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savitribai phule

स्त्री-शिक्षा व राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले के जन्म दिवस 3 जनवरी पर विशेष

आकांक्षा कुरील व रजनीश कुमार अम्बेडकर

आधुनिक भारत के सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में स्त्री-शिक्षा के लिए सबसे पहले मशाल जलाने वाली एक ऐसी महिला शख्सियत का नाम आता है। जिनको हम सभी देश की पहली अध्यापिका के रूप में जानते तो हैं हीं, परन्तु इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन को अंगीकार करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। जिस प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबाराव फुले ने शूद्र-अतिशूद्रों के लिए शिक्षा के द्वार मुक्त किए और वे सामाजिक क्रांति के प्रणेता बन गए, ठीक उसी प्रकार राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले ने भी महिला वर्ग के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलकर, भारत की स्त्री-मुक्ति आन्दोलन की प्रणेता बन गईं। उन्होंने जिस स्त्री-मुक्ति आन्दोलन के संघर्ष का आरम्भ किया था, उसके परिणाम स्वरूप आज भारतीय समाज की महिलाएँ, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बराबरी के ऊँचे पदों पर पहुँची हैं।

भारतीय समाज में सभी जातियों की महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोलने वाली राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का “3 जनवरी, 1831 को खंडोजी के घर पहली संतान के रूप में सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ।”1 इनका जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगाँव में हुआ था। “उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे पाटिल और माता का नाम लक्ष्मीबाई था।”2 जिन्होंने छुआछूत, सती प्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के विरूद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया। सावित्रीबाई के तीन भाई सिदुजी, सखाराम और श्रीपति थे। इनका विवाह सन् 1840 में ज्योतिबाराव फुले के साथ नायगाँव में हुआ। उस समय ज्योतिबाराव फुले की उम्र 13 वर्ष और सावित्रीबाई फुले की 9 वर्ष थी।

भारत का पुरुष प्रधान समाज शुरू से ही महिलाओं को दोयम दर्जे के बतौर व्यवहार करता आया है। जिसके कारण महिलाएँ गुलाम रहकर सामाजिक व्यवस्था की चक्की में पिसने के लिए विवश हुईं। कर्मकांड, अंधविश्वास, वर्णभेद, जाति-पांति, बाल-विवाह, मुंडन तथा सती प्रथा जैसी आदि कुरीतियों से महिलाएँ बहुत ज्यादा व्यथित थीं। महिलाओं को कोई महत्व नहीं दिया जाता था। एक तरह से कह सकते हैं कि महिलाएँ स्वयं अपना अस्तित्व खो चुकी थीं। तत्कालीन पंडित व धर्मगुरु भी इस बात को दोहराते रहे कि महिलाएँ परावलंबी हैं वह पिता, पति, भाई और पुत्र के सहारे बिना जी नहीं सकती हैं। इसका संदर्भ हमें इतिहास के पन्नों को पलटने पर मिलता है।

मनुस्मृति के अध्याय नौ के श्लोक तीन में कहा गया है कि “बाल्यावस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है। वह सदा (किसी न किसी के) अधीन रहती है क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं”3 ऐसी अनेकों पाबंदियाँ धार्मिक ग्रथों के माध्यम से महिलाओं के ऊपर लगाई गई थीं।

इन्होंने सबसे पहले अपने पति ज्योतिबाराव फुले से सगुणाबाई (नन्द) के साथ मिलकर शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद, भारत में स्त्री शिक्षा की ऊसर-बंजर जमीन पर स्त्री शिक्षा का नन्हा पौधा रोपने और उसे एक विशाल छायादार वृक्ष में तब्दील करने वाली, महान विदुषी राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले के अतुलनीय योगदान को कौन नहीं सराहना करेगा।

भारत में सदियों से शिक्षा से महरूम कर दिए गए शोषित वंचित, दलित-आदिवासी, और स्त्री समाज को सावित्रीबाई फुले या यूँ कहें ‘फुले दंपति’ ने अपने निस्वार्थ प्रेम, सामाजिक प्रतिबद्धता, सरलता तथा अपने अथक सार्थक प्रयासों से शिक्षा पाने का अधिकार दिलवाया।

शिक्षा की नेत्री सावित्रीबाई फुले ने इस तरह शिक्षा पर षडयंत्रकारी तरीके से एकाधिकार जमाएँ बैठी ऊँची जमात का भांडा एक ही झटके में फोड़ डाला। “अंग्रेजी ज्ञान होने के बाद सावित्रीबाई फुले ने 1855 में टामसन क्लार्कसन की जीवनी पढ़ी। टामसन क्लार्कसन नीग्रो पर हुए जुल्मों के विरुद्ध न केवल लड़े थे बल्कि कानून बनाने में सफल हुए थे। उनकी जीवनी पढ़कर सावित्रीबाई फुले बहुत प्रभावित हुई। वह भारत के नीग्रो (अछूतों और स्त्रियों) की गुलामी के प्रति चिंतित थी। उन्होंने भारतीय गुलामों के शोषण का मुख्य कारण ‘अशिक्षा’ को खोजा।”4

उन्होंने सबसे पहले अपने पति के साथ मिलकर एक जनवरी, 1848 में पुणे के तांत्यासाहब भिडे की हवेली (बुधवार पेठ) में लड़कियों के लिए प्रथम विद्यालय खोला।

“इस स्कूल की प्रथम छात्रा और प्रथम अध्यापिका सावित्रीबाई फुले थीं, शुरू में महात्मा फुले जी ने अपने दोस्तों की लड़कियों को ही स्कूल में दाखिल किया। एक जनवरी, 1848 को नामदर्ज लड़कियों के नाम इस प्रकार हैं अन्नपूर्णा जोशी, सुमती मोकाशी, दुर्गा देशमुख, माधवी थत्ते, सोनू पवार, जानी करडिले इन छह में से चार लड़कियाँ ब्राह्मण, एक धनगर (गड़रिया) और एक मराठा जाति की थी। इस स्कूल में अपनी लड़कियों को भेजने के लिए प्रथमत: अभिभावक डरते थे। लेकिन बाद में फुले दंपति ने अभिभावकों को मिलकर उन्हें समझाया, स्त्री-शिक्षा के महत्व का वर्णन किया”5 इस प्रकार फुले दंपति ने मिलकर 1 जनवरी, 1848 से लेकर 15 मार्च, 1852 तक बिना किसी आर्थिक मदद और सहयोग के लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलकर, सामाजिक क्रांति का बिगुल बजा दिया था।

ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी व परिवर्तनगामी काम इस देश में सावित्रीबाई व ज्योतिबाराव फुले से पहले किसी ने नहीं किया था। समाज बदलाव के इतने दमदार व व्यावहारिक योगदान के बाबजूद इस देश के सवर्ण समाज के जातीय घमंड से भरे पुतलों ने उनके इस शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में दिए योगदान को किसी भी गिनती में नहीं रखा। 

वर्तमान समय में सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि आज स्वयं दलित-पिछड़ा, वंचित शोषित समाज उनके योगदान के एक-एक कण को ढूंढकर-परखकर उनके अतुलनीय योगदान की गाथा को सबके सामने लाने का काम कर रहा है न केवल वह उनके काम को ही उजागर कर रहा है अपितु उनको और उनके निस्वार्थ मिशन को आदर्श मानकर उनसे प्रेरणा लेकर उनके नाम पर स्कूल, कॉलेज आदि खोलकर दलित-आदिवासी व वंचित समाज के छात्र-छात्राओं की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से मदद भी कर रहा है।

शिक्षिका सावित्रीबाई फुले न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया अपितु भारतीय स्त्री की दशा सुधारने के लिए उन्होंने 1852 में ‘महिला मंडल’ का गठन कर भारतीय महिला आन्दोलन की प्रथम अगुआ भी बन गई। इस महिला मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चा बन्द कर समाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया। हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंडवा दिया जाता था। विधवाओं के सर मूंडने जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए सावित्रीबाई फुले ने नाईयों से विधवाओं के ‘बाल न काटने’ का अनुरोध करते हुए आन्दोलन चलाया। जिसमें काफी बड़ी संख्या में नाईयों ने भाग लिया तथा विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली।

इतिहास गवाह है कि भारत क्या पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन कहीं नहीं मिलता। जिसमें महिलाओं के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरूष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो।

तमाम सारे सामजिक कार्यों को करते हुए सावित्रीबाई फुले ने भारत का पहला ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ 1852 में तथा निराश्रित असहाय महिलाओं के लिए 1864 में अनाथाश्रम खोला। स्वयं सावित्रीबाई फुले ने आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाते हुए आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण स्त्री काशीबाई जो कि विधवा होने के बाद भी माँ बनने वाली थी, उसको आत्महत्या करने से रोककर उसकी अपने घर में प्रसूति करवा के उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रुप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पालन-पोषण कर उनको डॉक्टर बनाया। इतना ही नहीं उसके बड़े होने पर उसका अंतरजातीय विवाह भी किया। महाराष्ट्र का यह पहला अंतरजातीय विवाह था।

सावित्रीबाई फुले ने लगभग 48 वर्षों तक वंचित शोषित, पीड़ित समाज के साथ स्त्रियों को भी पुरुषों के समान इज्जत व सम्मान से जीने के लिए प्रेरित किया। भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले तथा समाज में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ी। उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वे सबको पढ़ने-लिखने की प्रेरणा देकर जाति के बंधन तोड़ने की बात करती हैं-

जागो जागो शूद्र भाई-बहनों

नींद से जागो

थोपी हुई गुलामी को उतार फेंकने

डट कर खड़े हो जाओ

जागो देखो तुम पर प्रतिबंध लगाने वाले

मर खप गये मक्कार मनु पेशवा

मनु ने प्रतिबन्धित की थी तुम्हारी शिक्षा

अन्याय भरा पेशवायी राज्य नष्ट हुआ

आ पहुँची अंग्रेजी ज्ञानी सत्ता, अंग्रेजी सत्ता

बाल बच्चों को पढ़ाएं, खुद भी पढ़ें

शिक्षा पाकर ज्ञान बढ़ाएं”6

उनकी कविताओं में भी सबसे ज्यादा जोर उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने को ही दिया है क्योंकि वो जानती थीं अज्ञानता के कारण ही महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे व नरकीय जीवन जीने के लिए विवश हुई हैं। उसको सिर्फ और सिर्फ शिक्षा के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। उनके इस कार्य को देखते हुए “1852 में अंग्रेज सरकार द्वारा फुले दंपति को अलौकिक कार्य के लिए सम्मानित किया गया। उस समारोह में सावित्रीबाई के सामाजिक कार्य का गर्व के साथ उल्लेख करते हुए ज्योतिबा फुले ने कहा था, यह गौरव तुम्हारा ही गौरव है। मैं स्कूल खोलने के लिए कारण मात्र बन गया। लेकिन मुझे इस बात पर गुमान है कि उन स्कूलों को सुचारू रूप से चलाने में तुम सफल रही हो।”7

उनके काव्य संग्रह ‘काव्य फुले’ (1854) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1891) प्रकाशित हुए हैं। भारत की पहली अध्यापिका बनने का सम्मान एक शूद्र स्त्री को प्राप्त होना यही अपने आप में एक क्रांतिकारी व ऐतिहासिक घटना है।

मुम्बई के तत्कालीन महर्षि एवं ज्योतिबाराव फुले के परम मित्र मामा परमानन्द ने सावित्रीबाई के साहस की प्रशंसा करते हुए एक लेख में कहा कि “ऐसे विपरीत समय में एक शूद्र व्यक्ति अपनी पत्नी को सुशिक्षित बनाता है और उसके द्वारा ब्राह्मणों की लड़कियों को शिक्षा देने का प्रयत्न करता है और वह भी किस स्थान पर ? ब्राह्मणों के गढ़ में ! महार, मांग, अछूतों की पाठशाला की स्थापना करना और उन लोगों के साथ बराबरी का बरताव करना, इस बात का मतलब है, शेर की गुफा में ही जाकर उसे पकड़ना। इस कार्य के लिए उनकी पत्नी की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम ही है। उसकी योग्यता के बारे में क्या कहना है ? अपने पति को उसने पूर्ण सहयोग दिया और उसके साथ रहकर सारे दुख संकट सहन किए।”8 

आज हम सभी स्त्री-विमर्श व नारीवादी आन्दोलन पर बहुत बहस करते हुए मिल जाएंगे पर उस दौर में सावित्रीबाई फुले ने वर्तमान मुद्दों पर और तत्कालीन समाज में व्याप्त अंधविश्वास, रुढ़िवादी परम्पराएँ व कुरीतियों के खिलाफ अपने नेतृत्व में बखूबी लड़े। आज महानगरों से लेकर ग्रामीण अंचल तक दहेज, भ्रूण-हत्या, यौन शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़, गरीबी आदि के इर्द-गिर्द के मुद्दों पर स्त्री आन्दोलन सक्रिय है लेकिन शहरीकरण के चलते व पूँजीवाद के विकास ने महिलाओं को घर से बाहर निकलने का अवसर तो दिया है पर मोटे तौर पर उसकी सामाजिक स्थिति नहीं बदली है। प्रख्यात लेखिका फुलवंतावाई झोडगे ने अपने लेख में सावित्रीबाई की महानता का वर्णन करते हुए कहा है कि “अपने देश की महिलाओं में, सावित्रीबाई पहली शिक्षित स्त्री, पहली अध्यापिका, भारत की सभी जातियों स्त्रियों की पहली नेता और छुआछूत की प्रथा का प्रखर विरोध करने वाली पहली कार्यकर्ता स्त्री हैं। महात्मा ज्योतिबाराव फुले के कार्य पर उनका अटूट विश्वास था। उनकी स्पष्टवादिता शूद्र-अतिशूद्र समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की उनकी दूरदृष्टि, सद्वर्तन, विद्या-प्रेम, विलक्षण जिद्द तथा उसके साथ दृढ़ निष्ठा आदि गुणों के कारण उनकी महानता द्विगुणित होती है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन पददलित वर्ग, किसान, गरीब तथा मजदूरों के उत्थान के लिए समर्पित किया था। ये आचार-विचारों की एक महान् परम्परा उन्होंने अपने कार्य से शुरू की।”9

सन् 1890 में ज्योतिबाराव फुले का परिनिर्वाण होने के बाद भी सावित्रीबाई फुले पूरे सात साल समाज में काम करती रहीं। 1897 में महाराष्ट्र में भयंकर रुप से प्लेग फैल गया था। परंतु सावित्रीबाई फुले बिना किसी भय के प्लेग-पीड़ितों की मदद करती रहीं। एक प्लेग पीड़ित दलित बच्चे को बचाते हुए स्वयं भी प्लेग पीड़ित हो गई। अतंत: अपने पुत्र यशवंत के अस्पताल में 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले का परिनिर्वाण हो गया।

सावित्रीबाई फुले के द्वारा किए गए कार्यों के लिए समाज हमेशा उनको याद करेगा। खासकर महिलाओं को शिक्षित करने के साथ ही वंचित शोषित समाज को भी मानवीय अधिकारों के लिए उन्होंने जीवन पर्यन्त संघर्ष किया। वही समाज उनके प्रति अपना आभार, सम्मान, और उनके योगदान को चिन्हित करने हुए पिछले तीन-चार दशकों से लेकर पूरे भारत में सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन 3 जनवरी को ‘शिक्षिका दिवस’ के रूप में मनाने की एक नई शुरुआत हुई है। उनके जन्मदिन के माध्यम से स्कूल से लेकर कैंपस तक, सरकारी संस्थानों के अलावा तमाम सारे सामाजिक संगठन चर्चा-संवाद, प्रबोधनात्मक कार्यक्रम, प्रतियोगिता, एकांकी नाटक प्रस्तुति, झाँकी आदि के द्वारा उनके ऐतिहासिक जीवन-वृतांत का दर्शन करा रहे हैं। जिससे युवा पीढ़ी उनके योगदान से रू-ब-रू हो रही है अभी हाल के वर्षों में तमाम सारे स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय व संस्थानों में सावित्रीबाई फुले पीठ और उनके नाम पर छात्रावास बने और बनाए जा रहे हैं। साथ ही उनके नाम से छात्रवृत्ति, पुरस्कार भी सरकार व सामाजिक संगठनों द्वारा प्रदान किया जा रहा है।  अत: हम कह सकते हैं कि सावित्रीबाई फुले के शैक्षणिक योगदान के कारण वर्तमान समय में स्त्री-विचारों में कर्मकांड, पूजा-पाठ, अंधविश्वास, धार्मिक कुरीतियाँ आदि जैसी परम्पराओं में परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। जिसमें स्त्री वैज्ञानिकता व तार्किकता के आधार पर बातचीत कर रही है और अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर उसके लिए संघर्ष करती हुई दिखाई दे रही है।

संदर्भ सूची :

1.       माली, एम. जी. (2005). क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले. नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार. पृ. 4

2.       बौद्ध, शांति स्वरूप. (2010). सावित्रीबाई फुले सचित्र जीवनी. नई दिल्ली : सम्यक प्रकाशन, पृ. 8

3.       सक्सेना, सुरेन्द्रनाथ. (2013). मनुस्मृति. दिल्ली : मनोज पब्लिकेशन्स, पृ. 347

4.       तिलक, रजनी. (2017). सावित्रीबाई फुले रचना समग्र. दिल्ली : द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन. पृ. 11

5.       माली, एम. जी. (2005). क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले. नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार. पृ. 24

6.       तिलक, रजनी. (2017). सावित्रीबाई फुले रचना समग्र. दिल्ली : द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन. पृ. 62

7.       माली, एम. जी. (2005). क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले. नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार. पृ. 50

8.       खापर्डे, डी. के. (1993). क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले. हरि नरके (सं.) महात्मा फुले : साहित्य और विचार. मुंबई : महात्मा फुले सचित्र साधने प्रकाशन समिती. पृ. 243

9.       खापर्डे, डी. के. (1993). क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले. हरि नरके (सं.) महात्मा फुले : साहित्य और विचार. मुंबई : महात्मा फुले सचित्र साधने प्रकाशन समिती. पृ. 249

आकांक्षा कुरील

एम. ए., जेंडर स्टडी

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय,

डॉ. अम्बेडकर नगर, महू, (मध्य प्रदेश)

रजनीश कुमार अम्बेडकर

पी-एच.डी., शोध छात्र, स्त्री अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

हमारे बारे में Guest writer

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