टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में एक निर्लज्ज तबका सरकार के बचाव में खड़ा है

Corona virus

क्या सरकार की उचित आलोचना भी न हो ? | Shouldn’t the government also be properly criticized?

कोरोना महामारी से जंग के बजाय निहित स्वार्थ की राजनीति देश के लिए बेहद घातक होगी। किसी भी दल, संगठन ने लॉकडाउन पर सवाल (Question on lockdown) नहीं उठाया, पीएम के कोरोना के खिलाफ जंग में सहयोग का वायदा किया, लेकिन जिस तरह सरकार के पास विजन का अभाव है, पहले ही की गई घोर लापरवाही से हालात बिगड़ते गये, तब क्या सरकार की उचित आलोचना न हो और जवाबदेही तय न की जाये, यह भी उन्हें कहां बर्दाश्त है। इसलिए कोरोना महामारी के खिलाफ जब पूरा देश जंग लड़ रहा है, तमाम संस्थायें और लोग अपनी जान की परवाह किये बिना जी जान से लगे हैं,  तब कुछ लोग अपना राजनीतिक ऐजण्डा सेट कर रहे हैं लेकिन इसमें कामयाबी मिलने वाली नहीं है।

आज सूचना मिल रही है कि उत्तर प्रदेश में कल से पेमेंट व अपनी सुरक्षा (मेडिकल) को लेकर चिंतित 17 हजार एंबुलेंस कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी (Ambulance employees warned to go on strike) है। डॉक्टर मास्क, किट न होने की की शिकायत कर रहे हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर सरकारी डॉक्टर इलाज कर रहे हैं।

अन्य तमाम सरकारी कर्मचारी भी बिना सुरक्षा उपायों (किट आदि) के काम में लगे हैं। लेकिन हर मर्ज की दवा निजीकरण बताने वाले कहीं दिख नहीं रहे हैं।

कारपोरेट जगत भारी आलोचना के बाद भी दाल में नमक के बराबर भी सहयोग के लिए आगे नहीं आया। पीएम केअर फंड में कारपोरेट्स ने कितना फंड जमा किया अभी तक सार्वजनिक नहीं (How much fund corporates deposited in PM Care Fund not yet public), वैसे बताया जा रहा है कि पीएम केअर का फंड सार्वजनिक किया भी नहीं जायेगा।

ऐसे में यह विचारणीय है कि अगर बची खुची सरकारी संस्थाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया होता तब कैसे हालात होते। जिस तरह के इंतजामात हैं, हवा हवाई घोषणाएं हो रही हैं, घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने के बजाय राजनीतिक बयानबाजी ज्यादा हो रही है।

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए, सैकड़ों किमी पैदल चलने वाले भूखे प्यासे मजदूरों को रास्तों में मारापीटा गया और जब मुद्दा बना और बसों की व्यवस्था की गई तो बस की छत पर सफर करने वालों से भी किराया वसूला गया, बरेली में सेटेनाइजेशन के लिए खतरनाक केमिकल का छिड़काव मजदूरों के विरोध के बावजूद कर उनकी जिंदगी को खतरे में डाला गया।

अगर हालात ऐसे ही रहे तो गरीबों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है लेकिन इन तमाम ज्वलंत मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित कराने के लिए विचार विमर्श और सरकार को कटघरे में खड़ा करने के बजाय बिना किसी तैयारी के हुये लॉकडाउन के बाद पैदा हुई अव्यवस्था व अफरातफरी को बेहद स्वाभाविक बताते हुए टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में एक तबका सरकार के बचाव में खड़ा है, यह बेहद शर्मनाक है, पतन की पराकाष्ठा है।

अगर इसी तरह की हरकतें जारी रहीं तो देश कितना तबाह होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। अभी भी वक्त है कि सरकार की जवाबदेही तय की जाये और सरकार स्वीकार करे कि कोरोना महामारी के अपने देश के प्रथम चरण में जिसमें विदेश से आने वाले लोगों की जांच और उन्हें क्वारेनटाइन में रखने के मामले में घोर लापरवाही व चूक हुई है, लॉकडाउन में भी होम वर्क का घोर अभाव रहा।

लेकिन देश की बर्बादी का भुक्तभोगी तो मजदूर, किसान, छोटे-मझोले कारोबारी और बेरोजगार ही होंगे। बड़े कारपोरेट्स को सरकार भरपाई कर देगी, बड़े कारोबारी भी देर सबेर भरपाई कर ही लेंगे ऐसा उन्हें लगता है। यही वजह है कि एक तबका जाने अनजाने देश की भावी तबाही से बेखबर राजनीतिक चश्मे से चीजों को देख रहा है . दरअसल इसकी मुख्य संचालक शक्ति बड़ा कारपोरेट्स है और उसका मुख्य ऐजण्डा भाजपा व पीएम की साख को बचाये रखने की है न कि कोरोना महामारी से जंग और आमजन की जिंदगी की रक्षा।

राजेश सचान, संयोजकयुवा मंच,

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