साहित्य अकादेमी जैसी प्रतिष्ठित संस्था में महिला के यौन उत्पीड़न पर चुप्पी

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

Silence on sexual harassment of women in a prestigious institution like Sahitya Academy

देश भर में महिला सुरक्षा पर बहस (Debate on women’s safety across the country) एक बार फिर से तेज हो गई है। हैदराबाद रेप के आरोपियों का एनकाउंटर (Encounter of Hyderabad rape accused) किया जा चुका है, उन्नाव पीड़ितe की मौत के बाद दोषियों को जल्द से जल्द सख्त सजा देने की मांग उठ रही है। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल पिछले कई दिनों से अनशन पर हैं। राहुल गांधी सरकार से बार-बार सवाल कर रहे हैं। संसद के शीतकालीन सत्र में भी महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के मुद्दे की गूंज सुनाई पड़ी है। कुछ मीडिया समूहों में भी इस मुद्दे पर देशव्यापी बहस छेड़ रखी है। लेकिन क्या वाकई देश में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को रोकने और बेटियों को सुरक्षा देने की कोई ईमानदार कोशिश चल रही है? इसका जवाब है नहीं, और इस नहीं के पीछे जो वजह है उसे बताने के लिए मैंने ये भूमिका बनाई है।

Asiaville ने 10 दिसंबर को एक स्टोरी प्रकाशित की। साहित्य अकादेमी जैसी प्रतिष्ठित संस्था में यौन शोषण के गंभीर मामले को कवर करती स्टोरी का शीर्षक है…’शारीरिक संतुष्टि’ के बदले नौकरी पक्की करने का वादा किया गया साहित्य अकादमी में? इससे पहले ये स्टोरी द हिन्दू में 27 नवंबर को ‘Woman alleges sexual harassment by Sahitya Akademi official‘ हेडर से की गई थी। ये मामला देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक साहित्य अकादेमी में हुए यौन शोषण (Sexual abuse in the Sahitya Akademi) का है। ख़बर में लिखा है कि दिल्ली पुलिस ने साहित्य अकादेमी के सचिव श्रीनिवासराव के खिलाफ FIR दर्ज (FIR lodged against Sahitya Akademi secretary Srinivasa Rao) कर लिया है।

द हिन्दू में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पुष्टि की है, कि 7 नवंबर को ही तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज हो गया है। लेकिन पुलिस ने अभी तक अपनी तरफ से कार्रवाई नहीं की है।

एफआईआर के अनुसार साहित्य अकादमी में सचिव के श्रीनिवासराव, संस्थान में उप सचिव के स्तर पर काम कर रही अंग्रेजी संपादक पर ज्वाइनिंग के बाद से ही यौन संबंध बनाने के लिए दबाव डाल रहे थे। FIR के मुताबिक 7 नवंबर को जब पीड़ित श्रीनिवासराव के कमरे में पहुंची, तो उन्होंने आगे बढ़कर उसका हाथ छू लिया और साफ शब्दों में कहा… ‘कि अब तक तुम्हें समझ जाना चाहिए था, अगर तुम मुझे बॉडिली सेटिस्फेक्शन देती हो तो मैं तुम्हारी नौकरी पक्की कर दूंगा।’ इस पर पीड़ित रोते हुए सचिव के कमरे से बाहर निकली और पुलिस हेल्पलाइन को फोन किया।

FIR में ये भी लिखा गया है कि हेल्पलाइन को फोन करते वक्त पीड़ित लड़की रो रही थी। पीड़ित के मुताबिक घटना के बाद साहित्य अकादेमी के सचिव श्रीनिवासराव ने उससे कहा कि वो उसकी बेटी की तरह है और उसके सामने हाथ भी जोड़े।

एफआईआर के मुताबिक पीड़िता का 15 फरवरी 2018 से लगातार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हो रहा था।

साहित्य अकादेमी की एक समिति भी इस मामले में कार्यस्थल पर हुए यौन शोषण की शिकायत की जांच कर रही है। जांच की रिपोर्ट तो अभी नहीं आई है, लेकिन पीड़िता ने बताया है कि उसपर रिपोर्ट वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। पीड़िता ने बताया कि शिकायत के बाद बड़े अधिकारियों ने उसे एक कमरे में बुलाया। जहां ज्यादातर पुरुष थे और पीड़िता से आपत्तिजनक सवाल भी किए गए। पीड़िता को ये भी समझाने की कोशिश की गई कि ग़लती उसी की है।

पीड़िता फिलहाल मेडिकल लीव पर है और मानसिक तौर पर ऑफिस लौटने में सहज नहीं है। Asiaville ने इस ख़बर पर साहित्य अकादेमी के सचिव श्रीनिवासराव से उनका पक्ष भी जानना चाहा लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए।

मेरे जैसे पत्रकार के लिए साहित्य अकादेमी में घटी यौन उत्पीड़न की ये घटना जितनी दुखदायी है उससे ज्यादा दुख की बात साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की चुप्पी को लेकर है। सात नवंबर से लेकर अब तक इस मामले में किसी साहित्यकार ने आवाज़ नहीं उठाई है। साहित्यकार अपने को सत्ता का वैचारिक प्रतिपक्ष बताते रहते हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं पर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या साहित्यकारों ने संस्थाओं की तरफ से मिलने वाले पद पुरस्‍कारों के लिए अपनी अंतरआत्मा को गिरवी रख दिया है?

पत्रकार, बुद्धिजीवी और समाजसेवी भी चुप्‍पी साधे हुए हैं।

सोशल मीडिया में जो दिन-रात महिला सुरक्षा और बेटियों पर हो रहे अत्याचार की दुहाई देते रहते हैं, वे सब इस गंभीर मामले में चुप हैं। ये घटना देश की राजधानी में संसद से कुछ ही फासले की दूरी पर घटी है, पीड़िता सदमे में है और आरोपी खुला घूम रहा है। पता चला है कि पीड़िता देश के एक सीमावर्ती राज्‍य की नागरिक हैा इस घटना से पता चलता है कि देश की राजधानी में स्थित  प्रतिष्ठित संस्‍थानों में भी सीमावर्ती राज्‍यों के नागरिक उसी तरह अकेले होते हैं जैसे मुख्‍यधारा समाज में होते हैं।

राजेश कुमार

(लेखक टीवी पत्रकार हैं।)

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