जानिए ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली क्वासार्स का रहस्य

space in hindi

हमारे अंतरिक्ष में अंतहीन दूरी में विस्तारित अति विशाल ब्रह्माण्ड सैकड़ों रहस्यों, रोमांचों और अद्भुत दृश्यों और संरचनाओं से परिपूर्ण है। पुच्छल तारे, क्षुद्र ग्रह, बगैर चंद्रमा वाली अंधेरी रात में तेजी से प्रकाश की एक रेखा बनाते सैकड़ों उल्का पिंड (Meteorite), शुद्ध हीरे से बने तारे (stars made of diamond), ब्लैक होल्स (black holes), नीहारिकाएं (nebulae), शनि जैसे ग्रह के चारों तरफ बने रंग-बिरंगे वलयों आदि सैकड़ों तरह की रोमांचक और अद्वितीय संरचनाएं हम मानवों के मनमस्तिष्क में एक अद्भुत रोमांच और कौतूहल जगा देतीं हैं ।

क्वासार्स की खोज (discovery of quasars)

अंतरिक्ष में हो रही सतत घटनाओं का गहन अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक ब्रह्मांड से जुड़े एक बड़े रहस्य को सुलझाने में अभी कुछ दिनों पहले कामयाबी हासिल कर ली है। इसी कामयाबी में हमारे ब्रह्माण्ड की सबसे शक्तिशाली जगह क्वासार्स या की एक अद्भुत खोज भी है।

इस अद्भुत खोज के लिए अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष शोधकर्ताओं ने एक सुपरकम्प्यूटर का इस्तेमाल किया।

इन अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार क्वासार्स गैसों की ये धाराएं एक अरब प्रकाश वर्ष के क्षेत्र में केवल एक दर्जन क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं।

पहला क्वासर कब पाया गया था? When was the first quasar found?

वैसे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने क्वासार्स खोज वर्ष 2003 में ही कर ली थी। उसके बाद से अब तक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा सुपरमैसिव ब्लैक होल्स में 200 से भी अधिक क्वासार्स (Quasars in Supermassive Black Holes) का पता लगाया जा चुका है। इनके बारे में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का कहना है कि ये ब्रह्मांड के बनने के बाद शुरू के एक अरब सालों के विस्तृत समयांतराल के बीच में ही बने थे।

क्वासार्स कितने विशाल और शक्तिशाली ?  (How big and powerful are quasars?) | What space scientists say about quasars?

 अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार क्वासार्स हमारे सूरज से एक लाख गुना ज्यादा द्रव्यमान वाले सुपर ब्लैक होल्स में बनते हैं, जहां पर ठंडी गैसों की शक्तिशाली धाराएं बहुत ही घनीभूत मात्रा में पाई जातीं हैं। यही नहीं क्वासार्स के बारे में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का कहना है कि ये क्वासार्स ब्रह्मांड में पाई जाने वाली कुछ सबसे शक्तिशाली चीजों में से एक हैं। क्वासार्स हमारी आकाशगंगा से अंतहीन दूरी पर स्थित गैलेक्सियों के केंद्र (center of galaxies) में मिलते हैं, जहां पर अरबों सूर्यों के द्रव्यमान के बराबर द्रव्यमान वाले सुपरमैसिव ब्लैकहोल्स मौजूद होते हैं।

ये ब्लैक होल्स अपने आसपास के पदार्थों के पास सरकने लगते हैं, जो ब्लैकहोल्स के पास आने के कारण घर्षण और दबाव से गर्म हो जाते हैं। इस तरह से जो उष्मा और इलेक्ट्रोमेग्नेटिक ऊर्जा निकलती है, वह क्वासार्स के माध्यम से ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी (electromagnetic energy) के रूप में बाहर छोड़ी जाती है।

इससे पूर्व वैज्ञानिकों को यह पता नहीं था कि शुरुआती ब्रह्मांड में ये क्वासार्स कैसे बने होंगे ?

अब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की शोधकर्ताओं की टीम ने यह पता लगाया है कि ये शुरुआती ब्रह्मांड में मौजूद दुर्लभ गैसों के भंडारों में पैदा हुई अस्त-व्यस्त परिस्थितियों के कारण बने होंगे।

ब्रह्मांड में पाए गए क्वासार्स (Quasars found in the universe) के बारे में अमेरिका के एक शहर पोर्ट्समाउथ स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ या University of Portsmouth के प्रोफेसर डॉक्टर डेनियल व्हेलन ने कहा है कि पहले यह सोच थी कि सुपरमैसिव ब्लैक होल्स ठंडे डार्क मैटर में होने वाले स्ट्रक्चर फॉर्मेशन का एक स्वाभाविक परिणाम थे – जिन्हें कॉस्मिक वेब के बच्चे (children of the cosmic web) कहा जाता है।

डॉक्टर व्हेलन इस टीम को लीड कर रहे थे, जिसने क्वासार्स के बनने का अध्ययन किया है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन और शोध को अभी पिछले दिनों इसी महीने के 6 जुलाई 2022को सुप्रतिष्ठित नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

निर्मल कुमार शर्मा

Know the secret of the universe’s most powerful quasars

जानिए धूमकेतु या पुच्छल तारे क्या हैं

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धूमकेतु या पुच्छल तारे के विषय में कुछ वैज्ञानिक तथ्य (Some scientific facts about comet or tail star in Hindi)

अंतरिक्ष के आंगन में हमारा सौरमंडल (Solar System in Hindi) और अधिक विस्तृत फलक में कहें तो हमारा पूरा ब्रह्माण्ड बहुत से आश्चर्यचकित कर देने वाले नजारों, पिंडों, तुच्छ ग्रहों, ग्रहों, उपग्रहों, तारों,  ब्लैकहोल्स, निहारिकाओं आदि से भरा पड़ा है। हमारे सौरमंडल में ही सूर्य की परिक्रमा कर रहे शनि नामक ग्रह के अति खूबसूरत वलय हमारी पूरी आकाशगंगा का एक अद्भुत, अद्वितीय,  अतुलनीय आकाशीय संरचना है। हमारे सौरमंडल में ही लगभग सभी गैस से बने अतिविशाल ग्रहों के अपने वलय हैं, लेकिन शनि के वलयों की खूबसूरती सबसे अप्रतिम और बेहद शानदार है, शनि के वलय सबसे स्पष्ट, चमकदार, जटिल और अद्भुत वलय हैं। शनि के चारों तरफ बने वलय इतने शाही और शानदार है कि शनि को सौर मंडल का आभूषण धारी ग्रह भी माना जाता है। अभी कुछ दिनों पूर्व खगोल वैज्ञानिकों ने लाखों प्रकाश वर्ष दूर एक ऐसे तारे की खोज किए थे, जो पूरा का पूरा तारा ही बेशकीमती हीरे से निर्मित है। ऐसे ब्लैकहोल्स की खोज हो चुकी है, जो अपनी पूरी निहारिका को ही निगलने को तैयार हैं। इसी क्रम में अंतरिक्ष में एक ऐसी अद्भुत आकाशीय संरचना दिखाई देती है, जिसे धूमकेतु या पुच्छल तारा या Comet in Hindi कहते हैं।

धूमकेतु आकाश में सबसे शानदार वस्तुओं में से एक हैं,  उनके चमकीले चमकते कोमा और उनके लंबे धूल से बनी आयनित पूंछ होती है। धूमकेतु किसी भी दिशा से अचानक ही प्रकट हो सकते हैं, जो रात्रि में दृश्यमान लाखों ग्रहों और तारों के बीच एक बहुत ही शानदार और दिलकश नज़ारा प्रस्तुत करते हैं। वे आकाश में कई महीनों तक के लिए एक शानदार और हमेशा अपनी स्थिति बदलते रहनेवाला अतुलनीय नजारा दर्शित कर सकते हैं क्योंकि धूमकेतु सूर्य के चारों ओर अपनी अत्यधिक विलक्षण और अजीबोगरीब कक्षाओं में घूमते रहते हैं।

धूमकेतु एक सौरमण्डलीय संरचना है जो पत्थर, धूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे पिंड होते हैं। ये भी सौरमंडल के अन्य सभी ग्रहों की तरह सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। छोटे पथ में परिक्रमा करने वाले धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा एक अण्डाकार पथ में करते हैं, ऐसे धूमकेतु अपनी परिक्रमा पूरी करने में 6 से 200वर्ष तक लगा देते हैं। लेकिन अत्यंत विस्तृत पथ वाले धूमकेतु सूर्य की एक परिक्रमा करने में हजारों वर्ष तक लगा देते हैं।

धूमकेतु भी एक ऐसे विशेष आकाशीय पिण्ड है जिनका केन्द्रीय भाग ठोस होता है और बाहरी भाग अत्यंत ठंडी जमी हुई गैंसों जैसे अमोनिया, मिथेन और जल वाष्प आदि से बना होता है। अधिकांश धूमकेतु अपने परिक्रमण काल का ज्यादातर समय सूर्य से बहुत दूर रहते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं।

धूमकेतुओं की सौरमंडल में स्थिति  (position of comets in the solar system)

अधिकांश धूमकेतु का द्रव्यमान (mass of comet) बहुत ही कम होता है। इनका द्रव्यमान इतना कम होता है कि वह हमारी धरती के द्रव्यमान का एक अरब वाँ भाग तक भी हो सकता है।

खगोल वैज्ञानिकों द्वारा आज के आधुनिकतम् उपकरणों की मदद से अब तक लगभग 1000 धूमकेतुओ को देखा जा चुका है।

ब्रह्माण्ड में कितने धूमकेतु हैं?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सौरमंडल और पूरे ब्रह्माण्ड में धूमकेतुओं की संख्या (number of comets in the universe) 100 अरब से भी ज्यादा हो सकती है। अधिकांश धूमकेतुओं की कक्षाएं हमारे सौरमंडल के सबसे बाहरी ग्रह की कक्षा के भी बाहर है। उदाहरणार्थ वरुण ग्रह हमारे सौर मण्डल में सूर्य से दूरी के क्रम में ज्ञात आठवाँ दूरस्थ ग्रह है, जो सूर्य से 4अरब 49करोड़ 50लाख किलोमीटर दूर है, इस हिसाब से अधिकांश धूमकेतुओं के परिक्रमा पथ हमारे सूर्य से लगभग 5अरब किलोमीटर के बाहर ही हैं।

धूमकेतु बहुल इस अंतरीक्षीय क्षेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ऊर्ट क्लाउड या Oort Cloud कहते हैं। इतनी असीमित दूरी की वजह से ये धूमकेतु सामान्यत: हमारी धरती पर से नंगी आंखों से या सामान्य दूरबीन से भी देखे ही नहीं जा सकते हैं।

धूमकेतु की पूंछ कैसे बनती है ?  | How is the tail of a comet formed?

silhouette of grass during starry night
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 एक वैज्ञानिक तथ्य यह है कि जब वे सूर्य से बहुत अधिक दूरी पर होते हैं, तब इनकी पूंछ विलुप्त हो जाती है,  इस स्थिति में ये आंखों तथा दूरदर्शी यंत्रों की नजर से भी अदृश्य हो जाते हैं। लेकिन जब ये सूर्य के निकट आते हैं तब सूर्य के भीषण तापमान की वजह से इन पर उपस्थित  पदार्थ वाष्पीकृत होने लगता है। तब यही वाष्पित पदार्थ सूर्य से परे धूमकेतु की पूंछ के रूप में दिखाई देने लगता है। जैसै-जैसे इनकी सूर्य से निकटता बढ़ती है, इनके पदार्थ का वाष्पीकरण उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है। फलस्वरूप इनकी पूँछ की लम्बाई भी बढ़ती चली जाती है। इस पूँछ के कारण ही धूमकेतु पुच्छल तारे कहलाते हैं।

अधिकांश धूमकेतु हमें तभी दिखाई देते हैं, जब वे सूर्य के निकट होते हैं, क्योंकि इस स्थिति में वे हमारी धरती के भी सर्वाधिक निकट होते हैं। तभी ये सबसे लम्बी पूंछ वाले भी रहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी धूमकेतु की पूंछ अरबों किलोमीटर तक लम्बी हो सकती है।

सौरमंडल के आदिम पदार्थों से बने पिंड हैं धूमकेतु

आधुनिक खगोल और भौतिक तथा रासायनिक वैज्ञानिकों के अनुसार धूमकेतुओं का निर्माण प्रारम्भिक सौर मंडल के निर्माण से बचे हुए आदिम पदार्थों से बना हुआ है। क्योंकि इस सौरमंडल के सूर्य सहित सभी ग्रहों का निर्माण भी आदिम अवस्था में आकाश गंगा (Galaxy) नामक निहारिका में उपस्थित धूल और गैस से ही हुआ है,  धूमकेतुओं का निर्माण भी उसी धूल और गैस से हुआ है। इसीलिए वैज्ञानिकों के लिए धूमकेतु सौरमंडल की आदिम अवस्था के अध्ययन के लिए एक सबसे बेहतर नमूने हैं। ये एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं, क्योंकि धूमकेतुओं में उपस्थित पदार्थों के गहन रासायनिक विश्लेषण से इस बात की बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं कि हमारे सौरमंडल बनने के समय उस समय कौन-कौन से मूल पदार्थ रहे थे।

चूंकि धूमकेतु सौर निहारिका के बाहरी क्षेत्रों में बनते हैं जहाँ का तापमान वाष्पशील बर्फ को संघनित करने के लिए पर्याप्त ठंडा है।

धूमकेतुओं की कक्षा बृहस्पति ग्रह की कक्षा से भी दूर है,  इसलिए वे सौर मंडल में बड़े पिंडों को पिघलाने या बदलने वाली कुछ संशोधित प्रक्रियाओं से अवश्य गुजरे होंगे। इस प्रकार वे प्राथमिक सौर निहारिका और ग्रह प्रणालियों के निर्माण में शामिल प्रक्रियाओं का एक भौतिक और रासायनिक रिकॉर्ड बनाए रखे हो सकते हैं।

इस धरती पर जीवन धूमकेतुओं द्वारा ही लाया गया है।

वैज्ञानिकों ने धूमकेतुओं के टुकड़ों के अध्ययन से पाया है कि इनमें हाइड्रोकार्बन यौगिक (hydrocarbon compound) भी मौजूद हैं। ये वही केमिकल होते हैं जो जीवन का आधार माने जाते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के एक विश्वविद्यालय मिनेसेटा के शोध वैज्ञानिकों ने एक शोध से यह निष्कर्ष निकाला है कि  सौरमंडल बनने के शुरूआती दिनों में हमारी पृथ्वी और मंगल पर एक धूमकेतु जीवन की सारी परिस्थितियों को लेकर आया।

हाल ही में हुए बहुत से वैज्ञानिक शोधों ने इस धारणा को बहुत मजबूत किया है कि हमारी धरती पर जीवन की शुरुआत किसी धूमकेतु से लाए गए जीवन के परमावश्यक तत्व के इस धरती पर आने के बाद ही शुरू हुआ है।

वैज्ञानिकों के अनुसार अत्यधिक गर्म चट्टानों पर पानी गिरने से दोनों के बीच रासायनिक क्रिया हुई और एक जटिल कार्बनिक अणु का निर्माण हुआ। इस खोज के लिए शोधकर्ताओं ने उस विशेष घाटी के तत्वों को लेकर उसके रासायनिक व कार्बन समस्थानिक का गहन अध्ययन किया।

धूमकेतु की आंतरिक संरचना structure of comet in Hindi

comet in starry sky
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धूमकेतुओं के पांच भाग होते हैं। प्रथम मुख्य भाग जिसे नाभिक या Nucleus कहते हैं यह एक ठोस पिंड होता है, यह भाग धूमकेतु का मुख्य भाग होता हैं, यह आमतौर पर कुछ किलोमीटर व्यास तक का बना होता है, इसकी रचना बर्फ, गैस, सिलिकेट और कार्बनिक धूल कणों के मिश्रण से बनी होती है। दूसरा हाइड्रोजन के बादल होते हैं, तीसरा धूल का गुबार, चौथा कोमा जो पानी, कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरे गैसों के मिश्रण से बने घने बादलों के समूह होते हैं, कोमा नाभिक के चारों ओर स्वतंत्र रूप से भागने वाला वातावरण है जो तब बनता है जब धूमकेतु सूर्य के करीब आता है और वाष्पशील बर्फ अपने साथ धूल के कणों को ले जाती है और पांचवां आयन टेल + डस्ट टेल अर्थात पूंछ जो सूर्य के संपर्क में आने पर ही निर्मित होती है।

एक लंबी घुमावदार पूंछ बनाने के लिए सौर विकिरण दबाव जो आमतौर पर सफेद या पीले रंग का होता है। कोमा में वाष्पशील गैसों से आयन टेल बनते हैं,  जब वे सूर्य से पराबैंगनी फोटोन द्वारा आयनित होते हैं और सौर हवा द्वारा उड़ा दिए जाते हैं।

आयन टेल्स सूर्य से लगभग बिल्कुल दूर इंगित करते हैं और CO + आयनों की उपस्थिति के कारण ये खूबसूरत नीले रंग में चमकते हैं।

क्या आप जानते हैं एक धूमकेतु ने ही डायनोसोरों का सर्वनाश किया था?

भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व इस धरती के सबसे दैत्याकार छिपकलियों जिन्हें डायनासोर कह देते हैं उनके समेत इस धरती के 70 प्रतिशत अन्य स्तनधारी जीव-जंतुओं का सर्वनाश करने वाला आकाशीय पिंड उल्का पिंड नहीं अपितु एक बड़ा धूमकेतु ही था। उसने धरती से तीव्र गति से टकराकर उस समय के सभी भूमि की सतह पर रहनेवाले और विशालकाय डायनोसोर सरीखे जीव जंतुओं का सफाया कर दिया था।

 कुछ प्रसिद्ध धूमकेतुओं का क्रमबद्ध विवरण (famous comets in Hindi)   
  • हैली धूमकेतु Halley’s Comet-

इस सुप्रसिद्ध धूमकेतु को सुविख्यात ब्रिटिश खगोलशास्त्री एडमंड हेली ने सन 1682 में खोजा था और उन्होंने अपने जीवन काल में ही सटीक गणना करके इसके वर्ष 1752 में दिखाई दिए जाने की भविष्यवाणी भी कर दी थी, हेली का धूमकेतु 75 साल में एक बार दिखाई देता है आखिरी बार यह सन 1986 में दिखाई दिया था।

  • शोमेकर लेवी Shoemaker Levy Comet –

यह धूमकेतु वर्ष 1992 में बृहस्पति ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर उस पर गिरकर उससे टकराकर 21 टुकड़ों में बिखरकर नष्ट हो गया था।     

  • हयाकुताके धूमकेतु Hyakutake Comet –

यह धूमकेतु सन 1996 में पृथ्वी के पास से गुजरा था इस धूमकेतु की बहुत धुंधली पूंछ थी,  इस धूमकेतु का परिक्रमा कल 9000 साल का होता है,  इस धूमकेतु ने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया था, क्योंकि इसमें से एक्सरे किरणें निकलती हुई दिखाई दीं थीं।   

  • हेल बोप्प धूमकेतु Hale Bopp Comet –

हेल बोप्प धूमकेतु वर्ष 1997 में पृथ्वी से दिखाई दिया, यह धूमकेतु 4000 वर्षों में हमारी पृथ्वी से केवल एक बार दिखाई देता है। यह धूमकेतु हेली के धूमकेतु से भी अधिक चमकीला दिखनेवाला धूमकेतु है।  

  • बोरेल्ली धूमकेतु Borrelly Comet –

हेली धूमकेतु के 12 वर्ष बाद नासा के वैज्ञानिकों ने Borrelly धूमकेतु का गहन अध्ययन किया, नासा ने अपना अंतरिक्ष यान डीप स्पेस 9 को इस धूमकेतु के पास भेजा था।

  • इन्के धूमकेतु Encke Comet –

इन्के धूमकेतु की खोज वर्ष 1819 में जर्मन खगोल शास्त्री जोहान फ्रैंज इन्के Johann Franz Encke ने की थी। इन्के धूमकेतु की वजह से ही हर वर्ष अक्टूबर और नवंबर के महीने में टोरिड उल्का बौछार या  Taurid Meteor Shower दिखाई देते हैं।

  • टेम्पल टटल धूमकेतु Tempel-Tuttel Comet –

इस धूमकेतु द्वारा छोड़े गए कणों से भी हमें प्रतिवर्ष टोरिड उल्का बौछार या  Taurid Meteor Showers दिखाई देते हैं,  वास्तविक में ये उल्का छोटे-छोटे धूल के कण होते हैं जो कि पृथ्वी के वायुमंडल में आकर जलते हैं और हमें टूटते हुए तारों के रूप में दिखाई देते हैं।

  • वाइल्ड-2 धूमकेतु Wild-2 Comet  

वाइल्ड-2 धूमकेतु का अध्यन नासा के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2004 में किया था। नासा का एक अंतरिक्ष यान इस धूमकेतु से सिर्फ 236 किलोमीटर की दूरी से गुजरा था तथा इस धूमकेतु के कई बेहतरीन तस्वीरों को खींचकर उसे पृथ्वी पर भेजा था।  इस अंतरिक्ष यान ने पहली बार किसी धूमकेतु के धूल कणों के नमूने इकट्ठे किए थे।  

  • टेंपल-1 धूमकेतु  Tempel-1 Comet –

वर्ष 2005 के एक जुलाई को नासा के डीप इंपैक्ट अंतरिक्ष यान ने टेंपल -1 नामक इस धूमकेतु पर एक वाशिंग मशीन के आकार का एक गोला, जो कि इस धूमकेतु की सतह से 37000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जा टकराया था, छोड़ा था। इस जोरदार टक्कर से टेंपल-1 धूमकेतु पर एक फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा एक क्रेटर बन गया था।

  • चुर्युमोव गेरासिमेन्को धूमकेतु  Churyumov-Gerasimenko Comet

यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपना प्रसिद्ध Rosetta Space Probe नामक अंतरिक्ष यान को चुर्युमोव गेरासिमेन्को धूमकेतु की सतह पर उतारा है,  इस धूमकेतु की लंबाई 5 किलोमीटर है तथा यह सूर्य की एक परिक्रमा लगभग साढे 6 वर्षों में करता है।

जानिए  अभी तक का सबसे बड़ा धूमकेतु कौन सा है?

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हाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अब तक के सबसे बड़े धूमकेतु का पता लगाया है।  खगोल वैज्ञानिकों ने इस धूमकेतु का नाम C/2014 UN271 रखा है। वैज्ञानिकों द्वारा यह धूमकेतु सबसे पहले 2010में भी देखा गया था। उस समय यह सूर्य से 4.82 अरब किमी की दूरी पर था और सौर मंडल के किनारे से अपने केंद्र की ओर लौट रहा था।

C/2014 UN271 का द्रव्यमान अन्य धूमकेतुओं की तुलना में 100,000 गुना बड़ा है जो इस तरह के धूमकेतु आमतौर पर सूर्य के करीब पाए जाते हैं।        

अब तक का सबसे बड़ा यह धूमकेतु 35, 405 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा है। इस धूमकेतु का द्रव्यमान करीब 500 ट्रिलियन टन है और इसका बर्फीला नाभिक 128 किमी चौड़ा है, जो अन्य ज्ञात धूमकेतुओं के केंद्रों से 50 गुना बड़ा है।

अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार हमारी धरती के लोगों को इस धूमकेतु से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह सूर्य से करीब 1.60 अरब किमी से अधिक नजदीक आकर पुनः अंतरिक्ष की असीम गहराइयों में अंतर्धान हो आएगा। इस विशाल धूमकेतु को हबल टेलीस्कोप ने ढूंढा।

अंतरिक्ष की अंतहीन गहराइयों में हबल जैसे शक्तिशाली टेलस्कोप द्वारा नजर गड़ाए रखने वाले वैज्ञानिक तभी से इसकी निगरानी कर रहे हैं। उनका मानना है कि 2031 में इसकी यात्रा हमसे शनि जितनी दूर स्थित एक बिंदु पर जाकर खत्म हो जाएगी।

इस पर नजर रखने वाले वैज्ञानिक जानते थे कि यह विशाल कॉमेट है लेकिन इसके विशालकाय आकार का अनुमान हबल स्पेस टेलिस्कोप द्वारा ली गई तस्वीरों से लगा है।

धूमकेतुओं के आकार का पता लगाना (Finding out the size of comets) बेहद मुश्किलभरा काम होता है क्योंकि इनके चारों ओर धूल के ढेर सारे कण होते हैं जिसके चलते इन्हें देख पाना बेहद मुश्किल काम होता है। लेकिन धूमकेतु के केंद्र में चमकीले बिंदु को गौर से देखने पर और कंप्यूटर मॉडल्स का इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों ने इसका पता लगा लिया है। यह कॉमेट अरबों साल पुराना है और हमारे सौर मंडल के शुरुआती दिनों का अवशेष है।

निर्मल कुमार शर्मा

‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक, सामाजिक,  राजनैतिक, पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र,  निष्पक्ष, बेखौफ,  आमजनहितैषी, न्यायोचित व समसामयिक लेखन।

Know what are comets or tail stars in Hindi.

सुदूर ब्रह्माण्ड की गैलेक्सीज के तारे हमारी पूर्व धारणाओं से कहीं बहुत अधिक बड़े

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The stars in the galaxies of the distant universe are much larger than we previously thought

सुदूर गैलेक्सीज के तारे कैसे दिखाई देते हैं, लंबे समय से यह इंसानों के अध्ययन के प्रिय विषयों में शामिल रहा है। पिछले 67 सालों से यही धारणा रही है कि ब्रह्माण्ड की असीमित गहराइयों में सुदूर गैलेक्सीज में स्थित तारों का संयोजन ठीक हमारी गैलेक्सी के अरबों तारों की तरह ही है। लेकिन डेनमार्क की कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के नील्स बोहर संस्थान के खगोलविदों (Astronomers from the Niels Bohr Institute of the University of Copenhagen) और शोधकर्ताओं ने सूदूर अंतरिक्ष में अवस्थित गैलेक्सीज में स्थित तारों के बारे में शोधकर यह बताया है कि सुदूर अंतरिक्ष स्थित गैलेक्सीज में स्थित तारे हमारी पूर्व धारणाओं के विपरीत आकार में बहुत ही विशाल और द्रव्यमान में बड़े हैं।

New discovery about distant galaxies: Stars are heavier than we thought (दूर की आकाशगंगाओं के बारे में नई खोज : तारे हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा भारी हैं)

इन खगोल वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं तथा भौतिकविदों की टीम का यह शोध पत्र “Implications of a Temperature-dependent Initial Mass Function. I. Photometric Template Fitting” सुप्रतिष्ठित एस्ट्रोफिजिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

वैज्ञानिक जगत में भी अभी तक यही माना जाता था कि सुदूर अंतरिक्ष में स्थित गैलेक्सी में तारों का वितरण और विन्यास ठीक हमारी गैलेक्सी में स्थित तारों की ही तरह है, लेकिन नए अध्ययन ने इसे खारिज कर दिया है।

इस खोज से बहुत सी घारणाएं बदलेंगी तो कई अनसुलझे और अनुत्तरित सवालों के जवाब भी मिल सकेंगे।

वैज्ञानिकों द्वारा तारों से संबंधित नए अध्ययन (New studies related to stars) ने इस धारणा को तोड़ा है कि हमारी मिल्की वे गैलेक्सी (Milky Way Galaxy) से बाहर स्थित सूदूर स्थित गैलेक्सीज Too Much Distant Galaxies के तारे हमारी गैलेक्सी से कहीं बहुत-बहुत विशाल और आकार तथा द्रव्यमान में भी बहुत भारी और बड़े हैं।

ब्रह्माण्ड के विषय में जानकारी (information about the universe)

हमारे खगोलविदों के पास ब्रह्माण्ड (Universe) के विषय में ऐसी बहुत सी अधूरी जानकारी है जिसे प्रमाणित होना अभी भी शेष है। जैसे-जैसे वैज्ञानिक तौर पर नए और उन्नत उपकरण आविष्कृत होते जा रहे हैं, हमारे वैज्ञानिकों की जानकारी के आंकड़ों में भी क्रमशः सुधार होता जा रहा है। नये-नये हब्बल और जेम्स वेब दूरदर्शियों जैसे अतिशक्तिशाली दूरदर्शियों के निर्माण होने से सुदूर अंतरिक्ष स्थित कुछ तारों, निहारिकाओं और ब्लैकहोल्स की दूरियों, उनके आकार तथा उनकी बनावट को नये सिरे से निर्धारण और मापन भी होता जा रहा है तो कुछ नए पिंड और ब्लैक होल्स के निर्माण, सुपरनोवा और गैलेक्सीज के अंत जैसी परिघटनाओं को भी देख पाना अब संभव हो पा रहा है।

ऐसे ही एक शोध में वैज्ञानिकों को सुदूर गैलेक्सी के तारों या के बारे में (Too Much Distant Galaxies) पता चला है कि उनके तारों का अब तक जितना भार (Mass of Stars) समझा रहा था वे उससे कहीं बहुत ज्यादा भारी और विशाल हैं।

वैज्ञानिकों ने अब तक कितने गैलेक्सीज खोजे हैं?

हब्बल और अन्य दूसरे जेम्स वेब जैसे आधुनिकतम् टेलीस्कोप्स की मदद से खगोल वैज्ञानिक अब तक ब्रह्माण्ड में फैली 14 लाख गैलेक्सियों को ढूंढ चुके हैं। वैज्ञानिकों ने अपने शोध में यह भी पता लगाया कि सुदूर स्थित गैलेक्सी के केवल विशाल तारों का ही प्रकाश हमारी धरती पर आ पाता है। अन्य छोटे तारों का प्रकाश हमारी धरती पर पहुंच ही नहीं पाता या इतना धुंधला पहुंचता है, जिसको हमारी आंखें देख ही नहीं पातीं।

पुरानी धारणाओं को ध्वस्त कर देंगे नये शोध के परिणाम

हाल ही में इस नई खोज के परिणामों का ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी सोच और हमारी पूर्वधारणाओं पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा।

इस अध्ययन के प्रथम लेखक और नील बोर इंस्टीट्यूट के स्नातक छात्र अल्बर्ट स्नेपेन (Albert Sneppen) ने बताया कि तारों के भार से बहुत सारी जानकारी मिलती है जो नई जानकारी से बदल जाएगी।

अल्बर्ट स्नेपेन ने बताया कि यदि आप किसी तारे के भार में बदलाव करते हैं तो निश्चित रूप से आपको उस तारे से निकले सुपरनोवा और ब्लैक होल की संख्याओं (Supernova and Black Hole Numbers) को भी बदलना पड़ेगा।

इस शोध का मतलब यही है कि हमें अब बहुत सारी चीजों और अपने पूर्व स्थापित सिद्धांतों को भी बदलना पड़ सकता है, जिनके बारे में हमने कभी पहले से अनुमान लगा लिया था क्योंकि सुदूर गैलेक्सीज बहुत ही अलग दिखाई देती हैं।

अतिशक्तिशाली टेलीस्कोप की अभी तक भारी कमी थी

विगत कई वर्षों से शोधकर्ता यह मान कर चल रहे ते कि दूसरी गैलेक्सीज में तारों का आकार और भार हमारी गैलेक्सी यानी हमारी आकाशगंगा की ही तरह होता होगा। इसकी एक सीधी सी वजह यह थी कि उस समय हमारे पूर्वज वैज्ञानिक अपने पुराने और साधारण क्षमता वाले टेलीस्कोप से सुदूर स्थित गैलेक्सीज के तारे देख ही नहीं पाते थे जैसे वे अपने गैलेक्सी के तारे देखते थे। दूसरी गैलेक्सीज अंतरिक्ष में अरबों प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं, इसका प्रतिफल यह है कि उन गैलेक्सीज में स्थित केवल शक्तिशाली और अतिविशाल तारों की ही रोशनी पृथ्वी तक आ पाती है।                                           

विशाल आकाशगंगाएँ पहले मरती हैं (Massive galaxies die first)

शोधकर्ताओं के अनुसार, नई खोज के व्यापक प्रभाव होंगे। उदाहरण के लिए, यह अनसुलझा है कि आकाशगंगाएँ क्यों मरती हैं और नए तारे बनाना बंद कर देती हैं। नया परिणाम बताता है कि इसे एक साधारण प्रवृत्ति द्वारा समझाया जा सकता है।

नये शोधकर्ताओं का कहना है कि सूदूर अंतरिक्ष में स्थित तारों के बारे में हम अंधेरे में तीर चलाने जैसे खोज करने का प्रयास करते रहे हैं जैसे हम बहते हुए हिमखंड का केवल उसके शीर्ष को ही देखकर उसे ही हम उसके आकार-प्रकार का अंदाजा लगा लेते थे। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि समुद्र में तैरते हिमखंड का केवल 1/10 भाग ही सतह के ऊपर दिखता है, जबकि उसका 9/10 वाला विशाल आकार वाला भाग समुद्र के पानी में रहता है,जो हमारी आंखों से सदा ओझल ही रहता है।

निर्मल कुमार शर्मा

‘गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण तथा पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक, सामाजिक,आर्थिक, पर्यावरण तथा राजनैतिक विषयों पर सशक्त व निष्पृह लेखन’

मंगल पर होंगे भवन-निर्माण, भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगल की मिट्टी से बनाई ‘अंतरिक्ष ईंट’

space bricks

IISc and ISRO scientists made ‘space bricks’ to build buildings on Mars

नई दिल्ली, 21 अप्रैल: मंगल पर भविष्य में बस्तियां बसाने और लाल ग्रह पर निर्माण की संभावनाओं की तलाश (Exploring the possibilities of building on the Red Planet) में दुनियाभर के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। इस दिशा में कार्य करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों को एक नयी सफलता मिली है। वैज्ञानिकों ने मंगल पर बस्तियां बसाने में उपयोगी ‘अंतरिक्ष ईंट’ बनाने के लिए बैक्टीरिया आधारित एक विशिष्ट तकनीक विकसित की है, जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर इस तरह की ईंट बनाने में हो सकता है।

आईआईएससी और इसरो के वैज्ञानिकों ने बनाई है अंतरिक्ष ईंट

बेंगलूरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने ‘अंतरिक्ष ईंट’ बनाने के लिए मंगल की सिमुलेंट सॉयल (एमएसएस) यानी प्रतिकृति मिट्टी और यूरिया का उपयोग किया है।

इन ‘अंतरिक्ष ईंटों’ का उपयोग मंगल ग्रह पर भवन जैसी संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जा सकता है, जो लाल ग्रह पर मानव को बसने की सुविधा प्रदान कर सकते हैं। आईआईएससी के वक्तव्य में यह जानकारी प्रदान की गई है।

इन ‘अंतरिक्ष ईंटों’ को बनाने की विधि को शोध पत्रिका प्लॉस वन में प्रकाशित एक अध्ययन में रेखांकित किया गया है। सबसे पहले मंगल की मिट्टी को ग्वार गम, स्पोरोसारसीना पेस्टुरी (Sporosarcina pasteurii) नामक बैक्टीरिया, यूरिया, और निकल क्लोराइड (NiCl2) के साथ मिलाकर एक घोल बनाया जाता है। इस घोल को किसी भी आकार के सांचों में डाला जा सकता है, और कुछ दिनों में बैक्टीरिया; यूरिया को कैल्शियम कार्बोनेट के क्रिस्टल में बदल देते हैं। ये क्रिस्टल, बैक्टीरिया द्वारा स्रावित बायोपॉलिमर के साथ, मिट्टी के कणों को एक साथ बाँधे रखने वाले सीमेंट के रूप में कार्य करते हैं।

इस पद्धति का एक लाभ ईंटों की कम सरंध्रता है, जिसे अन्य तरीकों से प्राप्त करना समस्या रही है, जो कि मंगल की मिट्टी को ईंटों में समेकित करने के लिए उपयोग की जाती है। आईआईएससी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता आलोक कुमार कहते हैं, “बैक्टीरिया अपने स्वयं के प्रोटीन का उपयोग करके कणों को एक साथ बाँधते हैं, संरध्रता को कम करते हैं, और मजबूत ईंटों का निर्माण करने में मदद करते हैं।”

चाँद की मिट्टी से ईंटें बना चुके हैं शोधकर्ता

शोधकर्ताओं ने इसी तरह की विधि का उपयोग करके, चाँद की मिट्टी से ईंटें बनाने पर काम किया था। हालांकि, पिछली विधि केवल बेलनाकार ईंटों का उत्पादन कर सकती थी, जबकि वर्तमान स्लरी-कास्टिंग विधि जटिल आकार की ईंटों का उत्पादन भी कर सकती है। स्लरी-कास्टिंग विधि (slurry-casting method,) को आईआईएससी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर कौशिक विश्वनाथन की मदद से विकसित किया गया है, जिनकी प्रयोगशाला उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं पर काम करती है।

प्रोफेसर कुमार बताते हैं कि “मंगल ग्रह की मिट्टी का इस विधि में उपयोग करना चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि लाल ग्रह की मिट्टी (red planet soil) में बहुत अधिक आयरन होता है, जो जीवों के लिए विषाक्तता का कारण बनता है। आरंभ में बैक्टीरिया बिल्कुल नहीं पनपते थे। मिट्टी को बैक्टीरिया के लिए अनुकूल बनाने के लिए निकल क्लोराइड (nickel chloride) जोड़ना महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।”

मंगल ग्रह का वातावरण पृथ्वी के मुकाबले कैसा है?

शोधकर्ताओं की योजना मंगल के वायुमंडल और कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव की जांच ‘अंतरिक्ष ईंटों’ की मजबूती पर करने की है। मंगल ग्रह का वातावरण पृथ्वी के वायुमंडल की तुलना में 100 गुना पतला है, और इसमें 95% से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड है, जो बैक्टीरिया के विकास को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है।

शोधकर्ताओं ने मार्स (मार्शियन एटमॉस्फियर सिमुलेटर) नामक एक उपकरण का निर्माण किया है, जिसमें एक कक्ष होता है, जो प्रयोगशाला में मंगल ग्रह पर पायी जाने वाली वायुमंडलीय स्थितियों को उत्पन्न करता है।

शोधकर्ताओं ने एक लैब-ऑन-ए-चिप डिवाइस भी विकसित किया है, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण स्थितियों में जीवाणु गतिविधि को मापना है।

आईआईएससी में डीबीटी-बायोकेयर फेलो, और अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता रश्मि दीक्षित बताती हैं, “निकट भविष्य में सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण स्थितियों में प्रयोग करने के हमारे इरादे को ध्यान में रखते हुए डिवाइस को विकसित किया जा रहा है।”

इसरो की मदद से टीम ने ऐसे उपकरणों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना बनायी है, ताकि वे बैक्टीरिया के विकास पर कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का अध्ययन कर सकें।

प्रोफेसर कुमार कहते हैं,

“मैं बहुत उत्साहित हूँ कि दुनियाभर के कई शोधकर्ता दूसरे ग्रहों को उपनिवेश बनाने के बारे में सोच रहे हैं। हालांकि, यह जल्दी नहीं हो सकता है, लेकिन, लोग सक्रिय रूप से इस पर काम कर रहे हैं।”

(इंडिया साइंस वायर)

चीन इस वर्ष इस साल अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण पूरा करेगा

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China will complete the construction of the space station this year

नई दिल्ली, 18 अप्रैल 2022. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (space technology) में लंबी छलांग लगाते हुए चीन इस वर्ष के अंत तक अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण पूरा करेगा।

चीन राज्य नियंत्रित मीडिया CMG Hindi की फेसबुक पोस्ट के मुताबिक चीनी राज्य परिषद के प्रेस दफ्तर से मिली जानकारी के मुताबिक 2022 में चीन अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण को पूरा करेगा।

CMG Hindi ने चीनी मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम कार्यालय के प्रमुख हाओ छ्वन के हवाले से इस पोस्ट में बताया है कि चीनी अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण कुंजीभूत तकनीक परीक्षण और निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। अहम तकनीक परीक्षण के चरण में अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और प्रचलन की संबंधित अहम तकनीक की व्यापक जानकारी हासिल करना प्रमुख मिशन है। 2020 से चीन ने लांग मार्च-5बी वाहन रॉकेट को पहली बार लांच किया। फिर अंतरिक्ष स्टेशन के थ्येन ह मुख्य मॉड्यूल, शनचो-12 और शनचो-13 मानव अंतरिक्ष यान थ्येनचो-2 और थ्येनचो-3 मालवाहक अंतरिक्ष यान की उड़ानें पूरी हुईं। इन सभी ने अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण के लिए कुंजीभूत तकनीक परीक्षण के लक्ष्य को पूरा किया है।

पूरे वर्ष चीन अंतरिक्ष में छह उड़ानें पूरी करेगा

हाओ छ्वन ने कहा कि इस साल चीन अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण को अच्छी तरह पूरा करेगा। पूरे साल चीन छह उड़ानें पूरी करेगा, जिनमें थ्येनचो-4 और थ्येनचो-5 मालवाहक अंतरिक्ष यान, शनचो-14 और शनचो-15 मानव अंतरिक्ष यान, वनथ्येन प्रायोगिक केबिन और मंगथ्येन प्रायोगिक केबिन का लांच शामिल है।

चीनी अंतरिक्ष स्टेशन विदेशी अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करता है

एक अन्य फेसबुक पोस्ट में बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के प्रति चीन के रवैये के बारे में सवालों के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वनपिन ने 18 अप्रैल को आयोजित एक नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अंतरिक्ष विकास की प्रवृत्ति है, और चीनी अंतरिक्ष स्टेशन (chinese space station) विदेशी अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करता है।

उन्होंने कहा कि चीन की मानवयुक्त अंतरिक्ष परियोजना (manned space project) के शुभारंभ के बाद से उसने शांतिपूर्ण उपयोग, समानता और पारस्परिक लाभ, और समान विकास के सिद्धांतों का पालन किया है, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस, पाकिस्तान, अंतरिक्ष मामलों पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (United Nations Office on Space Affairs), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों व संगठनों के साथ सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, सहयोग परियोजनाओं के विभिन्न रूपों को लागू किया है, और उपयोगी सहयोग परिणाम प्राप्त किए हैं।

प्रवक्ता वांग वनपिन ने कहा कि चीन वर्तमान में अंतरिक्ष मामलों पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सहयोग से चीनी अंतरिक्ष स्टेशन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग परियोजनाओं के पहले बैच के कार्यान्वयन का आयोजन कर रहा है, और उम्मीद है कि इस साल के अंत में प्रायोगिक अनुसंधान किया जाएगा।

जानिए क्या होती है उल्कापिंडों की बरसात

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Meteor Shower in Hindi (उल्का वर्षा)

उल्का वर्षा उल्काओं की प्राकृतिक स्थिति है। ऐसा होना हमेशा तो नहीं होता लेकिन जब भी होता है, दृश्य काफी मनोहारी और विचित्र होता है। कुछ समय पूर्व लियोनिड उल्का की बरसात (Leonid Meteor Shower, लियोनिड उल्का बौछार) की चर्चा जोरों पर थी। लोग लियोनिड उल्का बौछार के बारे में जानकारी (Information about the Leonid meteor shower in Hindi) ज्यादा से ज्यादा एकत्र करना चाहते हैं।

क्या होती है लियोनिड उल्का की बरसात (Leonids Meteor shower)

लियोनिड उल्का की बरसात इससे पहले भी होती रही है। 1998 से 2002 के बीच इस चमत्कारी उल्का ने अपने पूरे जलवे दिखाए हैं। माना जाता है कि धरती जब किसी उल्का के ऑर्बिट से गुजरती है तो उल्का की बरसात दिखाई देती है। जैसे-जैसे उल्का अपनी कक्षा में घूमती है बर्फ भाप बनने लगती है और मिट्टी और पथरीले कणों के टुकड़े छूटने लगते हैं और यही लियोनिड उल्काओं का पर्व हो जाता है।

उल्काओं को गिरते हुए यूं तो किसी भी रात को देखा जा सकता है, लेकिन जब इनकी तादाद ज्यादा हो तो इसे उल्का की बरसात कहा जाता है।

लियोनिड उल्काओं की वजह से होने वाली ये आतिशबाजी ‘धूमकेतु 55 पी बटा टेंपल टटल‘ के साथ जुड़ी हुई है। इस दौरान उल्काओं के बरसात की संख्या सैंकड़ों प्रति घंटा तक हो जाती है लेकिन इस साल उल्काएं पहले की तुलना में बहुत तेज रफ्तार और कम समय के लिए दिखेंगी। लंबे समय से रात के समय आकाश में लियोनिड उल्काओं की आतिशबाजी (Fireworks of Leonid Meteors in the Sky) शानदार दिखती है। हालांकि अमावस्या के बाद का आसमान (new moon sky) काला रहता है इस कारण इसे देखने में परेशानी हो सकती है लेकिन इसके बावजूद लोगों में इसका नजारा देखने का आर्कषण बना रहता है।

उल्का पिंड की बरसात सामान्य टेलिस्कोप से देखने में सहूलियत होती है। संभव है कि रात कोहरे वाली हो ऐसे में बाहरी क्षेत्रों में जाकर इसका नजारा लिया जा सकता है।

उल्का वृष्टि क्या होती है? What is a meteor shower?

खगोलविदों के अनुसार (according to astronomers) पृथ्वी के सिंह राशि के पास से गुजरने से इसे सिंह की उल्कावृष्टि कहा जाता है। अंतरिक्ष में स्वतंत्र घूमते उल्का पिंड पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के चलते करीब 72 किमी प्रति घंटा की गति से खींचे चले आते हैं। जो आसमान में लकीर की तरह दिखाई देते हैं।

Notes : Leonids Meteor shower. The Leonids are a prolific meteor shower associated with the comet Tempel–Tuttle, which are also known for their spectacular meteor storms that occur about every 33 years. The Leonids get their name from the location of their radiant in the constellation Leo: the meteors appear to radiate from that point in the sky. (Wikipedia)

लॉंच हुआ नई पीढ़ी का टेलिस्कोप जेम्स वेब टेलिस्कोप, आसान भाषा में समझिए

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जेम्स वेब टेलिस्कोप : ब्रह्मांड के स्रोत का पता लगाने के लिए पृथ्वी से निकला नई पीढ़ी का टेलिस्कोप

James Webb Telescope Leaves From Earth to Look Into the Origin of the Universe

यह मिशन नासा, ईएसए (European Space Agency) और कनाडा की स्पेस एजेंसी का संयुक्त मिशन (joint mission) है। इसमें सौर मंडलों और सूर्य के अलावा दूसरे तारों के चक्कर लगाने वाले ग्रहों की खोज कर, शुरुआती ब्रह्मांड की पहली आकाशगंगाओं से आने वाले प्रकाश की खोज (Light coming from the first galaxies of the early universe discovered) करने का लक्ष्य है।

नई पीढ़ी का टेलिस्कोप जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप लॉन्च की तारीख

एस्ट्रोफिजिक्स की दुनिया (world of astrophysics) में जिस पल का लंबे वक़्त से इंतज़ार किया जा रहा था, क्रिसमस के दिन वह हकीक़त बन गया। नई पीढ़ी के टेलिस्कोप “जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप” (James Webb Telescope in Hindi) को 25 दिसंबर को सुबह 7 बजकर 20 मिनट पर दक्षिण अमेरिका में फ्रेंच गुयाना स्थित यूरोप के स्पेसपोर्ट से लॉन्च किया गया।

नासा द्वारा जारी वक्तव्य के मुताबिक़, इस टेलिस्कोप को एरियान-5 रॉकेट से लॉन्च किया गया था।

नासा, ईएसए और कनेडियन स्पेस एजेंसी का साझा उपक्रम (Joint venture between NASA, ESA and the Canadian Space Agency)

यह मिशन नासा, ईएसए (यूरोपियन स्पेस एजेंसी) और कनेडियन स्पेस एजेंसी का साझा उपक्रम है। इसमें सौर मंडलों और सूर्य के अलावा दूसरे तारों के चक्कर लगाने वाले ग्रहों की खोज कर, शुरुआती ब्रह्मांड की पहली आकाशगंगाओं से आने वाले प्रकाश की खोज करने का लक्ष्य है।

James Webb Space Telescope (जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी)

कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए नासा के प्रशासक बिल नेलसन ने कहा, “जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप नासा और साझेदारों की उन महत्वकांक्षाओं को प्रदर्शित करता है, जहां वे हमें भविष्य में ले जाना चाहते हैं। द वेब से अपेक्षा की जाती है कि यह ब्रह्मांड के बारे में अब तक समझ ना आने वाली या अब तक ना पहचानी गई चीजों को खोजेगा। यह क्या खोजेगा, इसे लेकर मैं बहुत उत्सुक हूं।”

परीक्षणशाला (टेलिस्कोप) को 870 मील या 1400 किलोमीटर ऊपर रॉकेट से अलग किया गया। लॉन्च के पांच मिनट बाद, ज़मीन पर मौजूद टीमों को वेब से डेटा मिलने लगा। एरियान रॉकेट उड़ान भरने के 27 मिनट बाद परीक्षणशाला से अलग हुआ था। फिर लॉन्च के 30 मिनट बाद वेब ने अपना “सोलर एर्रे (सौर संयंत्र)” खोल लिया। ज़मीन पर मौजूद टीमों ने पुष्टि करते हुए कहा कि सोलर एर्रे, टेलिस्कोप को बिजली उपलब्ध करवा रहा है। अपने पथ पर आधे घंटे चक्कर लगाने के बाद केन्या में मालिंदी ग्राउंड स्टेशन में स्थित परीक्षणशाला में संकेत पहुंचने की पुष्टि की गई। इस टेलिस्कोप को पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर एक ऑब्जर्विंग स्टेशन पर रखा जा रहा है।

अब तक की सबसे जटिल और बड़ी अंतरिक्ष परीक्षणशाला 6 महीने तक अपना काम करेगी। इसके बाद वेब टेलिस्कोप अपनी पहली तस्वीर भेजेगा। वेब टेलिस्कोप में चार उपकरण हैं, जो अब तक के सबसे उन्नत उपकरणों में से हैं, साथ ही, इंफ्रारेड सिग्नल के लिए इसमें संवेदनशील डिटेक्टर्स भी लगाए गए हैं, जिनमें अभूतपूर्व स्तर की गुणवत्ता मिल सकेगी। टेलिस्कोप खगोलीय संचरनाओं से आने वाले इंफ्रारेड प्रकाश का अध्ययन करेगा। यह अहम वैज्ञानिक मिशन नासा के हबल टेलिस्कोप और स्पाइट्जर स्पेस टेलिस्कोप का उत्तराधिकारी है। इन मिशन में जो खोजें हासिल की गई हैं, वेब उनकी उन्नति में भी अपना योगदान देने का लक्ष्य रखता है।

अपने पूर्ववर्ती टेलिस्कोप से कैसे भिन्न है जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी (How is the James Webb astronomical telescope different from its predecessor telescope)?

द वेब अपने पूर्ववर्ती हबल जैसे टेलिस्कोप (James Webb Space Telescope vs Hubble) से कई मायनों में अलग है। पहला इसमें 6.5 मीटर चौड़ा सुनहरा शीशा (परावर्तक) लगा है, जिससे इसकी ऑब्ज़र्वेटरी (परीक्षणशाला) की कार्यकुशलता बहुत ज़्यादा मजबूत हो जाती है। यह शीशा, हबल में लगे प्राथमिक परावर्तक से तीन गुना ज़्यादा चौड़ा है। द वेब का बड़ा परावर्तक जब इसके संवेदनशील उपकरणों के साथ काम करेगा, तो इससे अंतरिक्षविज्ञानियों को अंतरिक्ष में ज़्यादा गहराई से देखने का मौका मिलेगा। इस बड़े परावर्तक शीशे में 18 हिस्से हैं, हर किसी में पीछे एक छोटी मोटर लगी है। इन परावर्तकों को इस तरह से केंद्रित करना होगा, जिससे ब्रह्मांड के शुरुआती तारों से आने वाली इंफ्रारेड किरणों को पकड़ा जा सके।

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की लागत

इसे बनाने में 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च (James Webb Space Telescope cost) किए हैं, अनुमानित तौर पर इसकी उम्र 10 साल होगी। द वेब का वज़न 6200 किलोग्राम है।

परीक्षणशाला का एक प्राथमिक लक्ष्य वह युग (इपोच) होंगे, जब तारों का बनना शुरू ही हुआ था। इन तारों के बारे में कहा जाता है “बिग-बैंग” के बाद ब्रह्मांड में जो अंधेरा छाया था, वह इन तारों के प्रकाश से खत्म हुआ था। बता दें बिग-बैंग की यह घटना 13 अरब साल पहले हुई मानी जाती थी। इन खगोलीय वस्तुओं में हुई परमाणु क्रिया से कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, फॉस्फोरस और सल्फर जैसे भारी अणुओं का जन्म हुआ, जो जीवन के लिए जरूरी हैं। द वेब का एक दूसरा लक्ष्य, दूसरे ग्रहों के वातावरण का अध्ययन करना है, जिससे शोधार्थियों को यह जानने में मदद मिलेगी कि हमारे सौर मंडल के बाहर भी कोई रहने लायक ग्रह है या नहीं।

मिशन में वैज्ञानिक हेइडी हम्मेल ने टिप्पणी में कहा, “हम एस्ट्रोफिजिक्स की एक नई दुनिया में प्रवेश करने वाले हैं, जहां एक नया मोर्चा होगा; हममें से कई लोगों को यही चीज जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप को लेकर उत्सुक बनाती है।”

बहुत कम तापमान पर रहेगा टेलिस्कोप

नासा के मुताबिक, जेम्स वेब टेलिस्कोप बहुत कम तापमान पर रहेगा (James Webb Space Telescope will remain at very low temperature)। इसे ठंडा रखने की वजह यह है कि इसे बहुत दूर से आने वाले इंफ्रारेड सिग्नल का परीक्षण करना होगा, इसलिए उन कमज़ोर गर्म किरणों को खोजने के लिए उपकरण को बहुत ठंडा रहने की जरूरत है। द वेब में कई सारे सुरक्षा तंत्र हैं, जो इसे ठंडा रखते हैं और इसे बाहरी चीजों की गर्मी से बचाते हैं। एक “सनशील्ड” इस टेलिस्कोप की सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी से आने वाली गर्मी से रक्षा करते हैं। यह शील्ड टेलिस्कोप को -223 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखेगी। बेव के दूसरे उपकरणों में भी ठंडे करने के उपकरण लगे होंगे। “नियर-इंफ्रारेड” उपकरण -234 डिग्री सेल्सियम पर काम करेंगे, जब मिड-इंफ्रारेड उपकरण -266 डिग्री सेल्सियस पर काम करेंगे।

ईएसए के वरिष्ठ विज्ञान सलाहकरा मार्क मैककाघरेन ने बताया कि क्यों इन उपकरणों को इतने ठंडे तापमान पर रखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “अहम चीज यह है कि इस पूरे उपकरण को बहुत ठंडा रहना है। दरअसल यह टेलिस्कोप -233 डिग्री सेल्सियस पर काम करेगा। केवल तभी यह इंफ्रारेड वेवलेंथ (तरंगदैध्रर्य) पर चमकना बंद करेगा। वहीं हम इससे काम करवाना चाहते हैं। केवल तभी यह दूर के ब्रह्मांड (जहां पहली आकाशगंगाओं की खोज हुई) में स्थित चीजों और दूसरे तारों के आसपास चक्कर लगाने वाले ग्रहों की फोटो ले पाएगा। तो अभी बहुत काम होना बाकी है।”

संदीपन तालुकदार

(न्यूज क्लिक में प्रकाशित खबर का संपादित रूप साभार)

Topics : James Webb Telescope, NASA, ESA, Hubble Telescope, Spitzer Telescope, Origin of Universe, Malindi Station, Spaceport at French Guiana,

जानिए क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी जैसे अन्य ग्रह भी हैं ?

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क्या हमारे ब्रह्मांड जैसे कई और ब्रह्मांड वजूद में हैं? | Are there other planets like our earth in the universe?

आदिकाल से ही मानव समाज अनन्त ब्रह्मांड में अपनी धरती जैसे जीवन के स्पंदन से युक्त ग्रहों की खोज के लिए सतत प्रयत्नशील रहा है, लेकिन प्राचीनकाल में अंतरिक्ष की सूदूर अंतहीन गहराइयों में झांकने के लिए उस समय न तो बेहतरीन ढंग के दूरदर्शी थे, न आज की तरह द्रुतगामी अंतरिक्ष यान (fast spacecraft) थे, समय के साथ बेहतरीन दूरबीनों (best binoculars) का तथा इसके साथ ही अंतरिक्ष में स्थित सूदूर पिंडों, ग्रहों आदि तक जाने के लिए अत्यधिक द्रुतगामी अंतरिक्षयानों का भी अविष्कार भी होता गया है !

दूरबीन का आविष्कार किसने किया ?

मालिन्यूक्स Molyneux नामक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लेखक ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति डिऑप्ट्रिकानोवा Dioptricanova में इस बात की विस्तृत जानकारी दिया है कि इंग्लैंड निवासी रोजर बेकन (Roger Bacon 1220-1292) नामक वैज्ञानिक को दूरबीन के बारे में सैद्धांतिक ज्ञान (Theoretical knowledge about telescopes) था लेकिन दूरबीन के आविष्कार का श्रेय हैंस लिपरशे Hanslippershey नामक एक डच वैज्ञानिक ( 1570-1619 ) को जाता है, उन्होंने 1608 में बाकायदा एक ऐसे उपकरण का अविष्कार करके उसका पेटेंट कराया, जिसके ट्यूब में एक लैंस था, जिससे दूर की वस्तुओं को देखना संभव हुआ,जिसकी मदद से दूरस्थ वस्तुएं आमतौर पर नजदीक,स्पष्ट और बड़ी दिखाई देने का आभास होने लगता है, लेकिन उसके बाद गैलीलियो, केपलर, हाइगेन्स, ब्रैडले, ग्रेगरी और न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने बेहतरीन दूरदर्शी यंत्र तैयार किए। लेकिन इटली के सुविख्यात वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei – Astronomer 1564-1642) ने बहुत ही बेहतरीन दूरबीन बनाकर चन्द्रमा के गड्ढे (Moon craters), सूर्य के धब्बे (Sun spots) और वृहस्पति ग्रह के चंद्रमाओं को अपनी बनाई दूरबीन से देखकर एवम् दुनिया को उनके बारे में बताकर सारी दुनिया को स्तब्ध करके रख दिया।

इसके अतिरिक्त गैलीलियो ने यह बताकर कि क्लाडियस टॉलमी के भूकेन्द्रीय मॉडल (geocentric theory of Ptolemy – Claudius Ptolemy) को,जिसमें यह बताया गया था कि इस ब्रह्मांड का केन्द्र बिन्दु यह पृथ्वी ही है को ध्वस्त करके रख दिया,उन्होंने बताया कि कोपरनिकस की सूर्य केन्द्रित Heiocentric व्यवस्था एकदम सही है ! कितने दुर्भाग्य की बात है कि यही अटल सत्यपरक बात बताने पर इटली के ही एक प्रखर दार्शनिक, वैज्ञानिक,गणितज्ञ और खगोलशास्त्री 52 वर्षीय जियोर्दानो ब्रूनों ( 1548-1600) को पूरे 8 साल तक जेल में घोर यातना देकर अंततः 17 फरवरी सन् 1600 को वहाँ के धर्म के पैशाचिक दरिंदों ने उन्हें रोम के एक व्यस्ततम् चौराहे पर एक लैंप पोस्ट से लोहे के मोटे जंजीरों से कसकर बाँधकर उन पर मिट्टी का तेल छिड़ककर दिन-दहाड़े ही हजारों मूर्ख और धर्म के पाखंडियों के सामने ही जिंदा ही जला दिया था !

एक तरफ वह प्रख्यात वैज्ञानिक जिंदा जल रहा था,दूसरी तरफ धर्म के पाखंडी और मूर्ख तालियां बजा-बजाकर पैशाचिक ठिठोली कर रहे थे ! कितने दुःख और हतप्रभ कर देने वाली बात है कि एक तरफ वह बहादुर, सत्य पर अटल और निर्भीक वैज्ञानिक हँसते-हँसते जल जाना पसंद किया परंतु झूठ और पाखंड भरी बातों पर झुकना कतई स्वीकार नहीं किया !

हमारे सौरमंडल का केंद्र कौन सा है?

आज दुनिया भर के धार्मिक पाखंडी भी यह बात मानने को बाध्य हैं कि इस सौरमण्डल का केंद्र (center of the solar system) पृथ्वी न होकर सूर्य ही है ! लेकिन भारत में मूर्खों और अंधविश्वासी जाहिलों की संख्या आज के वर्तमान समय में भी करोड़ों में है जो अभी भी यह मानते हैं कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है,चं द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण राहु और केतु की वजह से ही होता है ! या कि हनुमान नामक देवता इस धरती पर रहनेवाला व्यक्ति करोड़ों डिग्री सेल्सियस तप्त और करोड़ों किलोमीटर दूरस्थ सूर्य को निगल गया !

अब पृथ्वी पर निर्मित दुनिया के बेहतरीन दूरबीनों में चिली, हवाई द्वीप, जापान, चीन, स्पेन, रूस, आस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में स्थित बहुत बड़ी-बड़ी और अतिसक्षम दूरबीनें अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में स्थित ग्रहों, उपग्रहों, स्टेरायडों, पुच्छल तारों, सूर्य से भी लाखों गुने बड़े तारों और अरबों प्रकाशवर्ष दूर स्थित गैलेक्सियों और ब्लैक होलों को देखने में सक्षम हैं।

इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष की सूदूर आकाशगंगाओं और नीहारिकाओं को देखने के लिए वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की बाह्य कक्षा (Earth’s outer orbit) में 20 मई 1990 को सशक्त हबल जैसे टेलीस्कोप छोड़े,जो अब तक लगभग 3000 आकाशगंगाओं के अस्तित्व (existence of galaxies) के बारे में हम मानवप्रजाति को बताया !

वर्ष 2009 में 7 मार्च को अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसे अन्य  ग्रहों को ढूंढने के लिए केप्लर अंतरिक्ष यान (Kepler space telescope) को भेजा गया, जो पृथ्वी जैसे अन्य ग्रहों को ढूँढने में सतत लगा हुआ है, इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर लगे उच्च क्षमता के टेलीस्कोप भी सूदूर अंतरिक्ष में उन ग्रहों को ढूंढने में दिन-रात अपनी सतर्क आँखें गड़ाए हुए हैं।

पृथ्वी जैसे कितने ग्रह?

अंतरिक्ष वैज्ञानिक अब तक अपनी पृथ्वी जैसे लगभग 4300 ग्रह ढूँढ चुके हैं, जहाँ की परिस्थितियां बहुत कुछ पृथ्वी जैसी ही हैं इनमें कुछ हमारे वृहस्पति जैसे विशाल गैस से निर्मित ग्रह हैं, तो कुछ पृथ्वी और मंगल जैसे बिल्कुल ठोस चट्टानों से निर्मित वाह्यग्रह Exoplanet हैं।

बाह्य ग्रह क्या हैं?

बाह्यग्रह या बहिर्ग्रह (Exoplanet in Hindi) वे ग्रह हैं, जो हमारे सौरमंडल से बाहर ब्रह्मांड में अपने सूरज के जीवन संभाव्य क्षेत्र मतलब हैबिटेट जोन (Habitat Zone) में हैं, वह क्षेत्र जहाँ ग्रह पथरीला होता और उसके साथ ही वहाँ तरल पानी भी होता है, अंतरिक्ष की सूदूर गहराइयों में अब तक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों (space scientists) द्वारा क्रमिक रूप से खोजे गए पृथ्वी जैसे जीवन योग्य ग्रहों का विवरण (Description of habitable planets like Earth) निम्नवत् है –

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की एक टीम ने हमारी पृथ्वी से लगभग 1400 प्रकाशवर्ष दूर एक ऐसे बाह्य ग्रह या Explante की खोज किया है जो अपने जी-2 नामक तारे या सूर्य से उतनी ही दूरी पर परिक्रमा कर रहा है, जितनी दूरी पर हमारी पृथ्वी हमारे सूरज की परिक्रमा (orbiting the sun) कर रही है। वह अपने तारे की परिक्रमा उसी हैबिटेट क्षेत्र में कर रहा है,जिस हैबिटेट क्षेत्र में हमारी पृथ्वी कर रही है।

हैबिटेट क्षेत्र क्या है? (Habitat center Meaning in Hindi)

नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार हैबिटेट क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसमें जीने लायक परिस्थितियां हों, यथा वहाँ का तापमान पानी के उबलने के तापमान यानी उसके क्वथनांक से कम हो और जिस तापमान पर बर्फ जमती है, उससे बहुत नीचे माइनस में भी न हो।

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह पर जीवन के लिए पर्याप्त परिस्थितियां मौजूद हैं, इस ग्रह पर ज्वालामुखी भी हैं, इसका गुरूत्वाकर्षण हमारी पृथ्वी से दोगुना है, यह अपने तारे की परिक्रमा 385 दिन में पूरा कर लेता है। चूँकि इस ग्रह के कई गुण हमारी पृथ्वी से मिलते हैं, इसलिए अंतरिक्ष वैज्ञानिक इस ग्रह को पृथ्वी का बड़ा भाई या सुपर अर्थ कहते हैं और इसके तारे जी-2 को सूर्य का बड़ा भाई मानते हैं !

सुपर अर्थ किसे कहते हैं?  (What is a super-Earth?) | Does super-Earth have a life? | क्या सुपर-अर्थ में जीवन है?

सुपर अर्थ उस ग्रह को कहते हैं जिसका द्रव्यमान हमारी पृथ्वी से बहुत ज्यादा परन्तु नेपच्यून और यूरेनस से बहुत कम हो। बाह्यग्रह या Explante उन ग्रहों को कहते हैं जो हमारे सौरमंडल से बाहर ब्रह्मांड में किसी अन्य तारे की परिक्रमा कर रहे हैं।

नासा के वैज्ञानिकों ने कैप्लर 10-बी (Kepler 10-b) नामक एक अन्य ग्रह की भी खोज किया है,जो अपने तारे से हमारे सूर्य से बुध की दूरी से भी 24 गुना ज्यादे कम दूरी पर अवस्थित है, इसका दिन में तापमान 1371 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा रहता है, जिस तापमान पर लोहा भी द्रव बनकर बहने लगता है, इस ग्रह का वजन हमारी पृथ्वी से 4.6 गुना भारी है, इसका घनत्व 8.8 ग्राम प्रतिघन सेंटीमीटर है, मतलब लोहे से भी ज्यादे ! इस ग्रह के बारे में विस्तृत जानकारी सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका एस्ट्रोफिजिककल जर्नल में प्रकाशित हुई है।

नासा के ही वैज्ञानिकों ने अपने केप्लर अंतरिक्ष यान के जरिए पृथ्वी से लगभग 300 प्रकाशवर्ष दूर एक ऐसे बाह्यग्रह या Explante की खोज किया है जो हमारी पृथ्वी से 1.06 गुना भारी है और इसका तापमान भी पृथ्वी जैसा ही है यह ग्रह भी हमारी पृथ्वी की तरह अपने बौने लाल तारे मतलब Red Dwarf Star से 75 प्रतिशत उर्जा लेता है और उसी का चक्कर लगाता है,वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह के बौने लाल तारे अंतरिक्ष में बिखरे पड़े हैं !

इसी प्रकार जर्मनी के सुप्रसिद्ध मैक्स प्लैंक खगोलशास्त्र संस्थान के वैज्ञानिकों ने ग्लीज -486-बी (gliese 486b planet) नामक एक ग्रह की खोज किया है,जो हमारे सौरमंडल के शुक्र ग्रह से थोड़ा ही ठंडा है, लेकिन इसकी सतह पर गर्म लावे की नदियां बह रहीं हैं, जाहिर है यहाँ कोई भी जीव रह ही नहीं सकता !

ग्लीज-486-बी नामक यह एक्सप्लानेट सुपर अर्थ है जिसकी दूरी अन्य एक्सप्लानेट की तुलना में पथ्वी से सबसे कम है। पृथ्वी से इसकी दूरी मात्र 26.3 प्रकाशवर्ष है, इसलिए भले ही इस पर हम रह न सकें लेकिन कम दूरी होने की वजह से इसका अध्ययन तो हम कर ही सकते हैं।

अब सबसे खुशी की बात यह है कि इसी महीने 24-12-2021को अमेरिका और कनाडा सहित यूरोप के लगभग 18 देश मिलकर जिसमें वहां के हजारों तकनीशियन, इंजीनियर और वैज्ञानिक शामिल हैं, 6500 किलोग्राम वजन का, 21फीट या 6.5 मीटर बड़े लैंस वाले जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप को जिसकी लागत 10 अरब अमेरिकी डॉलर है, को इस धरती से 15 लाख किलोमीटर दूर कक्षा में स्थापित करने के लिए और माइनस 223 डिग्री सेल्सियस ठंडा रखने के लिए सिलिकॉन और एल्युमिनियम की परत से ढंकने वाली तकनीक से लैसकर प्रक्षेपित करने वाले हैं। अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे हबल टेलीस्कोप से तुलनात्मक रूप से यह बहुत ही विशाल और सक्षम है, क्योंकि जहाँ हबल टेलीस्कोप का लैंस मात्र 7 फीट 10 ईंच है, वहीं जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप का लैंस 21 फुट का है, लेकिन हबल टेलीस्कोप के लैंस के क्षेत्रफल से जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप के लैंस का क्षेत्रफल 6 गुना ज्यादा है, जहाँ हबल टेलीस्कोप पृथ्वी से मात्र 537 किलोमीटर की ऊँचाई वाली कक्षा में स्थापित है वहीं जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप को हमारी पृथ्वी और चंद्रमा की दूरी से भी लगभग चार गुनी दूरी मतलब 15 लाख किलोमीटर दूर की कक्षा में स्थापित किया जा रहा है, जहाँ हबल टेलीस्कोप आकाश गंगाओं के दृश्यमान भागों को ही देख पाने में सक्षम था वहीं जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप इंफ्रारेड की शक्ति से लैस है, जो सूदूर अंतरिक्ष के अंधेरे कोने को भी भलीभाँति देखकर उनका बखूबी फोटो खींच सकता है और विडियो तक भी बना सकता है ! आशा है अंतरिक्ष वैज्ञानिक भविष्य में आधुनिकतम जेम्स वेब अंतरिक्ष टेलीस्कोप की मदद से मानव प्रजाति की इस परम इच्छा और जिजीविषा को शांत कर दें कि ‘काश हमारी जैसी कोई अन्य विकसित सभ्यता भी इस ब्रह्मांड में कहीं अस्तित्व में हो !’ को सुदूर अंतरिक्ष की लाखों प्रकाशवर्ष दूर स्थित अपनी धरती जैसे जीवन और सांसों के स्पंदन से युक्त कोई अन्य ग्रह ढूँढ ही निकालें जिसके फलस्वरूप और इस ब्रह्मांड में स्थित दो जीवित और समुन्नत सभ्यताओं का मधुर और सुखद मिलन हो ही जाय !

-निर्मल कुमार शर्मा, वैज्ञानिक, सामाजिक व राजनैतिक विषयों पर बेखौफ़ व स्वतंत्र लेखन

Notes – Roger Bacon, also known by the scholastic accolade Doctor Mirabilis, was a medieval English philosopher and Franciscan friar who placed considerable emphasis on the study of nature through empiricism. (Wikipedia)

यूरेनस से परावर्तित हो रही हैं एक्स-रे किरणें

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X-ray rays are being reflected from Uranus

नई दिल्ली, 05 अप्रैल: अंतरिक्ष के रहस्यों से पर्दा उठाने की दिशा में विश्वभर में अनेक वैज्ञानिक शोध में जुटे हुए हैं। हाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अध्ययनकर्ताओं को हमारे सौरमंडल में मौजूद ग्रह यूरेनस की ओर से एक्स-रे विकिरण आती हुई दिखाई दी हैं। हालांकि, एक्स-रे के इस परावर्तन के कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हैं।

नासा के खगोलविदों (NASA astronomers) को संकेत मिले हैं, जिससे यह पता चला है कि इन एक्स-रे विकिरण का स्रोत (Source of x-ray radiation) यूरेनस ग्रह पर ही मौजूद हो सकता है। हालांकि, खगोलविद अभी तक स्पष्ट रूप से यह पता नहीं कर सके हैं कि वास्तव में ये एक्स-रे विकरण आ कहाँ से रहे हैं। लेकिन, फिर भी उन्होंने इसकी दो संभावित व्याख्याएं दी हैं।

पहली व्याख्या के अनुसार, इसका कारण सूर्य हो सकता है, जो यूरेनस और नेप्च्यून जैसे ग्रहों पर अपना समान प्रभाव डालता है, जो एक्स-रे के प्रकाश को बिखेरता है। वहीं, दूसरी संभावित व्याख्या के अनुसार यूरेनस के छल्लों में इस विकरण के प्रक्रिया (Deformation process) छिपी हो सकती है। इन छल्लों से ग्रह के पास के वातावरण में मौजूद इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन जैसे कणों में टकराव के कारण ऐसा हो सकता है।

यह अध्ययन, नासा के चंद्रा स्पेस टेलीस्कोप द्वारा वर्ष 2002 से लेकर वर्ष 2017 के अवलोकनों पर आधारित है।

वर्ष 2002 में, पहली बार ग्रह के एक्स-रे के विश्लेषण में स्पष्ट रूप से चित्रित किया गया, और जब इसकी तुलना वर्ष 2017 में प्राप्त विश्लेषण से की गई, तो उसकी चमक संभवता समान पायी गई। अध्ययन में कहा गया है कि यूरेनस और नेप्च्यून को छोड़कर सौर मंडल के अन्य ग्रहों में एक्स-रे का पता लगाना बेहद महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही, अध्ययन में यह भी कहा गया है कि एक्स-रे उत्सर्जन को समझने से ग्रह की विशेषताओं और इसकी संरचना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। (इंडिया साइंस वायर)

राकेश शर्मा : भारत का प्रथम अंतरिक्ष यात्री

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Rakesh Sharma: India’s first astronaut

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नई दिल्ली, 02 अप्रैल : कैलेंडर की कुछ तारीखें इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं। 02 अप्रैल, 1984 ऐसी ही एक तारीख है, जब कोई भारतीय पहली बार अंतरिक्ष में जाने में सफल रहा। भारत के खाते में यह अनुपम उपलब्धि दर्ज कराने का श्रेय जाता है विंग कमांडर राकेश शर्मा (Wing Commander Rakesh Sharma) को।

अंतरिक्ष में कदम रखने का गौरव हासिल करने के सपने कई भारतीयों ने संजोए हुए थे। लेकिन, अंत में नियति ने यह अवसर राकेश शर्मा को दिया।

1980 के दशक की शुरुआत में भारत सरकार ने सोवियत रूस के साथ मिलकर अंतरिक्ष अभियान की योजना बनायी, तो उसमें तय हुआ कि एक भारतीय को भी इस अभियान के लिए चुना जाएगा। एक लंबी, जटिल और गहन प्रक्रिया के द्वारा इसके लिए योग्य उम्मीदवारों को चिह्नित किया गया। अंत में दो उम्मीदवार चयनित किये गए। एक राकेश शर्मा और दूसरे रवीश मल्होत्रा।

Story of India first astronaut retired wing commander Rakesh Sharma,

उस दौर में भारतीयों के मन में यही बड़ी उत्सुकता हुआ करती थी कि शर्मा और मल्होत्रा में से किसके सिर पर पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री होने का सेहरा सजेगा। अंत में बाजी राकेश शर्मा के हाथ लगी। इस प्रकार 20 सितंबर, 1982 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन  (Indian Space Research Organizationइसरो) के माध्यम से इंसरकॉस्मोस अभियान के लिए राकेश शर्मा के नाम पर अंतिम मुहर लगी। रवीश मल्होत्रा किसी भी विपरीत परिस्थिति में राकेश शर्मा का स्थान लेने के लिए तैयार थे, लेकिन इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी।

राकेश शर्मा ने यह मुकाम कड़ी परीक्षाओं से गुजरने के बाद हासिल किया था। इसमें एक कसौटी तो ऐसी भी थी कि उन्हें 72 घंटे यानी पूरे तीन दिन एक बंद कमरे में एकदम अकेले रहना पड़ा। उनकी परीक्षाएं यहीं समाप्त नहीं हुईं। मिशन के लिए चयन के बाद जब वह अभियान हेतु परीक्षण के लिए रूस के यूरी गागरिन अंतरिक्ष केंद्र (Yuri Gagarin Space Center of Russia) में गहन अभ्यास में जुटे थे, तो देश में उनकी छह वर्षीय बेटी मानसी का निधन हो गया। इस घटना से भी वह विचलित नहीं हुए, और उन्होंने स्वयं को अपने लक्ष्य पर केंद्रित रखा। पूरे देश की आशाएं उनसे जुड़ी हुई थीं, और उन्होंने उन उम्मीदों को टूटने नहीं होने दिया।

02 अप्रैल, 1984 को वह तारीख आ ही गई, जब शर्मा को अपने तीन सोवियत साथियों के साथ अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरनी थी। तत्कालीन सोवियत संघ के बैकानूर से उनके सोयुज टी-11 अंतरिक्षयान के उड़ान भरते ही देश के लोगों की धड़कनें बढ़ गईं। आखिरकार अंतरिक्ष में दाखिल हुए। उन्होंने कुल सात दिन, 21 घंटे और 40 मिनट अंतरिक्ष में बिताए और सफलतापूर्वक पृथ्वी पर लौटे।

अंतरिक्ष में उनकी प्रयोगधर्मिता खासी परवान चढ़ी, और अपने अंतरिक्ष प्रवास के दौरान उन्होंने कुल 33 प्रयोग किए। इनमें भारहीनता से उत्पन्न होने वाले प्रभाव से निपटने के लिए किया गया प्रयोग भी शामिल था। शर्मा और उनके तीनों साथियों ने स्पेस स्टेशन से मॉस्को और नई दिल्ली के लिए एक साझा संवाददाता सम्मेलन को भी संबोधित किया। अंतरिक्ष में भी राकेश शर्मा का अंदाज विशुद्ध भारतीय था। कहा जाता है कि स्पेस स्टेशन में भी शर्मा रोज कम से कम दस मिनट योग किया करते थे। उन्होंने अंतरिक्ष से उत्तर भारत के इलाकों को अपने कैमरे में भी कैद किया।

राकेश शर्मा की जीवनी | Biography of Rakesh Sharma in Hindi,

राकेश शर्मा भारत के प्रथम और विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री थे। अपनी इस उपलब्धि से शर्मा उस दौर के एक बड़े नायक बन गए। युवाओं में उनकी लोकप्रियता कायम हो गई और उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया। उनकी उपलब्धि से प्रेरित होकर ही भारत सरकार ने उन्हें ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया। सोवियत सरकार ने भी उन्हें ‘हीरो ऑफ सोवियत यूनियन’ सम्मान से नवाजा। समय के साथ भारतीय वायुसेना भी पदानुक्रम की सीढ़ियां चढ़ते गए और विंग कमांडर के पद तक पहुँचे। विंग कमांडर के पद पर सेवानिवृत्त होने पर राकेश शर्मा ने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में परीक्षण विमान चालक के रूप में भी काम किया।

पंजाब के पटियाला में 13 जनवरी 1949 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे शर्मा बचपन से ही आकाश की ओर टकटकी लगाए रहते थे। आसमान में उड़़ते विमान पर उनकी नजरें तब तक टिकी रहती थीं, जब तक कि वह आंखों से ओझल न हो जाए। अनंत आकाश के प्रति यही आकर्षण उन्हें भारतीय वायुसेना में ले आया। वर्ष 1966 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) का हिस्सा बने शर्मा का 1970 में भारतीय वायुसेना से जुड़ाव हो गया। इस प्रकार वह 21 साल की उम्र में भारतीय वायु सेना के पायलट बन गए। वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में देश उनकी प्रतिभा और कौशल से परिचित हुआ। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनकी उपलब्धियों ने तमाम भारतीय युवाओं को अंतरिक्ष के क्षेत्र में दिलचस्पी जगाने का काम किया।

कालांतर में कल्पना चावला से लेकर सुनीता विलियम्स जैसे भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्रियों के नाम उभरे, जो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अभियानों का हिस्सा बने। भविष्य में भी ऐसे तमाम नाम उभरेंगे, लेकिन अंतरिक्ष को लेकर भारतीयों के जेहन में हमेशा जो पहला नाम उभरेगा, वह राकेश शर्मा का ही होगा।

(इंडिया साइंस वायर)

क्या हम कभी एलियन को ढूंढ पाएंगे… क्यों नहीं मिलते एलियन?

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Why don’t you meet the aliens?

Alien News in Hindi, Latest Alien News | एलियन की जानकारी, Aliens की ताज़ा खबरें,

प्रारम्भ में मानव के पास ज्ञान सीमित था तो उसने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिय़ा और बिना किसी प्रमाण के पृथ्वी बाहर के आकाशीय पिण्डों पर विविध प्रकार के जीव होने की कहानियां रच डालीं। इस विषय पर बहुत साहित्य लिखा गया है। कई लोकप्रिय फिल्में भी बनती रही हैं। 

विज्ञान का विकास होने पर मानव ने पृथ्वी पर जीवन कैसे और कब से है (How and when is life on earth)? जैसे प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास किया। डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त के साथ ही यह स्पष्ट हो गया गया कि गर्म गोले के रूप में जन्मी पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्डी हुई तब इसका वातावरण बना। वातावरण में उपस्थित तत्वों के संयोग से सरल यौगिक व उनसे जटिल यौगिक बने। इन यौगिकों में जीवन के आधार अणु जैसे जल, अमीनों अम्ल, नाभकीय अम्ल आदि भी थे। इन अणुओं के घनीभूत होने पर आकस्मिक रूप से प्रथम जीव की उत्पति हुई। उस प्रथम जीव ने ही जैव विकास की प्रक्रिया द्वारा सहित सभी जीवों को जन्म दिया। पृथ्वी पर जीवन पनपने का कारण उसकी सूर्य से विशिष्ट दूरी है। पृथ्वी सूर्य से इतनी दूरी पर है कि वहां जल तरल रूप में रह सकता है।

अंतरिक्ष की जानकारी (Space information) बढ़ने के साथ ही यह स्पष्ट हुआ कि हमारी अपनी आकाशगंगा में सूर्य जैसे अरबों तारे हैं तथा उनके सौर परिवार भी हैं। अनेक तारों के सौर परिवार में पृथ्वी जैसे ग्रह भी हैं। रेडियो खगोलिकी (Rediyo khagoliki -RADIO ASTRONOMY) के विकास के साथ ही यह ज्ञात होने लगा कि जिन रासायनिक अणुओं ने पृथ्वी पर जीवन को जन्म दिया वे अणु अन्तरिक्ष में बहुतायत से उपस्थित हैं। इससे यह अवधारणा विकसित हुई कि पृथ्वी के बाहर अनेक ग्रहों पर जीवन उपस्थित है।

यह भी माना गया कि अनेक ग्रहों पर पृथ्वी से भी विकसित जीवन है। इसी से उड़न तश्तरियों में बैठ कर एलियनों के पृथ्वी पर आने की बात लोगों के मन में पनपने लगी।

1972 में पायोनियर 10 के छोड़े जाने के समय तो पृथ्वी बाहर मानव से बहुत अधिक विकसित जीवन होने की बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी जाने लगी थी। उस समय वैज्ञानिकों को यह भय भी सताने लगा था कि पृथ्वी बाह्य की सभ्यता, हमारी किसी भूल के कारण, हमसे नाराज होकर हम पृथ्वीवासियों पर हमला कर सकती है। 

Pioneer 10 Space probe in Hindi

पायोनियर 10 योजना में अन्तरिक्ष यान को बृहस्पति ग्रह के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला जाना था। भय इस बात को था कि अपनी अनन्त यात्रा के दौरान पायोनियर 10 किसी विकसित सभ्यता के सम्पर्क में आ सकता था। विकसित सभ्यता पायोनियर 10 को उन पर मानव सभ्यता द्वारा किया हमला मान हम पर पलटवार भी कर सकती थी। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए पायोनियर 10 पर एक प्लेट पर मानव स्त्री-पुरुष को मित्रता की मुद्रा में चित्रित किया गया तथा सांकेतिक भाषा में यान के पृथ्वी से भेजे जाने की बात प्रदर्शित की गई थी।

योजना अनुसार पायोनियर 10 बृहस्पति के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला गया मगर किसी बाह्य सभ्यता का कोई संकेत नहीं मिला है।

बाहरी जीवन की खोज | Outdoor life search

वैज्ञानिक संसाधनों के विकसित होने के साथ पृथ्वीवासियों ने बाहरी जीवन की खोज करने करने प्रयासों को तेज कर दिया। बड़े बड़े रेडियो दूरसंवेदी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस 1999 – Search for extra-terrestrial intelligence 1999) लगा कर दूर अन्तरिक्ष में होने वाली फुसफुसाहट को सुनने के प्रयास  किए जाते रहे हैं। इन सभी प्रयासों का परिणाम अभी तक शून्य ही रहा है। मानव से भी अधिक विकसित सभ्यता की बात तो बहुत दूर की है, पृथ्वी से बाहर किसी किसी सूक्ष्म जीव के होने के संकेत भी, वैज्ञानिक जगत, अभी तक नहीं जुटा सका है। इस खोज को किसी परिणाम तक पहुँचाने के लिए नासा ने एक महत्वाकांक्षी योजना प्रारम्भ की है। 

लगभग 100 अरब आकाशगंगाएं हैं ब्रह्माण्ड में

नए वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि हमारी गेलेक्सी आकाशगंगा में एक अरब पृथ्वी के जैसे संसार हैं, इनमें से अनेक पृथ्वी की तरह ही चट्टानी हैं। अब तक देखे गए ब्रह्माण्ड में लगभग 100 अरब आकाशगंगाएं हैंनासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एलेन स्टोफेन का कहना है कि आज हम पृथ्वीवासियों के पास बहुत पक्के सबूत है कि आगामी एक दशक में पृथ्वी बाह्य जीवन को खोज लेगें। 20 या 30 वर्ष में तो एलियन के विषय में पक्के प्रमाण जुटा लिए जाएंगे।

एलेन स्टोफेन की बात पर शंका करने का भी कारण नहीं क्योंकि आभासी सौरमण्डलीय प्रयोगशालाओं व अन्तरिक्ष में उपस्थित दूर संवेदी साधनों ने मानव समझ को पूर्व के किसी समय की तुलना में बहुत बढ़ा दिया है।

पृथ्वी जैसे गृहों के साथ बर्फ से ढंके उपग्रहों जैसे यूरोपा पर भी जीवन खोजा जा रहा है। किसी पृथ्वी बाह्य पिण्ड पर जीवन होने के संकेत अनुभव के साथ बदलते रहे हैं। पहले किसी आकाशीय पिण्ड के वायुमण्डल में आक्सीजन, ओजोन या मीथेन की उपस्थिति जीवन की उपस्थिति का पर्याय माना जाता थी।

प्रयोगों में पाया गया कि भौतिक क्रियाओं में भी ये गैंसें उत्पन्न हो सकती हैं, तब से किसी गैस को जीवन का प्रतीक मानने का पैमाना बदल दिया गया है। वर्तमान यह माना जा रहा है कि यदि मीथेन व ऑक्सीजन दोनों साथ-साथ पाई जाती हैं तो यह जीवन की उपस्थिति का सूचक होगा। यह सोच वैसी ही है जैसे महाविद्यालयी विद्यार्थी उपस्थित हैं तो पिज्जा वहां होगा ही।

यह हुआ सिक्के का एक पहलू।

वैज्ञानिकों के दूसरे समूह की सोच है कि पृथ्वी बाहर जीवन तो मिल सकता है मगर उसके पृथ्वी जैसा विकसित होने की संभावना नगण्य ही है। इनका मानना है कि जीवन के विकास के लिए जल युक्त पृथ्वी जैसा चट्टानी ग्रह होना ही पर्याप्त नहीं है। पृथ्वी जैसे पिण्ड पर जीवन की उत्पति होने में कोई परेशानी नहीं है, परेशानी जीवन की उत्पति के बाद उस पिण्ड के वातावरण को जीवन योग्य बनाए रखने में होती है। इन वैज्ञानिकों का मानना है पृथ्वी जैसे ग्रह के बनने के बाद आधा अरब वर्ष तक तो वह पिण्ड अत्यधिक गर्म व विस्फोटक होता है। ऐसे में जीवन पनपने की कोई संभावना नहीं होती।

लगभग आधे से एक अरब के बीच पिण्ड इतना ठण्डा हो जाता है कि रासायनिक यौगिकों के संयोग से जीवन की उत्पति हो सके।

जीवन की उत्पत्ति के लिए क्या जरूरी है | What is necessary for the origin of life

जीवन की उत्पति के लिए ग्रह के वातावरण का जीवन योग्य होना आवश्यक नहीं है। असली परीक्षा ग्रह के बनने के एक से डेड अरब वर्ष की आयु के बाद में होती है जब वातावरण स्थायी रूप से जीवन योग्य बनाए रखना होता है। यह जंगली साण्ड की सवारी करना जैसा कठिन होता है।

वाइटल डस्टके लेखक डी डुवे (Christian de Duve’s, author of “Vital Dust: Life as a Cosmic Imperative”) का कहना है कि अधिकांश पृथ्वी जैसे ग्रह अपनी आयु के प्रथम एक अरब वर्ष तक ऐसा करने में असफल रहते हैं और वहां उत्पन्न जीवन सूक्ष्म अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पिण्ड पर जीवन उत्पन्न के बाद, जीवन ग्रह के भौतिक वातावरण के साथ पुर्नभरण संवाद करने लगता है। यह संवाद सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है। सामान्यत: यह नकारात्मक होता है और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। जहाँ जीवन का अपने वातावरण से सकारात्मक पुर्नभरण संवाद स्थापित हो पाता है वहां ही जीवन का आगे विकास होता है। जैसा कि पृथ्वी पर हुआ। इस सकारात्मक पुर्नभरण संवाद को वैज्ञानिक जेम्स लवलोक व लिन मार्गुलिस (1974) ने गैअन (धरती माता) नियमन नाम दिया है।

 गैअन नियमन के अनुसार पृथ्वी एक सजीव इकाई की तरह कार्य करते हुए उस पर उपस्थित जीवों से सकारात्मक पुर्नभरण करती है। गैअन नियमन को पहले एक परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया था मगर आधुनिक अनुसंधानों के आधार पर इसे सिद्धान्त का दर्जा दे दिया गया। आध्यात्मिक विचार के लोग तो पहले से ही धरती को माता कह कर जीवन को पालने में धरती की भूमिका स्वीकारते रहे हैं।

विज्ञान जगत के लिए धरती को सजीव मानना गले नहीं उतर रहा है। इससे धरती के सोद्देश्य विकसित होने की बात सामने आती है जो विज्ञान में स्वीकार नहीं है।

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी एक ईकाई के रूप में कार्य करते हुए ही यहाँ के वातावरण को जीवन के पक्ष में बनाए रखा है। इस बात के प्रमाण मिले है कि जीव व उसका भौतिक वातावरण सकारात्मक पुर्नभरण संवाद करते हुए साथ साथ विकसित हुए हैं। इस बात को स्वीकारते हुए भू-कार्यकी जैसे विषय पढ़ाए जाने लगे हैं। जैव मण्डल (बायोस्फेयर) के रूप में धरती, उसके जीव व वायुमण्डल को एक ईकाई मान कर भू-जैव-रसायन चक्र का अध्ययन किया जाने लगा। यह भी माना जाने लगा है कि भू-जैव-रसायन चक्र में हस्तक्षेप कर मानव ने प्रदूषण को जन्म दे ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) का संकट उत्पन्न किया है।

गैअन बोतल ग्रीवा स्पष्टीकरण के अनुसार पृथ्वी जैसे ग्रह पर, जीवन का उत्पन्न होना व विलुप्त होजाना ही प्रकृति की नियती है। किसी ग्रह को जीवन योग्य बने रहने के लिए उस पर जीवन को होना आवश्यक है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जीवन ही किसी ग्रह के वातावरण को जीवन योग्य बनाता है। ग्रह के वातावरण व जीवों का विकास साथ-साथ चलते हैं मगर जैसे मुँह की जाते हुए बोतल संकरी होती है वैसे स्थाइत्व की ओर बढ़ने का मार्ग भी कठिन होता जाता है। सामान्यत: सफलता नहीं मिलती और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पृथ्वी बाह्य जीवन से हमारी मुलाकात नहीं हो पाने का रहस्य भी इसी में छिपा है। 

चौपड़ा व लाइन्वीवर की कल्पना के पक्ष में फिलहाल कोई परिणाम उपलब्ध नहीं है। जब अन्तरिक्ष में जीवन मिलने लगेगा और वह सूक्ष्म जीवों के स्तर का ही होगा तो चौपड़ा व लाइन्वीवर की कल्पना की पुष्टि होगी।

कुछ खगोल जीववैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर जीवन के विकास के अध्ययन से कुछ अवरोधक खोज निकाले हैं। सामान्य अणुओं से जनन-क्षम अणुओं की उत्पति पहला अवरोधक रहा होगा। इन अणुओं के संयोग से सरल पूर्वकेन्द्रिकी कोशिका की उत्पति दूसरा अवरोधक रहा होगा। पूर्वकेन्द्रिकी से सुकेन्द्रकी कोशिका की उत्पति तीसरा अवरोधक रहा होगा। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि पृथ्वी पर, 3.5 अरब वर्ष पूर्व, सरल पूर्वकेन्द्रिकी कोशिका बनने के बाद लगभग 1.8 अरब वर्ष तक जीवन में कोई परिर्वतन नहीं हुआ था।  

कुछ लोग परिकल्पना को धर्म प्रभावित मान कर इसको खारिज भी करते हैं। स्पष्ट है कि जब तक कोई एलियन सचमुच में नहीं मिल जाता तब तक कल्पनाओं का दौर चलता रहेगा।

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी

सेवानिव़ृत प्रधानचार्य

श्री बांगड़ राजकीय उ.मा.वि.पाली ( राजस्थान) 306401

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप)

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पुरोधा : प्रोफेसर उडुपी रामचंद्र राव

prof. udupi ramachandra rao

Pioneer of Indian Space Program: Prof. Udupi Ramachandra Rao

नई दिल्ली, 09 मार्च 2021, भारत में अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science in India) ने बहुत प्रगति कर ली है। आज भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अपनी उपलब्धियों से दुनिया भर के लिए एक मिसाल बन चुका है। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान की इस उड़ान में अनेक दिग्गज अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण नाम है प्रोफेसर उडुपी रामचंद्र राव का।

भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान की विकास यात्रा में जिन क्षेत्रों का निर्णायक योगदान रहा, उनमें से अधिकांश का सरोकार उसी तकनीक से रहा है, जिस पर प्रोफेसर यू आर राव (Prof. Udupi Ramachandra Rao) जीवनपर्यंत काम करते रहे।

आज देश में सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा जो क्रांति आकार ले रही है हम उसकी बात करें या फिर रिमोट सेंसिंग, टेलीमेडिसिन या टेली एजुकेशन, सब में प्रो राव के काम की छाप दिखती है।

प्रोफेसर राव का जन्म कर्नाटक के अडामारू में 10 मार्च 1932 को हुआ था। वह एक साधारण परिवार से ही संबंध रखते थे, परंतु अपने कठिन परिश्रम और विज्ञान के प्रति समर्पण ने उन्हें एक असाधारण व्यक्तित्व बना दिया। सफलता के नित नए सोपान चढ़ते हुए जहां उन्होंने प्रतिष्ठित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research organization) यानी इसरो के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया तो वहीं देश के अंतरिक्ष सचिव के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं जो विभाग सीधे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में काम करता है।

प्रोफेसर राव ने 1960 में अपने करियर की शुरुआत की और उसके बाद से भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास और संचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। छुपे हुए प्राकृतिक संसाधनों की खोज करने में उनकी दूर-संवेदी तकनीकें बहुत उपयोगी सिद्ध हुईं। भारत की अंतरिक्ष और उपग्रह क्षमताओं के निर्माण तथा देश के विकास में उनके अनुप्रयोगों का श्रेय भी प्रोफेसर राव को दिया जाता है।

उन्होंने 1972 में भारत में उपग्रह प्रौद्योगिकी का आगाज कर अपनी मेहनत से उसे एक नया आयाम प्रदान किया। प्रोफेसर राव के कुशल नेतृत्व में ही 1975 में पहले भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट से लेकर 20 से अधिक उपग्रहों को डिजाइन किया गया, तैयार किया गया और अंतरिक्ष में प्रक्षेपित भी किया गया। भारत में प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी के विकास को भी प्रोफेसर राव ने एक नई दिशा दी। यह उनके प्रयासों का ही परिणाम रहा कि 1992 में एएसएलवी का सफल प्रक्षेपण संभव हो सका। प्रसारण, शिक्षा, मौसम विज्ञान, सुदूर संवेदी तंत्र और आपदा चेतावनी के क्षेत्रों में अंतरिक्ष तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में राव का योगदान अतुलनीय है।

प्रोफेसर राव को अंतरराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉटिकल फेडरेशन ने प्रतिष्ठित ‘द 2016 आईएएफ हॉल ऑफ फेम’ में शामिल किया था। वहीं वर्ष 2013 में सोसायटी ऑफ सेटेलाइट प्रोफेशनल्स इंटरनेशनल ने प्रोफेसर राव को सेटेलाइट हॉल ऑफ फेम, वाशिंगटन का हिस्सा बनाया। भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला (अहमदाबाद) की संचालन परिषद के अध्यक्ष रहे प्रोफेसर राव अंतरराष्ट्रीय तौर भी पर बहुत विख्यात रहे। अंतरिक्ष विज्ञान में अहम योगदान के लिए भारत सरकार ने प्रोफेसर यू आर राव को 1976 में तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। वर्ष 2017 में उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दिया गया।

देश के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक रहे प्रोफेसर राव यदि जीवित होते तो 10 मार्च,2021 को अपना 89वां जन्मदिन मनाते। आज वह भले ही हमारे बीच में न हों, लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में अपने अतुलनीय योगदान से उन्होंने एक ऐसी समृद्ध विरासत छोड़ी है, जिसे उनके अनुयायी और समृद्ध करके उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

(इंडिया साइंस वायर)