परसाई को कुत्तेवाले घर अच्छे नहीं लगते : मुद्रावादी काले धंधे में वैष्णव की फिसलन धर्म से जुड़ जाती है

Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई)

आज है Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) का जन्मदिन | 22 अगस्त

हरिशंकर परसाई की जयंती पर विशेष | Special on the birth anniversary of Harishankar Parsai

परसाई ने निम्नवर्गीय, मध्यवर्गीय ओर अभिजातवर्गीय समाज की वास्तविकताओं को देखा और जहां भी विसंगतियां दिखीं, वहां उन्होंने कठोर व्यंग्याघात भी किए। उन्होंने सामाजिकता के समूचे भरे बाजार को देखा और परखा है। विसंगतियों की भरी पूरी हाट। व्यक्ति, समाज, राजनीति, धर्म-दर्शन, संस्कृति-अपसंस्कृति, जनतांत्रिक व्यवस्था, सेठ-साहूकार, चंदाखोर, मकान-मालिक, दुहरी मानसिकता वाले लोग, दोगलापन, अध्यापकीय निरीहता, अफसरशाही, पुलिस प्रशासन, संसद, राज्यसभा, विधान-सभाएं, व्यक्तिवाद, क्षणवाद, उग्रवाद, लोहियावादी समाजवाद, कृपलानीवादी प्रजा समाजवाद, सम्पूर्ण क्रान्ति और सम्पूर्ण भ्रान्ति, सर्वोदयवाद, लाठीधारी व्यायाम, केंचुए, सर्प, अवसरवाद के आढ़तिए, फड़ और जीवन की हो रही सौदेबाजी आदि सब विसंगतियों से भरे हुए बाजार को घूम-घूम कर देखा। और इसी हाट-बाजार में उन्होंने चरित्रों की खरीदी की तथा अपनी कलम से उन्हें शब्द-अर्थ, व्यंग्यार्थ और कटूक्तियां दीं। परसाई की लेखनी से सभी पात्र कागद पर उतरते रहे।

फ्रेम में मढ़े समय की बिखरी हुई धूल से सने, वर्तमान के एक टूटे हुए आईने में समूचे आदमी की तस्वीर को उल्टा कर देखा जाए तो उस आदमी का जैसा व्यक्तित्व और शरीर की भाषा और उसका व्याकरण दिखेगा, वैसा ही यथार्थ को देखने का नजरिया हरिशंकर परसाई का रहा है।

प्रसिद्ध चित्रकार सल्वाडोर डॉली को यथार्थ तब बहती हुई पिघलती घड़ी-सा दिखा था। उन्हें घड़ी के पिघलते हुए रूप में समय और उसके यथार्थ का बिगड़ा चेहरा दिखाई दे रहा था। और परसाई को यथार्थ और उसकी वर्तमानता, सभी दिशाओं में संत्रस्त युद्धरत दिखलाई देती रही है। उन्होंने अपने सम्पर्क के सभी गली-कूचों में उसे युद्धक होते हुए भी पलायन करते हुए पाया है। उन्होंने देखा है कि उसका बहुमुखी और बहुशरीरी चेहरा शब्दों के आघातों से लहूलुहान तथा आहत है। उसके चेहरे के टुकड़े-टुकड़े सच्चाई की धरती पर बिखरे पड़े हैं। यथार्य का पूरा शरीर अपाहिज सा दिख रहा है। दृष्टिहीन भी है। वह अपनी अंधी आंखों से अपने ही शरीर को देख रहा है, जिस पर जीवन के फटे-पुराने चीथड़े पड़े हैं, अधनंगा है। जिसके मुख से निकले हुए शब्द, साम्प्रदायिकता के अस्त्रों को साधे हुए, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के जनतांत्रिक प्रवाह को छिन्न-भिन्न करने के लिए पुरातनवाद और यथास्थितिवाद का मलबा खोद-खोद कर डाल रहे हैं। जनतांत्रिकता का प्रवाह बाधित हो रहा है। जिसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कारखानों से निकला अपसंस्कृति का कचरा और रसायन भी पड़ता जा रहा है। और वह पूरी व्यवस्था की नदी के जल को ही प्रदूषित कर रहा है। प्रवाह रुकता-सा दिखलाई देता है। कचरे के ढेर के कारण जलधारा पीछे लौटती दिख रही है। परसाई की रचनाओं के चरित्र, इस कचरे को निकाल-निकालकर बाहर फेंक रहे हैं। दिख रहा है जल, प्रदूषण मुक्त हो रहा है।

वर्तमानता की जलधारा को प्रदूषणमुक्त करते हुए परसाई के शब्द और अर्थ, देख रहे हैं, कि कचरे का ढेर कुछ ऐसे चरित्रों को लिए हुए है, जो जीवित हैं पर अस्थिपिंजर हैं किन्तु उनकी अस्थिसंरचना अमानवीयता, संवेदनहीनता की मांसपेशियां लिए हुए हैं। अस्थिपिंजर, कंकाल होते हुए भी वैयक्तिक कमजोरियों के चीथड़ों से अपनी अस्मिता को अनावृत न होने की कोशिश कर रहा है। परसाई की रचनाओं के चरित्र उन चीथड़ों को ही तार-तार कर रहे दिखते हैं।

यह भी सत्य उजागर हो रहा है कि जन करुणा असहाय होती जा रही है। जीवन की वास्तविक जरूरतों की गलियां सिकुड़ती जा रही हैं। वे उस ओर जा रही हैं, जहां गली के आगे बढऩे का रास्ता ही नहीं है। आईना झूठ नहीं बोलता। और परसाई के यथार्थ का आईना सच बोलने और लिखने-दिखने के लिए प्रतिबद्ध है। आईने को सीधा करो तो मानवीय संवेदना और करुणा की विराटता दिखने लगती है। परसाई के आसपास का परिवेश, रचनात्मकता की दृष्टि से बहुत उपजाऊ रहा है। चाहे गांव हो चाहे कस्बा, चाहे नगर हो चाहे महानगर, चाहे राजनीतिक दर्शन के अखाड़े हों और चाहे धर्म की व्यायाम शालाएं, उन्हें सभी जगह विसंगतियों की मिट्टी से लिपटे चुपड़े हुए अखाड़चियों के शरीर ही दिखते रहे हैं, इन्हीं से शब्द-युद्ध करने के लिए चरित्रों की खोज परसाई अपने वर्तमान में ही, अपनी रचनाशीलता से करते आए हैं। उनकी रचनाओं में ये चरित्र सकारात्मकता की उद्भावना के लिए स्वयं नकारात्मक रूप में प्रस्तुत होते हैं। और परसाई उनकी नकारात्मकता का उपयोग व्यक्ति और समाज की सार्थकता के लिए करते हैं।

परसाई ने यथार्थ  के महानगर से लेकर छोटी-छोटी गलियों में भटकती करुणा और अभावग्रस्तता को देखा है। वे अभावों के पास जाते रहे हैं। उनका प्रत्येक प्रहार एक जीवन्त प्रश्न बनकर उभरता रहा है, जो अपनी उलटबांसियों में उत्तर भी साथ लिए रहता है। परसाई ने जो कुछ लिखा, सब देखा हुआ लिखा, कोई कल्पना नहीं। उनकी रचनाओं में आए हुए पात्र और घटना-प्रसंग, अपनी चारित्र्यिक-संधियों में मानवीय प्रकृतियों का सामान्यीकरण लिए दिखती हैं। परसाई विसंगतियों पर व्यंग्य के आग्नेयास्रों से प्रहार करते दिखते हैं। चिनगारियां फूटती हैं और परसाई की रचनाओं में यहां-वहां फैल जाती हैं। इन चिनगारियों के भीतर मानवीय करुणा भरी है। इनके भीतर विराट मानवीय संवेदना है। इनके भीतर, यथास्थितिवाद के विरुद्ध विद्रोह का ताप भरा हुआ हुआ है और परिवर्तन की ज्वालाएं सिमटी हुईं, जिन्हें उलटते ही जीवन शुभ्र दिखते लगता है। परसाई के पात्र, उनके सम्पर्क-सेतु के यात्री हैं। अमानवीयता की टहनियों को तोड़कर सूखी लकडिय़ों के छिलकों की तरह उनको बिखराने का कार्य परसाई की रचनाधर्मिता ने किया है। यही उनकी जीवनी का रचनात्मक विधान रहा है। देखा और लिखा हुआ सच है कबीर की तरह। यही उनके सच के अध्याय हैं, परिच्छेद हैं।

परसाई ने अपनी कहानियों और निबन्धों में स्थानीय और दूर के देखे हुए वास्तविक व्यक्तियों को पात्र बना लिया है। इन सब व्यक्तित्वों को नामांकित करना अथवा वास्तविक नामोल्लेख करना, मर्यादा और रचनात्मकता की दृष्टि से उचित नहीं है। क्योंकि उनकी प्रकृतियां और विसंगतियां, केवल अपने तक सीमित नहीं रहीं, वे सामान्यीकृत हो गई हैं। रंगमंच पर देखे हुए अभिनेता की अभिनेयता के साधारणीकरण की तरह। इसलिए इस अध्याय में ऐसे सभी वास्तविक व्यक्तियों को ‘यथार्थ-पुरुष’ या ‘तत्पुरुष’ सम्बोधित कर लिखा गया है। पूरी सृजनशीलता में लेखक और तत्पुरुष की सीधी बात होती चलती है। और मनोविकास सामने आते चले जाते हैं। कहीं लेखक बोलता है और कहीं यथार्थ पुरुष। प्रखर व्यंग्यकार परसाई ने अपने समकालीन पुरुष की वैयक्तिकता को सामान्यीकृत कर बहुब्रीहीय सामासिकता तक पहुंचाया और उसे वर्तमानता में वस्त्रविहीन कर दिया। समकालीन भी बेशुमार हैं, जिन पर व्यंग्य के प्रहार किए गये हैं। समकालीन तत्पुरुषों का पात्रत्व इस रूप में सामान्यीकृत हुआ है कि वह वर्तमान के कपड़े ही उतार देता है-

परसाई को कुत्तेवाले घर अच्छे नहीं लगते। वहां जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से ‘नमस्ते’ हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- क्यों, यहां क्यों आया है? तेरे बाप का घर है? भाग यहां से। परसाई आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरते। उनसे निपट लेते हैं, पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरते हैं। मेजबान का कुत्ता, मध्यवर्गीय कुत्ता है। वह जंजीर से बंधा-बंधा निम्नवर्गीय कुत्तों पर भौंकता है। उच्च वर्गीय कुत्ता, रोबीला, अहंकारी और आत्मतुष्ट होता है। लेकिन वही कुत्ता जब नौकर की गफलत से फाटक के बाहर निकलता है, तब सड़कछाप निम्नवर्गीय कुत्ते उस पर झपटते हैं। ऐसे मध्यवर्गीय कुत्ते को रगेदते हैं, पटकते हैं, काटते हैं और उसे धूल चटा देते हैं। उसके ढोंगी, दगाबाज और झूठे वर्ग के अहंकार को नष्ट कर देते हैं। वह चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन करने लगता है।’’

उच्चवर्गीय कुत्ता सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज में आवाज भी मिलाता है। कहता है- मैं तुममें शामिल हूं। उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी। यह मध्यवर्गीय चरित्र है। यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। यह वास्तविक चरित्र, मध्यवर्गीयता का है, जो आसन्न संकट का आभास पाते ही अवसरवादी होकर अपना वर्गीय रंग बदल लेता है। मध्यवर्गीय चेतना का छद्म इसी प्रकार रंग बदलता है।

”सुबह उस तत्पुरुष की मृत्यु हो गई। वह इतवार की छुट्टी के दिन मरे। वेतन लेकर क्रिया-कर्म का खर्च छोड़कर और वसीयत लिखकर। वह जब जीवित थे। तब घर की सीढ़ी ऐसी चढ़ते थे, जैसे सीढ़ी से माफी-सी मांग रहे हों। माफ करना मुझे तुम्हारे ऊपर पांव रखना पड़ रहा है। मक्खियां नाक पर बैठतीं, तो आहिस्ता से मक्खियों को उड़ा देते-जैसे क्षमा मांग रहे हों। माफ करना, मेरा इरादा तुम्हें कतई तकलीफ देने का नहीं है। बरसात में घर के सामने कीचड़ होता, तो ईंट पत्थर डलवाने की बात को टालते हुए कहते-सभी को तकलीफ है, क्या करेंगे। उनसे जब कोई कहता, सुना है सरकार मंहगाई भत्ते की वह किश्त नहीं दे रही है। वे कहते क्या करें जी? देने वाली तो सरकार है, जब देगी तब ले लेंगे। कोई कहता, आपके यहां हड़ताल हो रही है, आप तो कल काम पर नहीं जायेंगे? वे कहते- मैं तो काम पर जाऊंगा। सभी तो हड़ताल कर रहे हैं, जी। मेरे नहीं करने से क्या बिगड़ता है? सबको मिलेगा, तो मैं भी ले लूंगा। वे वोट देने नहीं जाते थे, कहते सब तो जाते हैं। उनसे कोई पूछता आपको कौन सी पार्टी पसंद है? वे कहते – अपने लिए तो दोनों ही अच्छी हैं। सभी सरकारें एक सी होती हैं। सुबह वे यथार्थ-पुरुष मर गये। प्रश्नकर्ता ने कहा – क्या वह संत था? रचनाधर्मी ने उत्तर दिया- ‘केंचुआ था’ लिजलिजे और रीढ़-विहीन व्यक्तित्व ऐसे ही होते हैं। आत्मकेन्द्रित, आत्मतुष्ट और निष्क्रिय। जिनके मन में न उत्साह होता है, न आग होती है और न सामाजिक चिन्तन।

”वे तत्पुरुष हमेशा असहमत रहते थे। कोई कहता भारतीय सेना लाहौर की तरफ बढ़ गई, तो वे कहते-क्या हर कहीं घुसना चाहिए। जब कोई कहता-बहुत भ्रष्टाचार फैला है मगर लोग भ्रष्टाचार का हल्ला ज्यादा उड़ाते हैं- तो वे कहते-मगर बिना कारण लोग हल्ला क्यों मचायेंगे जी? होगा तभी तो हल्ला करते हैं। लोग पागल थोड़े ही हैं। जनता खुद घूस देती है, तो वे लेते हैं। वे हर बात पर असहमत होने के लिए अंगुलियों के कटाव गिनने लगते थे। कोई कहता-धूप है, तो वे कहते, नहीं अंधेरा है। वे सोचते सारी दुनिया गलत है। सिर्फ मैं सही हूं।’’

”यह अहसास बहुत दु:ख देता है। इस अहसास में आगे अपेक्षा होती है कि मुझे सही होने का श्रेय मिले, मान्यता मिले, कीमत भी मिले। दुनिया को इतनी फुरसत होती नहीं है कि वह किसी कोने में बैठे उस आदमी को मान्यता देती जाए जो सिर्फ अपने को हमेशा सही मानता है। उसकी अवहेलना होती है। अब सही आदमी क्या करे। वह सबसे नफरत करता है। खीजा रहता है। दु:ख भरे तनाव में दिन गुजारता है।’’ रचनाधर्मी जब उससे सहमत होने की नीति अपनाता है, तब वह सामान्य हो जाता है। रचनाधर्मी सहमति के इस दुर्लभ क्षण को बिगडऩे नहीं देना चाहता। गणित का सूत्र है ऋण का धन से गुणा करने पर गुणनफल ऋण ही होता है किन्तु ऋण और ऋण का गुणनफल धन में निकलता है। नकारात्मकता को नकारात्मकता से ही सकारात्मक बनाया जा सकता है। तत्पुरुष के साथ जब यह प्रयोग किया गया, तो वे असहमत से सहमत होने लगे।

”रचनाधर्मी की एक दिन एक दूसरे तत्पुरुष से भेंट हो गई। वे एक ऊंचे शिक्षण संस्थान के आचार्य के पद पर हैं। सुन्दर सरकारी बंगला है। उन्होंने अपने बंगले में मनमोहक फूलों के पौधे रोपकर सुन्दर बागीचा बनाया है। अवकाश प्राप्त करने की उम्र पार कर चुके हैं। एक्सटेंशन चाहते हैं। इसकी आशा में जब वे अपने बगीचे में बैठते, तो कहा करते प्रकृति के सौन्दर्य में से ईश्वर झांकता है। उन्हें फूल की कली का स्पंदन सुनाई देता। वे फूल के जीवन का उत्स देखते। उन्हें पत्ते उल्लास से भरे लहराते दिखते। वे फूल को बच्चे की तरह सहलाते। वे कहते-ये भी मनुष्य हैं। प्रकृति में प्राण हैं। ये फूल, पत्ते, पौधे मेरी सन्तानें हैं। तब रचनाधर्मीं को आचार्यजी बहुत दयालु, और भावुक लगते। लेकिन उन्हें कल खबर मिली कि एक्सटेंशन नहीं मिलेगा। बागीचे को आग उगलती आंखों से देखने लगे। पौधों को पानी देना बंद करवा दिया। कहते-उस गुलाब की हालत देखो सूख रहे हैं बेटे एक्सटेंशन नहीं मिला, उस मौलिसिरी की हालत पतली है-एक्सटेंशन नहीं मिला, ये गमले तो सब सूख गये- एक्सटेंशन नहीं मिला। 30 जनवरी की रात उनका सामान बंध गया। कड़के की ठंड थी। आचार्य जी ने फूलों के पौधों के सूखे डण्ठल कटवाये। इकट्ठे किये और स्वयं उसमें आग लगा दी। आग तापते रहे और कहते रहे- एक्सटेंशन नहीं मिला।’’

”खोखले बुद्धिवादी का आचार्यत्व, हितसाधन न सधने पर क्रूर और हिंसक हो जाता है। ऐसा स्वार्थांध पाण्डित्य असंवेदनशील और अमानवीय भी हो जाता है- आचार्य के इस क्रूर रूप को देखकर रचनाधर्मी भी गहरे चिन्तन में डूब गया। स्वार्थ, जीवनधर्मिता को ही परास्त कर देता है।’’

परसाई के एक और तत्पुरुष हैं। वे पूरे नगर में अत्यन्त लोकप्रिय हैं। बहुभाषा ज्ञानी हैं। मिलनसार हैं। नगर में जितने भी उनके परिचित हैं, उनमें वे पारिवारिक संबंध जैसा निर्वाह करते हैं। वे यशकामी हैं। विशिष्ट दिखने ओर बनने के उनके तरीके भी अलग हैं। अब तो वे हैं नहीं। जब थे, तब उनके घर की देहरी सभी के लिए खुली रहती थी। वे खूंटी पर शव-यात्रा में लपेटा जाने वाला तौलिया तैयार रखते थे। किसी के मरने की खबर मिली नहीं कि इतने प्रसन्न होते थे जैसे किसी की शादी हो रही हो। दफ्तर से छुट्टी ले लेते। घर में और मुहल्ले में ऐलान कर देते हम फलां आदमी ‘की मिट्टी’ में जा रहे हैं। जब शव को जलाकर लौटते तो इतने प्रसन्न लगते जैसे किसी का जीवन बचाकर आ रहे हों। एक दिन पड़ोस से एक आदमी आया घबराया हुआ। कहने लगा-कक्का बहुत सीरियस हो गये हैं। जरा डॉक्टर को फोन कर दूं। यथार्थ – पुरुष ने कहा- भैया फोन तो खराब है। कहीं और से कर लो। उनको डर था कि कहीं फोन करने से डॉक्टर न आ जाए और कक्काजी बच न जायें। कक्काजी न मरे तो सबेरे तौलिया लपेटकर अर्थी बनाने का कार्यक्रम गड़बड़ हो जायेगा। कक्काजी रात को मर गये। वे यथार्थ-पुरुष मौत का तौलिया लपेटे अर्थी इस गर्व से तैयार कर रहे थे, जैसे किसी युवक की बारात सजा रहे हों। मुरदे के प्रति इतना प्रेम कम देखा गया है। मौत से इतना प्रेम तारीफ के लायक है। किसी कथावाचक से उन्होंने सुन लिया था- जो आदमी सौ आदमियों की शवयात्रा में जाता है, उसे स्वर्ग मिलता है, ऐसा शास्त्र कहते हैं। इसीलिए वे उसी तौलिया में जीवन की सार्थकता खोजकर मजे में यश के साथ जीवन जी रहे हैं। जीवन से ऐसा द्वेष और मृत्यु से ऐसा प्रेम- क्या कहा जाये। मनुष्य के भीतर रहस्य की कई परतें होती हैं, कहां तक कोई परतें खोलेगा।’’

रचनाधर्मी-वर्तमान को, ऐसे क्रूर यशकामी व्यक्तित्व के क्रूर निष्कर्ष निकालना पड़े। ”मनुष्य सार्थकता के अहसास के बिना जी नहीं सकता। कोई ज्यादा मुर्दों को जलाने में जीवन की सार्थकता देखता है और कोई जीवन-संघर्ष में। लेकिन उस यथार्थ पुरुष ने सौ शवयात्राएं पूरी कर लीं और स्वर्ग में अपना स्थान आरक्षित कर लिया। अब घनिष्ठ मित्र की मृत्यु पर भी वे शवयात्रा में नहीं जाते। अब न खूंटी पर वह गंदा तौलिया है, न वे  भावुक हैं।’’

रचनाधर्मी का निष्कर्ष यह था कि ‘ऐसा आदमी किसी भी मित्र को जहर देकर मार सकता है और सबेरे अश्रुपात करते हुए, तौलिया लपेटे अर्थी भी बांध सकता है। मित्र-पे्रम के कारण बेहोश भी हो सकता है।’

रचनाधर्मी स्वयं उन यथार्थ-पुरुष के मित्र थे। पहले डरते-डरते उनके घर जाते थे, अब बेखटके जाने लगे। क्योंकि शव यात्रा का गंदा तौलिया अब खूंटी पर टंगा हुआ नहीं दिखता। तौलिया की सौ मरघट-परिक्रमाएं पूरी हो चुकी हैं। शास्र द्वारा उपजायी गई भय-भावना और मोक्ष कामना मानवीयता को भी क्रूर और हिंसक बना देती है।

तत्पुरुष वैष्णव के पास अपार नम्बर दो का पैसा इकट्ठा हो गया, तो उसने प्रभु की दी हुई अपनी शुद्ध आत्मा की आवाज को सुनकर यह विशाल होटल बनवा डाला। भव्य होटल की बड़ी प्रसिद्धि फैल गई। बड़ी-बड़ी कम्पनियों के एक्जीक्यूटिव, बड़े अफसर और बड़े सेठ आने लगे। ठहरना तो आरामदेह था किन्तु भोजन को देखकर वे असंतुष्ट दिखते थे। वैष्णव ने शुद्ध शाकाहारी भोजन का प्रबन्ध किया था- शुद्ध घी की सब्जी, फल, दाल, रायता, पापड़ वगैरह- यानी कि शुद्ध वैष्णवी भोजन। लेकिन अभिजात वर्ग के, होटल में ठहरने वाले ग्राहक असंतुष्ट ही दिखते थे। उनका असंतोष इस तरह प्रकट होता था-

-इतने महंगे होटल में हम क्या यह घास पत्ती खाने के लिए ठहरते हैं। यहां ‘नानवेज’ का इन्तजाम क्यों नहीं है? ”

वैष्णव साष्टांग विष्णु के सामने लेट गया। प्रभु ने उसकी सुन ली। उसकी आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, गांधीजी से बड़ा वैष्णव इस युग में कौन हुआ है? गांधी का भजन है- वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जे पीर पराई जाणे रे। तू इस होटल में रहनेवालों की पीर समझ और उस पीर को दूर कर।’’

-वैष्णव ने जल्दी ही गोश्त, मुर्गा, मछली का इन्तजाम करवा दिया। – ‘फिर वही एक्जीक्यूटिव ने शिकायत की और कहा – गोश्त के पचने की दवाई भी तो चाहिए’ वैष्णव ने-लवण भास्कर चूर्ण के इन्तजाम कर देने की बात कही। -उसने कहा- आप कुछ नहीं समझते- मेरा मतलब है- शराब। यहां बार खोलिए।

वैष्णव की आत्मा ने कहा-देवता सोमरस पीते थे। वही सोमरस यह मदिरा है। इसमें तेरा वैष्णव धर्म कहां भंग होता है। वैष्णव ने होटल में ‘बार’ खोल दिया। ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। वैष्णव खुश रहने लगा। एक दिन एक ग्राहक ने वैष्णव से कहा- ‘अब होटल ठीक है। शराब भी है। गोश्त भी है। मगर मरा हुआ गोश्त है। हमें जिन्दा गोश्त भी चाहिए।’

वैष्णव ने पूछा- ‘यह जिन्दा गोश्त कैसा होता है?’ ग्राहक ने कहा- ‘कैबरे जिसमें औरत नंगी होकर नाचती है।’

वैष्णव ने कहा, ”अरे बाप रे!’’ वैष्णव अब प्रभु के चरणों में था। कहने लगा, ”प्रभु वे लोग कहते हैं कि होटल में नाच भी होना चाहिए। आधा नंगा या पूरा नंगा।’’

वैष्णव की पवित्र आत्मा से शुद्ध आवाज आई,- ”मूर्ख, कृष्णावतार में मैंने गोपियों को नचाया था! चीरहरण तक किया था। तुझे क्या संकोच है?’’

वैष्णव ने कैबरे का इन्तजाम कर दिया। फिर ग्राहकों की मांग और अपनी पवित्र आत्मा की आवाज सुनकर, रात को ग्राहकों का मन बहलाने के लिए ‘नारी’ का इन्तजाम भी कर दिया।

उसकी आत्मा ने कहा था- ‘मूर्ख यह तो प्रकृति और पुरुष का संयोग है। इसमें क्या पाप और क्या पुण्य चलने दे।’ बेयरे ग्राहकों के लिए रात को मन बहलाने के लिए ‘नारी’ का इन्तजाम चुपचाप करने लगे। पुलिस से बचकर। वैष्णव ने बेयरों से कहा- ‘पच्चीस फीसदी भगवान की भेंट ले लिया करो- ग्राहकों से। जब भी उनके लिए ‘नारी’ का इन्तजाम करो।’ अब वैष्णव का होटल खूब चलने लगा। शराब, गोश्त, कैबरे और औरत। वैष्णव धर्म बराबर निभ रहा है। इधर यह भी चल रहा है। वैष्णव ने धर्म को धन्धे से खूब जोड़ा है। मुद्रावादी काले धंधे में वैष्णव की फिसलन धर्म से जुड़ जाती है

अब रचनाधर्मी परसाई को निरीह, असहाय, आफिस की फाइल में दबे रिटायर्ड तत्पुरुष भेलाराम के जीव की आवाज सुनाई पडऩे लगी। भोलाराम यहां फाइल में अपनी सैकड़ों पेंशन की दरख्वास्तें  लिए छिपा बैठा था और वहां धर्मराज के सामने बैठा हुआ चित्रगुप्त परेशान था। ”चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में नहीं आ रही थी। आखिर उन्होंने खोजकर रजिस्टर इतने जोर से बंद किया कि मक्खी चपेट में आ गई। उसे निकालते हुए वे बोले- ‘महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए, रवाना भी हुआ, पर अभी तक यहां नहीं पहुंचा। धर्मराज ने पूछा, ‘अरे वह हुत कहां है?’ महाराज, वह भी लापता हैं।’ इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास वहां आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ‘अरे तू कहां रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहां है?’

‘पांच दिन पहले भोलाराम के देह त्यागने पर उसके जीव को यमदूत ने पकड़ा था। इस लोक की यात्रा भी आरंभ की थी। उसके जीव को लेकर तीव्र वायुतंरग पर सवार भी हुआ। लेकिन वह मेरे चुंगल से छूटकर न जाने कहां गायब हो गया। वह मुझे चकमा दे गया। पूरा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।’ धर्मराज क्रोधित हो उठे। उन्होंने यमदूत से कहा- ‘मूर्ख! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया। फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया।’

चित्रगुप्त ने कहा- ‘महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। रास्ते में रेलवे वाले चीजें उड़ा लेते हैं। हौजरी के पार्सलों के मोजे, रेलवे अफसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डिब्बे के डिब्बे रास्ते में कट जाते हैं। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद दुर्गति करने के लिए नहीं उड़ा दिया?’ धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा- ‘तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गई। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?’

लेकिन एक चिन्ता की बात है। भोलाराम नाम के एक पेंशनर ने देह त्याग दी। पांच दिन बीत गये। उसका जीव यमदूत को चकमा देकर कहीं छिप गया है।  नारद ने वहां के बड़े साहब के सामने जोर से ‘भोलाराम’ कहकर आवाज दी। ‘सहसा फाइल में से आवाज आई, ‘कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमेन है? क्या पेंशन का आर्डर आ गया?’ नारद चौंके पर दूसरे ही क्षण समझ गए। बोले, ‘भोलाराम’! तुम क्या भोलाराम के जीव हो? हां, आवाज आई। नारद ने कहा, ‘मैं नारद हूं। मैं तुम्हें लेने आया हूं। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।’ आवाज आई, ‘मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों में अटका हूं। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।’ नारद निराश होकर लौट गए। जीव अभी भी फाइलों में अटका है। ये तत्पुरुष भोलाराम रचनाधर्मी परसाई के पास कभी-कभी आ जाते थे, जब उन्होंने अपनी देह का त्याग नहीं किया था। बड़े साहब आज भी फाइल पर ‘वजन’ का इन्तजार कर रहे हैं। नारद अपनी वीणा को ही छिनते देख वहां से भाग खड़े हुए।

परसाई अपनी समकालीनता में ही, अपनी रचनाधर्मिता को गति देते रहे हैं। सड़क पर चलते हुए, उनके अभिन्न और आत्मीय, श्रद्धा और अश्रद्धा से आते-जाते दुए दर्शनार्थी, कागद पर यथार्थ और अयथार्थ को उतारते हुए लेखक-आलोचक, धर्म और दर्शन के अखाड़ची, राजनीति की चिन्तन-भूमि पर शीर्षासन लगाकर जनतांत्रिक व्यवस्था और समाजवाद को देखने वाले राजनीतिज्ञ, ईष्र्या और द्वेष के कीचड़ भरे डबरों में अपने पांव डुबाये शुभचिन्तक और इसी तरह के जीवन-व्यापारों के सभी क्षेत्रों में फैले हुए सौदागर, उनके लिए पात्र थे, जो उनकी रचनाओं में चरित्र बने। उनके पात्रों के कंधे वर्तमान का संघर्ष लादे, कांवड़ी ढोते हुए भारी हो चले हैं। युग की पीड़ा और संत्रास को लादे हुए चल रहे हैं। आंखों से आंसू की बूंदें टपक रही हैं, और उन बूंदों ने ही चरित्र बनकर कागद पर उतरकर सार्थक अक्षरों के आकार ले लिए हैं। उन अक्षरों को पढऩा, चरित्र को पढऩा है। जीवन के कुरुक्षेत्र में संघर्षशील महाभारत की तरह। क्योंकि वे सब पात्र, चरित्र बनकर व्यंग्य की शरशय्या पर पड़े, इतिहास के पन्ने पलटते जा रहे हैं। युग जाग रहा है।

डॉ. रामशंकर मिश्र

दर्पण देखे मांज के (परसाई: जीवन और चिंतन) से साभार

(देशबन्धु)

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