27 को होगा शाम-ए-तालिब

सन 1998 अपने उस्ताद के गुजर जाने के बाद तालिब साहब ने कव्वाली विधा को जिंदा रखकर बदायूं के नाम को और भी बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया। अपनी ज़िंदगी के आखिरी दौर तक देश-विदेश में कार्यक्रम पेश करते रहे। तालिब हुसैन सुल्तानी का सूफियाना कलाम ग़ज़ल गायकी में अनोखा अंदाज सबसे जुदा है

Sham-e-Talib will be organized in memory of the famous Qawwal Marhoom Talib Hussain Sultani

बदायूँ, 24 नवंबर 2020. आगामी 27 नवंबर 2020 को उस्ताद तालिब सुल्तानी म्यूज़िक एकेडमी सरगम के तत्वावधान में मशहूर कव्वाल मरहूम तालिब हुसैन सुल्तानी की याद में शाम-ए-तालिब का आयोजन किया जा रहा है।

यह जानकारी देते हुए एक विज्ञप्ति में बताया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी और सुप्रसिद्ध सूफी गायक जाफर साबरी इस कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देंगे।

तालिब हुसैन सुल्तानी | World famouse Qawwal (Talib husain sultani ) budauni

मरहूम तालिब हुसैन सुल्तानी का नाम किसी तारीफ का मोहताज नहीं है। बदायूं घराने से ताल्लुक रखने वाले इस फनकार का नाम संगीत की दुनिया में बहुत ही अदब और एहतराम के साथ लिया जाता है। यही वजह है कि उनकी शिनाख्त एक आला दर्जे के आलमी शोहरत याफ्ता कलाकार के तौर पर होती है

तालिब हुसैन सुल्तानी की पैदाइश सन 1954 में बदायूं शहर के मोहल्ला वैदों टोले में हुई। क्योंकि कव्वाली और ग़ज़ल गायन की विधा उनको विरासत में मिली थी इसलिए संगीत उनके रोम-रोम में बसता था। उन्हें बचपन से ही कव्वाली ग़ज़ल गायन का बेहद शौक था। उन्होंने बुनियादी तालीम अपने वालिद मरहूम मतलूब हुसैन से हासिल की, जो फारसी कलाम के अनोखे गायब थे। जनाब सुल्तानी ने खेलने कूदने की उम्र में ही कव्वाली और ग़ज़ल से अपना अटूट रिश्ता कायम कर लिया था। बचपन से ही उनके नाम को हिंदुस्तान में काफी शोहरत मिल चुकी थी। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनका नाम अपने वतन की सीमाओं में ही सीमित नहीं रहा बल्कि विदेशों में भी उनके नाम की शोहरत शुरू हो गई थी। एक वक्त वह भी आया जब उन्हें ग़ज़ल का बादशाह कहा जाने लगा।

अंतरराष्ट्रीय कव्वाली गायक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजे जाने वाले मशहूर कव्वाल जाफर हुसैन को अपना उस्ताद बनाकर तालिब हुसैन सुल्तानी ने उनके साथ तमाम देशों में हिंदुस्तानी तहजीब व संगीत का परचम लहराया। तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन साहब ने उनके फन को देखकर उन्हें सम्मानित किया।

उस्ताद के साथ श्री सुल्तानी ने लंदन, अल्जीरिया, जर्मन, जापान, दुबई, सूडान, पेरिस, सऊदीअरबिया, मारीशस, तंजानिया जद्दा, फ्रांस, जिंबाब्वे, युगांडा, केन्या समेत कई देशों में भारतीय कला और संगीत का लोहा मनवाया है।

सन 1998 अपने उस्ताद के गुजर जाने के बाद तालिब साहब ने कव्वाली विधा को जिंदा रखकर बदायूं के नाम को और भी बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया। अपनी ज़िंदगी के आखिरी दौर तक देश-विदेश में कार्यक्रम पेश करते रहे। तालिब हुसैन सुल्तानी का सूफियाना कलाम ग़ज़ल गायकी में अनोखा अंदाज सबसे जुदा है

एक दौर में उत्तर प्रदेश की सबसे प्राचीन कला कव्वाली विलुप्त होने की कगार पर थी, उसको जिंदा रखने के लिए तालिब साहब ने संजीवनी का काम किया। वह इसके अलावा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, आकाशवाणी, दूरदर्शन, ईटीवी उत्तर प्रदेश, संस्कृति निदेशालय उत्तर प्रदेश से जुड़कर तमाम कार्यक्रम देते रहे।

उन्होंने समाज में फैली भ्रांतियों कुरीतियों और बुराइयों को मिटाने के लिए अपने फन यानी कव्वाली को सहारा बनाया। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्वच्छ भारत मिशन, कुपोषण, जल संरक्षण जैसे अभियान से सरकार की आवाज बनने का काम किया। उनकी अनोखी कोशिशों के लिए शासन-प्रशासन ने उन्हें कई बार सम्मानित किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने श्री सुल्तानी को अपनी सरकार में सम्मानित किया।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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