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Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

बाल यौन अत्याचार : नए सिरे से एक बहस

Sexual torture in children: a fresh debate

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012, (POCSO ) अधिनियम, के तहत मुंबई में गठित अदालत की एक स्पेशल जज ने पिछले दिनों एक अहम फैसला सुनाया। अपने फैसले में सुश्री भारती काले ने उस यौन अत्याचार (Sexual harassment) के उस अभियुक्त को जमानत देने से भी मना किया जिसने पांच साल की एक बच्ची के साथ यौन अत्याचार किया था।

जज महोदया ने कहा कि पीड़िता ने साफ कहा है कि अभियुक्त ने उसके शरीर को छुआ है और वह ‘बुरा स्पर्श’ है। अभियुक्त  की इस दलील को अदालत ने नहीं माना कि वह बच्ची अच्छे और बुरे स्पर्श का फर्क समझ नहीं सकती तथा इस तर्क को भी खारिज किया कि अभियुक्त पीड़िता का पड़ोसी ही है और दूर का रिश्तेदार ही है तथा दोनों परिवारों के भी आना-जाना रहता है।

अच्छा स्पर्श’, ‘बुरा स्पर्श’ आदि को लेकर नए सिरे से चर्चा | Fresh discussion about ‘good touch’, ‘bad touch’ etc.

यह सकारात्मक है कि इस फैसले ने ‘अच्छा स्पर्श’, ‘बुरा स्पर्श’ आदि को लेकर चर्चा नए सिरे से खड़ी हुई है। आंकड़े यही बताते हैं कि अधिकतर बच्चे उन्हीं लोगों द्वारा यौन अत्याचार का शिकार होते हैं जिन्हें वह जानते हैं या जो उनके ‘आत्मीय’ कहलाते हैं। कुछ साल पहले खुद भारत सरकार के समाज एवं बालकल्याण मंत्रालय ने खुलासा किया था कि 53 प्रतिशत बच्चे यौन हिंसा के शिकार होते हैं, और उनके पीड़ितों में अधिकतर मामलों में उनके ‘करीबी कहलाने वाले लोग ही शामिल होते हैं।

विगत कुछ सालों से अलग-अलग सरकारें तथा गैरसरकारी संगठन बाल यौन अत्याचार को लेकर जागरुकता (Awareness about child sexual abuse) पैदा करने के बारे में इस दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं। कुछ समय पहले खुद दिल्ली सरकार ने भी बाल यौन अत्याचार को लेकर जागरुकता पैदा करने हेतु हिन्दी पोस्टरों की एक शृंखला जारी की थी, जबकि उन्हीं दिनों राष्ट्रीय राजधानी में ऐसे अत्याचारों में तेजी दिखाई दे रही थी, एक के बाद एक घटनाओं का खुलासा हो रहा था।

महिला एवं बाल कल्याण विभाग द्वारा जारी इन पोस्टरों में ‘अच्छा स्पर्श बुरा स्पर्श’ आदि को रेखांकित किया गया था और बच्चों को यह समझाने की कोशिश की गई थी कि वह अपने आप को अनुचित व्यवहार से कैसे बचाएं और खतरे की स्थिति में किससे सम्पर्क करें।

स्वयं को सुरक्षित रखने के चतुर उपाय‘, ‘तुम्हें हर समय सुरक्षित रहने का अधिकार है’, आदि शीर्षकों से बने यह पोस्टर सरल भाषा में बच्चों को सचेत करते दिख रहे थे। निश्चित तौर पर यह योजना बाल अधिकारों के लिए कार्यरत विशेषज्ञों की सलाहों के अनुरूप ही थी जिसमें उनकी तरफ से यह बात रखी जाती रही है कि किस तरह बच्चों को ‘अच्छे स्पर्श’ और ‘बुरे स्पर्श’ के बारे में बताना जरूरी है।

इस मामले में एक घटना ने सुर्खियां भी बटोरी थीं जब मीडिया में गुड़गांव (गुरूग्राम) की 12 साल की अनामिका (बदला हुआ नाम) के मामले को उठाया था, जहां पता चला था कि वह सात साल तक अपने ही पिता के हाथों यौन अत्याचार का शिकार होती रही। अपने साथ हो रही इस ज्यादती का एहसास उसे तब हुआ जब उसे ‘अच्छा स्पर्श’ बुरा स्पर्श’ आदि के बारे में स्कूल में बताया गया। उसने अपनी आप बीती अपने दोस्त से साझा की, जिसने स्कूल के प्रधानाध्यापक को बताया और फिर पुलिस हरकत में आई जिसने उसके पिता को ‘पोक्सो अधिनियम की धारा 4‘ तथा भारत की दंड विधान की धारा 376 एवं 506 के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

Have we found a final solution to stop child sexual abuse?

तो क्या यह समझा जाए कि बाल यौन अत्याचार को रोकने का एक अंतिम समाधान हमें मिल गया? दरअसल यह समझने की जरूरत है कि ऐसे सुझावों की बहुत सीमित उपयोगिता है। इसमें दो तरह की दिक्कतें हैं – एक व्यावहारिक दिक्कत, कई बच्चे- अनामिका की तरह ऐसी उम्र में अत्याचार का शिकार होते हैं, जिन्हें आप कैसे शिक्षित कर सकते हैं। दूसरा, इस पर अत्यधिक जोर कहीं पीड़ित को ही उसके अत्याचार के लिए जिम्मेदार मानने तक पहुंच जाता है। सोचने का मसला यह है कि स्पर्श के नियम सिखाने तक इस मामले को न्यूनीकृत/रिडयूस करके दरअसल कहीं न कहीं हम आत्मीय कहे गए सम्बन्धों में भी जो सत्ता सम्बन्ध व्याप्त होते हैं, उसकी गंभीरता और व्यापकता की अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, ऐसे कदम जिनका दर्शनीय मूल्य ज्यादा होता है, वह शेष समाज की उस विराट असफलता पर परदा डाल देते हैं, जो बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के सुविचार और जमीनी यथार्थ के गहरे अन्तराल को सामने लाता है। न विशेष अदालतें मौजूद हैं, न बच्चों के काउंसलिंग के इन्तजाम मौजूद हैं, और न ही एक सुरक्षित वातावरण में वह पल बढ़ सकें इसलिए समाज की तरफ से इन्तजाम मौजूद हैं।

मिसाल के तौर पर प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल आफेन्सेस एक्ट के तहत गठित विशेष अदालतें (Special courts constituted under Protection of Children from Sexual Offenses Act) भी हर राज्य में गठित नहीं हुई हैं या उन्हें समाप्त किया गया है। ऐसे समाचार भी मिलते रहते हैं कि ऐसी गठित विशेष अदालतों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन/नशीली दवाओं/सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम आदि के तहत आने वाले मामलों का भी बोझ डाला जाता है।

अंत में कई बार न्यायपालिका में पदासीन न्यायाधीशों के रुख से भी मामले को हल्का करने की कवायद दिखती है।

आप को याद होगा कि बाल यौन अत्याचार किस तरह समझा जाए, इसे लेकर पिछले ही माह मुंबई उच्च अदालत की नागपुर पीठ के फैसलों ने काफी विवाद पैदा किया था। 

अपने इन विवादास्पद फैसलों में अदालत ने यह भी पूछा था कि किसी बच्ची के पाजामे की जिप खोली जाए या उसके सीने पर हाथ घुमाया जाए जबकि वह कपड़े पहनी हो तो उसे यौन अत्याचार नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें ‘स्किन टू स्किन’ संपर्क नहीं हुआ है। याद रहे पोक्सो अधिनियम के तहत इन जज महोदया के फैसले इतने विवादास्पद हुए कि उन्हें सेवाविस्तार ठीक से नहीं मिल सका।

सुभाष गाताडे

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