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अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई नई वेब सीरीज पाताल लोक,New web series Patal Lok released on Amazon Prime,

समाज और राजनीति के असल पाताललोक से रू-ब-रू कराती है पाताल लोक

समीक्षा : पाताललोक | Review Patal Lok in Hindi

अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई नई वेब सीरीज पाताल लोक (New web series Patal Lok released on Amazon Prime) काफी चर्चित हो रही है और दर्शकों को खूब पसंद आ रही है। इसके मुख्य किरदारों (The main characters of the web series Hades) में एक इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी की ज़बान में दुनिया एक नाह बल्कि तीन हैं, सबसे ऊपर स्वर्गलोक यानि की रईसों की दुनिया, दूसरी बीच में धरतीलोक, यानि आम लोगों की दुनिया और तीसरी सबसे नीचे पाताललोक, यानी गरीबों की दुनिया जिसे हाथीराम कीड़ों की दुनिया कहकर भी संबोंधित करता है। पाताललोक अपने दर्शकों कों समाज और राजनीति के असल पाताललोक यानी भ्रष्टाचार, हिंसा, अपराध ओर उन तमाम बुराईयों से रुबरु कराती है जो रुपहले परदे और चमक दमक के पीछे छुपे रहते हैं।

सिरीज़ की शुरुआत एक नामी प्राइम टाइम पत्रकार, जो अपनी चमक और नौकरी बचाने की कोशिश में लगा हुआ है, की हत्या करने आये 4 षड्यन्त्रकारियों की गिरफ्तारी से शुरू होती है और इनके साथ शुरू होता है इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी का इन्वेस्टीगेशन, जिसे अपने अब तक के करियर में कोई ढंग का केस नहीं मिला और वो इसके जरिये प्रमोशन पाना चाहता है।

एपिसोड दर एपिसोड यह सिरीज़ पहले उन 4 षड्यन्त्रकारियों की कहानी को उजागर करती है और इन्हीं पात्रों के जरिये निर्माता निर्देशक ने वर्तमान भारतीय समाज की जाति व्यवस्था में शोषण और उससे जन्मे असंतोष के स्वर जिसमे यदा कदा हिंसा के स्वर भी शामिल हैं, धनबल बाहुबल के दम पर न्याय व्यवस्था को ठेंगा दिखाता हुआ शक्तिसंपन्न शोषक, और वह समाज जहाँ स्त्री का बलात्कार एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है, मुसलमानों के साथ हो रहा भेदभाव और उनका अपनी अस्मिता को लेकर भय और मॉब लिंचिंग जैसे सवालों को बड़ी ही साफगोई से परदे पर उकेरा है।

यह पाताललोक कभी प्राइम टाइम और लीड स्टोरी नहीं बन पाता | This underworld never becomes prime time and lead story

दरअसल हाथीराम जिस पाताललोक की बात करता है वह यहीं हमारे आसपास कहीं घटित हो रहा है लेकिन वह कभी प्राइम टाइम और लीड स्टोरी नहीं बन पाता। पाताललोक अपने शीर्षक के मुताबिक हमें उसी अँधेरी दुनिया की क्रूर और भयावह सच्चाई की ओर ले जाती है जिसे प्राइम टाइम के गलाफाड़ एंकर और फर्जी व्हाट्सएप्प फॉरवर्ड्स के शोर में दबा दिया जाता है। हाथीराम चौधरी बार-2 कहता है “ऐसा लिखा तो शास्त्रों में हैं……पर मैंने व्हाट्सएप्प पर पढ़ा था।”

कहानीकार ने बड़े ही चुटीले मगर सीरियस बातचीत के दौरान मुख्य पात्र के जरिये सोशल नेटवर्क्स और फेक फॉरवर्ड्स को प्रस्तुत किया है।

इन 4 अभियुक्तों की कहानियां जहाँ हमे समाज के अंधेरों में ली जाती हैं जहाँ अपराध और अपराधी पैदा होते हैं तो वहीँ दूसरी ओर एंकर संजीव मेहरा और उनके मालिक सिंह साहब और दिल्ली पुलिस के डीसीपी भगत के किरदारों के जरिये निर्देशक ने कॉर्पोरेट-मीडिया-पुलिस-राजनीति और अपराध के नेक्सस को बड़ी ही सटीक ढंग से परदे पर पेश किया है। जहाँ एंकर और उसके मालिक की लड़ाई और उनके भ्रष्टाचार की कड़ी राजनीति से जा मिलती है।

कहानी जैसे-2 आगे बढ़ती है और हाथीराम मामले की तह तक जाने की जिद ठान लेता है तो डीसीपी भगत बेचैन हो उठता है और हाथीराम को हटाकर मामला सीबीआई को दे दिया जाता है। सीबीआई जिस तरह से हत्या के एक षडयंत्र को आइएसआई का टेरर अटैक और नेपाली स्लीपर सेल का नाम देकर पूरी इन्वेस्टीगेशन को पड़ोसी मुल्क का आतंकी एजेंडा बताकर स्पिन करती है, ये बात हाथीराम और इंस्पेक्टर अंसारी को हज़म नहीं होती और सस्पेंसन के बाद भी वह सवालों के जवाब खोजने में लग जाता है। सिरीज़ का यह हिस्सा वाकई में सिहरन पैदा करता है और बिना किसी हीरोइक एक्शन के दर्शकों को बांधे रखता है और देश की पुलिस और उनके रियल लाइफ का असल अक्स परदे पर पेश करता है।

एंकर संजीव मेहरा का सीबीआई की प्रेस ब्रीफिंग पर बिना किसी एविडेंस या जांच पड़ताल के अपने निहित स्वार्थों के लिए टेरर प्लाट की स्टोरी को प्राइम टाइम पर जानबूझकर चलाना वर्तमान टीवी मीडिया के एक हिस्से का अक्स दिखता है, और हाथीराम को इन्वेस्टीगेशन से हटाना ऐसे सवाल हैं जो आपको भारत में जेलों में सालों साल से बंद बेगुनाह लोगों और दशकों बाद रिहा होने वाले आरोपियों की याद दिलाते हैं।

सिरीज़ के एक दृश्य को लेकर कुछ लोगों ने आपत्तियां जाहिर की हैं जहाँ सीबीआई प्रेस ब्रीफिंग में एक आरोपी कबीर एम. के घर से बरामदगी के नाम पर उर्दू की कुछ किताबों (फ़ज़ाइल ए अमल – यानी मुसलमान का जीवन कैसा हो, जन्नती जेवर- महिलाओं के जीवन के मसले) को जिहादी एविडेंस बताया गया है।

आपत्ति करने वालों का कहना है कि ये किताबें अमूमन मुसलमानों के घरों या मस्जिदों में मौजूद होती हैं, इसलिए इनको जिहादी बताना गलत है और यह आम जनमानस जिसे उर्दू नहीं आती उसमें इसे बिना जाने ख़राब छवि बनती है। लेकिन इसके आलोचक यह भूल रहे हैं कि वास्तव में निर्माता निर्देशक ने बड़ी सहजता से फेक टेरर मामलों और आतंकवाद के मामलों की टिपिकल चार्जशीट को परदे पर पेश किया है जहाँ कोई भी उर्दू या अरबी किताब को जिहादी साहित्य बताकर पेश किया जा सकता है।

वास्तव में सिनेमाकार इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ज़मीनी हकीक़त का अक्स हुबहू अपनी कहानी में बिना लाग लपेट के और साफगोई से पेश किया है। दर हकीक़त यह फिल्म जिन भी सवालों को परदे पर उतारती है उनमें आतंकवाद और एक बड़ी जांच एजेंसी के फेक टेरर प्लॉट (Fake Terror Plot of Investigation Agency) को अभी तक शायद ही किसी फिल्म/ सिरीज़ ने इतनी बोल्डनेस के साथ पेश किया है जिसकी जड़ें चुनावी राजनीति के दलदल में जाती हैं और वहां हर शख्स एक मोहरा है चाहे वह विशाल त्यागी उर्फ़ हथौड़ा त्यागी हो या कबीर एम. या इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी।।

सिरीज़ के अन्य पात्रों में इंस्पेक्टर अंसारी का किरदार पूरी तरह खुलकर सामने नहीं आता है और वह हाथीराम के एक विश्वस्त साथी की भुमका में है लेकिन उसके अन्दर मुसलमान होने का भाव और कुछेक अस्मितावादी टिप्पणियों पर उसका चुप लगा जाना शायद इस देश के मुसलमानों का प्रतिनधित्व करता है जो अब बस चुपचाप सुन लेते हैं। सारा का किरदार संजीव मेहरा के आकर्षण में बंधा हुआ है लेकिन जैसे -2 कहानी आगे बढती है उसका मोहपाश टूटने लगता है। संजीव मेहरा की पत्नी का किरदार खीझ पैदा करता है और उनकी ज़िन्दगी को शायद और बेहतर तरीके से उकेरने की गुंजाइश थी।

इसी तरह एक जगह चैनेल के मालिक सिंह साहब लेफ्ट-लिबरल को लेकर टिप्पणी करते हैं जो बहुत सतही लगता है और बस मसालेदार बनाने के लिए है या यह सन्देश देने के लिए की संजीव मेहरा भले ही खुद को पत्रकारिता के उसूलों पर चलने वाला मानता हो लेकिन मौका आने पर सब हमाम में नंगे नज़र आते हैं।

मो. आरिफ (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
मो. आरिफ
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

जयदीप अहलावत बिना किसी मुश्किल से बखूबी पुलिस के रोल में जमे हैं और अंत तक अपने चेहरे से तमाम भावों को हम तक पहुंचाते हैं। विशाल त्यागी के रोले में अभिषेक बनर्जी भी फिट बैठते हैं और बहुत कम संवादों के बाद भी अपनी आँखों से ही दृश्यों में जान भर देते हैं। नीरज कबी भी, प्राइम टाइम एंकर के रोल में सहज नज़र आते हैं। गुल पनाग, हाथीराम की पत्नी की भूमिका में और एक मां की भूमिका को आसानी से पेश करती हैं।

कुल मिलाकर यह सिरीज़ अपने दर्शकों को जरुर पसंद आएगी और चूँकि ज्यादातर कहानियां ऐसी हैं जिन्हें हमने कहीं न कहीं जरुर सुना या पढ़ा होगा। अभिनय, संगीत और दृश्यांकन के लहज़ से यह सिरीज़ बेहद रीयलिस्टिक लगती है और यही इसकी खासियत भी है कि बिना किसी हीरोइक एक्शन के भी यह एक बेहतरीन इनवेस्टिगेटिव थ्रिलर साबित होती है जिसके मूल में राजनीति है और पूरी कहानी इसी राजनीती के इर्द-गिर्द घूमती है।

निर्माता निर्देशक ने बड़ी ही खूबसूरती के साथ 4 आरोपियों के जरिये राजनीति-पुलिस-मीडिया-अपराध के गठजोड़ को बखूबी बयान किया है और उन चारों की कहानियों को एक में पिरो कर कैनवस पर जीवंत कर दिया है।

मो. आरिफ

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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