज की तारीख में सीएए के विरोध में शाहीन बाग में हो रहे आंदोलन (Movements are being held in Shaheen Bagh against the CAA) ने जो मुकाम हासिल किया है वह जंतर-मंतर को पीछे छोड़ता प्रतीत हो रहा है।

Republic Day in Shaheen Bagh

गणतंत्र दिवस में जिस तरह से वहां पर सीएए के विरोधियों की भीड़ उमड़ी और गणतंत्र दिवस मनाया उसने मोदी सरकार द्वारा मनाए जा रहे गणतंत्र दिवस को भी पीछे छोड़ दिया। भले ही राजपथ पर देश की आन-बान-शान में विभिन्न झांकियां निकाली गईं हों पर शाहीन बाग के गणतंत्र दिवस समारोह ने न केवल देश बल्कि विदेश का भी ध्यान अपनी ओर खींचा।

The CAA issue is no longer national but has become international.

सीएए का मुद्दा अब राष्ट्रीय नहीं रह गया है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बन गय है। अमेरिका के प्रसिद्ध समाजसेवी जार्ज सूरूस ने सीएए के विरोध में कहा है ‘हम इतिहास के बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। खुली सोचने रखने वाला समाज खतरे में है। दुनिया में तानाशाहों का राज बढ़ रहा है। लोकतांत्रिक तौर पर चुने जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहत हैं’।

सुरूस का यह बयान ऐसे समय आया है जब शाहीन बाग के आंदोलन ने एक अलग पहचान बना ली है।

शहीन बाग आंदोलन को 45 दिन हो गए हैं। अब देश में यह स्थिति बन गई है कि हर शहर और हर कस्बा हर गांव शाहीन बाग बनता जा रहा है।

एक सर्वे के मुताबिक मुल्क के 400 से ज्यादा शहरों और कस्बों की महिलाएं शाहीन बाग से प्रेरणा लेकर बीजेपी की राजनीति और सत्ता को चुनौती दे रही हैं।

लखनऊ का घंटाघर, इलाहाबाद का मंसूर पार्क, बरेली का इस्लामिया कॉलेज, कानपुर का मो. अली पार्क, एएमयू का बाब-सर-सैयद, देवबंद का इदगाह मैदान और इकबाल मैदान, संभल का पक्का पाक, भोपाल की सेंट्रल लाइब्रेरी, बडवाली चौक, मानिक बाग, इंदौर का खजराना, कोचीन का आाजीद स्कावायर, नागपुर का संविधान चौक, पुणे कौंढूआ, अहमदाबाद का पौखियाल, कोटा का किशोरपुरा औरंगाबाद, हैदराबाद की टोल चौकी, कोलकाता के पार्क सर्कस से लेकर रांची के कूडरू वगैरह में महिलाओं का धरनों का सिलसिला जारी है।

बिहार वह अकेला राज्य है जहां 17 से अधिक जिलों में महिलाएं धरने पर बैठी हुई हैं और वहां के लोग भी मानव श्रृंखला बनाकर सरकार को आईना दिखा रहे हैं।

गया के शांति बाग आंदोलन से प्रेरणा लेकर मोतिहारी, बेतिया, बेगूसराय, नालंदा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सीवान, दरभंगा, मधुबनि, भागलपुर, किसनगंज, पूर्णिया, अररिया आदि तक महिलाओं के धरने का सिललिसा न केवल बढ्रता जा रहा है बल्कि नीतीश सरकार के आगे भी आईना रखता जा रहा है कि इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव में एनडीए का क्या हश्र होना वाला है।

भले ही भाजपा की आईटी सेल के शाहीन बाग आंदोलन में 500-500 रुपये देकर भीड़ इकट्ठी करने की बात बात की जा रही हो पर शाहीन बाग आंदोलन ने जो मुकाम हासिल किया है, उसे पैसे की भीड़ नहीं कहा जा सकता है।

सत्ता पक्ष के शाहीन बाग आंदोलन पर बोलने का मतलब ही यह है कि शाहीन बाग आंदोलन से सरकार में बेचैनी है।

अब तक तो भाजपा के दूसरी लाइन के नेता ही इस आंदोलन पर उंगली उठा रहे थे अब तक खुद कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद भी शाहीन बाग आंदोलन से बच्चों को स्कूल जाने में असुविधा होने की बात कर आंदोलन को कांग्रेस और आप से जोड़ रहे हैं। भले ही भाजपा के दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी इस आंदोलन को कानून से खिलवाड़ करने की बात कर रहे हों पर बिना किसी नेता के चल रहे इस आंदोलन ने बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है।

यह आंदोलन का प्रभाव ही है कि सीएए के विरोध में देश में विभिन्न  शहरों में चल रहे महिलाओं के आंदोलन को दूसरे शाहीन बाग के नाम से पुकारा जाने लगा है।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के विरोध में जब जंतर-मंतर पर आवाज बुलंद हुई तो एनजीटी ने ध्वनि प्रदूषण का हवाला देते हुए वहां पर आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों को हटवा दिया। साथ ही पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का भी हवाला दिया। कई महीने तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन नहीं हुए। हां संसद रोड पर कुछ आंदोलन हुए पर जंतर-मंतर पर वीरानी छा गई थी। पूर्व सैनिकों के साथ ही कई संगठनों ने इसके विरोध में अदालती लड़ाई लड़ी। जीत आंदोलनकारियों की हुई पर दिल्ली पुलिस के किसी भी धरना-प्रदर्शन के लिए एक ही दिन की अनुमति देने की परिपाटी अपना लेने पर जंतर-मंतर पर आंदोलन का माहौल नहीं बन पाया। कुल मिलाकर एक योजना के तहत मतलब मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलनकारियों को जमने नहीं दिया गया। हां सीएए के विरोध में शाहीनबाग में जो महिलाओं ने माहौल बनाया है उसने किसी समय जंतर-मंतर पर होने वाले आंदोलनों को भी फीका साबित कर दिया है।

Shaheen Bagh movement is becoming a major disaster for Modi government

यह जमीनी हकीकत है कि शाहीन बाग आंदोलन मोदी सरकार के लिए एक बड़ी आफत बनता जा रहा है। यदि मोदी सरकार आंदोलन को जेएनयू, जामिया की तरह कुचलवाती है तो उसे यह डर सता रहा है कि आंदोलन में महिलाएं ही महिलाएं हैं। महिलाएं भी वो जो सीएए के विरोध में सब कुछ दांव पर लगाने के लिए बैठी हैं।

इस आंदोलन की यह खासियत है कि जहां वहां पर नमाज पढ़ी जा रही है वहीं यज्ञ भी हो रहे हैं। भले ही पुलिस द्वारा भंडारे की व्यवस्था करने वाले हलवाईयों को गिरफ्तार कर लिया गया खाने की व्यवस्था को वह विफल नहीं कर पाई है।

यह आंदोलन का वजूद ही है कि सत्ता पक्ष के लोग अब आंदोलन को बदनाम करने में लग गये हैं। सत्ता पक्ष की ओर से देश और विदेश से बड़े स्तर पर शाहीन बाग आंदोलन को फंडिंग करने का आरोप लगाया जा रहा है।

इस आंदोलन ने यह पहचान बनाई कि लोग आंदोलन देखने ही जाने लगे हैं। न केवल देश बल्कि विदेश का मीडिया भी इस आंदोलन की ओर आकर्षित हुआ है।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT, CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

दरअसल धारा 370 और राम मंदिर निर्माण के बाद एनआरसी, एनपीआर और सीएए को लेकर मुस्लिमों में एक असुरक्षा का माहौल देखा जा रहा है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी बार-बार देश के मुसलमानों को सीएए से कोई खतरा न होने की बात कर रहे हैं। सीएए में बाहर से आए हिन्दू,-ईसाई, सिखों को राहत देते हुए मुसलमानों को टारगेट करने पर देश के मुसलमान इसे सीधे-सीधे अपने ऊपर हमला मानकर चल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से हिंसक आंदोलन की आड़ में योगी सरकार ने मुस्लिम युवाओं को टारगेट बनाया और उनकी संपत्ति जब्त की जा रही है। उससे देश के मुस्लिम मोदी सरकार से आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गये हैं।

भले ही भाजपा विभिन्न कार्यक्रम चलाकर सीएए के बारे में विपक्ष द्वारा भ्रम फैलाने की बात कर रही हो। लोगों को जागरूक करने की बात की जा रही हो पर इससे मुस्लिमों पर कोई असर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। भाजपा के सीएए के समर्थन में चलाए जा रहे अभियान का मुस्लिमों पर इसलिए भी कोई असर नहीं पड़ रहा है क्योंकि भाजपा यह अभियान अपने समर्थकों को ही चला रही है। मतलब जो लोग पहले से ही सीएए के पक्ष में हैं उन्हें ही जागरूक किया जा रहा है।

कहना गलत न होगा कि शाहीन बाग आंदोलन मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

नई दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार चरण सिंह राजपूत

 

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