अंधेरे खंडहरों में बिलबिलाती जिंदगियां ¬गुलाबो सिताबो पर क्षण भर

Man’s physical impoverishment also causes his mental impoverishment.

गुलाबो सिताबो हिंदी फिल्म की समीक्षा | Gulabo sitabo hindi movie review

 आदमी की भौतिक दरिद्रता उसकी मानसिक दरिद्रता का भी कारण बनती है। वह अपने अस्तित्व के लिये ही हर प्रकार की लूट-खसोट, कमीनेपन की मानसिकता का शिकार होता है, छोटी-छोटी चालाकियों में ही पूरा जीवन व्यतीत कर देता है। ‘गुलाबो सिताबो’ फ़िल्म के मिर्ज़ा साहब बेगम के साथ सारी उम्र बीता देने पर भी अपनी परजीविता के बोध से कभी मुक्त नहीं हुए, और जिंदगी भर, जिसे बांग्ला में कहते हैं, मुर्गीचोर ही बने रहे। किसी की भी मुर्गी को काँख में दबा कर उड़ा लेने और उसे मार कर खा जाने वाला एक चिर भूखा चोर। ‘गुलाबो सिताबो’ का फ़ातिमा महल परिस्थितियों के शिकार ऐसे ही लोगों की एक बस्ती है। बेहद कम आमदनी के स्रोतों से बंधी हमेशा दरिद्रता में परेशान रहने को अभिशप्त लोगों की बस्ती।

लुटे-चुके टुच्चे लोगों की इस बस्ती के शीर्ष पर किसी नष्ट हो चुके राज के सिंहासन पर बैठे बादशाह की तरह है इस फ़िल्म की बेगम साहिबा, जो सब खो कर भी जैसे महज अपने राज के रुतबे के अहसास से ही सबसे अलग और ऊपर है। उसके अतीत मोह में ही उसकी ख़याली काल्पनिक उड़ानों की शक्ति छिपी हुई है।

ऐसी बस्ती से ही चुने गये अपने शौहर मिर्ज़ा की क्षुद्रता की सारी आदतों से वाक़िफ़ रहने पर भी बेगम साहिबा इस जानकारी की वजह से ही उनके प्रति अंधी बनी रही क्योंकि उनसे उसे उसकी औक़ात का पता रहता था। पर अब, जब बुढ़ापे में मिर्ज़ा ने हवेली को ही बेच देने की ऊँची उड़ान भरनी चाही, बेगम को उसके पर कतरने और उसके साथ जुटे मुर्गीचोरों की उस पूरी बस्ती को उनकी हैसियत बता देने में एक क्षण नहीं लगा।

सबसे दिलचस्प था इसमें पुरातत्व विभाग का पहलू।

प्रमोटर की भूमिका तो पिटे-पिटाये रूप में ही सामने आती है। पर एक चरम भ्रष्ट राज्य के सारे पवित्र माने जाने वाले, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में लगे अंग भी किस प्रकार इस राज्य के शरीर के कोढ़ से गल-गल कर गिरने लगे हैं, पुरातत्व विभाग इसी का नमूना है। राजनीतिक-विचारधारात्मक भ्रष्टाचार की ओट में नगद-कौड़ी से जुड़ी तमाम क्षुद्र प्रवृत्तियों का प्रवेश और भी आसान होता है।

बहरहाल, इस फ़िल्म का फ़िल्मांकन भी अलग से टिप्पणी की अपेक्षा रखता है।

महज देखने वाली नज़रों के लिए भव्य अतीत के खंडहर वैसे ही बहुत लुभावने होते हैं। वे सहज ही उनकी कल्पना को उस व्यतीत रौशन परिप्रेक्ष्य से जोड़ देते हैं, जिसमें वर्तमान के सारे चरित्रों का बौनापन और भी मुखर हो जाता है।

सुजीत सरकार ने हवेली के भारी खंभों और उसकी मेहराबों के साथ ही उसके बाशिंदों की ज़रूरत के पाखाना के शाट्स से अतीत से वर्तमान तक की यात्रा के इन सारे अंतरालों को खोल कर रख दिया है। मिर्ज़ा के पास ताला लगाने की अब वही एक जगह बची थी।

मिर्ज़ा इन सबके बीच की वह असाधारण कड़ी ही है जिसमें अब सिवाय ओछापन के और कुछ नहीं धरा है। आटा चक्की से बंधा बाँके और तमाम चालाकियों को जीने वाली उसकी बहन भी इस अतीत के साथ घिसटते चले आ रहे उन परजीवी तत्वों की नई जमात के चरित्र हैं, जिनकी लालसाओं का टुच्चापन उन्हें सिर्फ हंसी का पात्र बना दे रहा है। इनके प्रति करुणा का कोई स्थान नहीं बचता है।

अभिनय के मामले में अमिताभ और आयुष्मान, दोनों ने अपने चरित्रों को बखूबी जीया है। बाक़ी मनहूस सी सूरत वाले पुरातत्व अधिकारी के रूप में विजय राज और चिकने घड़े की मूरत लगते वकील की भूमिका में बृजेंद्र काला का भी सुजीत सरकार ने सटीक प्रयोग किया है।

लखनऊ शहर की तमाम खंडहरनुमा हवेलियों में आज पल रहा यह जीवन खंडहर हो चुकी भारत की कल्पित भव्य प्राचीनता में पनप रहे सड़ांध से भरे एक बजबजाते हुए समाज का रूपक पेश करता है।

इसमें सरकार की भूमिका भी सिवाय गंद फैलाने के और कुछ नहीं रह गई है। अतीत उसके राजनीतिक व्यवसाय की वस्तु है।

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

कौन सा ऐसा बंगाल का फ़िल्मकार होगा, जिसे कोलकाता के बाबुओं की कोठियों ने आकर्षित नहीं किया होगा। सुजीत सरकार ने लखनऊ की हवेलियों में मानों अपने अचेतन में बैठे उसी रोमांच को लखनऊ की एक हवेली में प्रतिस्थापित किया है।

फिल्म के अंतिम शॉट्स में तांगे पर निढाल पड़े मिर्जा साहब लखनऊ के नवाब पदवीधारियों की अवैध जमात की दुर्दशा और सिर्फ ढाई सौ में बेची गई उनकी कुर्सी के एक एंटीक शोरूम में लाखों की कीमत के रूप में भाग्योदय का संकेत भी किसी की दया से मिली चीज को भुना कर अपना पेट भरने वाले परजीवियों की पूरी कहानी कहते हैं।

अरुण माहेश्वरी

 

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