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आत्मनिर्भर भारत : जनता राम भरोसे | जनता को किस्मत भरोसे छोड़ने का अपराध, मोदी सरकार ने सोच-समझकर किया है

Self-reliant India: Janta Ram Bharose | Modi government has deliberately committed the crime of leaving the public to luck

कोविड-19 महामारी की दूसरी घातक लहर के बीच, शासन द्वारा भारतीयों को पूरी तरह से अपनी किस्मत के भरोसे छोड़ दिए जाने के साक्ष्य अनगिनत हैं। इस भयावह लहर के जोर पकड़ने के साथ, विशेष रूप से अप्रैल के मध्य से, मौजूदा सत्ताधारियों तथा राज्यों के उनके सूबेदारों के कुख्यात मीडिया नियंत्रण के बावजूद, पहले सोशल मीडिया तथा विदेशी मीडिया और आगे चलकर खुद भारतीय मीडिया के भी बढ़ते हिस्से में, ऑक्सीजन समेत न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं के  अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ते लोगों और अपनों की जान बचाने के लिए अस्पतालों, ऑक्सीजन, दवाओं की तलाश में भटकते लोगों की बदहवास भीड़ों और मौतों के सरकारी आंकड़ों को पूरी तरह से झुठलाते हुए, श्मशानों-कब्रिस्तानों में लगी शवों की बेहिसाब लंबी कतारों की तस्वीरें आने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, पूरे महीने भर बाद भी थमा नहीं है।

हां! इतना जरूर हुआ है कि इस बीच अगर दिल्ली, भोपाल, लखनऊ जैसे अपेक्षाकृत बड़े शहरों से अस्पताल बैड से लेकर ऑक्सीजन तक की बदहवास तलाश और श्मशानों में चिताओं की अंतहीन कतारों के दृश्य कुछ कम हुए हैं, तो उनकी जगह गंगा समेत अनेक प्रमुख नदियों में बड़ी संख्या में बहतीं प्रकटत: कोरोन की मौत मरने वालों की लाशों और खासतौर पर कानपुर से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार तक के अनेक जिलों में गंगा के किनारे-किनारे की रेती में बनी उथली प्रकटत: हिंदू कब्रों की अंतहीन कतारों की तस्वीरों ने ले ली है।

हिंदी के एक विशाल प्रसार संख्या वाले दैनिक प्रकाशन की खबर के अनुसार, आधा दर्जन जिलों में ही लगभग दो हजार ऐसी ‘कब्रें’ रातों-रात निकल आयी थीं।

रही बात बड़े शहरों में मरीजों के बदहवास परिजनों की दर्दभरी चीखों में कुछ कमी की तो, उसकी कई गुना ज्यादा भरपाई देश के ग्रामीण इलाकों में तूफानी रफ्तार से पांव पसारती महामारी की अकल्पनीय तकलीफें कर रही हैं। बस ये चीखें बाकी दुनिया के सुनने के साधनों की पहुंच से आम तौर पर बाहर हैं और इसलिए प्राय: बेआवाज ही बनी हुई हैं।

खासतौर पर उत्तरी भारत में कोरोना के गांव-देहात में तेजी से अपने पांव फैलाने की कहानी बेशक, इस घातक महामारी के सामने जनता को उसकी किस्मत के भरोसे छोड़ दिए जाने की ही कहानी है। जिस उत्तरी भारत में ग्रामीण क्षेत्र में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं एक प्रकार से सिरे से ही गायब हैं, महामारी के इस दौर में कोई वास्तविक सहायता मिलना तो दूर, उसका कोई आधा-अधूरा प्रयास तक नजर नहीं आता है। हां! महामारी के इस दौर में अपेक्षाकृत बड़े शहरों-कस्बों तक केंद्रित बनी हुई स्वास्थ्य सुविधाओं के इन बड़े शहरों-कस्बों की जरूरतों के लिए भी छोटा पड़ जाने का यह नतीजा और हुआ है कि गांव-देहात के अपेक्षाकृत समर्थ हिस्से को, ज्यादातर निजी क्षेत्र में काम रही स्वास्थ्य सुविधाओं का जो थोड़ा-बहुत सहारा था भी, वह भी अब उनसे छिन गया है। नतीजा यह कि जहां एक ओर हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जैसे अपेक्षाकृत संपन्न गांवों से, कोरोना की धमक सुनकर पूरे के पूरे गांवों के ही खुद को बंद कर लेने तथा बिना किसी मदद के तूफान के गुजर जाने की प्रतीक्षा कर रहे होने की खबरें आ रही हैं, तो पूर्वी-उत्तर प्रदेश के और गरीब देहात से संभावित कोरोना पीड़ितों के इलाज के नाम पर, पीपल-बरगद के नीचे मरीजों की खटिया डाले जाने की खबरें आ रही हैं।

अचरज नहीं कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य के देहात में स्वास्थ्य सुविधाओं को ‘‘राम भरोसे’’ करार दे दिया है।

इसके बावजूद, देश में सबसे विशाल ग्रामीण आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा आदि के अपने भाजपायी समकक्षों की तरह, देहात में कोरोना के विस्फोट की भीषणता को नकारने में तथा इसके लिए संक्रमण तथा मौतों के संभावित आंकड़ों को, क्योंकि कोई वास्तविक गिनती तो हो ही नहीं रही है, दबाने में तो लगे ही हुए हैं। इसके ऊपर से, अपने भगवाई समकक्षों से भी चार कदम आगे बढ़कर, अपने प्रदेश में हालात पूरी तरह से नियंत्रण में होने के भी दावे कर रहे हैं और तीसरी लहर का मुकाबला करने के लिए ताल भी ठोक रहे हैं।

जाहिर है कि महामारी की भयावह सचाइयों को इस तरह सिरे से नकारने का हौसला किसी ‘योगी’ ही दिखा सकता है।

वैसे योगी की सरकार तो कोरोना की दूसरी लहर को शुरू से ही, ऐसे ही हौसले से ‘संभाले’ रही है! आखिरकार, उनके राज ने ही अप्रैल के आखिर तथा मई के आरंभ में, जब राज्य के अन्य प्रमुख शहरों में ही नहीं, राजधानी लखनऊ तक में अस्पतालों में बैडों से लेकर ऑक्सीजन तक का भारी संकट था और ऑक्सीजन सिलेंडर भरवाने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों में लंबी-लंबी लाइनें लग रही थीं, पहले सरकारी अस्पतालों में भर्ती के लिए सीएमओ की चिट्ठी की शर्त लगायी और उसके बाद निजी ऑक्सीजन सिलेंडर भरे जाने पर रोक लगायी। और कोरोना के मारों की मुश्किलें बढ़ाने वाले इन आदेशों के रूप में मुस्तैदी दिखाने से भी पेट नहीं भरा तो, शासन को झूठ-मूठ बदनाम करने के आरोप में, उन लोगों के खिलाफ मुकद्दमे दर्ज कराने शुरू कर दिए, जो सोशल मीडिया पर ऐसी चिकित्सकीय मदद की गुहार लगा रहे थे या दूसरों की ऐसी गुहारों को विस्तारित कर, जरूरतमंदों तक संभव मदद पहुंचने में सहायता करने की कोशिश कर रहे थे। जाहिर है कि शासन को बदनाम करने डंडे से, मीडिया को भी चुप कराने की कोशिश की जा रही थी। मोदी-शाह की सरकार ने कम से कम इस मामले में योगी सरकार का अनुकरण किया है।

         फिर भी, महामारी की तबाही को नकार कर, लोगों की तकलीफों को कम करने से इंकार ही करना, व्यवहारत: तो संकट के बीच लोगों को अपनी किस्मत के भरोसे छोड़ देना है, जो किसी भी शासन के लिए एक अक्षम्य अपराध है। आखिरकार, जो करणीय है उसे न करने के लिए, महामारी से लोगों की तकलीफों को नकारने की जरूरत तो इसीलिए पड़ती है कि शासन, लोगों की तकलीफों को दूर करने की जिम्मेदारी से औपचारिक रूप से पल्ला झाडऩे से हिचकता है।

जाहिर है कि शासन का औपचारिक रूप से इस जिम्मेदारी से ही पल्ला झाड़ लेना, इससे भी बड़ा अपराध है। और मोदी सरकार ने कोविड-19 के टीके या वैक्सीन के मामले में, महामारी के बीच जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी से औपचारिक रूप से भी पल्ला झाडऩे का, ठीक यही अपराध तो किया है।

यह समझने के लिए किसी रॉकेट विज्ञान की जरूरत नहीं थी कि वायरस से फैल रही महामारी के खिलाफ लड़ाई में, टीका ही असली हथियार है। अचरज नहीं कि पिछले साल के आरंभ में कोविड-19 को विश्व महामारी घोषित किए जाने से भी पहले से, इस वायरस के संक्रमण से बचाव के टीके की खोज में दुनिया भर में वैज्ञानिक मेधा जुट गयी थी। इन्हीं प्रयासों के चलते और जाहिर है कि अन्य वाइरसों के संदर्भ में टीके तथा टीका विज्ञान के मामले में हो चुकी प्रगति की मदद से, मानवता लगभग एक साल के रिकार्ड समय में ही, पिछली एक सदी की इस सबसे घातक महामारी के टीके तक पहुंच गयी। जहां अब तक महामारी से सिर्फ बचा ही जा सकता था, अब उसे परास्त करने का भी रास्ता दिखाई देने लगा था।

बेशक, कोविड-19 जैसी महामारी के सिलसिले में वैज्ञानिकों द्वारा टीके का विकास आधी लड़ाई ही जीतना था। बाकी आधी लड़ाई, इस टीके को इस तरह से लोगों तक पहुंचाने की इतनी ही मुश्किल और श्रमसाध्य लड़ाई थी, कि वायरस के लिए फैलने के कोई ठिकाना ही नहीं रहे। जिस तरह दुनिया भर में यह महामारी फैली थी, उसके अनुभव से साफ था कि इस वायरस के खिलाफ टीके के सचमुच कारगर होने के लिए, यह भी जरूरी है कि लगभग सारी दुनिया को इसके खिलाफ टीका लगे। सब सुरक्षित होंगे, तभी कोई भी सुरक्षित होगा। बेशक, आज की दुनिया में यह किसी भी तरह आसान नहीं था। टीके के विकास की आधी लड़ाई में भी और उसे सब लोगों तक पहुंचाने की बाकी आधी लड़ाई में तो और भी ज्यादा, बड़ी पूंजी की भूमिका रहनी थी। इसीलिए, विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे विश्व संगठन और जागरूक विश्व जनमत शुरू से ही इसके लिए प्रयत्नशील थे कि विश्व की भीमकाय दवा कंपनियां, अपने इजारेदाराना संपत्ति अधिकारों के जरिए, टीकों को अनाप-शनाप मुनाफे बटोरने का हथियार न बना लें और इसके चक्कर में विश्व आबादी के बड़े हिस्से को टीके से वंचित रखकर, टीके के इस हथियार को ही भोंथरा न बना दें। अमरीका तथा अन्य बड़ी पश्चिमी ताकतों के प्रतिरोध के चलते, कोविड-19 के टीकों, दवाओं आदि को पेटेंट-इजारेदारी से मुक्त रखने के दुनिया के देशों के विशाल बहुमत के प्रयास तो कामयाब नहीं हुए, उसके विकल्प के तौर पर देशों के विशाल बहुमत ने एक कौवैक्स प्लेटफार्म बनाया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दुनिया के गरीब देश, टीके से एकदम वंचित ही नहीं रह जाएं। दूसरी ओर जैसाकि अनुमान लगाया जा सकता था, विकसित पश्चिमी देशों ने, जिनकी की भीमकाय दवा कंपनियों का टीका बाजार पर बोलबाला है और जिन्होंने इसी के हिस्से के तौर पर टीके विकास के लिए पहल की थी, इन कंपनियों के अधिकांश टीका उत्पादन को, अग्रिम अनुबंधों आदि के जरिए अपने लिए ही आरक्षित कर लिया।

फिर भी बाकी सारी दुनिया भी टीके की दौड़ से बाहर ही नहीं रही। करीब-करीब एक साथ, कई टीके विकसित हुए थे और इनमें पश्चिमी दुनिया के बाहर, रूस में विकसित स्पूतनिक, चीन में विकसित सिनोवैक व दो अन्य टीके और भारत में विकसित कोवैक्सीन (Bharat Biotech Vaccine, Covaxin News,) खास हैं।

बहरहाल, कोविड-19 के टीके के मामले में भारत का एडवांटेज इस ‘स्वदेशी’ टीके के विकास तक ही नहीं था। उसका एक बड़ा एडवांटेज सीरम इंस्टीट्यूट जैसी दुनिया की सबसे बड़ी मात्रा में टीका बनाने वाली कंपनी का भारत में होना भी था। सीरम इंस्टीट्यूट ने इंग्लेंड में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित टीके, कोवीशील्ड का लाइसेंस के आधार पर उत्पादन करने के अधिकार हासिल कर लिए थे। इस तरह, भारत में दो टीकों का उत्पादन हो रहा था, जिससे भारतीयों को टीके की सुरक्षा हासिल होने की उम्मीद बंधी थी।

बहरहाल, मोदी सरकार का ‘‘दो-दो स्वदेशी’’ टीकों का प्रचार करने पर और प्रकारांतर से इस उपलब्धि का तथा दुनिया भर को टीके मुहैया कराने का सेहरा अपने सिर बांधने की कोशिश करने पर तो खूब जोर रहा, लेकिन उसने यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह टीका जल्द से जल्द सभी भारतीयों को टीका मिले, न कोई योजना बनायी और न कोई कदम उठाए। इसके लिए उसने शब्दश: कुछ भी किया ही नहीं। और तो और, कोवीशील्ड उत्पादक सीआइआइ और कोवैक्सीन उत्पादन, भारत बायोटैक को अग्रिम ऑर्डर तो क्या कोई पक्के आर्डर तक देने की जरूरत नहीं समझी गयी और न उन्हें अपनी उत्पादन क्षमताएं बढ़ाने के लिए कोई मदद दी गयी या प्रोत्साहित किया गया। उल्टे सरकारी पैसे से तथा सरकारी प्रयोगशालाओं में विकसित कोवैक्सीन का पेटेंट, भारत बायोटैक के हवाले कर के संतोष कर लिया गया, जबकि भारत की टीके की जरूरत के सामने उसकी उत्पादन क्षमता कुछ भी नहीं थी।

अब टीके का बहुत गंभीर संकट पैदा हो जाने तथा टीकाकरण के कार्यक्रम में भारी बाधा पड़ जाने के बाद ही, सार्वजनिक क्षेत्र के तीन दवा कारखानों को भी यह टीका बनाने का लाइसेंस दिया गया है। वास्तव में यह संख्या अब भी और बढ़ायी जा सकती है।

इसी नियोजनहीनता तथा महज गाल-बजाऊ सक्रियता का नतीजा है कि आज जबकि देश कोविड दूसरी लहर के थपेड़ों बुरी तरह से आहत है, उससे सुरक्षा हासिल कराने वाला टीकाकरण, करीब तीन महीने से ज्यादा में भी न सिर्फ कुल 18 करोड़ टीकों तक तथा करीब 2 फीसद आबादी के ही दोनों खुराकों के साथ पूर्ण टीकाकरण तक पहुंच पाया है, बल्कि अब ऐसे घातक उलझाव में भी फंस गया है, जहां कथित रूप से प्राथमिकता पर होने के बावजूद, दूसरी खुराक के उम्मीदवारों तक को टीके के अभाव में देश के अनेक हिस्सों में टीका केंद्रों से लौटाया जा रहा है।

लेकिन, जनता को उसके हाल पर छोड़ा जाना, पर्याप्त मात्रा में टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं किए जाने तक ही सीमित मामला नहीं है। यह तो सभी लोगों को, टीका मुहैया कराने की जिम्मेेदारी से मोदी सरकार के सीधे-सीधे इंकार कर देने तक जाता है। और यह काम करती है कथित नयी टीका नीति, जो टीके के वितरण का उदारीकरण करने के नाम पर पेश की जा रही है और 1 मई से लागू कर दी गयी है। बिना टीकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित किए, 45 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू करना तो इसका दिखाने वाला चेहरा भर है। इसका असली सार है, मोदी सरकार का इसका एलान कि 44 से 18 वर्ष तक आयु के लोगों के लिए, जो आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा होते हैं, यह जीवन रक्षक टीका मुहैया कराना उसकी जिम्मेदारी ही नहीं है।

यह आधी से ज्यादा आबादी, उसके बस में हो तो बाजार से खरीद कर खुद टीके की सुरक्षा हासिल कर ले या अपनी राज्य सरकार को इसका खर्चा करने के लिए मजबूर कर ले या फिर इस सुरक्षा के बिना ही काम चलाए! और बात सिर्फ इतनी नहीं है कि आबादी एक बड़े हिस्से को इस तरह उपलब्ध होने के बावजूद, टीके की सुरक्षा के बिना रहने के लिए छोड़ जा रहा है। इसके ऊपर से, कथित ‘स्वदेशी’ टीका उत्पादकों को आबादी के इस बहुमत के लिए टीके की बहुत बढ़ी-चढ़ी कीमत वसूल करने के लिए न सिर्फ छूट दे गयी है बल्कि वास्तव में उन्हें यह कहकर इसके लिए उकसाया ही गया है कि 150 रु0 खुराक का टीके का दाम केंद्र सरकार के लिए ही है, बाकी सब के लिए दाम आप तय कर लो। यह जनता को किस्मत के भरोसे छोडऩे के ऊपर से उसकी कीमत पर अपनी चहेती बड़ी दवा कंपनियों से खुद खड़े होकर मुनाफाखोरी कराने का भी मामला है।

संकट में जनता को उसके हाल पर छोड़ना अपराध है, तो इसे क्या जाएगा? सुप्रीम कोर्ट के इस नीति पर अनेक सवाल उठाने के बावजूद, मोदी सरकार के इस नीति पर अड़े होने से साफ है–जनता को किस्मत के भरोसे छोड़ने का यह अपराध, मोदी सरकार ने गलती से नहीं बल्कि सोच-समझकर किया है।                                                                         

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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