पानी जब ज़हर बन गया

प्रतिवर्ष फ्लोराइड युक्त जल से बचाव के लिये केन्द्र व राज्य की सरकारों द्वारा अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं तथापि स्थितियाँ वही ढाक के तीन पात वाली हैं।

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दो साल से खाट पर पड़ा हूँ। हाथ-पैर काम नहीं करता। दर्द ऐसा कि सहा तक नहीं जाता। क्या करूँ बाबू, परिवार के लिए बोझ ही तो बन गया हूँ? बस अब पड़े-पड़े मौत का इंतजार कर रहा हूं!

बांस और टाट से निर्मित एक टूटी सी झोपड़ी के अंधेरे कोने में, खाट पर बैठा 58 वर्षीय सफल मुर्मू जिंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिनते हुए अचानक फफक पड़ता है। भारी शारीरिक पीड़ा के बावजूद अपनी जिंदगी से हार नहीं मानने वाला व्यक्ति हार रहा है तो सिर्फ अपनी शारीरिक अक्षमता की वजह से।

यह कड़वी सच्चाई उस गाँव की है, जहां जीवन देने वाला जल ही वहां के लोगों के लिये जहर साबित हो रहा है। जल जनित बीमारी फ्लोरोसिस (Water borne fluorosis) के कारण झारखंड के साहेबगंज जिलान्तर्गत बरहेट विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले सिमलढाब पंचायत के कई टोलों के बाशिंदों की सुबह इसी दर्द से ही शुरू होती है और दर्द में ही रात गुजर जाती है।

सिमलढाव पंचायत के अलग अलग गांवों में जल जनित इस बीमारी से अबतक सैकड़ों लोगों की मौतें हो चुकी है। सिमलढाब पंचायत के अंतर्गत 13 टोला हैं, उपरोक्त में से फ्लोरोसरिस से सर्वाधिक प्रभावित पंडित टोला, इलाकी व श्रीशटोला है, जहाँ पानी में फ्लोराइड की मात्रा (Fluoride content in water) सर्वाधिक है। सिर्फ पंडित टोला व इलाकी में ही सफल मुर्मू नहीं बल्कि 65 साल के पड़रा हेंब्रम, 62 वर्षीय सीताराम पंडित, 60 साल के मति सोरेन, 52 साल के होपनी किस्कू, 50 साल के साँझली मुर्मू और मंझो सोरेन, 35 वर्षीय कांहुँ मुर्मू, 34 साल के बुधिन टुडू, 30 साल के मुंझी हांसदा और 28 साल के नौजवान मंगल किस्कू सहित सैकड़ों लोग फ्लोरोसिस के शिकार हैं।

फ्लोरोसिस से हुई मौतों का आधिकारिक आंकड़ा | Official figure of deaths from fluorosis

सिमलढाव के कई ग्रामीणों का कहना है कि जब से होश संभाला तब से इस बीमारी की चपेट में खुद को पा रहे हैं। कितनी पुश्तें इस बीमारी का शिकार हो चुकी हैं, कोई नहीं जानता। चौंकाने वाली बात यह है कि इस से अब तक हुई मौतों का कोई आधिकारिक आंकड़ा तक विभाग के पास मौजूद नहीं है।

भू वैज्ञानिक डॉ. रणजीत कुमार सिंह का कहना है भूगर्भीय जल में आयरन, मैग्नीशियम, आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे तत्व पाए जाते हैं। किसी तत्व की अधिकता इस बीमारी का प्रमुख कारण बन सकती है। जल का फिल्टरेशन कर इसे उपयोगी बनाया जा सकता है। प्रभावित इलाकों में बाहर से जल पहुंचाना भी एक कारगर उपाय है। लेकिन दोनों तरह की योजनाएं खर्चीली हो सकती हैं। हालांकि बरहेट में मेगा जलापूर्ति योजना के तहत इस समस्या से निपटा जा सकता है।

ग्रामीण दीनबंधु पंडित के अनुसार वर्ष 2000 में पीएचईडी विभाग की ओर से गाँव के कुछ चापाकलों (हैंडपंप) में फिल्टर लगाया गया था। जब से फिल्टर लगाया गया उसके बाद आज तक मात्र एक दो मर्तबा ही उसके पार्टिकल्स बदले गए हैं। अब तो विभाग का कोई ध्यान ही नहीं रह गया है। एक कुआं की कृपा पर ही पूरा का पूरा गांव निर्भर है।

World Bank Assisted Water Supply Projects in Selected Districts of Jharkhand

झारखंड सरकार की मेगा ग्रामीण जलापूर्ति योजना भी मुँह बाए खड़ी है। यह योजना भी हाथी का दांत बनकर रह गई है। इस योजना से सिर्फ बरहेट बाजार के लोग ही लाभान्वित हो रहे हैं। योजना की क्षमता भी इतनी कम है कि इससे सिर्फ बरहेट बाजार की ही आवश्यकता पूरी की जा रही है। इस योजना के तहत खैरवा गुमानी नदी से पानी निकाल कर तथा फिल्टर कर उसकी सप्लाई की जाती थी।

वर्ष 2017 में बंद पड़े जलापूर्ति योजना के तहत सिमलढाब पंचायत में पाईप लाईन बिछाया गया था, जिससे लोगों को पानी प्राप्त हो रहा था।

ग्रामीण फ्रांसिस सोरेन का कहना है कि इसी वर्ष के अगस्त/ सितंबर महीने से अचानक पानी मिलना बंद हो गया। इसकी सबसे बड़ी वजह सड़क निर्माण के दौरान पेयजलापूर्ति की पाईपों को क्षतिग्रस्त कर दिया जाना रहा। इन इलाकों में फ्लोरोसिस से पीड़ित मरीज डॉक्टर के पास नहीं जाते। मरीजों का कहना है कि वह गांव के हकीमों की जड़ी-बूटियों से ही अपना इलाज कराते हैं, क्योंकि आर्थिक रुप से वे इतने सम्पन्न नहीं कि डाक्टरों की फीस दे सकें।

मरीज कांहुँ मुर्मू के अनुसार कुंडली मिशन की एक सिस्टर से वे दवा लेते हैं। जबतक दवा का असर रहता है दर्द में राहत मिलती है। दवा की धीमी पड़ती असर से दर्द पुनः हरा हो जाता है।

Use only fluoride free water

इस संबंध में कार्यपालक अभियंता विजय कुमार एडविन का कहना है कि बरहेट प्रखंड के फ्लोरोसिस प्रभावित इलाकों में चापाकलों (हैंडपंप) में फिल्टर लगाया गया है। समय-समय पर उसके पार्टिकल्स बदले भी जा रहे थे। वहीं लोगों को इसके लिये जागरूक भी किया गया है। उन्हें हिदायत दी गयी है कि किसी भी स्रोत से पेयजल इस्तेमाल करने से पहले पीएचईडी के जल जांच केंद्र में नमूने की जांच करा लें। फ्लोराइड मुक्त जल का ही इस्तेमाल करें। हाल ही में चापाकलों में फिल्टर लगाने के लिए विभाग की ओर से टेंडर भी निकाला गया।

उन्होंने कहा कि इस प्रखंड में पेयजलापूर्ति योजना के एक्सटेंशन के लिए वरीय अधिकारियों को प्रस्ताव भेजा जाएगा। हालांकि जिस पंचायत के अधिकांश लोग पूरी तरह चलने फिरने की स्थिति में न हों तथा जहाँ इस भयावह बीमारी के साथ साथ भुखमरी और बदहाल जिंदगी हो, वहां जांच केन्द्र जाकर पानी के नमूनों की जांच कराने की बात करना बेमानी है।

इस संबंध में साहेबगंज के सिविल सर्जन डॉ डीएन सिंह का कहना है कि बरहेट में मुख्यतः दंत फ्लोरोसिस व कंकालीय फ्लोरोसिस के रोगी अधिक पाए गए हैं।

क्या है कंकालीय फ्लोरोसिस | What is skeletal fluorosis

डॉ डीएन सिंह का कहना है कि कंकालीय फ्लोरोसिस शरीर की अस्थियों व जोड़ों को प्रभावित करता है, विशेषकर घुटनों को। इस बीमारी में घुटने  फूल जाते हैं, जिनमें असहनीय पीड़ा होती है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति का चलना फिरना तक दूभर हो जाता है।

क्या है दंत फ्लोरोसिस | What is dental fluorosis

डॉ डीएन सिंह का कहना है कि जहां तक दंत फ्लोरोसिस की बात है तो इसमें दांत पीले पड़ जाते हैं और धीरे धीरे सड़ने भी लगते हैं। इस बीमारी पर अंकुश लगाए रखने के लिये अभी तक वैज्ञानिकों का शोध जारी है।

उन्होंने कहा कि स्वास्थ विभाग प्रभावित इलाकों में कैंप कर पीड़ितों की जांच और उनका उपचार करेगी। हाल ही में होप फॉर कैंसर पेशेंट संस्था ने फ्लोरोसिस प्रभावित बरहेट के कई इलाकों का भ्रमण कर उपरोक्त की हालात का जायजा लिया।

संस्था की मैनेजिंग ट्रस्टी सीमा सिंह ने कहा कि प्रभावित इलाकों की स्थिति भयावह है। प्रत्येक घर का एक सदस्य फ्लोरोसिस से बुरी तरह ग्रसित है।

उन्होंने कहा कि इस बीमारी के पीड़ितों की संख्या पर अबतक किसी ने सर्वे नहीं किया, जो चिंता का विषय है।

बहरहाल सरकारी दावों के अनुसार इस जिले को प्लोराइड मुक्त बनाया जायेगा लेकिन सिमलढाब के अधिकांश गांवों में अबतक यह प्रयास शुरू भी नहीं किया जा सका है। प्रतिवर्ष फ्लोराइड युक्त जल से बचाव के लिये केन्द्र व राज्य की सरकारों द्वारा अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं तथापि स्थितियाँ वही ढाक के तीन पात वाली हैं। ऐसे में सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से ले ताकि न केवल पीड़ितों का इलाज संभव हो सके बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सके।

रब नवाज आलम

साहेबगंज, झारखंड

(चरखा फीचर)

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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