मैं रोटी और कपड़ों में उलझा रहा, और एक फरेबी ने मेरा वतन बेच डाला.

सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने निम्न नज़्म उपलब्ध कराई है। यह नज़्म आज के दौर में भी मौजूँ है। शायर का नाम अज्ञात है।

Rukhsar Shayari in Hindi

सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने निम्न नज़्म उपलब्ध कराई है। यह नज़्म आज के दौर में भी मौजूँ है। शायर का नाम अज्ञात है।

ऐ वतन कैसे ये धब्बे दर-ओ-दीवार पर हैं ?

किस साकी के ये तमाचे तेरे रुखसार पर हैं ?

ए वतन तेरा ये उतरा हुआ चेहरा क्यूँ है ?

दर्द पलकों से लहू बनके छलकता क्यूँ है ?

इतनी वीरान तो कभी सुबह बयाबाँ न थी ?

कोई साथ कभी इस दर्ज बुरे ज़मीन पे न थी.

ज़मीन बेच डाला,

ज़मन बेच डाला,

लहू बेच डाला,

बदन बेच डाला,

और किया मेरे गुलशन की हर शै का सौदा,

शजर बेच डाला

चमन बेच डाला,

और जो किए थे ज़मीन-ओ-मकानों के वादे,

मेरी जा-ए- मरकत कफ़न बेच डाला,

मैं रोटी और कपड़ों में उलझा रहा,

और एक फरेबी ने मेरा वतन बेच डाला.

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नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे। OR
उपाध्याय अमलेन्दु:
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