भारत बचाओ दिवस और गांधी जी 

Mahatma Gandhi

Save India Day and Gandhi

9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा (British Quit India Slogan) दिया था। इस बार इस तारीख को भारत बचाओ दिवस भी मनायेगा। जिसे किसान संगठनों के साथ दस सेंट्र्ल ट्रेड यूनियन आयोजित करेंगी। इसकी वजह देश के भीतर मौजूदा हालात को बताया जा रहा है।

इन संगठनों का मानना है कि इस समय न तो किसानों की हालत ठीक है न ही मजदूरों की। उनको लगता है कि सरकार उनकी समस्या को सुलझाने की जगह और दुरूह बना रही है। ये बातें तब हो रही है जब केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारें तक किसान मजदूरों के हालात सुधारने का दावा कर रही है। यूं तो हमेशा से इन क्षेत्रों के लोंगो को सरकारों से शिकायत रही है, जबकि केंद्र सरकार के अनुसार उसने बीते 5 जून को कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए तीन बड़े फैसले लिए हैं। इसमें आवश्यक वस्तु अधिनियम में सुधार सहित द फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कामर्स (एफपीटीसी, एग्रीमेट आन प्राइस एश्युरेंस एंड फार्म सर्विसेज आर्डिनेंस (एफएपीएएफएस) 2020 मुख्य है। सरकार का मानना है कि इससे किसानों की माली हालत सुधरेगी। इसके लिए आवश्यक वस्तु सूची से कुछ वस्तुओं को निकाल दिया गया है। जिसमें धान,गेहूं सहित अन्य अन्न, दलहन, तिलहन, टमाटर, आलू, प्याज आदि है।

सरकार ने कृषि उत्पादों को सीधे बाजार में किसानों को बेचने की अनुमति दे दी है। ठेके पर खेती कराने के लिए व्यावसायिक अनुमति भी दी है। अब कोई भी कंपनी किसानों से खेतों का अनुबंध कर उस पर खेती कर सकेगी।

एक नजर में देखने में इसमें कोई बुराई भी नहीं नजर आती। कई कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे 1991 की उदारीकरण नीति की तरह देश को फायदा मिलेगा। उसको पहले से ज्यादा मौके अपने उत्पाद को बेचने के होंगें। जबकि धरातल का यथार्थ कुछ और बयां करता है।

फिलहाल किसी भी मंडी में जब किसान अपने अनाज या सब्जियां लाता है तो उसे मंडी एजेंट को देता है। ये बात सब्जी, फल, अनाज सब पर लागू होती है। कहीं भी किसान सामने खड़े थोक दुकानदार को सीधे अपना माल नहीं बेच पाता है। आढ़तिए या कमीशन एजेंट किसान से माल उतरवा कर थोक व्यापारी को बेचते हैं। इसके एवज में उसे किसान और व्यापारी दोनों से कमीशन मिलता है। ये बिके माल की कीमत का तकरीबन 5 से 7 प्रतिशत तक होता है। यहां सीधे तौर पर फायदा कमीशन एजेंट को होता है।

इसे ऐसे समझा जा सकता है जब दिल्ली ही नहीं भोपाल की मंडियों में भी प्याज 12 से 15 रूपये किलो बिका, तब किसान उसको आढ़त पर 2 से 4 रूपया किलो बेच रहा था। जिसमें लागत छोड़िये मंडी तक का भाड़ा नहीं निकल रहा था। ऐसा हर उत्पाद के साथ होता है।

कृषि क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जो भारत को रोजगार ही नहीं वरन् स्वास्थ्य भी उपलब्ध कराता है। अगर इस क्षेत्र का उत्पादन प्रभावित होता है तब इसका असर पोषण पर भी होता है। जिससे बच्चें और महिलाएं सीधी तौर पर प्रभावित होती हैं।  इस कोरोना काल में जब हर क्षेत्र में रोजगार के अवसर खत्म हो गए लग रहे हैं तब कृषि जगत ने ही संभाला है। लॉकडाउन के लंबे वक्त में दो जून की रोटी इसी के चलते मिलनी संभव हुई। हांलाकि इसमें भी नुकसान ही हुआ। लागत तक निकल नहीं पायी। बाजार बंद होने के चलते सब्जियां, अनाज मंडियां समय से नहीं पहुंचे, नतीजतन किसान को घाटा उठाना पड़ा।

यही हाल मजदूरों का भी है। खास बात ये है कि मजदूरों का एक बड़ा वर्ग छोटी जोत वाला किसानों का ही है। इनके पास नाम मात्र की खेती है। जिससे इन्हें मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है।

No government seems serious about Gandhiji’s views in his country.

गांधी जी के देश में उनके विचारों को लेकर कोई भी सरकार गंभीर नहीं दिखती। हमने उन्हे जयंती और महत्वपूर्ण तिथियों तक ही सीमित कर दिया है। उनके विचारों की देश में हर समय कितनी प्रासंगिकता है ? कृषि क्षेत्र। जिसे गांधी जी काफी महत्व देते थे। वो कहते थे-भारत गांवों में बसता है। अगर गांवों का नाश होगा तब भारत का नाश हो जायेगा।

गांधी जी के हिसाब से बड़े उद्योगों के चलते ही भारत में गरीबी बढ़ी। 1937 में हरिजन में उन्होंने लिखा कि भारत की गरीबी तब शुरू हुई जब उसके बाजार सस्ते और भद्दे विदेशी माल से पट गये। यही माल शहरों ने गांव में भेजकर उनको बरबाद कर दिया। जिससे वहां के कुटीर उद्योग खत्म हो गये। जिसके चलते गांवों में गरीबी को फैलने का मौका मिल गया।

गांधी जी विकेंद्रीकरण चाहते थे जबकि नयी व्यवस्था में सारा जोर केंद्रीयकरण पर हो गया है। वो जिस यंत्रीकरण के खिलाफ थे, उससे जैसा खतरा बताते थे आज, हमारे सामने मौजूद है। इसका सबसे सटीक उदाहरण हमें स्थानीय स्तर पर हर जगह मौजूद रहे। आज से 25-30 साल पहलें के कुटीर उद्योगों को याद करने पर मिल जाता है। हर शहर या गांव की एक खास नमकीन, मिठाई, पेठा, अगरबत्ती, खाद्य तेल, तौलिया, दरी की दुकान हुआ करती थी। जहां से ताजा और ग्राहकों के सामने तैयार सामान मिलते थे। धीरे-धीरे बड़ी बड़ी कंपनियों ने इनको बाजार से आउट कर दिया। आज एक ब्रांड की अगरबत्ती अजमेर से लगाये अगरतला तक मिलती है। एक खास नमकीन भुसावल से लेकर भुड़कुड़ा तक मिलती है। एक ही तरह के पैकेट में पैक सरसों का तेल नागपुर से नोएडा तक मिल रहा है। इसे, एक नजर में देखने में कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। मगर गौर करें तो पता चलता है कि कैसे एक जगह बनी एक खास तरह के कंपनी का माल बिक कर धन और उत्पादन का केंद्रीकरण कर रहा है। जिसे गांव से लगाये शहरों तक कई स्तरों पर जाना था। अब, कुछ खास जगह और कुछ ही लोगों के पास जा रहा है।

इन क्षेत्रों में लगे लोग पहले बेरोजगार हुए फिर इन्हीं कंपनियों के मजदूर हो गये। कपड़ा, ज्वैलरी, दस्तकारी, जरीदोंजी के काम खत्म हो गए। उन्हें बड़ी-बड़ी मशीनों से किया जाने लगा। जिससे ये हुनरमंद जहां बेकार हुए वहीं ये कला भी अब खत्म होने के कगार पर आ चुकी है।

9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन के दिन अगर किसान मजदूर सामूहिक रूप से भारत बचाओं दिवस की बात करते है तब ये सरकारों के सोचने का विषय भी है। हाल ही में एअर इंडिया ने अपने तकरीबन बीस हजार कर्मचारियों को छह माह के लिए अवैतनिक छुट्टी पर भेज दिया है। जिसे अगले 5 साल तक बढ़ाया भी जा सकता है। इसी में लॉकडाउन के चलते 24 करोड़ के आस पास लोगों की दैनिक, आकस्मिक, स्थायी नौकरियां खत्म भी हो गयी है।

एमएसएमआई का मानना है कि 30 से 35 प्रतिशत तक के आस पास औद्योगिक इकाईयां बंद हो जायेगी। डॉक्टर, वैज्ञानिक मान रहे हैं कि मौजूदा परिवेश के चलते देश में बेरोजगारी से भुखमरी होगी। कुपोषण बढ़ेगा। मानसिक बीमारियों में इजाफा होगा। आत्महत्या के मामले बढ़ेंगें।
संजय दुबे (Sanjay Dubey alis Bittoo Baba), लेखक उप्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। पिछले 25 सालों से लेखन क्षेत्र में सक्रिय।वर्तमान में हर मुख्य हिंदी समाचार पत्रों में नियमित रूप से राजनीति, सामयिक मुद्दे, व्यंग्य पर लेखन यात्रा जारी।
संजय दुबे (Sanjay Dubey alis Bittoo Baba), लेखक उप्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। पिछले 25 सालों से लेखन क्षेत्र में सक्रिय।वर्तमान में हर मुख्य हिंदी समाचार पत्रों में नियमित रूप से राजनीति, सामयिक मुद्दे, व्यंग्य पर लेखन यात्रा जारी।

1991 की उदारीकरण नीति के बाद से देश में तकरीबन 3.5 लाख से ऊपर किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अब तो हालत ये है कि सरकार ने किसानों के आत्महत्या के मामलों के प्रकाशन पर रोक लगा दी है। पहले इसे नेशनल क्राइम रिपोर्ट में शामिल किया जाता था। इसी तरह कुपोषण पर रिपोर्ट देने वाली नेशनल न्यूट्र्एिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो भी बंद हो गया है। देश में किसानों, मजदूरों के लिए कैसी नीतियों की जरूरत है? इस पर कभी आज तक सुसंगत बहस ही नहीं हुई। उल्टे इनके बोझिल और घाटे का उपक्रम बताने का जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जा रहा है। सरकारी स्तर पर किसानों और आम आदमी के साथ किस तरह का भेदभाव होता है इसे साल दो साल भर पहले कोयम्बटूर में किये गये पानी के निजीकरण से समझा जा सकता है। जहां एक मल्टीनेशनल कंपनी ने बीस साल तक पेयजल आपूर्ति का ठेका लिया है। जिसने शहर के गरीबों को 45 पैसे लीटर पानी दिया और वाइन कंपनी को 4 पैसे प्रति लीटर। किसानों को मिली छूट सब्सिडी है और औद्योगिक ऋण की छूट इन्सेटिंव और प्रमोशन?

अब समय आ गया है कि हम गांधी जी के दर्शन को किस तरह क्रियान्यवित कर सकते है? इस पर सोचें। बजाय इसके कि अंधाधुंध मशीनीकरण कैसे हो ? इकॉनामिक्स को यूनानी भाषा में परिवार प्रबंधन कहते हैं।

Gandhiji in self-reliant India

गांधी जी समग्र देश को एक परिवार मानते थे। मजदूर और किसान हमारे इस परिवार के महत्वपूर्ण हिस्सा है बिना इनके भारतीय परिवार की कल्पना व्यर्थ है। इस 9 अगस्त को जब किसान मजदूर भारत बचाओ दिवस मना रहे होंगें तब सरकार सहित सबको सोचना चाहिए। क्योंकि ऐसी ही बेरोजगारी का डर गांधी जी को था। जैसा, आज है। जिसका निदान आत्मनिर्भर भारत में खोजा जा रहा है। क्या गांधी जी के दर्शन ने भी यही बात नहीं की थी?

संजय दुबे

स्वतंत्र पत्रकार   

 

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