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शोधकर्ताओं ने किया खुलासा कैसे केरल में चक्रवात ‘तौकते’ ने मचाया अनापेक्षित विध्वंस?

शोधकर्ताओं ने किया खुलासा कैसे केरल में चक्रवात ‘तौकते’ ने मचाया अनापेक्षित विध्वंस?

केरल में चक्रवात ‘तौकते’ ने मचाया था अनापेक्षित विध्वंस

नई दिल्ली, 05 दिसंबर (इंडिया साइंस वायर) : भारत के पश्चिमी तट पर स्थित केरल के चेलानम तटीय क्षेत्र में वर्ष 2021 में ताउते चक्रवात के दौरान बाढ़ और कटाव का स्तर अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अत्यधिक देखा गया था। कम तूफान और कम ज्वार के बावजूद चेलानम में समुद्र की लहरें तटीय सुरक्षा उपायों को पार कर गईं और घरों तथा सड़कों को जलमग्न कर दिया।

कम तूफान और कम ज्वार के बावजूद कैसे ताउते चक्रवात ने केरल को नुकसान पहुंचाया

एक नये अध्ययन में भारतीय शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि कम तूफान और कम ज्वार के बावजूद ताउते चक्रवात ने केरल के तटीय क्षेत्रों को कैसे अपनी चपेट में ले लिया।

क्या कहते हैं शोधकर्ता?

शोधकर्ता बताते हैं कि ताउते चक्रवात केरल के चेलानम तट से लगभग 500 किलोमीटर दूर था, और इस क्षेत्र में कम ज्वार की स्थिति बनी हुई थी। लेकिन, 15 मई, 2021 की सुबह कम तूफान और कम ज्वार के बावजूद चेलानम क्षेत्र जलमग्न हो गया। इस घटना ने मौसम-वैज्ञानिकों को इसके कारणों को समझने के लिए प्रेरित किया। इस घटनाक्रम के मॉडलिंग सिमुलेशन या अनुकरण से शोधकर्ताओं ने वास्तविक स्थिति का आकलन करने का प्रयास किया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि लहरों के टूटने से तटीय जल स्तर को बढ़ाने वाली घटना, जिसे ‘वेव सेटअप’ के नाम से जाना जाता है; और तूफानी लहरों से जुड़ी कम आवृत्ति वाली लहरों को तटीय जल स्तर को ऊपर उठने और चेलानम के तटीय गाँवों तक पहुँचने के लिए जिम्मेदार पाया है।

बाथिमेट्रीशब्द का मतलब क्या है?

अध्ययन में, यह भी पता चला है कि तटीय क्षेत्र की बाथमीट्री ढलान (Bathymetry Slopes) की भूमिका चेलानम क्षेत्र के जलमग्न होने के पीछे महत्वपूर्ण रही है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि तटीय जल स्तर में वृद्धि करने में सीधी बाथिमेट्री ढलान वाले क्षेत्रों की भूमिका रही है, और इसने कम ढलान वाले बाथिमेट्री क्षेत्रों की तुलना में गंभीर तटीय बाढ़ को बढ़ावा दिया है।

शोधकर्ता बताते हैं कि ‘बाथिमेट्री’ शब्द मूल रूप से समुद्र तल के सापेक्ष समुद्र की गहराई को संदर्भित करता है। हालाँकि, इसके अर्थ को ‘समुद्री जल सतह के नीचे की स्थलाकृति’ से भी जोड़कर देखा जाता है।

यह अध्ययन, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस), हैदराबाद; अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (एसएसी), इसरो, अहमदाबाद; और केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज ऐंड ओशन स्टडीज (KUFOS), कोच्चि के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि लहरों के ‘वेव सेटअप’ और कम आवृत्ति लहर जैसे गुणों का आकलन करने में सक्षम कोस्टल वेव मॉडल्स का उपयोग चेलानम के तटीय क्षेत्र के जलमग्न होने के सिमुलेशन या अनुकरण के लिए किया गया है।

उन्होंने बताया कि आईएनसीओआईएस में उपयोग होने वाली ‘वेव वॉच-III’ मॉडलिंग तकनीक के वर्णक्रमीय तरंग गुणों का उपयोग चेलानम के क्षेत्रीय मॉडल में किया गया है। विभिन्न ज्वारीय स्थितियों के अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने सिमुलेशन किया, जिसमें देखा गया कि चेलानम में सीधी ढलान वाले तटीय क्षेत्रों में कम ज्वार के बावजूद जल स्तर बढ़ाने वाली ‘वेव सेटअप’ घटना बढ़ जाती है।

तूफान की लहरों का क्या महत्व है, बताता है यह अध्ययन

आईएनसीओआईएस की शोधकर्ता डॉ रम्या पी.जी. ने इंडिया साइंस वायर को बताया है कि “यह अध्ययन, तूफान की लहरों के महत्व को दर्शाता है, और तूफान की लहरों से जुड़ी ‘वेव सेटअप’ नामक प्रक्रिया के कारण तूफान के दौरान तटीय जल स्तर के ऊपर उठने की घटना को स्पष्ट करता है। तूफानी लहरें कम आवृत्ति (अवधि) की लहरों के अन्य सेट को भी प्रेरित करती हैं, और तटीय जल स्तर बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं। तूफानी लहरों के दौरान तटीय बाढ़ की रोकथाम के लिए आवश्यक परिचालन प्रक्रिया; ‘वेव सेटअप’ और कम आवृत्ति की तरंगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, जिसे चेलानम के तटीय क्षेत्रों के जलमग्न होने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।”

डॉ रम्या ने बताया कि वर्तमान अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं की योजना ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनशील इलाकों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय मॉडल प्रस्तावित करने की है, जिसमें निहित संख्यात्मक मॉडल ‘वेव सेटअप’ और इन्फ्राग्रैविटी लहरों का आकलन करने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

डॉ रम्या पी.जी. के अलावा, इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में रतीश रामकृष्णन और अनूप मंडल, एसएसी, इसरो, अहमदाबाद; आईएनसीओआईएस, हैदराबाद के प्रकाश मोहंती, आर.एस. महेंद्र, और टी.एम. बालकृष्णन नायर; और केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज ऐंड ओशन स्टडीज (KUFOS), कोच्चि के शोधकर्ता प्रिंस अरयाकंडी शामिल हैं। उनका यह अध्ययन, शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है।

(इंडिया साइंस वायर)

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