जानिए स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका क्या है

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आजादी की लड़ाई में मीडिया की भूमिका | आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का योगदान (Role of media in freedom struggle | Contribution of journalism in freedom struggle)

स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी पत्रकारिता का योगदान pdf

स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका | स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता (Role of Hindi Journalism in Freedom Struggle. Freedom Struggle and Journalism)

हमारे देश के स्वाधीनता संघर्ष में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है। आजादी के आन्दोलन में भाग ले रहा हर आम-ओ-खास कलम की ताकत से वाकिफ था। राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबा साहब अम्बेडकर, यशपाल जैसे आला दर्जे के लीडर सीधे-सीधे तौर पर पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हुए थे और नियमित लिख रहे थे। जिसका असर देश के दूर-सुदूर गांवों में रहने वाले देशवासियों पर पड़ रहा था। अंग्रेजी सरकार को इस बात का अहसास पहले से ही था, लिहाजा उसने शुरू से ही प्रेस के दमन की नीति अपनाई। 

भारत में पत्रकारिता की नींव अठाहरवीं सदी में, कंपनी शासनकाल में एक अंग्रेज जॉन्स आगस्टक हिक्की ने रखी थी। अपने अखबार के जरिए हिक्की ने उस समय कंपनी के भ्रष्टाचार पर जमकर प्रहार किए। जिसके एवज में उस पर मुकदमा चला और कारावास भी भुगतना पड़ा।

हिंदी पत्रकारिता की शुरूआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan roy father of indian journalism) को दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा। भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया। समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किए और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की।

राजा राममोहन राय ने कई पत्र शुरू किए। जिसमें अहम हैं-साल 1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’। बंगाल गजट भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे। इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना फैलाई।

30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकलने वाले ‘उदंत मार्तण्ड’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता है। अपने समय का यह खास समाचार पत्र था, मगर आर्थिक परेशानियों के कारण यह जल्दी ही बंद हो गया। आगे चलकर माहौल बदला और जिस मकसद की खातिर पत्र शुरू किए गए थे, उनका विस्तार हुआ।

समाचार सुधा वर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण, बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला जैसे दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक पत्र तो सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चांद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए वतनपरस्ती के जज्बे को जगाया और क्रांति का आह्वान किया। नतीजतन उन्हें सत्ता का कोपभाजन बनना पड़ा। दमन, नियंत्रण के दुष्चक्र से गुजरते हुए उन्हें कई प्रेस अधिनियमों का सामना करना पड़ा।

‘वर्तमान पत्र’ में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखा ‘राजनीतिक भूकम्प’ शीर्षक लेख, ‘अभ्युदय’ का भगत सिंह विशेषांक, किसान विशेषांक, ‘नया हिन्दुस्तान’ के साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और फासीवादी विरोधी लेख, ‘स्वदेश’ का विजय अंक, ‘चांद’ का अछूत अंक, फांसी अंक, ‘बलिदान’ का नववर्षांक, ‘क्रांति’ के 1939 के सितम्बर, अक्टूबर अंक, ‘विप्लव’ का चंद्रशेखर अंक अपने क्रांतिकारी तेवर और राजनैतिक चेतना फैलाने के इल्जाम में अंग्रेजी सरकार की टेढ़ी निगाह के शिकार हुए और उन्हें जब्ती, प्रतिबंध, जुर्माना का सामना करना पड़ा। संपादकों को कारावास भुगतना पड़ा।

कब आया पहला प्रेस अधिनियम (When did the first press act come?) | Who was the father of Indian journalism? (भारतीय पत्रकारिता के जनक कौन थे?)

भारतीय पत्रकारिता की स्वाधीनता को बाधित करने वाला पहला प्रेस अधिनियम गवर्नर जनरल वेलेजली (Governor General Wellesley) के शासनकाल में 1799 को ही सामने आ गया था। भारतीय पत्रकारिता के आदिजनक जॉन्स आगस्टक हिक्की के समाचार पत्र ‘हिक्की गजट’ (‘Hickey Gazette‘ newspaper of John Augustus Hickey, the father of Indian journalism) को विद्रोह के चलते सर्वप्रथम प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। हिक्की को एक साल की कैद और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा हुई।

कालांतर में 1857 में गैंगिंक एक्ट, 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1908 में न्यूज पेपर्स एक्ट (इन्साइटमेंट अफैंसेज), 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट, 1930 में इंडियन प्रेस ऑडिनेंस, 1931 में दि इंडियन प्रेस एक्ट (इमरजेंसी पावर्स) जैसे दमनकारी कानून अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने के उद्देश्य से लागू किए गए। अंग्रेजी सरकार इन काले कानूनों का सहारा लेकर किसी भी पत्र-पत्रिका पर चाहे जब प्रतिबंध, जुर्माना लगा देती थी। आपत्तिजनक लेख वाले पत्र-पत्रिकाओं को जब्त कर लिया जाता। लेखक, संपादकों को कारावास भुगतना पड़ता व पत्रों को दोबारा शुरू करने के लिए जमानत की भारी भरकम रकम जमा करनी पड़ती। बावजूद इसके समाचार पत्र संपादकों के तेवर उग्र से उग्रतर होते चले गए। आजादी के आन्दोलन में जो भूमिका उन्होंने खुद तय की थी, उस पर उनका भरोसा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया। जेल, जब्ती, जुर्माना के डर से उनके हौसले पस्त नहीं हुए।

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रवक्ता का रोल निभाया।

कानपुर से 1920 में प्रकाशित ‘वर्तमान’ ने असहयोग आन्दोलन को अपना व्यापक समर्थन दिया था। पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा शुरू किया गया साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय’ उग्र विचारधारा का हामी था। अभ्युदय के भगत सिंह विशेषांक में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदनमोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू के लेख (Articles of Pandit Jawaharlal Nehru) प्रकाशित हुए। जिसके परिणामस्वरूप इन पत्रों को प्रतिबंध-जुर्माना का सामना करना पड़ा। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, सज्जाद जहीर एवं शिवदान सिंह चौहान के संपादन में इलाहाबाद से निकलने वाला ‘नया हिन्दुस्तान’ राजाराम शास्त्री का ‘क्रांति’ यशपाल का ‘विप्लव’ अपने नाम के मुताबिक ही क्रांतिकारी तेवर वाले पत्र थे। ‘नया हिन्दुस्तान’ और ‘विप्लव’ के जब्तशुदा प्रतिबंधित अंकों को देखने से इनकी वैश्विक दृष्टि का पता चलता है। फासीवाद के उदय और बढ़ते साम्राज्यवाद, पूंजीवाद पर चिंता इन पत्रों में साफ  देखी जा सकती है।

हमें गहरे सरोकारों से जोड़ती है स्वाधीनता आंदोलन के दौर की पत्रकारिता (Journalism of the era of freedom movement connects us with deep concerns)

गोरखपुर से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र ‘स्वदेश’ को अपने उग्र विचारों और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण की भावना के कारण अंग्रेजी सरकार की कोप दृष्टि का शिकार होना पड़ा। आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा संपादित ‘चांद’ के फांसी अंक की चर्चा भी जरूरी है। यह अंक क्रांतिकारियों की गाथाओं से भरा हुआ है। अंग्रेज हुकूमत एक तरफ क्रांतिकारी पत्र-पत्रिकाओं को जब्त करती रही, तो दूसरी तरफ इनके संपादक इन्हें बिना रूके पूरी निर्भिकता से निकालते रहे।

मौजूदा दौर में जब मीडिया की आम जनता से लगभग संवादहीनता की स्थिति है। प्रतिबद्धताएं बदल गई हैं। ऐसे माहौल में स्वाधीनता आन्दोलन के दौर की पत्रकारिता न सिर्फ हमें गहरे सरोकारों से जोड़ती है, बल्कि उस कर्तव्यपथ की भी याद दिलाती है, जिसे हम बिसरा चुके हैं।

जाहिद खान

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By देशबन्धु

Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

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