टीवी और मोदी का पत्थर दिल !

Narendra Modi new look

Stop watching PM Modi through television images

टेलीविजन इमेजों के माध्यम से पीएम मोदी को देखना बंद करो, मोदी के कामों के माध्यम से देखना आरंभ करो।

टीवी इमेजों में मोदी जितना लुभावना लगता है,कामों के जरिए उतना ही डरावना लगता है।

टीवी इमेजों ने मोदी की लुभावनी इमेज बनायी है। हम सबकी आदत है फोटो को ही सच मानने की, इसलिए हमारे अंदर रीयल मोदी से ज्यादा इमेज मोदी की अपील है। मोदी की रीयल इमेज वह है जिसे आरएसएस ने रचा है, फोटोजनित इमेज तो नकली इमेज है।

Photo Modi and Real Modi differ

फोटोजनित इमेज विभ्रम है संघजनित इमेज य़थार्थ है, हमको फोटोजनित इमेज पसंद है, संघ को रीयल इमेज पसंद है। फोटो मोदी और रियल मोदी में अंतर है। फो टोमोदी देखना बंद करके रीयल मोदी पर ध्यान केन्द्रित करें। रीयल मोदी तो पत्थरदिल है। पीएम के पास “अन्य” या “अदर” के दर्द को महसूस करने वाली फैकल्टी ही नहीं है। “अन्य” का दर्द तब महसूस होता है जब आप अपनों का दर्द महसूस करते हैं। जो अपने निजी दर्द को महसूस न कर सके, वह अन्य के दर्द को क्या महसूस करेगा !

Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

मेरी बात पर विश्वास न हो तो पता करो। सन् 2002 के दंगों में मारे गए मासूम-निहत्थों की हत्या को लेकर मोदीजी कितना रोए थे, कितनी बार दंगापीड़ितों के शिविऱों में गए थे, दंगा पीड़ितों से कितनी बार मिले थे और उनके दुख-दर्द को सुनने के लिए कितना समय खर्च किए थे, यदि इनका कहीं कोई अनुभव भी वे लिख पाए ?

It is not possible to realize the pain of others by staying in the Lakshmanrekha of Hindutva.

“अन्य” का दर्द महसूस करने के लिए संघी मन नहीं चाहिए, मनुष्य का मन चाहिए। अन्य दर्द में रहता है, संघी दर्द को देखता है। संघियों को अन्य का दर्द देखकर संतोष मिलता है, वे दूर से देखकर दुख व्यक्त करते हैं, “बुरा हुआ”, से ज्यादा नहीं सोचते, नहीं महसूस करते हैं। “अन्य” को समझने, उससे जुड़ने और उसे जीने के लिए हिन्दुत्व के दायरे के बाहर निकलने की जरूरत है। हिन्दुत्व की लक्ष्मणरेखा में रहकर अन्य के दर्द का एहसास कर पाना संभव नहीं है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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