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what is the real reason behind russia ukraine dispute

रूस यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि और आहत मानवता का सवाल

रूस-यूक्रेन युद्ध पर परिचर्चा | Russo-Ukraine War Debate

Vladimir’s Putin’s invasion of Ukraine has changed the world. We are living in new and more dangerous times

नई दिल्ली, 21 मार्च 2022. रूस यूक्रेन युद्ध ने दुनिया के सामने नए संकट खड़े कर दिए हैं जिससे पूंजीवादी अन्तरविरोधों का शिकार एक देश आज तबाही की कगार पर पहुंच चुका है। आहत मानवता की ह्रदय विदारक तस्वीरों के बहाने साम्राज्यवादी मीडिया तरह-तरह का नेरेटिव (वृतांत) खड़ा कर रहा है। इस शोर में युद्ध के मूल कारण परिदृष्य से गायब हैं।

युद्ध के बाद यह दुनिया कैसी होगी? | What would this world be like after the war?

आखिरकार युद्ध को समाप्त होना ही है। लेकिन उसके बाद यह दुनिया कैसी होगी? दो महाशक्तियों में बंटी दुनिया के सामने क्या कोई तीसरा विकल्प भी होगा? भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीतियों को छोड़कर क्या स्वयं को कमजोर किया है? रूस की आलोचना करने वालों को नाटो की भूमिका पर भी चर्चा करना चाहिए? ऐसे कई सवालों के जवाब एक कार्यक्रम में विद्वान वक्ताओं द्वारा दिए गए।

“रूस यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि और आहत मानवता का सवाल” विषय पर चैनल गांव के लोग के संपादक रामजी यादव द्वारा संचालित इस आयोजन में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर अजय पटनायक एवं प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव एवं जोशी अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडी के अध्येता विनीत तिवारी ने अपने विचार साझा किए।

अपने आप में अमानवीय कार्य होता है युद्ध

कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए प्रोफसर पटनायक ने कहा कि युद्ध अपने आप में अमानवीय कार्य होता है। लड़ाई सदैव ह्रदय विदारक ही होती है। कोई बड़ा देश छोटे देश पर हमला करता है तो लोगों की सहानुभूति छोटे देश के प्रति होती है। वर्तमान विवाद में अमरीका और भारत का मीडिया इसी सहानुभूति का लाभ लेकर एक राष्ट्र को खलनायक के रूप में प्रचारित कर अपने आकाओं का हित साध रहे हैं। देखा जाए तो यह युद्ध यूक्रेन और रूस के बीच नहीं अपितु रूस और अमेरिका के बीच लड़ा जा रहा है। उत्तर अटलांटिक संगठन (नाटो) सन 1955 में अमरीका द्वारा बनाया गया सैनिक संगठन है। यह कोई लोकतांत्रिक संगठन नहीं है। इसी के जवाब में सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों ने वार्सा संधि का गठन किया था।

उन्होंने बताया कि जब सोवियत संघ टूट गया, जर्मनी का एकीकरण हुआ तो वारसा संधि से जुड़े देशों ने महसूस किया कि अब इस संधि की जरूरत नहीं है, क्योंकि शीत युद्ध समाप्त हो चुका है। लेकिन नाटो संगठन न केवल बना रहा अपितु वह खुद का विस्तार भी करने लगा। इन्हीं प्रयासों के तहत उसने सोवियत संघ से अलग हुए उन तीनों राष्ट्रों को नाटो में शामिल कर लिया जो रूस की सीमा से लगे हुए थे। नाटो प्रयास करता रहा कि रूस की सीमा के अन्य निकटवर्ती राष्ट्रों को नाटो में शामिल किया जाए। कई सीमावर्ती देशों के साथ रूस का विवाद रहा है। उसी तनाव का लाभ लेते हुए नाटो ने सन 2003 में जार्जिया एवं सन 2004 में यूक्रेन में दखल दिया। वहां उसके पालतू संगठनों द्वारा संपन्न हो चुके चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए चुने हुए राष्ट्रपति को हटाने के लिए आंदोलन किए और अन्ततोगत्वा वे अपने कठपुतली राष्ट्रपतियों को बिठा पाने में सफल हो गए। जैसे ही इन देशों में यह परिवर्तन हुआ तो ये शासक नाटो में शामिल होने की इच्छा जाहिर करने लगे।

उन्होंने आगे बताया कि यूक्रेन में सन 2006 एवं 2010 में विक्टर यानुकोविच राष्ट्रपति चुने गए लेकिन हिंसक आंदोलन के जरिए उन्हें सत्ता से हटा दिया गया। वह अपनी जान बचा कर रूस चले गए। तब से यूक्रेन सरकार ने अपने देश में रूसी नागरिकों पर अत्याचार बढ़ा दिए। यूक्रेन पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में बंटा हुआ देश है। पश्चिमी क्षेत्र की सीमा पोलैंड से लगी हुई है और इस हिस्से को उस समय हिटलर ने अपने कब्जे में ले लिया था फिर सन 1940 में सोवियत संघ ने इस हिस्से को पुन: यूक्रेन में मिलाया। पूर्वी और पश्चिमी दोनो भागों में धार्मिक एवं विचार के स्तर पर फासला बना हुआ है। इस फासले का लाभ अमरीका और यूरोप उठाता रहा है। गत वर्ष नवंबर माह में नाटो ने यूक्रेन की सीमा के पास सैनिक अभ्यास किया था। रूस ने अपने देश की सीमा के निकट इस सैनिक अभ्यास को अपने लिए खतरे के रूप में देखा। अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए रूस नाटो को अपनी सीमा के निकट नहीं आने देना चाहता। इन परिस्थितियों में हर देश यही चाहेगा कि कोई भी सैनिक संगठन उसकी सीमा के निकट न रहे।

रूस चाहता था कि यूक्रेन में रूसी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा व स्वायत्तता दी जाए। इस हेतु उसने बेलारूस की राजधानी मींस में यूक्रेन से एक समझौता भी किया था। लेकिन यूक्रेन द्वारा समझौते का पालन नहीं हुआ। नाटो के बढ़ते दखल को लेकर भी रूस पश्चिमी देशों को अपनी चिंता जताता रहा लेकिन इन देशों ने उसका मजाक उड़ाया कि आप तय नहीं कर सकते कि नाटो में कौन आएगा और कौन नहीं। आपके पास ऐसा कोई वीटो पावर नहीं है और स्थिति यह थी कि यूक्रेन के सभी फैसले नाटो ही ले रहा था।

नाटो और अमरीका पर निर्भर है यूक्रेन

प्रोफसर पटनायक ने कहा कि वर्तमान में दिखाने के लिए यूक्रेन स्वतंत्र राष्ट्र है लेकिन असलियत यह है कि यूक्रेन नाटो और अमरीका पर निर्भर है। यूक्रेन के हटाये गए राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच यूरोपियन यूनियन से जुड़ना चाहते थे परंतु उनका कहना था कि हमारा सर्वाधिक व्यवसाय तो रूस के साथ है और रूस यूक्रेन की मदद करता है। यानुकोविच रूस और यूरोप में संतुलन बनाए रखना चाहते थे लेकिन उनके खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किए गए। इन प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारी नात्सी नेताओं के चित्र लेकर चल रहे थे। ये चित्र उन नेताओं के थे जिन्होंने सन 1930 में जब नाजी यूक्रेन में घुसे थे उस समय यहूदियों के कत्लेआम में साथ दिया था। यानुकोविच को हटाने के प्रदर्शनों में ऐसे ही नाजी संगठनों के लोग शामिल थे, जिन्हें यानुकोविच के हटने के बाद वहां के सशस्त्र बलों में शामिल कर लिया गया और ये ही लोग यूक्रेन में रूस विरोधी आंदोलन चलाते रहे। ऐसे ही लोगों ने प्रदर्शनों में आगजनी की, गोलियां चलाई जिसके कारण कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। आखिरकार राष्ट्रपति को सत्ता छोड़नी पड़ी।

रूस यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि (russia ukraine war background)

back view of people in street holding signs against the war in ukraine
Photo by Jimmy Liao on Pexels.com

प्रोफसर पटनायक ने कहा कि सन 2014 से ही प्रयास हो रहे थे कि यूक्रेन को नाटो के प्रभाव क्षेत्र में लाया जाए ताकि रूस की सीमा पर नाटो और उसके हथियार बने रहें। यही रूस के लिए बड़ा संकट था और इस युद्ध की पृष्ठभूमि। अगर यूक्रेन नॉटो से मिलने की बात न करे तो ने केवल रूस अपितु यूक्रेन भी सुरक्षित रह सकता है। अमरीका लगातार प्रयास कर रहा है कि सोवियत संघ से टूटने के बाद पूर्वी यूरोप के देशों में राष्ट्रवाद को उभारा जाए। ये देश अपने यहाँ अल्पसंख्यकों को स्वीकार नहीं करना चाहते, इसलिए भाषा और संस्कृति के नाम पर इन्हें आपस में लड़वाया गया। युगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड पर लगातार 78 दिन तक बम गिराए गए उसे तोड़कर वर्सोवा नामक छोटे राष्ट्र में विभाजित कर दिया गया। यूक्रेन में भी ऐसा ही देखा जा रहा है।

क्या रूस साम्राज्यवादी देश है? | Is Russia an imperialist country?

प्रोफसर पटनायक ने कहा कि रूस साम्राज्यवादी देश नहीं है। ऐसा कोई संकेत नहीं है कि उसने यूरोप के अन्य देशो के खिलाफ कभी कुछ किया हो। जब नाटो का विस्तार किया जा रहा था तब भी वह यूरोप और अमरीका के साथ जुड़ा रहा। तब वह समय था जब सोवियत संघ टूट चुका था, इन्हीं साम्राज्यवादी देशों द्वारा रूस में निजीकरण की नीतियां कैसे बनायी जाएँ ऐसा मास्को में बैठकर रूस को समझाया जा रहा था। यूरोप और अमरीका ने नाटो को बना रहने दिया तब भी रूस चुप रहा। जर्मनी की दीवार गिरा दी गई तब भी उसने बर्दाश्त कर लिया। अमेरिका ने मध्य एशिया में सोवियत संघ से अलग हो चुके देश किर्गिस्तान और उजबेकिस्तान में सैनिक अड्डा बनाया तब भी रूस ने कुछ नहीं कहा। रूस ने मित्र राष्ट्रों युगोस्लाविया, इराक, सीरिया में अमेरिका को बर्दाश्त किया। यही नहीं अफगानिस्तान पर बम गिराने के लिए रूस ने अमरीका को अपना हवाई क्षेत्र दिया। सोवियत संघ के दौरान ही अमरीका द्वारा बिना हथियारों के ही रूस की घेराबंदी करने की नीति बनी थी, जिस पर अमरीका आज भी अमल कर रहा है। उसका प्रयास है कि रूस अपने ही क्षेत्र में उलझा रहे। इसलिए वह रूस के निकटवर्ती देशों में अपनी समर्थक सरकारें बनवाकर उसको घेरने का प्रयास करता रहा है। जबकि रूस ने किसी भी देश में जाकर युद्ध नहीं किया है। सीरिया में भी उसने वहां के शासक को बचाने का प्रयास किया है, कब्जा करने का नहीं।

क्या रूस समाजवादी देश है? (Is Russia a socialist country?)

वर्तमान रूस समाजवाद से दूर है। वहां राष्ट्रवाद को उभारा जा रहा है। राष्ट्रपति पुतिन क्रोनीकैपिटलिज्म (सांठ-गांठ वाला पूंजीवाद) के माध्यम से सत्ता को बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं। पुतिन का मजबूत होना और नाटो के विस्तार के प्रयास आपस में जुड़े हैं। इसीलिए समाजवाद पर भरोसा रखने वालों को तो पुतिन व नाटो दोनों का विरोध करना चाहिए।

श्री पटनायक ने कहा कि सन 1990 से लगातार प्रयास हो रहे हैं कि दुनिया को एक ध्रुवीय बनाए रखा जाये इसी के लिए नाटो का विस्तार किया जा रहा है। इराक, अफगानिस्तान, बेलग्रेड पर बमबारी, सीरिया में सत्ता परिवर्तन करना इसी खेल का हिस्सा है। वर्तमान में न तो सोवियत संघ है न ही वारसा संधि। अमरीका केवल अपने प्रभुत्व को बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह नहीं हो पा रहा है। नब्बे के दशक के बाद भारत, चीन के अलावा रूस का भी अर्थतंत्र चमकने लगा है। गैस और तेल की कीमतें इतनी बढ़ीं की रूस की अर्थव्यवस्था सुधर गई। उसने सोवियत संघ के दौरान जुड़े देशों को मिलाकर “यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन” बनाई। इन पांच देशों ने मिलकर एक आर्थिक क्षेत्र बना दिया जिसमें पूंजी और श्रम का अबाध आवागमन हो सका। इन पांच देशों में रूस के अलावा कजाकिस्तान, बेलारूस, अर्मेनिया और तिर्किस्तान शामिल हैं। इसी दौरान दुनिया में भारत, चीन और ब्राजील जैसे देश आर्थिक रूप से उभरने लगे। ये देश भी एकल दुनिया की व्यवस्था के खिलाफ थे। सन 1994-95 में रूस के तत्कालीन विदेश मंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने कहा था कि अगर बहुध्रुवीय विश्व बनाना है तो भारत, रूस और चीन तीनों देशों को एक साथ आना पड़ेगा, जिससे ये मिलकर दुनिया के स्तर पर एकध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती दे सकेंगे। बाद में यही प्रिमाकोव रूस के प्रधानमंत्री भी बने। इस घटना क्रम के पश्चात रूस, चीन, भारत का फोरम बना, ब्रिक्स बना जिसमें ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जुड़े। सन 2008 के बाद इन प्रयासों ने तेजी पकड़ी। सन 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट में पश्चिमी देश अधिक फंसे। भारत और चीन कम प्रभावित हुए। उसके बाद से ही वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचा जाने लगा। विश्व मुद्राकोष (आई एम एफ) में वोट की मांग की गई। ब्रिक्स बैंक बना जो आईएमएफ की शर्तों के मुकाबले उदार ऋण देता था। दुनिया में अमेरिका अकेला ही शक्तिशाली देश नहीं है बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, रूस, ब्राजील भी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्षम देश हैं। विश्व अर्थव्यवस्था पर डॉलर का नियंत्रण हैं। यूक्रेन में जारी यह युद्ध निर्णायक है। रूस अपनी सुरक्षा चाहता है। युद्ध से यूरोप में अमरीका, कैनेडा और यूरो अटलांटिक व्यवस्था कमजोर होगी। उसके बाद वैकल्पिक ध्रुवीकरण हो सकेगा।

प्रोफ़ेसर पटनायक ने कहा कि लोग सोचते हैं कि जब युद्ध समाप्त हो जाएगा तो सब चीजें ठीक हो जायेंगी। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि आज यह स्थिति क्यों है? कोई बड़ा देश यह मानता है कि या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। जब से गुटनिरपेक्ष आंदोलन को कमजोर किया गया है तब से छोटे देशों की आवाज दब गई है। सन 1964 में 77 देश गुट निरपेक्ष संगठन से जुड़े थे। बाद में बढ़कर 134 हो गए। संयुक्त राष्ट्र संघ में इन्हें सुना जाता था। यह इतना बड़ा खेमा था कि समाजवादी और साम्राज्यवादी दोनों गुट इन देशों को अपने पक्ष में रखना चाहते थे। दोनों महाशक्तियों में इसे लेकर प्रतिस्पर्धा होती थी। सोवियत संघ उपनिवेशवाद से मुक्त देशों को साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में अपना साथी मानता था। नब्बे के दशक के बाद उदारवादी आर्थिक नीतियों के चलते विकासशील देशों पर दबाव बढ़ गया। भारत जो अभी तक तटस्थ था। उस पर भी भारी दबाव बढ़ा। गुट निरपेक्ष आंदोलन को कमजोर करने का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है। जिससे भारत कभी इस महाशक्ति को तो कभी दूसरी महाशक्ति को खुश करने की कोशिश करता रहता है। जबकि पहले यही महाशक्तियां भारत को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत रहती थीं।

क्या जार के समय का रूस बनाना चाहते हैं पुतिन? (Does Putin want to build a Czarist Russia?)

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि रूस एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। लेकिन वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा करना चाहता है। पुतिन अपने देश में एक माचो पर्सनालिटी (मर्दाना व्यक्तित्व) है। लोगों में राष्ट्रवाद की भावना भड़के इसलिए लोगों के बीच रूस को अखंड रहने की बात कही जा रही है। आम लोगों के मन में शांति और समाजवाद की छवियों को धुँधला करने के लिए पुतिन रूसी लोगों को यह कह रहे हैं कि समाजवादी दौर एक विकृति के रूप में आया था। लेनिन ने अलग-अलग राज्यों को रिपब्लिक की मान्यता दी थी, यह गलती थी। पुतिन रूस को ज़ार के ज़माने के रूस जैसा बनाने का सपना रूसी जनता के सामने परोस रहे हैं जो न तो आज की दुनिया मे संभव है और न ही ख़ुद पुतिन ऐसा चाहते हैं लेकिन ऐसा करके वो अपने देश की जनता के बीच अपनी छवि मज़बूत करना चाहते हैं।

girls with signs on protest against russian war on ukraine
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लोगों के बीच बार-बार यह कहा जा रहा है कि जार के समय का रूस जो दुनिया के पांचवें हिस्से तक फैला हुआ था हम वही रूस फिर से बनाएँगे। जबकि यह बात रूस की जनता भी जानती है कि जार के समय वाला रूस अब दोबारा नहीं बनाया जा सकता। जैसा कि भारत में अखंड भारत की राजनीति करने वाले जानते हैं कि अफगानिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान को पुन: अपने भीतर शामिल नहीं किया जा सकता। लेकिन राष्ट्रवाद की भावनाएं हमेशा शासकों को ताकत और लोकप्रियता देती हैं। रूस में 70 साल तक चाहे किसी भी तरह का समाजवाद रहा हो लेकिन उसने दुनिया की राजनीति में बड़े हस्तक्षेप किए थे। तो फिर सवाल उठता है कि क्या वहां के लोगों की चेतना को समाजवादी नहीं बनाया जा सका था? सत्ताओं का उठना-गिरना, क्रांति के जरिए चाहे दूसरी सरकार का आ जाना, लोगों के भीतर चेतना का विस्तार नहीं करता। सोवियत संघ में जब बोल्शेविक क्रांति करने वालों की पीढ़ी चली गई तब नई पीढ़ी में क्रांति के प्रति वह सम्मान नहीं रहा, उसमें पूंजीवाद उभार विकसित होने लगे। ऐसा ही पूर्वी जर्मनी में भी हुआ। रूस में अब क्रॉनिकेपिटलिज्म मौजूद है लेकिन वह विस्तारवादी नहीं है। उसने साम्राज्यवादी रुझान नहीं बताए हैं।

सोवियत संघ नहीं है वर्तमान रूस और लेनिन या कास्त्रो नहीं है व्लादिमीर पुतिन (Current Russia is not the Soviet Union and Vladimir Putin is not Lenin or Castro)

हमें यह समझ लेना चाहिए कि वर्तमान रूस सोवियत संघ नहीं है। पुतिन लेनिन या कास्त्रो नहीं है। लेकिन यह भी समझ लेना चाहिए कि वह जिस पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है और पूंजीवाद के आंतरिक अंतर्विरोध अपने ही दुश्मन पैदा करता है। चीन अगर अपनी सुरक्षा चाहेगा तो उसे रूस अपना सबसे बड़ा सहयोगी महसूस होगा। ऐसा ही रूस भी चीन को अपना सबसे बड़ा सहयोगी मानेगा। भारत में भी भले ही पूंजीवादी अमरीकीपरस्त सत्ता काबिज है, बावजूद इसके वह अपने पड़ोसी मुल्क रूस और चीन से दुश्मनी मोल नहीं ले सकता। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव में उसने तटस्थ रहकर यह बता दिया है कि हम सीधे-सीधे अमरीकी खेमे में नहीं जा सकते। चाहे दिल से भले ही उनके साथ हों।

city road traffic people
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उन्होंने कहा कि ऊंट किस करवट बैठेगा यह देखना अभी बाकी है। अमरीका के साथ भारत चाहे “क्वाड” में शामिल हो जाए, सैन्य अभ्यास कर ले पर पड़ोस के देश ही आपको सबसे बड़ा सहारा देते हैं। वहीं उनसे ही सबसे बड़ा खतरा भी हो सकता है। अगर आप उनसे दुश्मनी रखेंगे तो हमेशा खतरा बना रहेगा।

विनीत ने कहा कि वर्तमान रूस इराक नहीं है, पुतिन भी सद्दाम और गद्दाफी नहीं है। रूस को इतनी आज आसानी से हजम नहीं किया जा सकता, जैसा इराक और अफगानिस्तान में किया गया। प्रथम विश्व युद्ध किन्हीं नैतिक मूल्यों के लिए नहीं लड़ा गया था वह युद्ध जमीन की छीनाझपटी के लिए था। द्वितीय विश्व युद्ध में कुछ मूल्य बने कि हम किसलिए लड़ रहे हैं? ये मूल्य मानवता को बचाने के लिए थे। जिसने युद्ध थोपा वह मानवता को खत्म करने की कोशिश कर रहा था। जिन्होंने उसे हराया वह मानवता के योद्धा के रूप में पहचाने गए। जो युद्ध लड़े वे मानवता की खातिर लड़े आज भारत की स्थिति मौकापरस्त की है। वैश्विक विकल्प का नेहरू के समय ही सोचा गया था। गुट निरपेक्ष आंदोलन ऐसा ही ख्वाब था जिसमें ऐसी दुनिया बनाई जाए जिसके चलते किसी भी देश को केवल ताकत के कारण किसी देश के पीछे चलने पर विवश ना होना पड़े। इंसानियत को केंद्र में रखकर देश जिसे सही समझेंगे उसके साथ जाएंगे। ये मूल्य हम अपने देश से विदा कर चुके हैं। यह प्रक्रिया काँग्रेस के समय से ही प्रारंभ हो चुकी थी। आर्थिक नीति के क्षेत्र में भारत उसी नवउदारवाद में शामिल हो गया जिस नीति पर आज भाजपा की वर्तमान सरकार काम कर रही है। आज हमारे समकालीन लोगों में भ्रम की स्थिति है।

उन्होंने कहा कि लोग युद्ध के खिलाफ तो हैं लेकिन उन्हें युद्ध की पूर्व पीठिका की जानकारी नहीं है। बहुत सारे पत्रकार एवं लेखक मित्र इन हालात पर दुखी हैं। कोई भी युद्ध हो वह अपने साथ विभीषिका व त्रासदी लेकर आता है। यह त्रासदी एक देश की स्मृति पर हमेशा लगा रहने वाला दाग होती है। इसलिए वर्तमान युद्ध बड़ी विभीषिका है। नाटो ने यूक्रेन को उकसा कर रूस की सीमाओं की सुरक्षा पर खतरा पैदा कर दिया है। ऐसे में अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए रूस को युद्ध की कार्यवाही करना पड़ी। युद्ध का विकल्प सदैव मौजूद रहता है। वर्तमान में लगभग 40 देश रूस के पक्ष में हैं। वे रूस के पक्ष को समझ रहे हैं। इनका दायरा बढ़ाने का प्रयास पूर्व में भी किया जा सकता था। अगर ऐसा संभव होता तो मुमकिन है कि युद्ध की स्थिति ही नहीं आती। रूस के इस कदम की निंदा सभी लोग करेंगे। यह सच है कि केवल निंदा करके ही समस्या को नहीं समझा जा सकता।

नाटो तथा यूक्रेन की रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका (Role of NATO and Ukraine in Russo-Ukraine War)

श्री तिवारी ने कहा कि इस युद्ध में और उससे पहले नाटो तथा यूक्रेन की भूमिका क्या रही है इसे समझना जरूरी है। सन 2014 में क्रीमिया को लेकर यूक्रेन में हिंसा हुई थी। इन सब को मुकम्मल तरीके से देखने की जरूरत है। विशेष कर 2014 के बाद से। सन 2021 में पश्चिमी देशों के लिए अटलांटिक संधि में संशोधन किया गया था। इस संशोधन के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेने वाले देशों को अपनी संस्कृति छोड़ने पर विवश किया जा सकता है। उसकी ऋण योजनाएं व्यक्ति के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती हैं। जिसने कर्ज दिया है धीरे-धीरे वह लोगों के जीने के, शिक्षा पाने के, दवा प्राप्त करने के एवं अन्य जरूरी अधिकार तय करने लगता है और आखिरकार एक बड़ी आबादी को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सन 1970 में लेटिन अमरीकी देशों ने यह सब भुगता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने सन 2014 में हिंसा के जरिये विक्टर यानुकोविच को हटाने के बाद यूक्रेन को 27 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया, जबकि हिंसाग्रस्त देशों को कर्ज देने का प्रावधान नहीं है। दिया भी जाता है तो वह बहुत कम एवं मानवीय जरूरतों के हिसाब से दिया जाता है न कि हथियार खरीदने के लिए। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। अब ये अमरीका की चाकरी कर रही हैं और अमरीका के हितों की संरक्षक बनी हुई हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में यूक्रेन का विकास सोवियत संघ के दौरान का परिणाम है। वहां शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था निःशुल्क थी। यानुकोविच को हटाने के कारणों में यह भी था कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों को मानने को तैयार नहीं थे। यह संगठन मुफ्त गैस, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा को समाप्त करना चाहते थे। राष्ट्रपति द्वारा इन्कार करने पर षड़यंत्र पूर्वक आंदोलन चला कर उन्हें देश छोड़कर जाने के लिए विवश किया गया।

रूस-यूक्रेन युद्ध में भारतीय मीडिया भूमिका (Indian media role in Russo-Ukraine war)

भारतीय मीडिया अतीत की परिस्थितियों को समझे बगैर केवल युद्ध को युद्ध के रूप में देख रहा है। प्रारंभिक स्तर पर भारतीय मीडिया पुतिन को राक्षस के रूप में प्रचारित कर रहा था। रूस के हमले की तारीख और समय बता रहा था। देश में युद्ध माहौल पैदा किया जा रहा था। यूरोप और अमरीका द्वारा पहुंचाई जा रही सूचनाओं से भारतीय दर्शक आक्रांत हैं। हमें याद रखना चाहिए कि भारत में भिलाई स्टील प्लांट यूक्रेन ने बनाया था तब वे स्वयमं को सोवियत संघ का नागरिक बताते थे। पश्चिम को इस विवाद में केवल जमीन, गैस, तेल और प्राकृतिक संसाधनों की फिक्र है। उसे वहां के लोगों के जीवन के बारे में कोई चिंता नहीं। शांति कार्यकर्ता के रूप में हमें इस संदर्भ में विचार करना चाहिए और विकल्प की बात लोगों तक पहुंचाना चाहिए।

विनीत तिवारी ने कहा कि साधारण लोग असाधारण परिस्थितियों में ही काम करने की योग्यता रखते हैं। किसी समय स्टालिन एक फौजी टुकड़ी को नियंत्रित नहीं कर सकते थे लेकिन विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने हिटलर की ताकत और उसकी सेना को पराजित किया। व्यक्ति जब मोर्चे पर होता है तो जल्दी से सीखता है। भारतीय मीडिया कठपुतली की तरह काम करता है। कल तक मीडिया में किसान आंदोलन था। मीडिया ने उससे ध्यान हटाने का प्रयास किया लेकिन जब उसे सफलता नहीं मिली तो आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया गया। किसानों की समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। आज भी वे आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन मीडिया का ध्यान हट चुका है।

रूस-यूक्रेन युद्ध कैसे खत्म हो? (How did the Russo-Ukraine War end?)

विनीत तिवारी ने कहा कि यह युद्ध खत्म कैसे हो? या तो हारने वाला समझौता कर ले या जीतने वाला पूरी तरह से जीत हासिल कर ले। शांति आंदोलन ने रास्ता बताया है कि बर्बरता के इन दोनों विकल्पों के बीच में एक तीसरा विकल्प होता है नैतिक साहस का। वह साहस वहां से आता है जहां केंद्र में इंसान होता है। युद्ध के समय लोकतांत्रिक सरकारें भी अधिनायकवादी हो जाती है। भारत में दलितों आदिवासियों, महिला आंदोलनों को दरकिनार किया जा रहा है।

वे लोग जो रूस और सोवियत संघ, पुतिन और कास्त्रो के अंतर को समझते हैं उन्हें रूस की आलोचना पर यह कहना चाहिए कि “नाटो के लगातार उकसावे पर रूस ने युद्ध शुरू किया है जो कि निंदनीय है। अमन के पक्ष में संस्कृति को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है।”

कार्यक्रम के संचालक एवं “गांव के लोग” के संपादक रामजी यादव ने कई सवाल उठाते हुए कहा कि रूस और यूक्रेन के मध्य जारी युद्ध में साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा नेरेटिव फैलाया जा रहा है इसे हमें समझना चाहिए। मीडिया किसी देश को कैसे खलनायक और किसी दूसरे को दयनीय बताते हैं। इसके बहाने साम्राज्यवादी सरदार अपने एजंडे को सेट कर सकते हैं। ये देश कई छोटे देशों में हथियार बेचकर मुनाफा कमाते हैं। रूस और यूक्रेन से कई हृदय विदारक खबरें आईं। भारत सरकार द्वारा समय पर एडवाइजरी जारी न करने के चलते छात्रों को अनेक संकट झेलना पड़े। हमारे प्रधानमंत्री बातों के बहादुर हैं। वे हर सफल चीज का श्रेय लेना चाहते हैं। जो मंत्री यूक्रेन की सीमा पर भेजे गए उन्होंने भी विद्यार्थियों की कोई मदद नहीं की। सोवियत संघ के टूटने के बाद भी रूस के समय भारत के मैत्री पूर्ण संम्बंध बने रहे। यूक्रेन में अमेरिका की कोई भूमिका है भी? किसी भी देश का राजनीतिक ढा़चा किसी एक नेता के आने से नहीं बदल जाता। जैसे भारत का संघीय ढांचा मोदी की फासिस्ट नीतियों के बावजूद अभी भी काफी हद तक सुरक्षित है। वर्तमान में नाटो के खिलाफ पावर सेंटर बनने का संघर्ष है। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो बुर्जुआ मीडिया ने एक सुर में कहा था कि अब दुनिया एकध्रुवीय हो गई है। वर्तमान युद्ध से क्या दुनिया का परिदृश्य बदल सकता है? वर्तमान युद्ध से भारत के संबंध सभी देशों से बदलेंगे, इनका क्या प्रभाव पड़ेगा यह समय ही बताएगा। भारतीय मीडिया वाट्सएप यूनिवर्सिटी की भेट चढ़ चुका है। साम्राज्यवादी मीडिया एक पक्षीय रहकर अपने आकाओं को शांति दूत बता रहा है। ऐसे समय में घटनाओं का निष्पक्ष विश्लेषण जरूरी है।

हरनाम सिंह

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