डॉ. आंबेडकर : पुलिस, जासूस, और अखबारों की नजर से

Source Material on Baba Saheb Ambedkar and Movement of Untouchables - Volume 1 IN Hindi

“डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन: स्रोत सामग्री 1915-1956) खंड -1” की पुस्तक-समीक्षा

अनिरुद्ध कुमार

मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही सरकारी आदेशों, परिपत्रों, पुलिस और जासूसी संस्थाओं की रिपोर्टों की इतिहास लेखन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास लेखन या उनके पुनर्लेखन में इन हजारों वर्षों से ये स्रोत ऐतिहासिक भूमिका निभा रहे हैं। कई बार इन स्रोतों के आधार पर इतिहास की पुनर्व्याख्या हुई और मानव सभ्यता में लंबे समय से मिथकीय इतिहास के रूप में चली आ रही प्रचलित अवधारणा परिवर्तित हुई और नए इतिहास का सृजन हुआ।

आंबेडकर के जीवन एवं उनके संघर्षों के इतिहास के ऊपर इसी तरह की एक पुस्तक अनुवाद के रूप में चर्चित लेखक व आलोचक कंवल भारती हिन्दी में लेकर आए हैं जो सन 1915 से लेकर 1956 ई. तक बाबा आंबेडकर के द्वारा अछूतों के लिए चलाये गए आंदोलनों का सिलसिलेवार ढंग से लेखा जोखा प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1982 में अँग्रेजी में प्रकाशित “सोर्स मैटेरियल ऑन बाबा साहब आंबेडकर ऐंड मूवमेंट ऑफ अनटचेबल्स- वॉल्यूम 1(Source Material on Baba Saheb Ambedkar and Movement of Untouchables – Volume 1) का हिन्दी अनुवाद है। डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन एवं उनके संघर्षों के ऊपर निश्चित रूप से यह एक अनूठा एवं अद्वितीय इतिहास है जो तत्कालीन अखबारों में प्रकाशित खबरों एवं सरकारी संस्थाओं द्वारा दर्ज सूचनाओं को आधार बनाकर लिखा गया है।

यह पुस्तक आंबेडकर एवं उनसे जुड़ी संस्थाओं के प्रति तत्कालीन प्रशासन एवं उस समय के अखबारों की मानसिकता का खुलासा करती है कि वे आंबेडकर के प्रति किस तरह की सोच रखते थे, और कदम-कदम पर उन्हें प्रताड़ित एवं अपमानित महसूस करवा कर उन्हें उनकी निम्न जाति का एहसास करवाते रहते थे।

इतिहासकार पक्षपाती हो सकता है, तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ कर सकता है, उन्हे अलग रंग दे सकता है, किन्तु रिपोर्टें तो नहीं! और वो भी तब जब ये रिपोर्टें समूची व्यवस्था के द्वारा प्रेषित की जा रही हों, तब जब ये टिप्पणियाँ लाखों लोगों तक एक साथ अपनी बात पहुंचा रही हों! लेकिन हिंदुस्तानी मज़हब में, अछूतों को उनका हक़ दिलाने के लिए आंबेडकर के सिवा उनका कोई न था। किसी को भी इस बात की फिकर नहीं थी कि हिंदुस्तान की एक बहुत बड़ी जनसंख्या ( जो आज भी बहुसंख्यक हैं) के साथ इस तरह का बर्ताव किया जाता है! आंबेडकर की चिंता इस बात का प्रमाण है कि वे एक अच्छे समाज के निर्माण के प्रति कितने सतर्क एवं संघर्षशील थे।

जिस जनतंत्र में सिर्फ जन की भूमिका होती है न कि उसके पढ़े-लिखे या व्यावहारिक ज्ञाता होने की, वही जनतंत्र उसी संख्या के आधार पर आज भी जीवित है और साँसें गिन रहा है जिसे आज तक इस समाज में अपनी इच्छा से हिलने का भी अधिकार नहीं मिला, प्राकृतिक रूप से मिलने वाली वस्तुओं जल, जंगल, जमीन का उपभोग तो छोड़िए, उपयोग करने का अधिकार नहीं मिला! आप अंदाज़ा लगा सकते हैं इस डेमोक्रेसी या जनतंत्र का उस दलित-वंचित समाज की जिंदगी में क्या योगदान है! उस बहुसंख्यक दलित-पिछड़ी जनता के लिए, अपने मूलभूत अधिकारों के लिए गुहार लगाना आज़ादी के 73 वर्षों के बाद, आज भी किसी संघर्ष से कम नहीं।

इस पुस्तक में छपी रिपोर्टों एवं अखबारी टिप्पणियों के आधार पर आप इस बात का अंदाज़ा खुद लगायेँ, हाथ कंगन को आरसी क्या!

आंबेडकर की विचारधारा (Ambedkar’s ideology) को समझने के लिए ये आख्यायें और टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण हैं। इस पुस्तक की अनुवादकीय में कंवल भारती लिखते हैं

“यह ग्रंथ जनवरी 1915 की घटनाओं से आरंभ होता है जब डॉ. अंबेडकर न्यूयार्क में थे और बड़ौदा नरेश की सहायता से वित्त एवं समाजशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे।”

ये वो समय था जब गांधी और आंबेडकर दोनों ही एक साथ सार्वजनिक जीवन एवं राजनीति में प्रवेश करते हैं। गांधी ने राजनीतिक सत्ता के लिए स्वराज आंदोलन का आरंभ किया जबकि आंबेडकर इस राजनीतिक आह्वान के साथ साथ ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का गठन करके हजारों सालों से मानवीय अधिकारों से वंचित अछूतों को संगठित कर संघर्ष का आह्वान किया।

कंवल भारती लिखते हैं

“गांधी के साथ ब्राह्मणों का समर्थन और हिन्दू सेठों का भरपूर धन-बल था जबकि डॉ. आंबेडकर के साथ नंगे-भूखे, शोषित-पीड़ित और वंचित अछूत जातियों के विशाल समाज के प्यार के सिवा कुछ न था।”

पुस्तक में आंबेडकर द्वारा दलित वर्ग की मुक्ति के लिए समय-समय पर चलाये गए मुक्ति संग्रामों एवं आन्दोलनों के विवरण के साथ ही तत्कालीन अखबारों द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर की गयी आंबेडकर की राजनीतिक भूमिका की आलोचना, एवं गांधी की प्रशंसा का विस्तृत विवरण विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों से देखा जा सकता है।

गांधी एवं आंबेडकर दोनों ही भारतीय इतिहास के महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं। यह आंबेडकर के साथ-साथ गांधी के इतिहास को भी नए ढंग से प्रस्तुत करने वाली पुस्तक है।

कंवल भारती जी ने बहुत ही मनोयोग से इस पुस्तक का अनुवाद किया है। अँग्रेजी से हिन्दी में अनूदित अन्य पुस्तकों के मुक़ाबले इसका अनुवाद काफी अच्छा बन पड़ा है। अनुवाद के ख़ौफ़ से डरने वाले पाठकों को शायद ये जानकर आश्चर्य हो कि इसे पढ़ते हुये बिलकुल भी नहीं लगता कि हम अनुवाद पढ़ रहे हैं। यह रचनाकर्म के प्रति लेखक की ईमानदारी को दर्शाती जिसे वो ‘अनुवादकीय’ शीर्षक के माध्यम से ही घोषित कर देते हैं।

अगर इस बात की घोषणा न की जाए कि ये अनुवाद है तो ये बिलकुल भी पता नहीं लगेगा कि ये अनुवाद का कार्य है, जो कंवल भारती जी का आंबेडकर के ऊपर एक दीर्घकालीन शोधों का परिचायक है। निश्चित रूप से यह पुस्तक भारती जी के लंबे काम का परिणाम रही होगी जो इतने सफल अनुवाद के रूप में सामने अब प्रस्तुत है।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप पाएंगे कि हिंदुस्तान में सदियों से दमित-वंचित जातियों के लिए कानून और न्याय के मायने क्या रहे थे और बाबा साहब के आंदोलनधर्मी और काननूविद् के रूप में हस्तक्षेप के कारण आज उसका स्वरूप क्या है!

इसे पढ़कर आपको पता चलेगा कि आंबेडकर जैसे नायकों को वंचित समाज को सम्मान दिलाने में किस तरह से अपने ही देश की न्याय व्यवस्था एवं पुलिस प्रशासन तथा साथ ही अखबार के मालिकों के साथ कितना संघर्ष करना पड़ा था। आंबेडकर जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता के साथ उस समय यदि इन संस्थाओं का ऐसा बर्ताव था तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सामान्य दलित-वंचित मानवों की क्या स्थिति रही होगी!

कंवल भारती जी ने इस पुस्तक की सिर्फ साढ़े तीन पृष्ठों की भूमिका लिखी है जिसे उन्होंने ‘अनुवादकीय’ नाम दिया है। संक्षिप्त भूमिका या ‘अनुवादकीय’ भारती जी की ईमानदारी, दूरदर्शिता एवं उनकी इतिहास दृष्टि की परिचायक है। भूमिका को संक्षिप्त रखकर उन्होंने इतिहास को ज्यों का त्यों ही रहने दिया है। क्योंकि भारती जी इस बात से वाक़िफ़ लगते हैं कि चूंकि यह इतिहास सूचनाओं के आधार पर दर्ज़ है तो इसे वैसे का वैसा ही पाठकों के सामने भी आना चाहिए।

श्री भारती अपने अनुवादकीय में ठीक कहते हैं कि “जिसे यह मालूम नहीं कि बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने किन परिस्थितियों और परेशानियों के बीच दलित आंदोलन की शुरुआत की थी। उसे यह भी नही पता कि इस आंदोलन के दौरान उनके साथ हिन्दू नेताओं, हिन्दू प्रेस और कुछ दलित साथियों ने भी किस तरह का व्यवहार किया था।” (अनुवादकीय अंश)

भारती जी का यह कार्य इस दृष्टि से और महत्वपूर्ण हो उठता है क्योंकि अँग्रेजी में प्रकाशित इस ग्रंथ का अब तक हिन्दी में अनुवाद और प्रकाशन नहीं हुआ था। यहाँ यह भी द्रष्टव्य है कि उक्त अंग्रेजी पुस्तक का दूसरा संस्करण भी नहीं छप सका था।

इस किताब को अलीगढ़ के न्यून आर्थिक संसाधन लेकिन जीवट इच्छाशक्ति के धनी ए. आर. अकेला ने प्रकाशित किया है। कथित मुख्यधारा के प्रकाशनों की दुनिया से दूर करोड़ों-करोड़ पिछड़े-शोषित लोगों के संघर्षों को दर्ज करने वाले ऐसे प्रकाशनों का भी एक अलग इतिहास रहा है, जिन पर प्राय: बात नहीं होती। कंवल भारती के साथ-साथ, बल्कि प्रकाशक ए.आर अकेला भी इस पुस्तक के प्रशंसा के पात्र हैं।

पुस्तक : “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन: स्रोत सामग्री 1915-1956) खंड -1”

अंग्रेजी से अनुवाद : कंवल भारती

पृष्ठ संख्या : 575

मूल्य : 500 रूपए

प्रकाशक : आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़, मोबाइल :9319294963

[अनिरुद्ध कुमार असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में अध्यापक हैं। उन्होंने हरिश्चंद्र पाण्डेय की कविताओं पे जे.एन.यू. दिल्ली से एम. फिल. की है तथा फ़िलहाल वे आधुनिक हिंदी की छह लंबी कविताओं पे जे.एन.यू. दिल्ली से ही पीएच. डी. कर रहे हैं। व्यंग्य, गजल और आलोचना उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं]

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