आरटीआई की धार पर वार है जन सूचना पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

The Supreme Court of India. (File Photo: IANS)

Supreme Court’s comment on RTI is wise on RTI’s edge

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी से लेकर नौकरशाह, राजनेता और हर संवैधानिक संस्था चिंता जाहिर करते देखे जाते हैं, पर व्यावहारिक बात करें तो जैसे हर कोई भ्रष्टाचार का हिस्सा बनता जा रहा हो।

RTI is one weapon against corrupts.

आरटीआई देश में एक ऐसा हथियार है जिससे थोड़ा बहुत डर भ्रष्टाचारियों को लगता है। यही वजह है कि देश के प्रभावशाली तंत्र किसी तरह से आरटीआई रूपी इस हथियार को निष्प्रभावी बनाने के तरह-तरह के प्रयास में लगे हैं। यदि सर्वोच्च न्यायालय आरटीआई को लेकर आशंकित होने लगे तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरटीआई को लेकर अहम टिप्पणी (Supreme Court’s comment on RTI) की है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सभी को सभी सूचनाएं पाने का अधिकार सीमित होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने सवालिया लहजे में कहा है कि क्या आरटीआई एक्ट किसी का व्यवसाय भी हो सकता है? उन्होंने आरटीआई डालने की चल रही परिपाटी पर उंगली उठाई है। उन्होंने कहा है कि ऐसे लोग, जिनका सूचना के विषय से कोई लेना-देना नहीं है, वे भी सूचना के लिए आरटीआई लगा दे रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि कानून का उद्देश्य यह था कि लोगों को वह सूचनाएं मिलें, जिनसे वे प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन अब हर कोई आरटीआई लगा दे रहा है, चाहे उसे अधिकार हो या नहीं। अधिकार का कोई महत्व नहीं रह गया है।

आरटीआई के हर किसी के लगा देने पर अदालत ने संकेत दिया कि वह इस मामले में दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।

अपने को आरटीआई एक्टिविस्ट बताने वालों पर टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि हम देख रहे हैं कि लोग अपने लेटर हेड पर खुद को आरटीआई एक्सपर्ट (RTI Expert) लिख रहे हैं।

शीर्ष अदालत का कहना है कि कि ये ऐसे लोग हैं जिनका न कोई इससे लेना-देना नहीं है और न ही उनका इस विषय से कोई संबंध नहीं है। बस सूचनाओं के लिए याचिकाएं लगा रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त लहजे कहा है कि देखा जाए तो ये बुनियादी रूप से आईपीसी की धमकी (धारा 506) है। यानी धमकी देना है।

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हालत तो यह हो गई है कि अब कोई फैसला नहीं लेना चाहता, क्योंकि उसे डर है कि उसके खिलाफ आरटीआई लगा दी जाएगी।

न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा कि मुंबई में मुझे लोगों ने बताया कि सूचना कानून के डर के कारण मंत्रालय में काम को वास्तविक रूप से लकवा मार गया है।

आरटीआई को लेकर मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस तरह से चिंता जाहिर करने को लेकर विधि विशेषज्ञ आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश की इस बात पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि जो भ्रष्ट हैं, उन्हें ही डरने की जरूरत है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हर कोई व्यक्ति गैर कानूनी काम नहीं कर रहा है। हम कानून के या सूचनाओं के प्रवाह के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन क्या ये इस तरह से जारी रह सकता है? ये अप्रतिबंधित अधिकार, जिसमें कोई भी किसी से कुछ भी मांग सकता है? यहां तक कि अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अर्जियां लगाई जा रही हैं। आरटीआई को लेकर लोग आपसी खुन्नस निकाल रहे हैं। इस मामले में कुछ दिशा-निर्देंश होने ही चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय की इस बेहद सख्त टिप्पणी से लोगों में बेचैनी है।

यह माना जा रहा है कि यदि अदालत इस बारे में कोई दिशा-निर्देश जारी करता है तो निश्चित ही इससे आरटीआई की धार कुंद होगी और इसमें भ्रष्ट तंत्र संरक्षण पाने का अधिकारी बन जाएगा।

यह जगजाहिर है कि सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत सारे मामले इसलिए सामने आ सके हैं, क्योंकि लोगों ने आरटीआई के तहत सूचनाएं मांगी थी। आरटीआई में साफ कहा गया है कि सूचना मांगते वक्त यह नहीं पूछा जा सकता है कि आप यह सूचना क्यों मांग रहे हैं, लेकिन मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी है कि कोई भी कोई सूचना यूं ही मांग ले रहा है, जो उचित नहीं है।

वैसे भी गत 22 जुलाई को मोदी सरकार ने लोकसभा से आरटीआई अधिनियम में संशोधन की अनुमति दिलवा दी है।   इसके एक दिन बाद सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसा करके सरकार जनता को धोखा दे रही है। हालांकि अन्ना से जब आरटीआई के प्रावधान में बदलाव को लेकर आंदोलन करने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा, ‘मैं अब खुद आंदोलन नहीं करना चाहता। अब मेरे पास शक्ति नहीं रही कि मैं आंदोलन करूं’।

मोदी सरकार ने 2018 में भी ऐसा करने की कोशिश की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली।

चरण सिंह राजपूत

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One Reply to “आरटीआई की धार पर वार है जन सूचना पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी”

  1. शानदार लेख . लगता है मुख्य न्यायधीश सरकार की ही भाषा बोल रहे हैं . यह दुर्भाग्य पूर्ण है . एक ओर आर टी आई कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं उनकी ओर ध्यान देने की स्थान पर कोर्ट सरकार के साथ खड़ा है . वैसे भी कानून बनाने का सरकार का है कोर्ट का नहीं . वह अपनी ओर ऐसे नियमों के लिये हरी झंडी क्यों दिखा रहा है.

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