न्याय नहीं पंचायती फैसले कर रहा है सर्वोच्च न्यायालय : ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर आईपीएफ का बयान

न्याय नहीं पंचायती फैसले कर रहा है सर्वोच्च न्यायालय : ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर आईपीएफ का बयान

सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल हमारे देश में सबसे अधिक संवेदनशील और विवादित रहा है। संविधान सभा में भी सत्ता में प्रतिनिधित्व सामाजिक, शैक्षिक आधार पर किया जाए या इसका आर्थिक आधार भी बनाया जाए। इस पर बातचीत और आपसी समझ में यह पाया गया था कि हमारे देश में वर्णीय विभाजन की वजह से समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से दासता का शिकार रहा है। इसे ठीक करने का समय आजाद भारत के लोगों को मिला, इसलिए संविधान सभा द्वारा सामाजिक और शैक्षिक रूप एससी-एसटी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसे सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) के रूप में लिया गया। इसकी सीमा 50 प्रतिशत तय की गई। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए समय सीमा 10 वर्ष तय की गई। लेकिन नौकरियों के लिए इस तरह का कोई समय सीमा का प्रावधान नहीं था। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में समय-समय पर मूल्यांकन करके इसकी समय सीमा बढ़ाई जाती रही है।

बहरहाल मंडल कमीशन द्वारा पिछड़े वर्ग के लिए निश्चित किए गए 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर 1990 में केंद्र सरकार द्वारा इसकी घोषणा की गई और इंदिरा साहनी केस में उच्चतम न्यायालय ने इसे मंजूरी भी दे दी। 2019 में एनडीए सरकार ने संविधान के द्वारा निश्चित किए गए शैक्षिक और सामाजिक आधार पर दिए गए आरक्षण के साथ इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन यानी ईडब्लूएस (आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग) के नाम पर जो जातियां एससी-एसटी और पिछड़े वर्ग में नहीं आती थीं जिसमें मुसलमान और ईसाई भी हैं, उन सभी लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी। अपवाद में एक क्षेत्रीय दल के अलावा करीब करीब सभी दलों ने संसद में इसे पास कर दिया। पिछले दिनों संविधान के 103 वें संशोधन द्वारा पारित आरक्षण की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार कर लिया। तब से इस पर फिर विवाद तेज हो गया। ऐसी स्थिति में आइपीएफ की राष्ट्रीय कार्यसमिति की मीटिंग में विचार किया गया कि इसे कैसे देखा जाए।

     राष्ट्रीय कार्यसमिति महसूस करती है कि यहां कुछ चीजें स्पष्ट हो जानी चाहिए।

पहली चीज तो यह है कि अधिकांश दलों ने इसका समर्थन किया है। सुप्रीम कोर्ट में भी 5 जजों की संविधान पीठ ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण देने को न गलत न पाया और न ही संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध। सामान्य वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण में जो 50 प्रतिशत की सीमा तय की थी उसे भी अपने पूर्व के निर्णयों को नकारते हुए खारिज कर दिया। इन 70 सालों में देश के शासक वर्ग की न्यायिक व्यवस्था में भी यह राय बन गई है कि आर्थिक आधार पर भी आरक्षण दिया जा सकता है। आने वाले दिनों में इसके दूरगामी परिणाम को भी नकारा नहीं जा सकता है।

यह पूरी तौर पर स्पष्ट है कि जो व्यवस्था संविधान में सकारात्मक कार्यवाही के बतौर शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर स्वीकृति पाई थी अब उसे बदलकर आर्थिक आधार भी इसमें जोड़ दिया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि अभी भी सामाजिक न्याय का एजेंडा अधूरा है खासतौर पर शिक्षा और न्याय के क्षेत्र में एससी-एसटी और पिछड़े वर्ग की उपस्थिति लगभग नगण्य है। यदि आर्थिक आधार भी एक कारक मानकर 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था समाज के ऊपरी हिस्से के लिए की जाती है और उसकी आय सीमा 8 लाख रूपये तक कर दी जाती है तो जो सामान्य वर्ग के गरीब तबके हैं उन्हें उसका लाभ कैसे मिलेगा । इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि उच्च जातियों के गरीब तबकों के लिए यह आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें सामान्य वर्ग के अधिकांशतः सभी लोग इस आरक्षण का लाभ उठाएंगे और जो यह कहना है कि यह सामान्य वर्ग के गरीबों को मिलेगा वह सही साबित नहीं होता है। यह सही है कि भारतवर्ष में इन 70 सालों में बड़े बदलाव हुए हैं। अगर एक बार समाज की जातीय जनगणना करा ली जाए और उसके आर्थिक संबंधों का आकलन कर लिया जाए और उसके आर्थिक स्थिति की समीक्षा हो तो नई आरक्षण व्यवस्था पर बहस हो सकती है। शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रीय असंतुलन , निजी व सरकारी स्कूलों के लोगों की असमानता को ध्यान में रखते हुए सामाजिक, शैक्षिक और अन्य कारकों के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था के लिए एक नई बहस की जरूरत है। सामान्य वर्ग ( ईडब्लूएस) आरक्षण कोटे में एससी, एसटी और पिछड़े वर्ग को जो बाहर किया गया है वह भी कतई न्यायसंगत नहीं है। यह जो अभी सामान्य वर्ग के लिए व्यवस्था की गई है इसके पीछे किसी सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) से अधिक जातीय जोड़ तोड़ और चुनावी एजेंडा प्रमुख है। इसीलिए जल्दबाजी में संसद को बुलाकर इस संविधान संशोधन को संसद में भाजपा ने पास कराया और अधिकांश दलों ने इसका समर्थन चुनावी लाभ नुकसान की दृष्टि से किया।

जहां तक सर्वोच्च न्यायालय की बात है अब वह विधि के आधार पर फैसला देने की जगह सब को संतुष्ट करने का एक पंचायती भाव लेकर काम करती दिख रही है। यही दृष्टि उसके बाबरी मस्जिद केस में भी दिखी है और यही दृष्टि आर्थिक आधार के आरक्षण में भी दिखाई देती है।

तात्कालिक जरूरत यह है कि हम मांग करें कि इस केस का पुनर्परीक्षण हो और बेहतर तो यह है कि एक बड़ी संवैधानिक पीठ में इस प्रकरण को ले जाया जाये। 

राजनीतिक तौर पर हमें यह मांग उठानी चाहिए कि जाति जनगणना हो और उसके आंकड़ों के आधार पर आज नई आरक्षण नीति पर देशव्यापी बहस हो।

हमें यह ध्यान रखना है कि शासक वर्ग अपने जनाधार को व्यापक करने के लिए आरक्षण नीति का उपयोग करता है। जहां तक लोगों के आर्थिक उन्नयन की बात है वह प्रशासन में महज प्रतिनिधित्व से तय होने वाला नहीं है। उसके लिए जरूरी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को रोजगारपरक, जनोन्मुखी और राष्ट्रीय बनाया जाए। देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक कारपोरेट पूंजी की गिरफ्त से बाहर लाया जाए। सरकार की निजीकरण की नीतियां रोजगार की सम्भावनाओं को पूरी तौर पर खत्म करती जा रही हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों में यदि सार्वजनिक व कोआपरेटिव नौकरियों को जोड़ दिया जाये तो लगभग एक करोड़ पद रिक्त हैं उन्हें भरे जाने की जरूरत है दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था का विस्तार नहीं किया गया है।

जरूरत है बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन किया जाए, लोगों को  नौकरियां दी जाएं और निजी क्षेत्र तक सामाजिक न्याय का विस्तार किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण की मंजूरी पर आइपीएफ का बयान एस. आर. दारापुरी राष्ट्रीय अध्यक्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट(आइपीएफ) द्वारा जारी

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