दंगे देश की अर्थ व्यवस्था को पीछे ढकेलते हैं, दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं

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यह किसी से छिपा नहीं है कि देश कुछ दिनों से कमजोर उत्पादन, बेरोजगारी, आशंकित अर्थव्यवस्था के चलते चिंतित है। डॉलर की तुलना में रूपए का अवमूल्यन, महंगाई से आम लोग प्रभावित हैं। उधर कोरोना वायरस के कारण चीन से प्रतिबंधित हुए व्यापार के कारण देश के कारखानों में काम ठप्प है और इसका सीधा असर बाजार पर है। ऐसे में देश की राजधानी दिल्ली के 12 किलोमीटर दायरे में सांप्रदायिक दंगे भड़कना, आम लोगों में विश्वास के क्षरण के साथ-साथ आने वाले कई सालों के लिए समाज के गरीब तबके को और गरीब बना देगा। यह सभी जानते हैं कि जिस देश की राजधानी में इस तरह चार दिन तक सड़कों पर कानून की जगह उपद्रवियों का राज हो, वहां कोई भी विदेशी कंपनी निवेश करने को तैयार होगी नहीं। जब निवेश नहीं होगा तो न हमारी अर्थ व्यवस्था में सुधार होगा और ना ही लोगों को रोजगार मिलेगा।

जिस व्यापार, धंधे, प्रापर्टी, मानव संसाधन और सबसे बड़ी बात भरोसे का निर्माण करने में इंसान व मुल्क को दशकों लगते हैं, उसे बर्बाद करने में पल भी लगता। महज कोई क्षणिक आक्रोश, विद्वेष या साजिश की आग में समूची मानवता और रिश्ते झुलस जाते हैं और पीछे रह जाती हैं संदेह, बदले और सियासती दांव पेंच की इबारतें। विश्व में न्याय, आपसी प्रेम और समानता के प्रतीक माने जाने वाले संविधान की रक्षा के लिए चल रहा आंदोलन दिल्ली में अचानक खूनी संघर्ष में बदल गया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि दंगे जिन इलाकों में भड़के वे एशिया का सबसे बड़ा रेडिमेड कपड़े के मार्केट कहलाने वाले गांधी नगर के लिए कपड़े तैयार करने वालों का इलाका है, देशभर में आटो पार्ट की सप्लाई करने वाली छोटी-बड़ी ईकाइयों का स्थल है, प्लास्टिक से बनने वाले सामान के सैंकड़ो कारखानों का केंद्र हैं।

एक अनुमान है कि दंगाग्रस्त इलाकों में कोई आठ हजार इकाईयां नष्ट हो गईं जिनमें लगभग 50 हजार लोगों को सीधा रोजगार मिला था।

इस इलाके में दिल्ली को समर्थ परिवहन देने वाले बैटरी रिक्शा, आटो रिक्शा चालक और कारखानों से माल ढो कर दुकानों या ट्रांसपोर्ट तक पहुंचाने वाले हजारों मालवाहकों के निवास हैं। कुछ ही देर में ये कारखाने, उनके उत्पाद के छोटे-मोटे गोदाम, सवारी या माल के सैंकड़ों वाहन राख हो गए हैं। कई सौ घर भी फूंक डाले गए हैं। कई सौ करोड़ का जो नुकसान हुआ, वह किसी व्यक्ति का नहीं, देश की अर्थ व्यवस्था को इतनी गहरी चोट है जिससे उबरना संभव नहीं होगा और यह त्रासदी कई हजार लोगों को एक झटके में ‘‘बीपीएल या गरीबी रेखा से नीचे’’ ला कर खड़ा कर रही है।

जान लें, इससे न तो किसी धर्म को हानि होती है और न ही लाभ लेकिन देश जरूर कई साल पीछे खिसक जाता है।

हिंसा की खबरों का विपरीत प्रभाव पर्यटन पर भी पड़ा है। सनद रहे दिल्ली में विदेशी पर्यटकों के आगमन का यह लगभग आखिरी हफ्ता है। गरमी पड़ने पर बाहरी पर्यटक कम ही आते हैं। पर्यटकों के अपने टूर निरस्त करने से होटल, टैक्सी सहित कई व्यवसाय को भयंकर घाटा उठाना पड़ रहा है। हर बार की तरह इन दंगों का भी अपना अर्थशास्त्र (Economics of riots) है।

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत में हिंदू और मुसलमान गत् 1200 वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं। डेढ़ सदी से अधिक समय तक तो पूरे देश पर मुगल यानी मुसलमान शासक रहे।

इस बात को समझना जरूरी है कि 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को यह पता चल गया था कि इस मुल्क में हिंदू और मुसलमानों के आपसी ताल्लुक बहुत गहरे हैं और इन दोनों के साथ रहते उनका सत्ता में बना रहना मुश्किल है। एक साजिश के तहत 1857 के विद्रोह के बाद मुसलमानों को सताया गया, अकेले दिल्ली में ही 27 हजार मुसलमानों का कत्लेआम हुआ। अंग्रेज हुक्मरान ने दिखाया कि हिंदू उनके करीब है। लेकिन जब 1870 के बद हिंदुओं ने विद्रोह के स्वर मुखर किए तो अंग्रेज मुसलमानों को गले लगाने लगे। यही फूट डालो और राज करो की नीति इतिहास लेखन, अफवाह फैलाने में काम आती रही।

Why do riots happen?

यह तथ्य भी गौरतलब है कि 1200 साल की सहयात्रा में दंगों का अतीत तो पुराना है नहीं।

कहा जाता है कि अहमदाबाद में सन् 1714, 1715, 1716 और 1750 में हिंदू मुसलमानों के बीच झगड़े हुए थे। उसके बाद 1923-26 के बीच कुछ जगहों पर मामूली तनाव हुए।

सन् 1931 में कानपुर का दंगा भयानक था, जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी की जान चली गई थी। दंगें क्यों होते हैं? इस विषय पर प्रो. विपिन चंद्रा, असगर अली इंजीनियर से ले कर सरकार द्वारा बैठाए गए 100 से ज्यादा जांच आयोगों की रिपोर्ट तक साक्षी है कि झगड़े ना तो हिंदुत्व के थे ना ही सुन्नत के। कहीं जमीनों पर कब्जे की गाथा है तो कहीं वोट बैंक तो कहीं नाजायज संबंध तो कहीं गैरकानूनी धंधे।

गणेश शंकर विद्यार्थी की जान लेने वाले सन् 1931 में कानपुर में हुए दंगों के बाद कांग्रेस ने छह सदस्यों का एक जांच दल गठित किया था। सन् 1933 में जब इस जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी थी तो तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधताओं के बावजूद सदियों से ये दोनों समाज दुर्लभ सांस्कृतिक संयोग प्रस्तुत करते आए हैं। उस रिपोर्ट में दोनों संप्रदायों के बीच तनाव को जड़ से समाप्त करने के उपायों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था -धार्मिक-शैक्षिक, राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक। उस समय तो अंग्रेजी सरकार ने अपनी कुर्सी हिलती देख इस रिपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी। आज कतिपय राजनेता अपनी सियासती दांवपेंच को साधने के लिए उस प्रासंगिक रिपोर्ट को भुला चुके हैं। मुंबई दंगों की श्रीकृष्ण आयोग की रपट का जिन्न तो कोई भी सरकार बोतल से बाहर नहीं लाना चाहती।

आम गरीब ना तो स्थाई नौकरियों में है ना ही औद्योगिक घरानों में, हां हस्तकला में उनका दबदबा जरूर है। लेकिन विडंबना है कि यह हुनरमंद अधिकांश जगह मजदूर ही हैं। यदि देश में दंगों को देखें तो पाएंगे कि प्रत्येक फसाद गरीबों के मुंह का निवाला छीनने वाला रहा है। भागलपुर में बुनकर, भिवंडी में पावरलूम, जबलपुर में बीडी, मुरादाबाद में पीतल, अलीगढ़ में ताले, मेरठ में हथकरघा…, जहां कहीं दंगे हुए मजदूरों के घर जलें, उनमे कुटीर उद्योग चैपट हुए। एस. गोपाल की पुस्तक ‘‘द एनोटोमी ऑफ द कन्फ्रंटेशन’’ में अमिया बागची का लेखन इस कटु सत्य को उजागर करता है कि सांप्रदायिक दंगे मुसलमानों की एक बड़ी तादाद को उन मामूली धंधों से भी उजाड़ रहे हैं जो उनके जीवनयापन का एकमात्रा सहारा है। (प्रिडेटरी कर्मशलाईजेशन एंड कम्यूनिज्म इन इंडिया)।

दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। | Riots are stigma in the name of humanity.

धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार व पुलिस में बैठा एक वर्ग खुद सांप्रदायिक हो जाता है तो उसकी सीधी मार निरपराध, गरीब और अशिक्षित वर्ग पर पड़ती है। एक बारगी लगता हो कि दंगे महज किसी कौम या फिरके को नुकसान पहुंचाते हैं, असल में इससे नुकसान पूरे देश के विकास, विश्वास और व्यवसाय को होता है।

आज जरूरत इस बात की है कि दंगों के असली कारण, साजिश को सामने लाया जाए तथा मैदान में लड़ने वालों की जगह उन लोगों को कानून का कड़ा पाठ पढ़ाया जाए जो घर में बैठ कर अपने निजी स्वार्थ के चलते लोगों को भड़काते हैं व देश के विकास को पटरी से नीचे लुढ़काते हैं।

दुखद यह भी है कि दिल्ली में दंगों के दौरान कोई भी राजनीतिक दल खुल कर शांति की अपील या प्रयास के साथ सामने नहीं आया। प्रशासन या सत्ता पर आरोप लगाने वाले तो बहुत सामने आते हैं, लेकिन जब लोगों को संभालने की जरूरत होती है तब सभी दल घरों में दुबक कर खुद को एक संप्रदाय का बना लेते हैं।

पंकज चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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