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Migrants On The Road

अभी केन्द्र सरकार पहले ही डूबती अर्थव्यवस्था के नाम पर चंदा बटोर रही है, फिर राज्य सरकारें नई नौकरियों के नाम पर नंगा दौड़ाएंगी

अभी केन्द्र सरकार पहले ही डूबती अर्थव्यवस्था (Sinking economy) के नाम पर चंदा बटोर रही है, वो दिन दूर नहीं जब राज्य सरकारें नई नौकरियों के नाम पर नंगा दौड़ाएंगी

जैसे कि हम सब जानते हैं लॉकडाउन का चरण (Lockdown phase) लगभग खत्म हो चला है और लोगों को ज़रूरी कामों के रियायत दी जा चुकी है, लेकिन प्रवासी मज़दूरों का पलायन लगातार अब भी जारी है (The migration of migrant laborers continues to this day)। केन्द्र सरकार जो कुछ कर रही है वो सब काबिले-तवज्जोह है ही। उत्तर प्रदेश सरकार ने तो प्रियंका गांधी  द्वारा प्रवासियों के लिये भेजी गई बसो में घोटाले मामले का पर्दाफाश कर एक बार फिर साबित कर दिया कि सरकार आमजन के प्रति कितनी हितेशी और प्रतिबद्ध है? खैर…….

पिछले दिनों मजदूर पलायन के चलते दिल दहलाने वाली तस्वीरें और खबरें देखने और सुनने को मिलीं, लेकिन जिस खबर ने मेरी नींद आज तक उड़ा रखी है वो खबर है एक प्रवासी महिला का सड़क पर बच्चे को जन्म देना (Migrant woman giving birth on the street) और मीलों पैदल सफर कर अपने घर पहुंचना।

कहानी शकुंतला और राकेश के परिवार की है, जो पैदल ही (नासिक) महाराष्ट्र  से (सतना) मध्य प्रदेश (जिसकी दूरी लगभग 1 हजार किलोमीटर है)  के लिए रवाना हुए। 9 माह की गर्भवती शकुंतला 70 किलोमीटर ही पैदल चली थी कि उनको प्रसव पीड़ा होने लगी और उन्होंने 5 मई को सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म दिया।

कहानी अभी यहाँ खत्म नहीं हुई। बच्चे को जन्म देने के बाद सिर्फ 1 घंटे आराम किया और फिर बाकी 160 किमी का सफर नवजात को गोद में उठाकर पैदल ही तय किया।

वहीं एनएच-44 पर अनीता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जो अन्य प्रवासी मजदूर परिवारों की तरह ही तेलंगाना से छत्तीसगढ़ जाने के लिए निकली थी। नरसिंगी मंडल के जप्ती शिवनुर गांव में सड़क पर ही बच्चे को जन्म दिया।

ये अकेली एक शकुंतला या अनीता की कहानी नहीं। कई कहानियाँ और भी हैं जो सोचने पर मजबूर कर रही हैं।

सोचिए कि केन्द्र व राज्य सरकारें किस निचले स्तर तक आ पहुंची हैं कि इनको कुछ नज़र नहीं आता सिवा कुछ पूंजीपतियों और अपने आकाओं के। स्थितियाँ और विकट हो रही हैं।

गौरतलब है कि ये खबरें इस वक्त सुनने को मिल रही हैं कि जब हमारे देश की सरकार विदेशों में (मालदीव, यूएई व अन्य) फंसे नागरिकों को वापस लाने के लिए शुरुआत 7 मई से वन्दे भारत मिशन के तहत कई चरणों में कर चुकी है। जिसमें गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। इसके लिए दो स्पेशल फ्लाइट्स की व्यवस्था की गई है। जिसकी जानकारी रक्षा प्रवक्‍ता ने दी है। नौसेना ने भी समुद्र सेतु अभियान के तहत विदेश में फंसे लोगों को लाने की कवायद शुरू कर दी है। सवाल इस सिलेक्टिव एप्रोच का है। क्या सरकार की मंशा पर सवाल नहीं होना चाहिये? सोचिए आप भी……….

अभी क्या है? ये ट्रेलर है…..

अभी तो सड़कों पर रेंगते लोग नज़र आ रहे हैं और दूसरा तबका अफ़सोस जताता दिख रहा है। अफसोस जताने वालों में कुछेक दोगले लोग खड़े भी नहीं होंगे साथ बाद में।

हमारी सुरक्षा के लिए तत्पर डॉक्टर, नर्स, पुलिस और सफाई कर्मचारी के लिए जब हमारे प्रधान ने थाली-ताली बजवाई तो कितनों ने सफाई कर्मियों को भी वैसे ही महसूस किया अन्य को?

कितना मिटा पाए हम भेद?  अभी तो भूख-प्यास ने ढंग से अँगड़ाई भी नहीं ली। जिस दिन सिर उठाया, खा जाएगी बची इंसानियत को।

अभी तो बस घर में एक साथ रहते रिश्तों में कुछ उंसियत बाकी है। जिस दिन चोगा उतार फेंका शर्मसार को जगह नहीं मिलेगी कहीं तन ढंकने की।
नगीना खान - Nagina Khan युवा अधिवक्ता व कानून शिक्षिका हैं।
नगीना खान – Nagina Khan युवा अधिवक्ता व कानून शिक्षिका हैं।

जब फिल्म रिलीज़ होगी तब देखना हर ऐपिसोड में कई कहानियाँ निकलेंगी। अभी तो घरेलू हिंसा का ऐपिसोड चल रहा है। बाद में इक भूख का (पेट) सौदा दूसरी भूख को (जिस्म) शांत कर होगा। कम उम्र में बच्चियों की शादी फिर बच्चे, कुपोषण, यौन उत्पीड़न, मानव तस्करी उफ्फ़……

न्यायालयों में पिछले ही इतने केस पेंडिग पड़े हैं कि इसके बाद तो बाढ़ आएगी। तरह तरह के हज़ारों मामले दर्ज होंगें।

केन्द्र सरकार  पहले ही डूबती अर्थव्यवस्था के नाम पर चंदा बटोर रही है। वहीं वो दिन दूर नहीं जब राज्य सरकारें नई नौकरियों के नाम पर नंगा दौडाएगी।

जिनकी पहुंच सरकार की कुर्सी और कंधे तक हैं, उन्हें मुबारक। बाकी सब मंदिर के बाहर खुद के बनाए पकौड़े खाकर बनें आत्मनिर्भर। फिल्म ? बाकी है दोस्तों…….

नगीना खान

लखनऊ (उ.प्र.)

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