Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » देशबन्धु को अपनी स्वतंत्र नीति, सिद्धांतपरकता, निर्भीकता और राजाश्रय या सेठाश्रय के बिना कितनी मुश्किलों से गुजरना पड़ा है
Lalit Surjan ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं. वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है. यह आलेख देशबन्धु से साभार लिया गया

देशबन्धु को अपनी स्वतंत्र नीति, सिद्धांतपरकता, निर्भीकता और राजाश्रय या सेठाश्रय के बिना कितनी मुश्किलों से गुजरना पड़ा है

देशबन्धु के साठ साल Sixty years of Deshbandhu

दृश्य-1

मि.मजूमदार! आई हैव डन माई इनिंग्ज़ मोर ऑर लैस. बट गॉड विलिंग, यू हैव अ लॉंग वे टू गो. आफ्टर ऑल, यू एंड ललित आर ऑफ सेम एज.

(श्री मजूमदार! मैं अपनी पारियां लगभग खेल चुका हूं। लेकिन प्रभु कृपा से आपको लंबा सफर तय करना है। आखिरकार, आप और ललित हमउम्र हैं।

यह संवाद 1978 में किसी दिन रायपुर नगर निगम के प्रशासक कक्ष में हुआ। सुनाने वाले थे बाबूजी, और सुनने वाले थे प्रशासक डॉ. एस.सी. मजूमदार। निगम सचिव शारदाप्रसाद तिवारी और मैं कक्ष में मौजूद थे। बाबूजी का इतना कहना था कि तब तक चेहरे पर आक्रामक भाव भंगिमा लिए अकड़ कर बैठे डॉ. मजूमदार मानो एकदम से पिघल गए। उस क्षण के बाद से ही वे हमारे सदा के लिए शुभचिंतक बन गए।

इस घटना के एक-दो दिन पहले बाबूजी, और उनके साथ मैं, रायपुर के संभागायुक्त आर.पी. कपूर के पास अपनी समस्या लेकर गए थे। उनका रुख सहयोगपूर्ण था। उन्होंने बाबूजी को कहा- आप ललित को मजूमदार के पास सिर्फ शिष्टाचारवश मिलने भेज दीजिए। बाकी मैं उन्हें समझा दूंगा। बाबूजी ने कहा- ललित क्यों, मैं ही मिलने चले जाऊंगा। उनके पद का सम्मान तो होना ही चाहिए।

दृश्य-2

सन् फिर वही 1978। जबलपुर उच्च न्यायालय। न्यायमूर्ति सी.पी. सेन और न्यायमूर्ति बी.सी. वर्मा की खंडपीठ। पुकार हुई- ललित सुरजन बनाम नगर निगम रायपुर। जस्टिस सेन आंखें बंद किए बैठे थे। जस्टिस वर्मा ने फाइल देखी और बिना एक पल गंवाए आदेश दिया- ‘केस इज़ डिस्मिस्ड’। (प्रकरण खारिज किया जाता है)। मैं स्तब्ध और हमारे वकील के. एम. अग्रवाल कुछ क्षणों के लिए हतप्रभ। उन्होंने खुद को सम्हाला- मी लार्ड, दिस केस वाज़ एडमिटेड बाइ द ऑनरेबल चीफ जस्टिस हिमसेल्फ, यू कैन नॉट डिसमिस इट समरीली. (सम्माननीय महोदय, यह प्रकरण स्वयं मुख्य न्यायाधीश के इजलास में दाखिल किया गया था। आप बिना सुनवाई एक झटके में इसे खारिज नहीं कर सकते)। जस्टिस सेन ने अब आंखें खोलीं। केस पर बहस प्रारंभ हुई। कुछ माह बाद फैसला हमारे पक्ष में हुआ, लेकिन नगर निगम को सीधे दोषारोपण और हर्जाना देने से बचा दिया। के.एम. अग्रवाल बाद में स्वयं हाईकोर्ट जज और चीफ जस्टिस बने। वे छत्तीसगढ़ के पहले लोकायुक्त (First Lokayukta of Chhattisgarh) भी नियुक्त किए गए। देशबन्धु से उनका भावनात्मक लगाव प्रेस के स्थापना काल से ही था।

दृश्य-3

एक साल पीछे 1977 में लौटते हैं। दशहरे का दिन था। बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। सुबह-सुबह सारे पेपर आए- देशबन्धु, नवभारत, युगधर्म, महाकौशल। अन्य अखबारों में लगभग एक भाषा-शैली में छपा समाचार पढ़कर चौंका। चिंता हुई। यह जानबूझकर किया गया है। बाबूजी उस दिन जबलपुर या भोपाल में थे। उन्हें खबर करने के पहले कुछ अन्य जगह फोन लगाए।

पहला फोन- ”मिश्राजी! विजयादशमी की बधाई। आपने अच्छा पीठ में छुरा भोंका है। आपको याद नहीं आया कि युगधर्म का भवन कांग्रेस राज में बना था और उसमें कांग्रेसियों ने भी आर्थिक सहयोग दिया था। आप यह भी भूल गए कि आपातकाल में युगधर्म बंद कर दिए जाने पर बाबूजी ने आपका साथ दिया था।”

दूसरा फोन- ”शुक्लजी! महाकौशल तो कांग्रेस का अखबार है। और आप बाबूजी के मित्र हैं। आश्चर्य है कि आपके पत्र में न सिर्फ देशबन्धु, बल्कि कांग्रेस के ही खिलाफ समाचार छप जाए।”

तीसरा फोन- ”(नागपुर का यह फोन नंबर पत्नी माया को अचानक याद आ गया)। विनोद, बाबूजी ने नवभारत में अपनी सेवाएं दीं तो उसका यह प्रसाद मिल रहा है कि आप लोग इतने साल बाद भी हमें चैन से नहीं रहने देना चाहते।”

इसके बाद बाबूजी को फोन पर मैंने खबर सुनाई।

दृश्य-4

रायपुर का सर्किट हाउसCircuit House of Raipur (जहां आजकल राजभवन है)। सन् 1977। समय-रात लगभग बारह बजे। घर में सब सो चुके थे। एक फोन आने के बाद बाबूजी और मैं उठकर भागे-भागे सर्किट हाउस पहुंचे। हमारे शुभचिंतक और केंद्रीय नागर विमानन एवं पर्यटन मंत्री पुरुषोत्तम लाल कौशिक (Union Minister of Civil Aviation and Tourism Purushottam Lal Kaushik) का सूटकेस पैक हो चुका था और वे सड़क मार्ग से नागपुर निकलने के लिए लगभग तैयार थे। अगली सुबह उन्हें देशबन्धु के कार्यक्रम में आना था, जिसके निमंत्रण पत्र शहर में बंट चुके थे। कौशिकजी चले जाएंगे तो अखबार के बारे में दुनिया भर की बातें होंगी। वे नहीं माने। रवाना होने के पूर्व वे वॉशरूम गए।

मैं वहीं दरवाज़े पर जाकर खड़ा हो गया। वे बाहर निकले तो मैंने कुछ तुर्शी से कहा- तो आप नहीं रुकेंगे।

कौशिकजी नाराज हुए। तुम मुझसे इस तरह बात कर रहे हो!

तो क्या करूं? आप जाइए लेकिन याद रखिए कि हम कल भी पत्रकार थे, आज भी हैं, आगे भी रहेंगे। लेकिन आप का मंत्रीपद आज है, कल नहीं रहेगा।

बाबूजी ने मुझे डांटा-अपने से बड़ों से इस तरह बात नहीं की जाती।

खैर, मेरी कोशिश निष्फल हुई। हमारा कार्यक्रम उनकी गैरमौजूदगी में भी शानदार ढंग से हुआ। करीब एक साल हमारे बीच मनमुटाव रहा, लेकिन पुरानी दोस्ती हमें वापिस साथ ले आई।

हमारे साथ घटे इन चारों प्रसंगों का संदर्भ मैंने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं याने इनका संदर्भ एक ही है। इनसे ज्ञात होता है कि देशबन्धु को अपनी स्वतंत्र नीति, सिद्धांतपरकता, निर्भीकता और राजाश्रय या सेठाश्रय के बिना कितनी मुश्किलों से गुजरना पड़ा है। इस समूचे प्रकरण पर यहां विस्तार से लिखने की आवश्यकता नहीं है। ”धूप-छाँह के दिन” में बाबूजी ने सब कुछ लिख ही दिया है। उस अध्याय को ही कभी पुनर्प्रकाशित करेंगे। देशबन्धु और साथ-साथ नवभारत को नगर निगम से भूखंड आबंटित किया गया था। उसके लिए दोनों पत्रों ने संयुक्त आवेदन किया था।

युगधर्म का अपना भवन पंडरी सिटी रेलवे स्टेशन के सामने बन चुका था, जिसके लिए उनके प्रबंधक रामलालजी पांडे ने खूब दौड़धूप कर धनसंग्रह किया था। महाकौशल यद्यपि किराए के भवन में था, लेकिन उनके पास भी अपनी जमीन थी। इसलिए वे इस आवेदन में शामिल नहीं हुए। हमें एक भूखंड पहले आबंटित हो चुका था, लेकिन संविद सरकार के दौरान कूटरचना से उसे निरस्त कर दिया गया था। जब ओ.पी. दुबे रायपुर नगर निगम प्रशासक बनकर आए तो उन्होंने समाचारपत्रों को भूमि आबंटन करने में निजी दिलचस्पी ली और उक्त आवेदन के तहत सारी औपचारिकताएं पूरी कर आबंटन हो गया।

इस बीच 1977 में जनता पार्टी का शासन आ चुका था। कैलाश जोशी पहले जनसंघी मुख्यमंत्री बने, लेकिन जल्दी ही उनकी जगह वीरेंद्र कुमार सखलेचा को यह पद दे दिया गया। उनके कार्यकाल के दौरान ही देशबन्धु का भूखंड आबंटन रद्द करने, भूमिपूजन में बाधा उत्पन्न करने, सहयोगी समाचारपत्रों में विरुद्ध समाचार प्रकाशित करने जैसी कार्रवाईयों को अंजाम देने का काम विघ्नसंतोषियों ने किया। इसी कारण से हमें उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा। चिंता तो बराबर बनी रहती थी।

दौड़धूप भी बहुत करना पड़ी। सच्चे-झूठे हितैषियों की पहचान भी इस नाजुक दौर में हुई। बड़े-बड़े नेता भी कैसे चाटुकारों के झांसे में आ जाते हैं, यह भी देखने मिला। लेकिन पाठकों के हम पर विश्वास में कोई कमी नहीं आई। बल्कि इसी अवधि में जारी आजीवन ग्राहक योजना में मिले सहयोग से हमारा मनोबल बढ़ा। बाबूजी के साथ बातचीत में हम लोग कभी अपनी चिंता व्यक्त करते थे तो दार्शनिक अंदाज में उनका उत्तर मिलता था- जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुमसे कोई छीन नहीं सकता। और जो भाग्य में नहीं है, वह मिल भी जाए तो टिकेगा नहीं।

ललित सुरजन

देशबंधु में 13 फरवरी 2020 को प्रकाशित

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