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तारों के ध्वंस सुपरनोवा से जुड़ी गुत्थी समझने में सहायक नया शोध-अध्ययन

सुपरनोवा क्या है? (Definition of Supernova in Hindi )

नई दिल्ली, 14 जनवरी : तारों की मृत्यु के समय प्रचंड महा-विस्फोट होता है, जिसे सुपरनोवा विस्फोट के रूप में जाना जाता है, जिससे कई नये तारों का जन्म होता है। अपने जीवन के अंत में भीमकाय तारों का विखंडन एक बड़े झटके के रूप में होता है, जो अपनी आकाशगंगा में भी उथल-पुथल का कारण बनता है। ऐसे में, सुपरनोवा के दौरान विमुक्त होने वाले कणों के अध्ययन से ब्रह्मांड की कई गुत्थियां सुलझायी जा सकती हैं। यह माना जाता है कि जिन तत्वों से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है, ऐसे लगभग सभी तत्व इसी तरह के विस्फोटों का परिणाम होते हैं।

विशालकाय तारों में महा-विस्फोट (सुपरनोवा) को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आयी हैं। खगोल-विज्ञानियों की एक आम धारणा है कि तारों के जीवनकाल के अंत में होने वाले सुपरनोवा विस्फोट में न्यूट्रिनो (neutrinos) के सिर्फ दो रूपों की भूमिका होती है। लेकिन, एक नये अध्ययन में पता चला है कि सुपरनोवा में न्यूट्रिनो के तीनों रूप या फ्लेवर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ये तथ्य सुपरनोवा में न्यूट्रिनों (neutrinos) के सिर्फ दो रूपों की भूमिका पर केंद्रित आम धारणा के विपरीत हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये तथ्य विशालकाय तारों के अंत को बेहतर ढंग से समझने में उपयोगी हो सकते हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स, जर्मनी और नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय, अमेरिका के संयुक्त अध्ययन में यह खुलासा किया गया है।

जानिए सुपरनोवा विस्फोट का कारण

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीएफआईआर) के एक सैद्धांतिक अध्ययन से पता चला था कि तारों के जीवनकाल के अंत में होने वाले सुपरनोवा विस्फोट का कारण न्यूट्रिनो हो सकते हैं।

न्यूट्रिनो कितने प्रकार के होते हैं

न्यूट्रिनो के बारे में जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन और टाऊ के नाम से जाना जाता है।

पृथ्वी पर मौजूद जीवों की तरह आकाश में चमकने वाले तारों का भी एक दिन अंत होना तय रहता है। तारों के भीतर संचित ऊर्जा जब समाप्त हो जाती है, तो उनकी चमक खोने लगती है। इस तरह तारों का अंत या मृत्यु हो जाती है।

शोध पत्रिका फिजिकल रिव्यू लेटर (पीआरएल) में प्रकाशित इस अध्ययन ने पूरे विश्व के खगोल-विज्ञानियों का ध्यान आकर्षित किया है। यह अध्ययन आईआईटी, गुवाहाटी के भौतिकी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सोवन चक्रवर्ती एवं उनकी शोध छात्रा मधुरिमा चक्रवर्ती, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स, जर्मनी के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. फ्रांसेस्को केपोजी और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, अमेरिका में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो डॉ. मनिब्रता सेन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

डॉ. सोवन चक्रवर्ती ने बताया कि “सुपरनोवा से जुड़ी गुत्थियों को अभी तक पूरी तरह नहीं सुलझाया जा सका है, और यह प्रकृति का एक गूढ़ रहस्य बना हुआ है।”

उन्होंने बताया कि सुपरनोवा विखंडन की प्रक्रिया में आण्विक प्रक्रियाओं के माध्यम से न्यूट्रिनो का सृजन होता है। विखंडन से जुड़ी मूल चुनौती उन न्यूट्रिनो कणों से संबंधित है, जो आकार में बेहद सूक्ष्म होते हैं। न्यूट्रिनो कणों की अपनी जटिलताएं हैं। इन कणों की खोज के कई दशक के बाद भी भौतिक-विज्ञानी न्यूट्रनो से संबंधित रहस्यों को पूरी तरह समझ नहीं सके हैं। इन कणों की संरचना और द्रव्यमान जैसे बिंदुओं से संबंधित बहुत-सी बातें पहेली बनी हुई हैं। मौजूदा सुपरनोवा मॉडल यही बताता है कि म्यूऑन और टाऊ न्यूट्रिनो और एंटी-न्यूट्रिनो की काफी कुछ विशेषताएं एक जैसी हैं, और उन्हें एक ही प्रजाति का माना जाता है।

डॉ. सोवन चक्रवर्ती बताते हैं कि

“यह जानकारी इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है कि अत्यंत घने सुपरनोवा कोर के न्यूट्रिनो अन्य न्यूट्रिनो कणों के संपर्क में आकर अपनी प्रकृति (फ्लेवर) बदल लेते हैं। यह बदलाव कुछ माइक्रो सेकेंड्स में होता है, और यह सुपरनोवा की समग्र प्रक्रिया को प्रभावित करता है, क्योंकि विभिन्न प्रकृति (फ्लेवर) वाले न्यूट्रिनो कण महा-विस्फोट के समय भिन्न कोणीय वितरण से उत्सर्जित होते हैं। अत्यंत तीव्र गति से होने वाला संक्रमण अरैखिक होता है, जो न्यूट्रिनो कणों के किसी अन्य स्रोत से तो नहीं, परंतु सुपरनोवा से प्रतिरोध करता है। हमने पहली बार सुपरनोवा में तीनों प्रकार की प्रकृति के न्यूट्रिनो के तीव्र रूपांतरण वाले नॉन-लीनियर स्वरूप की अनुकृति प्रदर्शित की है।”

शोधकर्ताओं का कहना है कि न्यूट्रिनो के तीनों फ्लेवर में अंतर महत्वपूर्ण हैं। उनमें से किसी एक की अनदेखी से तीव्र गति से होने वाले फ्लेवर परिवर्तन की सही और स्पष्ट तस्वीर मिल पाना संभव नहीं है। यह अध्ययन ब्रह्मांड के कई रहस्यों को सुलझाने और भविष्य के कई शोध-अनुसंधानों को एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है।

(इंडिया साइंस वायर)

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