सारा मलिक की कहानी “पहला रोजा”

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

Sara Malik’s story “Pehla Roja”

इबादत करना फर्ज है, और हक भी।

रमजान का महीना (Month of ramadan) रोजा और इबादत का महीना, बरकतों वाला महीना है। अल्लाह खैर करे इस साल हालात मुख्तलिफ हैं। दुनिया में वबा फैली है। मुल्क भी उसी की चपेट में है। ऐसे में हुकूमत ने एहतियात के तौर पर तालाबंदी कर दी है।  पिछले लगभग एक महीने से हम सब तालाबंदी में जीने की आदत डाल रहे थे कि रमजान आ गए, इस बार बहुत सन्नाटा है, घबराहट है, मन भारी है, बस ऊपर वाला सुन ले, और निजात दे दे, जिंदगी अपने मामूल पर वापस लौट आए।

आज पहला रोजा है तो मैंने सोचा अपनी फूफी के घर जाकर साथ में रोजा खोलूं। काफी दिन से बुला रही थीं, लाकडाउन की वजह से जा नहीं पा रही थी। जाने का इरादा कई बार किया लेकिन हिम्मत न हुई। वीरान रास्ते चारों ओर पसरा सन्नाटा देख खौफ आ रहा है आजकल, और फिर नाहक घर से क्यों निकला जाए, यह सवाल भी वाजिब सा है।

खैर फूफी के पैर में चोट लग गई सो देखने जाना तो बनता है। बचपन में कितनी बार मेरी चोटों पर उन्होंने मरहम लगाया होगा। मुझे तो याद भी नहीं, रिश्ते ऐसे ही तो होते हैं, तमाम बातें तो याद भी नहीं रहती, और तमाम बातें याद रखनी भी नहीं चाहिए रिश्ते मजबूत रहते हैं। कुछ खून के रिश्ते होते हैं, कुछ इंसान समाज में रहते हुए बनाता है, यकीन जानिए बड़ा अच्छा लगता है जब कोई आपका ख्याल करें।

मेरी फूफी घर राबिया नाम की औरत घरेलू काम करने के लिए आती है। गरीब लोग हैं, फूफी उनका ख्याल करती हैं। राबिया की एक किडनी खराब है और कोरोना वायरस की दहशत इतनी ज्यादा है, कि लोग काम नहीं ले रहे हैं, बेचारी काफी परेशान हैं तो फूफी से उसकी जो मदद हो सकती, कर देती हैं।

उसकी एक बेटी है, जमालो। होगी कोई साथ 8 बरस की दुबली पतली, देखने से कुपोषित, कमजोर सी, पर जज्बा हिम्मती। अपनी मां की हिमायती। आंखों में चमक, कि “हार नहीं मानेंगे, रार नई ठानेंगे” रोज की जिंदगी के मामूल से लड़ती हुई आगे बढ़ती हुई।

मुझसे बोली अप्पी, आप जल्दी कैसे आईं ?

मैंने कहा स्कूटी से।

वो बोली, वो पैदल आती हैं, तभी उसको आने जाने में देर लगती है।

सवाल भी खुद किया, और जवाब भी खुद, पर उसके जवाब ने मेरे लिए कई सवाल छोड़ दिए, और मैं सोचने लगी उसकी तरह। जो मैं कभी ना सोच पाती, अगर उससे ना मिलती तो।

समाज के हर तबके के सवाल और उनकी अहमियत कितनी अलग होती है, और एक तबके का दूसरे तबके की परेशानी से कोई सरोकार नहीं रह गया है, इंसानियत मर रही है।

खैर, रोजा खोलने बैठे। वो बोली, अपने इफ्तारी की प्लेट घर से ले आऊं?

मैंने पूछ ही लिया, तो पीने के लिए शरबत बना दूँ !

वो बोली, शरबत नहीं, कोल्ड ड्रिंक पसंद है।

फूफी ने पैसे दिए कि अपनी पसंद की कोल्ड ड्रिंक ले आओ, जल्दी आना।

थोड़ी देर बाद आई तो कोल्ड ड्रिंक नहीं लाई।

पूछा तो बोली आजकल पैसों की तंगी है घर में, सो पैसे अम्मी को दिए। पैसे बहुत काम आते हैं, ठंडे पानी से रोजा खोल लूंगी और कल से शरबत में नींबू ना मिलाना, मुझे पसंद नहीं !

उसकी मासूमियत,  हंसी आ गई। मैंने कहा अच्छा बाबा और उसको करीब बुलाकर मैंने चॉकलेट दी, वो खुश होकर घर चली गई।

Sara Malik

  मैं सोच रही थी, आज खुदा ने इबादत कबूल की होगी, तो फरिश्तों ने जमालो का रोजा नजराने के तौर पर खुश होकर पेश किया होगा। अल्लाह भी खुश हो गया होगा, तभी देखती हूं कि, “रहमत की बारिश हो रही”, मौसम ठंडा हो गया, सोचा जमालो थकी हुई थी, चैन से सो गई होगी, और अल्लाह भी खुश हो गया होगा।

न जाने कितनी ही जमालो दुनिया में होंगी, गरीबी और बेबसी में जी रही होंगी, लेकिन उम्मीदों की मुट्ठी बंधी हुई होगी, बस रब की मेहर हो जाए, कि दुआ में जब हाथ उठे तो उनकी परेशानियां दूर हो जाएं। उनके बचपन की सारी ख्वाहिशें पूरी हो जाएं। हर “जमालो” को अपनी मां के साथ काम करने, पैसे बचाने के बारे में ना सोचना पड़े। खिलखिलाता बचपन, ढेर सारी खुशियां बेहतर जिंदगी, जो कि उनका हक है, उन सब को मिले , एक नई तस्वीर बने इस दुनिया की, और इस  समाज की ।।

सारा मलिक

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