बिजली पानी की हो रही समस्या की जिम्मेदार आरएसएस-भाजपा सरकार – एआईपीएफ

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RSS-BJP government responsible for electricity water problem – AIPF

कॉरपोरेट हितों के लिए हठधर्मिता पर उतरी सरकार

The government came down to dogma for corporate interests

बिजली कर्मचारियों का आंदोलन राष्ट्रीय हितों के लिए
Movement of power workers for national interest

लखनऊ, 6 अक्टूबर 2020, प्रदेश में बिजली कर्मचारियों के कार्य बहिष्कार के कारण हो रही आम जनता को बिजली और पानी की समस्याओं की जिम्मेदार आरएसएस और भाजपा की केंद्र व राज्य सरकार है. यह सरकारें कारपोरेट हितों के लिए सार्वजनिक संपदा के निजीकरण को करने की हठधर्मिता पूर्ण नीतियां लागू कर रही है. सरकारें बिजली, रेल, तेल, कोयला, बीएसएनएल, बैंक, बीमा जैसी जो भी राष्ट्रीय संपदा थी उसे हर हाल में बेचने पर आमादा है. इसलिए इनकी रक्षा के लिए चलाया जा रहा बिजली कर्मचारियों का आंदोलन राष्ट्रीय हितों का आंदोलन है. आइपीएफ जनता को हो रही तकलीफों को लेकर चिंतित है और सरकार से अपील करती है कि वह अपनी हठधर्मिता से पीछे हटकर निजीकरण के फैसले को वापस लें ताकि आम जनता को हो रही परेशानियों से उसे निजात मिल सके.

प्रेस को आज जारी बयान में ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के नेता दिनकर कपूर व वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर दुर्गा प्रसाद ने यह बातें कही.

उन्होंने कहा किआईपीएफ व वर्कर्स फ्रंट के कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में बिजली कर्मचारियों के आंदोलन के साथ है और जनता से भी अपील करता है कि वह सरकार पर दबाव डालें कि वह जारी गतिरोध को खत्म करने के लिए पहल करें.

The decision to privatize Purvanchal Power Distribution Corporation

उन्होंने कहा कि आरएसएस-भाजपा की सरकार निजीकरण के लिए विद्युत संशोधन विधेयक 2020 (Electricity Amendment Bill 2020) लाने पर आमादा है. लेकिन प्रदेश में तो इससे पहले ही प्रधानमंत्री मोदी जी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी के पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का फैसला  कर लिया गया. इन नीतियों से किसानों, मध्यवर्ग और आम जनता को बेहद महंगी बिजली खरीदने पर मजबूर होना पड़ेगा और समाज का गरीब गुरबा तो बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हो जाएगा.

The government’s logic of power sector deficit is also meaningless.

उन्होंने कहा कि सरकार का बिजली क्षेत्र के घाटे का तर्क भी बेमानी है क्योंकि जो मौजूदा घाटा है उसमें करीब तीस हजार करोड रुपए तो अकेले सरकार का ही बकाया है यदि उसे ही चुकता कर दिया जाए तो एक हद तक घाटे को कम किया जा सकता है. लेकिन सरकार यह देने को तैयार नहीं है. हद तो यह है कि उत्तर प्रदेश में बेहद सस्ती दर पर बिजली पैदा करने वाली अनपरा जैसी इकाइयों को थर्मल बैकिंग यानी बिजली उत्पादन को बंद करने के फैसले किए जाते हैं और उसी समय बेहद महंगी दर पर कारपोरेट घरानों से बिजली खरीदी जाती है और तर्क दिया जाता है कि हमारा पहले से समझौता है इसलिए उनसे बिजली खरीदना हमारी मजबूरी है यह साफ तौर पर बड़े भ्रष्टाचार का प्रतीक है.

उन्होंने कहा कि बिजली का क्षेत्र नो प्रॉफिट नो लॉस पर जनता के बुनियादी अधिकार के बतौर सार्वजनिक क्षेत्र में सृजित किया गया था जिसे आरएसएस-भाजपा की केंद्र व राज्य की सरकार अब बर्बाद करने में लगी हैं. जबकि आगरा के टोरेंट पावर के निजीकरण के प्रयोग में यह बात सीएजी की रिपोर्ट में प्रमाणित हुई कि सैकड़ों करोड़ का घोटाला हुआ था. इसके अलावा भी देश में निजीकरण के जितने भी प्रयोग हुए वह आमतौर पर विफल रहे हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि जहां तक बिजली कर्मचारियों के कार्य क्षमता पर सरकार द्वारा प्रश्न उठाया जा रहा है उसकी भी सच्चाई यह है कि बिजली कर्मचारी अपनी कार्य अवधि से ज्यादा समय काम कर रहे हैं. यहां तक कि छुट्टी के दिनों में भी वह सरकारी आदेशों का अनुपालन करते हुए विभागीय कामों को अंजाम देते हैं. इसलिए सरकार को कर्मचारियों पर दमन ढाने, उन्हें धमकी देने और फर्जी मुकदमों में फंसाने की कोशिश करने की जगह अपनी हठधर्मिता को छोड़कर राष्ट्रीय व जन हितों के मद्देनजर निजीकरण के फैसले को वापस लेना चाहिए.

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