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जानिए आपराधिक न्याय तंत्र में डॉक्टरों की भूमिका क्या है

Know what is the role of doctors in the criminal justice system

एक पीड़ित अस्पताल में पहुंचते ही जब डॉक्टर को अपनी व्यथा-कथा सुनाए तो एक डॉक्टर का पहला कर्त्तव्य क्या होना चाहिए | What should be the first duty of a doctor when a victim narrates his or her grief to the doctor as soon as they reach the hospital

पश्चिम बंगाल के एक गाँव की महिला ने गाँव के एक युवक पर आरोप लगाया कि उसने 28 अप्रैल, 1997 को उसके साथ बलात्कार किया है। यह शिकायत पंचायत में प्रस्तुत की गई थी। 5 महीने तक कोई कार्यवाही नहीं हुई तो 26 सितम्बर, 1997 को महिला ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवा दी जिस पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता का वक्तव्य मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखा गया। इसके एक वर्ष बाद 26 सितम्बर, 1998 की रात्रि में बलात्कारी तथा एक अन्य युवक ने उस महिला के घर का द्वार खटखटाया। द्वार खुलते ही दोनों युवकों ने महिला पर एसिड प्रहार किया और भाग गये। महिला का पति मन्दबुद्धि था। अत: घर पर होने के बावजूद भी वह किसी प्रकार से लाभदायक नहीं था। उसके अतिरिक्त दो छोटे बच्चे थे। महिला के शोर मचाने पर पड़ोसी पहुँच गये, महिला को पहले पुलिस स्टेशन लेकर गये और उसके बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर गये। पुलिस स्टेशन में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं हुई।

Doctors of the hospital did not send the report of the incident to the police

अस्पताल में उसने सारी घटना तथा दोनों हमलावरों के नाम भी डॉक्टर को बता दिये थे। परन्तु अस्पताल के डॉक्टरों ने इसकी सूचना रिपोर्ट पुलिस को नहीं भेजी। इस घटना के लगभग 5 दिन बाद उसने एक शिक्षित व्यक्ति के माध्यम से शिकायत लिखवाई और रजिस्टर्ड डाक से पुलिस स्टेशन भेजी। इस लिखित शिकायत में उसने अस्पताल में भी अपने विरुद्ध दो अनजान व्यक्तियों द्वारा हमले की शंका व्यक्त की। यह लिखित शिकायत 7 दिन बाद पुलिस स्टेशन में पहुँची तो पुलिस ने छानबीन की कार्यवाही प्रारम्भ की, परन्तु तब तक 23 नवम्बर, 1998 के दिन शिकायतकर्ता महिला ने दम तोड़ दिया। इस प्रकार दोनों हमलावरों के विरुद्ध धारा-302 के अन्तर्गत मुकदमा (Lawsuit under section 302) दर्ज करके कार्यवाही प्रारम्भ की गई, जबकि इनमें से एक हमलावर के विरुद्ध बलात्कार का मुकदमा (Rape case against the attacker) पहले ही लम्बित था। शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद बलात्कार के मुकदमें में आरोपी को बरी कर दिया गया। अब केवल कत्ल का मुकदमा शेष था जिसमें मृतक महिला के रिश्तेदारों, पड़ोसियों के अतिरिक्त अस्पताल में इलाज करने वाले प्रथम डॉक्टर का वक्तव्य प्रमुख रूप से लिखा गया।

आरोपियों ने अपनी सफाई में कोई गवाह प्रस्तुत नहीं किया। सत्र न्यायालय ने बलात्कारी आरोपी को मृत्युदण्ड की सज़ा सुनाई जबकि दूसरे आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

अपराधियों द्वारा कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अपील में निर्णय देते हुए उच्च न्यायालय ने दोनों अपराधियों को बरी कर दिया। इस निर्णय के विरुद्ध शिकायतकर्ता महिला के भाई सुरेश चन्द्र जैना ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।

Supreme Court said that benefit of every small and big doubt cannot be given to the accused

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री एन.वी. रमन्ना एवं न्यायमूर्ति श्री प्रफुल्लचन्द पंत की पीठ ने इस अपील पर सुनवाई की।

अभियुक्तों के वकीलों ने हर प्रकार की तकनीकी आपत्तियों के बल पर अभियुक्तों को बेकसूर सिद्ध करने का प्रयास किया। परन्तु सारे मामले पर विचार करने के उपरान्त सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पुलिस, डॉक्टरों तथा समूचे तन्त्र की असंवेदनशीलता का उदाहरण बताया। उच्च न्यायालय ने भी तथ्यों, हालात तथा गवाहों को समझने में एक सामान्य बुद्धि का परिचय दिया।

The main objective of the administration of justice is to protect society. | What is the importance of administration of justice?

अदालत ने कहा कि हर छोटे-बड़े संदेह का लाभ अभियुक्तों को नहीं दिया जा सकता। किसी परिस्थिति में जब किसी संदेह के कारण वस्तुस्थिति का आकलन करना असम्भव हो रहा हो तो ऐसे संदेह का लाभ ही अभियुक्तों को दिया जाना चाहिए। न्याय के प्रशासन का मुख्य उद्देश्य समाज की रक्षा करना है। न्यायिक प्रक्रिया ऐसे पीड़ितों को अनदेखा नहीं कर सकती जो मर चुके हैं और अदालत के समक्ष अपने दु:ख को व्यक्त नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति श्री रमन्ना ने अपने पृथक निर्णय नोट में कुछ विशेष और महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का उल्लेख किया।

न्यायमूर्ति श्री रमन्ना ने कहा कि अपराधिक न्याय व्यवस्था केवल निगरानी का तंत्र नहीं है अपितु इसका उद्देश्य प्रत्येक देशवासी का संरक्षण होना चाहिए। इसमें कोई आपत्ति नहीं है कि इस आपराधिक न्याय व्यवस्था का संचालन कई स्तरों पर अलग-अलग प्रकार के लोगों के द्वारा किया जाता है। यदि पीड़ित पक्ष के लोग और पूरा समाज जागरूक हो तभी इन सारे स्तरों पर तन्त्र के लोग आवश्यक कार्यवाही करते हुए दिखाई देंगे।

एक पीड़िता अस्पताल में पहुंचते ही जब डॉक्टर को अपनी व्यथा-कथा सुनाती है तो डॉक्टर का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह उसके सारे वक्तव्य को लिखकर पुलिस के समक्ष प्रस्तुत करे। परन्तु इस मामले में डॉक्टरों ने भी पूरी लापरवाही का परिचय दिया। डॉक्टरों ने पीड़ित महिला का प्रथम वक्तव्य नहीं लिखा। यहाँ तक कि अस्पताल में भर्ती के दौरान जब उसे कुछ अन्य लोगों से धमकी की आशंका थी तब भी कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस प्रकार 26 दिन तक अस्पताल के डॉक्टर या पुलिस ने पीड़िता से पूछताछ करने का कोई प्रयास नहीं किया।

उच्च न्यायालय जैसे स्तर पर कार्य करने वाले न्यायाधीश भी तकनीकी कमजोरियों के आधार पर अपराधियों को छोड़ने का कार्य कर देते हैं। न्यायाधीशों को कानून की भावनाओं के आधार पर कार्य करने का प्रशिक्षण मिलता है।

जहाँ तक एसिड हमलों की घटनाओं का प्रश्न है, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि इससे पीड़िता को केवल शारीरिक ही नहीं अपितु मनोवैज्ञानिक ठेस भी पहुँचती है। सख्त कानूनों तथा सर्वोच्च न्यायालय के अनेकों निर्णयों के बावजूद भी एसिड हमलों की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। ऐसी घटनाएँ केवल कानूनों से नहीं रुकेंगी। इन्हें रोकने के लिए समाज में विद्यमान नर-नारी भेदभाव को समाप्त करने की आवश्यकता है।

विमल वधावन एडवोके

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप)

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