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जी हाँ! सिस्टम बिगड़ा तो है, पर उसे सुधारेगा कौन ?

The system is spoiled, but who will repair it? : Vijay Shankar Singh

उदारीकरण के दौर में जब सब कुछ निजी क्षेत्रों में सौंप दिए जाने का दौर शुरू हुआ तो उसकी शुरुआत मुक्त बाजार और लाइसेंस परमिट मुक्त उद्योगों से हुई। जो सिस्टम, धीरे-धीरे ही सही, लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा के आधार पर विकसित हो रहा था, वह उदारीकरण के दौर की शुरुआत में पूंजी केंद्रित हो गया, और दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता है, की स्वार्थी और जनविरोधी थियरी के इर्दगिर्द सिमटने लगा। 1991 के बदलती आर्थिक नीति के परिणाम, हालांकि, सकारात्मक हुए, और देश में रोजगार के नए अवसर (New employment opportunities in the country) खुले और इससे न केवल औद्योगिकीकरण में तेजी आयी बल्कि देश की जीडीपी सहित अन्य आर्थिक सूचकांकों में भी बढ़ोत्तरी हुयी। मूलतः यह पूंजीवादी आर्थिकी का मॉडल () था जो हमने 1991 में नरसिम्हा राव सरकार के समय अपनाया। तब से अब तक यही मॉडल अपनी कुछ खामियों के साथ चलता रहा, और देश विकसित तो होता रहा, पर अमीर गरीब के बीच की खाई भी बढ़ती रही। सिस्टम की इस गंभीर खामी की समीक्षा नहीं की गयी।

विकास का मतलब, हाइवे, एक्सप्रेस वे, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन आदि तो समझे गए पर जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी रोटी की सुविधाएं और सम्मानपूर्ण जीवन आदि सरकारों की प्राथमिकता से बाहर होने लगा। सरकारें बजट या योजनायें बनाते समय, इन जनहित के मुद्दों को घोषणाओं और भाषणों में तो रखती थी, पर अमल में उन्हें कम ही लाती थीं। यह सब लोकलुभावन बातें, वोट खींचू मानी जाने लगीं, जिन्हें बाद में, जुमला कह दिया गया।

वंचितों और गरीबो को उनके जीवन स्तर को बढ़ाने वाली योजनाएं, मध्यवर्ग को मुफ्तखोरी लगने लगीं। जब कि सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह लोककल्याणकारी राज्य की ओर बढ़े और जनता का जीवन स्तर सुधारे।

कांग्रेस ने जब 1947 में सत्ता संभाली तो, उसने अपनी आर्थिक नीतियों के लिए जो सिस्टम विकसित किया वह मिश्रित अर्थव्यवस्था का था, जिसे लेफ्ट ऑफ द सेंटर (Left of the center) कहा जाता है। तब पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के नए मॉडल पर काम हुआ। स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में प्राइमरी हेल्थ सेंटर से लेकर बड़े सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, एम्स आदि बने। पंचवर्षीय योजनाएं, अपनी कुछ खामियों के साथ, नियोजन का एक अच्छा प्लेटफार्म बनी। योजना आयोग का स्वरूप जिसे 1939 में नेताजी सुभाष बाबू से अवधारित किया था, देश के विकास का एक महत्वपूर्ण थिंकटैंक 2014 तक बना रहा। अब इस थिंकटैंक को, 2014 में बदल कर नीति आयोग में परिवर्तित कर दिया गया और अब तो पंचवर्षीय योजनाओं का सिलसिला ही खत्म हो गया।

भाजपा, अपने पहले टर्म में 6 साल सत्ता में रही और अब 2014 से लगातार सत्ता में है। पर आश्चर्य की बात है कि आज सिस्टम पर ठीकरा फोड़ने वाली मीडिया और लोग भाजपा से यह पूछने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं कि उसकी आर्थिक और लोककल्याणकारी राज्य के संबंध में नीतियां क्या हैं।

सभी राजनीतिक दल अपने अधिवेशनों में तमाम प्रस्तावों के साथ साथ अपनी आर्थिक दृष्टि और आर्थिक प्रस्ताव भी प्रस्तुत करते हैं, पर आज तक यह दल या यह सरकार यह नहीं बता पा रही है कि वह किस आर्थिक मॉडल की ओर जाना चाहती है और लोककल्याणकारी राज्य के प्रमुख मुद्दे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजी रोटी के बारे में उसकी क्या आर्थिक रणनीति होगी।

नीति आयोग की सिफारिशों को आप देखेंगे तो उनकी हर सिफारिश में निजीकरण की बात होगी पर यह आज तक स्पष्ट नहीं हुआ कि यह निजीकरण क्यों और किन लक्ष्यों के लिए, किन नीतियों के कारण हो रहा है। आखिर यह उन्मादी निजीकरण किस प्रकार से लोककल्याण औऱ संविधान के नीति निर्देशक तत्वो का लक्ष्य प्राप्त करेगा। अब लगता है, सब कुछ निजीकरण कर देने के इस पागलपन में सरकार ने देश के सबसे महत्वपूर्ण लोककल्याण के मुद्दे, शिक्षा और स्वास्थ्य को लगभग अनाथ छोड़ दिया है।

Corona era health budget

अब एक नज़र कोरोना काल के स्वास्थ्य बजट पर डालते हैं, जहां घोषणाओं और उन पर बजटीय चुप्पी साफ दिखती है। वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत नामक एक नयी योजना के लिए 64,180 करोड़ रुपये खर्च का लक्ष्य, पिछले साल रखा था। स्वास्थ्य मंत्रालय को 2020-21 के बजट में, केंद्र का आवंटन 67,112 करोड़ रुपये का था। इस नई योजना की धनराशि को इसके साथ मिला कर देखें, तो यह सम्पूर्ण स्वास्थ्य आवंटन में 100% की वृद्धि करती दिख रही है। हालांकि, सरकार का यह भी कहना है, कि यह योजना छह सालों में शुरू होगी। यानी यह भविष्य की योजना है। लेकिन विस्तृत बजट दस्तावेज का जब आप अध्ययन करेंगे तो, साल 2021-22 के नवीनतम बजट में इस योजना के लिए धन आवंटन का कोई उल्लेख ही नहीं है।

यह घोषणा भी बजट के अभाव में एक जुमला ही सिद्ध होगी। क्योंकि सरकार ने इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिये कोई बजटीय व्यवस्था ही नहीं की है। यदि इसे आगामी 6 साल की योजना के प्रारूप में मान कर भी चले तो, इस साल के वित्तीय वर्ष में इसके लिए कुछ न कुछ धन आवंटित किया जाना चाहिए था।

सरकार ने स्वास्थ्य सेवा के लिए अभूतपूर्व परिव्यय की घोषणा भी की है। जिसके लिए 2,23,846 करोड़ रुपये व्यय करने की बात की गयी है। वित्त मंत्री के अनुसार यह 2020-21 के बजट में 137% की वृद्धि है। हालांकि बजट में पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य सेवाओं पर पूरा खर्च स्वास्थ्य मंत्रालय को ही जाता था। इस बार सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं के बजट को और भी कई हिस्सों में बांट कर पेश किया है। जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं के उन सभी हिस्सों और योजनाओं को भी इसमें जोड़ दिया गया है जो कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन नहीं आते हैं।

वहीं सरल शब्दों में कहें तो पहले के मुकाबले कोई नया पैसा इस बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च के लिए नहीं दिया गया। लेकिन वर्तमान की ही अलग-अलग कई सारी योजनाओं को आपस में जोड़ दिया गया है। जिससे स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च में, आंकड़ों के अनुसार, 137 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी नज़र आती है। इसे ही आंकड़ों की बाजीगरी कहते हैं।

इंडियास्पेंड ने बजट पर एक विश्लेषात्मक लेख प्रकाशित किया है। उक्त लेख के अनुसार, बढ़े हुए आवंटन में निम्नलिखित बजट शीर्ष आते है: स्वास्थ्य मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, पेयजल और स्वच्छता विभाग, वित्त आयोग द्वारा स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छता के लिए आवंटन और कोविड-19 टीकाकरण के लिए धनराशि का नया आवंटन। इन सबको एक मे ही जोड़ कर स्वास्थ्य बजट की भारी भरकम राशि दिखायी जा रही है। साल 2020 में कोरोना महामारी की पहली लहर के बावजूद भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए, सरकार ने उसके वास्तविक आवंटन में कोई विशेष वृद्धि नहीं किया है। 2020-21के बजट में भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय को 67,112 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, और वर्तमान वित्त वर्ष के लिए 82,928 करोड़ का संशोधित अनुमान या अनुमानित पैसा खर्च किया जाना है। फिलहाल, 2021-22 के लिए, भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय को 73,931.77 करोड़ रुपये आवंटित किए गए है। यह 2020-21 के अनुमानित बजट से 10.16% अधिक है, लेकिन चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान से 10.84% कम है। संशोधित अनुमान, जरूरतों के बढ़ने, महंगाई और टैक्स वृद्धि के आधार पर रखी जाती है। सरकार ने धन का आवंटन, खुद ही अपने संशोधित अनुमान से कम किया है।

बजट पर टिप्पणी करते हुए, अकाउंटेबिलिटी इनिशियेटिव की निदेशक अवनी कपूर ने बताया कि,

“स्वास्थ्य मंत्रालय का बजट यह नहीं दर्शाता है कि कोविड-19 महामारी पिछले साल से हो रही है,”

उनका कहना है कि

“लोगों ने नियमित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच खो दी है, जिसकी भरपाई के लिए और नए स्वास्थ्य मुद्दों से निपटने के लिए और अधिक आवंटन किया जाना चाहिए था । बजट इनमें से किसी को भी प्रतिबिंबित करने में विफल रहा है। इस साल स्वास्थ्य आवंटन में लगभग 10% का इज़ाफा हुआ है, ऐसा देश जो हमेशा स्वास्थ्य पर कम खर्च करता है, उसके लिए यह बहुत अच्छा नहीं है। दूसरी ओर महामारी को देखते हुए इस साल स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करना पूरी तरह से उचित है।”

स्वास्थ्य या आरोग्य का अर्थ केवल बीमार होने पर इलाज हो, यही नहीं होता है। बल्कि यह कुपोषण, प्रिवेंटिव मेडिसिन, कम्युनिटी हेल्थ, बृहद टीकाकरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता (Malnutrition, preventive medicine, community health, mass immunization and health awareness) आदि भी होता है। दिसंबर 2020 में राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-20 के पहले चरण के नए आंकड़ों के अनुसार, भारत में पोषण का स्तर गिर गया था। बच्चों में अल्प-पोषण और कमज़ोरी के स्तर में अधिकांश राज्यों में वृद्धि दिखी और इसके लिए डाटा जारी किया गया था, और यह गिरावट इतनी चिंताजनक स्तर की है कि, वह भारत में लम्बे समय से किए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की योजनाओं की उपलब्धियों को उलट सकता है।

इंडियास्पेंड के उक्त लेख में दिए गए आंकड़ों के अनुसार सर्वेक्षण में 22 में से 18 राज्यों में एक चौथाई बच्चे, कुपोषण के कारण, अविकसित है। यह कुपोषण सीधे सीधे, उन बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करता है। उम्मीद थी कि, इस बार के बजट में पोषण आदि के लिए कोई बड़ी राशि, आवंटित होगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की पूर्णिमा मेनन का कहना है कि,

“इस नए बजट में पोषण सेवाओं के लिए आवंटन में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं किया गया है, जो कि समस्यात्मक भी है क्योंकि आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवाएं) प्रारंभ के सालों में भी कई बच्चों तक नहीं पहुंची है। कुल मिलाकर, मैं बजट से आवंटन को पोषण संबंधी चुनौती की गंभीरता से जुड़ा हुआ नहीं देख पा रही हूं जो भारत के सामने है,”

पोषण और बच्चों के विकास के मुद्दे पर, अंबेडकर विश्वविद्यालय की प्राध्यापक दीपा सिन्हा का कहना है कि,

“पिछले कुछ सालों में, सरकार पहले से ही पोषण के लिए अपने दिए गए आवंटन को कम कर रही है और फिर भविष्य में अपने आवंटन में पर्याप्त वृद्धि नहीं कर रही है। हम पिछले कुछ सालों के अनुमानित संशोधित बजट से जानते है कि कई महिलाओं को उनके पोषण से संबंधित मातृत्व अधिकार नहीं मिल रहा है और आंगनबाड़ियों में घर का राशन कम स्तर पर मिल रहा है। इस कमी को बजट आंकड़े ही दर्शाते हैं । पोषण के नए सरकारी आंकड़ों और महामारी के तनाव का मतलब है कि “यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देशभर में पोषण का स्तर इस साल और भी खराब होगा”, जो कि पहले से ही विकट स्थिति को और बढ़ाएगा। यह साल बच्चों और परिवारों के लिए पोषण में धनराशि लगाने के लिए होना चाहिए था।”

मिशन पोषण 2.0 के लिए 20,105 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह योजना मौजूदा दो पोषण कार्यक्रमों का समावेश होगी, जो कि 112 आंकाक्षापूर्ण जिलों में पोषण परिणामों में सुधार करने के लिए लागू है। इससे पहले, “अम्ब्रेला एकीकृत बाल विकास सेवाओं” के तहत मातृक, बच्चे और किशोर के स्वास्थ्य से संबंधित अन्य भागों के साथ पोषण को भी शामिल किया गया है। जिसे अब बजट से हटा दिया गया है। पिछले बजटों में, इस भाग को 28,557 करोड़ रुपये (2020-21), 27,584.37 करोड़ (2019-20) और 23,088.28 करोड़ (2018-19) आवंटित किए गए थे। यह दर्शाता है कि 2021-22 में पोषण के लिए 20,105 करोड़ रुपये का आवंटन पिछले तीन सालों के आवंटन से कम है।मिड-डे मील योजना जो स्कूल जाने वाले बच्चों की पोषण की जरूरतों को पूरा करती है, उसे वर्तमान वित्तीय वर्ष (11,000 करोड़ रुपये) की तुलना में 2021-22 (11,500 करोड़ रुपये) में 500 करोड़ रुपये अधिक आवंटित किए गए है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लगभग 1160 लाख बच्चे मिड-डे मिल पर निर्भर करते है। यह सभी आंकड़े, इंडियास्पेंड के लेख से लिये गए हैं।

टीकाकरण एक बड़ी चुनौती है और भारत में अभी तक भारत बायोटेक, और सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के टीके उपलब्ध हैं। इसके लिये, सरकार ने 35,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। यह धनराशि, पूरे स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए बजट आवंटन की लगभग आधी है। पूरे बजट में से कोविड-19 के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को 11,756 करोड़ रुपये दिये गये हैं।

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के टीकाकरण की प्रक्रिया के लिए 360 करोड़ रुपये भी निर्धारित किए गए है। 23 अप्रैल को वैक्सीन की क़ीमतें प्रधानमंत्री की उपस्थिति में तय की गई थीं। ₹150, केंद्र सरकार के लिये, ₹400, राज्य सरकार के लिये और ₹600, निजी अस्पतालों के लिये तय किया गया और 25 अप्रैल को ही, सरकार ने वैक्सीन की क़ीमतें बढ़ा कर, राज्य सरकारों के लिये प्रति डोज ₹600, और निजी अस्पतालों के लिये ₹1200, कर दिया है। यह देश का पहला टीकाकरण अभियान नहीं है बल्कि टीबी, चेचक, पोलियो, मलेरिया आदि के रोकथाम के लिये सघन टीकाकरण अभियान पहले की सरकारों द्वारा निःशुल्क चलाये गए है। फिर आज सरकार क्यों नहीं सभी नागरिकों का मुफ्त टीकाकरण कर सकती है।

यह कौन सा सिस्टम है कि, जनस्वास्थ्य के लिये भी सरकार एक लोककल्याणकारी राज्य के स्थान पर एक व्यापारी की तरह पेश आ रही है ?

स्वास्थ्य कर्मियों और टीकाकरण के मूलभूत संसाधनों के लिये यह धनराशि कम है। ऐसा कहना है, पर्यवेक्षक अनुसंधान संस्था के स्वास्थ्य पहल के प्रमुख ओमन सी. कुरियन का। कुरियन के अनुसार,

“मैं उम्मीद कर रहा था कि सरकार बोर्ड में रिक्त पदों को भरने के ल्य। लिए पैसे लगाए, जिससे जमीनी स्तर पर लाभ के लिए अधिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को टीकाकरण का लाभ मिले। कोविड-19 वैक्सीन के लिए आवंटित 35,000 करोड़ रुपये वास्तविक वैक्सीन शॉट्स खरीदने के लिए लगते हैं, न कि स्वास्थ्य सेवा कर्मियों या टीकाकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक मूलभूत संरचना के लिए। ये स्वास्थ्यकर्मी वह सेना होगी जिसकी जरूरत हमें इस साल महामारी को हराने में पड़ेगी। यह अफ़सोस की बात है कि उन्हें कम वेतन दिया जाता है और अस्थायी रूप से काम पर रखा जाता है। इस महामारी ने दिखाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र को स्वास्थ्य सेवा का बोझ उठाना पड़ेगा। यह बजट इसे बेहतर तरीके से संबोधित कर सकता था।”

निश्चित रूप से स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की प्राथमिकता में कम ही रही है और सरकार ने निजी अस्पतालों को सस्ती ज़मीन और अन्य सुविधाएं तो दीं, पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं को धीरे धीरे उपेक्षित भी करती रहीं। इस महामारी काल मे, बजट में सरकार को अन्य खर्चो में कटौती कर के और वृद्धि करनी चाहिए।

अगर स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के सिस्टम की बात करें तो जिला अस्पतालों से लेकर पीएचसी तक बना हुआ सिस्टम, स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के दौर में बहुत प्रभावित हुआ। सरकार ने सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भर्तियां पूरी नहीं की, बहुत से नियमित पद भरे नहीं गए, जो भरे गए वे भी संविदा पर भरे गए। समय के अनुसार अस्पतालों को उच्चीकृत नहीं किया गया, और भ्रष्टाचार की समस्या तो है ही, पर बजाय भ्रष्टाचार पर कार्यवाही करने के उनको राजनीतिक संरक्षण दिया गया, और इसके लिये केवल वर्तमान सत्तारूढ़ दल ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दल दोषी है। उत्तर प्रदेश का एनआरएचएम घोटाला सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक उदाहरण है। पर ऐसे घोटालों से बचने के लिये सिस्टम को सुधारने की जिम्मेदारी भी तो सरकार की ही है। सिस्टम को सुधारने का कोई प्रयास किया ही नहीं गया।

सरकार ने अपने अस्पतालों को तो नीति आयोग की सिफारिश के अनुसार, पीपीपी मॉडल में डालने के लिये मन तो बना ही लिया है पर अब इस आपदा के बाद स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर की दुर्गति को देखते हुए, सरकार कोई नीतिगत बदलाव करती है या नहीं यह तो भविष्य में ही पता चल पाएगा। सरकार को लोककल्याण के सबसे महत्वपूर्ण अंग स्वास्थ्य के बारे में अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा अन्यथा किसी भी ऐसी आकस्मिक आपदा की स्थिति में एक अराजकता भरा माहौल पैदा हो सकता है। इसके लिये न केवल बजट में वृद्धि करनी होगी, बल्कि सरकार की प्राथमिकता में स्वास्थ्य को फिलहाल सबसे ऊपर और निजीकरण की व्याधि से मुक्त रखना होगा।

कोरोना की दूसरी लहर ने जो तबाही हमारे यहाँ, भारत मे मचायी है और यह तबाही अब भी मची हुयी है, पर उसने ऐसी तबाही हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार में नहीं मचाई है। इसका कारण क्या है ?

अगर हम स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर या सिस्टम की कमी की बात करें तो इन सभी देशों के मुकाबले हमारा हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर है। हालांकि अपनी तमाम कमियों के बावजूद भी कम से कम इन पड़ोसी देशों की तुलना में हमारे यहाँ स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर तो अधिक ही काम हुआ है। फिर क्या काऱण है कि हम बीस लाख करोड़ के कोरोना पैकेज और पीएम केयर्स फ़ंड में अच्छा खासा धन होने के बावजूद पिछले एक साल में, इस महामारी से नहीं लड़ सके ? या तो सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया या वह इस दूसरी लहर का पूर्वानुमान नहीं लगा पायी।

ऐसा लगता है कि पहली लहर में कोविड संक्रमण से हुयी मौतों, साल 2020 में हुए लॉक डाउन के समय महाविस्थापन से हुई कामगारों की मौतों और दुश्वारियों के बावजूद हम या तो आने वाली इस विपदा का आकलन नहीं कर पाए या हमारी सरकार का एजेंडा ही कुछ और था और हमने इस महामारी को हल्केपन से लिया।

आज जब आपदा ने पूरे देश को संक्रमित कर रखा है और श्मशान तथा कब्रिस्तान में हाउस फुल का बोर्ड लग गया है, टोकन से दाह संस्कार हो रहे हैं, सत्तारूढ़ दल के असरदार लोगों को भी अस्पताल में जगह नहीं मिल रही है, दवाओं, ऑक्सिजन और अन्य स्वास्थ्य उपकरणों की कालाबाज़ारी जम कर हो रही है, सोशल मीडिया के माध्यम से जाने अनजाने लोग, एक दूसरे की जो सम्भव हो मदद कर रहे हैं तो ऐसे में यह सरकार नामधारी तंत्र, सिवाय विज्ञापनों के, मंत्रियों और सत्तारूढ़ दल के नेताओ के ट्वीट में प्रधानमंत्री के प्रति आभार प्रदर्शन के, कहीं दिख नहीं रहा है। यह सिस्टम की विफलता है या सिस्टम को चलाने वालों की अक्षमता है ? सरकार केवल श्रेय ही नहीं ले सकती है। उसे राज्य की दुरवस्था का कलंक भी लेना होगा। अदम गोंडवी के शब्दों के कहें तो, फाइलों के गुलाबी मौसम से ज़मीन की तासीर बिल्कुल अलग हो गयीं है।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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