दिल्ली में दंगे : सोशल मीडिया ने किया एंटी सोशल काम !

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सोशल मीडिया ने दिल्ली में भड़काई दंगे की आग Social media triggered riots in Delhi

सोशल मीडिया की जवाबदेही तय होना ज़रूरी, केंद्र सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट बनाये सख़्त कानून

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा (President Donald Trump’s visit to India) के दौरान CAA-NRC को लेकर दंगा भड़काने का कार्य सोशल मीडिया को हथियार बनाकर किया गया। सोशल मीडिया के माध्यम से दंगा भड़काने के लिये फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर अफ़वाह फैलाकर लोगों को भड़काने का कार्य किया गया।

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में फैली हिंसा ने अब तक कई लोगों की जान ले ली है। रविवार को सोशल मीडिया पर अफ़वाह फैलाने के बाद भड़की हिंसा लगातार तीन दिनों तक जारी रही। अर्धसैनिक बलों ने फ्लैग मार्च कर दंगा प्रभावित इलाकों में शांति बहाल कराने की कोशिश की है।

इस दंगे को भड़काने की सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया है जिस पर कंट्रोल करने के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं किए गए हैं।

हालात यह हैं अब तक सोशल मीडिया पर तरह-तरह के भ्रामक और भड़काऊ संदेश भेजे जा रहे हैं जिससे दोबारा दंगे भड़क सकते हैं। प्रशासन की ओर से इसे रोकने के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। सामान्यतः ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया क्षेत्र से इंटरनेट सेवा बाधित करने जैसे उपाय अपनाए जाते हैं।

जाफराबाद में प्रदर्शन कर रहे लोगों का भी आरोप है कि कुछ स्थानीय नेताओं ने अपने ट्विटर और फेसबुक पेजों से आपत्तिजनक बयानबाजी की जिसकी वजह से हिंसा फैली। अगर इनके जरिए लोगों की भावनाओं को नहीं भड़काया गया होता तो हिंसा की ये आग नहीं फैलती।

एक सोशल मीडिया संदेश में कहा गया है कि रविवार को ही कुछ धार्मिक स्थलों से एक समुदाय विशेष के बारे में आपत्तिजनक अपील की गई थी जिसके बाद लोगों की भावनाएं भड़क गईं और दंगाई सड़कों पर उतर आए। हालांकि, चेकिंग के दौरान ऐसा कोई संदेश किसी धार्मिक स्थल से जारी होने की बात सामने नहीं आई।

दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतनलाल की मौजपुर और अन्य इलाकों में हुई हिंसा के दौरान हुई पत्थरबाजी में मौत हो गई थी। इससे लोगों की भावनाएं आहत हुईं और माना जा रहा है कि इसी खबर के बाद और हिंसा भड़क गई। इसी खबर के पीछे शरारती तत्वों ने एक गलत खबर चलाना शुरू कर दिया। इस खबर में दिल्ली पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी के भी दंगों के दौरान मौत होने की बात कही गई। जबकि यह सच्चाई नहीं है। संदेश में जिस अधिकारी की बात कही गई थी उनका एक अस्पताल में इलाज चल रहा है, सोमवार को उनका एक ऑपरेशन हुआ था। अस्पताल ने बताया कि उनकी हालत बिल्कुल ठीक है और वे स्वास्थ्य में सुधार कर रहे हैं।

इसी प्रकार के कई अन्य संदेश भी सोशल मीडिया में फैलाए जा रहे हैं। दूसरी जगहों की अलग घटनाओं के वीडियो भी दिल्ली के बताकर फैलाए जा रहे हैं जिससे लोगों की भावनाएं भड़क रही हैं। लेकिन इस पर रोक लगाने के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं किया गया है। आपत्तिजनक संदेश वाले एकाउंट को बंद करने के लिए भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

सोशल मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर सोशल मीडिया को यदि हम यूं ही निरंकुश होने के लिये छोड़ देते हैं तो इस तरह की घटना बार बार होती रहेंगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत यात्रा के दौरान दंगे भड़का कर देश की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया है। अब समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय एवं केंद्र सरकार सोशल मीडिया की जवाबदेही तय करे। देश की छवि बिगाड़ने वालों के लिये भी सख़्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिये। सोशल मीडिया पर गलत सूचना पोस्ट करने वाला व्यक्ति के लिये जब तक सज़ा का प्रावधान नहीं किया जाता तब तक दिल्ली जैसी घटना पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है।

शाहनवाज़ हसन

लेखक पत्रकार हैं।

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