सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : कुआनो नदी के किनारे की गीली मिट्टी लेकर गीत रचने वाले कवि

Sarveshwar Dayal Saxena (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : व्यक्तित्व और कृतित्व

आज का गीत

‘चुपाइ रहो दुलहिन, मारा जाई कौआ’ हो या ‘नीम की निबौली पक्की, सावन की रितु आयो री’ बस्ती में कुआनो नदी के किनारे की गीली मिट्टी लेकर गीत रचनेवाले कवि थे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,(1927 -1983 )जिनकी प्रतिभा का लोहा मानते हुए अज्ञेय जी ने न केवल उन्हें अपने तीसरे सप्तक ( 1959 ) में स्थान दिया, बल्कि 1964 में आकाशवाणी की नौकरी छुड़वाकर उन्हें ‘दिनमान’ के सम्पादकीय विभाग में शामिल कर लिया।

दिनमानमें उनका चरचे और चरखेस्तम्भ काफी लोकप्रिय हुआ। चुटीली भाषा,समकालीन प्रवृत्तियों की पकड़ और प्रखर धारदार व्यंग्य–इन विशेषताओं ने इस स्तम्भ को पत्रिका का प्रमुख आकर्षण बना दिया था।

हिंदी के अन्य कवियों से पृथक उनका जन्म और देहावसान दोनों राजभाषा पखवाड़े में ही हुआ था।

बस्ती में एक साधारण परिवार में जन्मे सर्वेश्वर की शिक्षा बस्ती, बनारस और इलाहाबाद में हुई। 1949 में एमए करने के बाद 6 वर्षों तक वे एजी ऑफिस में लिपिक रहे। तदनन्तर दिल्ली आकर आकाशवाणी के समाचार विभाग में सेवारत हो गए। वहीँ से 1964 में ‘दिनमान’ आ गए और 14 वर्षों के बाद प्रमुख बाल पत्रिका ‘पराग’ के सम्पादक बने, जहाँ वे मृत्यु पर्यन्त सेवारत रहे।

काठ की घंटियां, बांस का पुल,गर्म हवाएं, कुआनो नदी, खूंटियों पर टंगे लोग, क्या कह कर पुकारूं, काला कोयल उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं।

‘खूंटियों पर टंगे लोग’ पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।

उनके कथा साहित्य में ‘सोया हुआ जल’, ‘पागल कुत्तों का मसीहा’ (लघु उपन्यास) तथा ‘सूने चौखटे'(उपन्यास) उल्लेखनीय है। सर्वेश्वर जी का ‘बकरी’ और ‘अब गरीबी हटाओ’ नाटक एवं ‘बतूता का जूता’ व ‘महँगू की टाई’ बाल कविता संग्रह विशेष लोकप्रिय हुए। ‘बकरी’ पर तो आपातकाल में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।

उनका ‘जब-जब सिर उठाया, अपनी चौखट से टकराया’ गीत अपने नवगीत के तत्वों के कारण बहुत उद्धृत हुए हैं।

बुद्धिनाथ मिश्र, लेखक प्रसिद्ध कवि हैं।
बुद्धिनाथ मिश्र, लेखक प्रसिद्ध कवि हैं।

सर्वेश्वर जी बस्ती से बिछड़ने के बाद हमेशा महानगरों में ही रहे, मगर उनकी कविता में और खासकर उनके गीतों में कुआनो नदी अनवरत बहती है। यही नहीं, उसके किनारे मसान में मुर्दा जलते, धोबी कपड़े धोते. औरतें छुपकर बीड़ी पीतीं और पास लगने वाले फुटहिया बाजार भी कभी उनकी आँखों से ओझल नहीं होते।

अपने तीखे, बेलौस राजनीतिक तेवर के कारण सर्वेश्वर जी के साहित्य का विभिन्न भारतीय भाषाओँ के अलावा रूसी, जर्मन, चेक और पोलिश भाषाओँ में अनुवाद हुए हैं।

सामान्यतः सर्वेश्वर जी नयी कविता के प्रमुख सप्तकीय कवि माने जाते हैं ,लेकिन प्रस्तुत गीत इस बात का प्रमाण है कि परिस्थिति की मांग ने सर्वेश्वर से चाहे जो भी लिखाया हो , उनकी आत्मा हमेशा कुआनो नदी की भाँति गीतों में बसती थी।

बुद्धिनाथ मिश्र

 

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बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

ताते जल नहा, पहन श्वेत वसन आई

खुले लॉन बैठ गई दमकती लुनाई

सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

 

नभ के उद्यान छत्र तले मेघ: टीला

पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला

वृक्ष खुली पुस्तक, हर पृष्ठ फड़फड़ाया।

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

 

पैरों में मखमल की जूती-सी क्यारी

मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी

डोलती सलाई, हिलता जल लहराया।

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

 

बोली कुछ नहीं एक कुर्सी की खाली

हाथ बढ़ा छज्जे की छाया सरका ली

बांह छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया।

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

 

@सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बुद्धिनाथ मिश्र की एफबी टाइमलाइन से साभार। प्रस्तुति डॉ. कविता अरोरा

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