आईआईटी हैदराबाद परिसर में मानव रहित वाहनों के लिए अत्याधुनिक केंद्र स्थापित

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नई दिल्ली, 05 जुलाई, 2022: केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान, पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने सोमवार को हैदराबाद में मानव रहित वाहनों के विकास के लिए अत्याधुनिक सुविधा केंद्र का उद्घाटन किया है।

आईआईटी हैदराबाद परिसर में स्वचालित नेविगेशन सुविधा केंद्र

यह एक स्वचालित नेविगेशन सुविधा केंद्र है, जिसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), हैदराबाद परिसर में स्थापित किया गया है।

मानव रहित वाहन विकसित किये जाएंगे

टेक्नॉलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनोमस नेविगेशन (Technology Innovation Hub on Autonomous Navigation – TiHAN) नामक यह केंद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के 130 करोड़ रुपये के अनुदान पर आधारित है। यह एक बहु-विषयक पहल है, जो भारत को भविष्य और अगली पीढ़ी की ‘स्मार्ट मोबिलिटी’ तकनीक में एक वैश्विक खिलाड़ी बनाने की क्षमता रखती है। अपनी तरह के इस पहले अत्याधुनिक सुविधा केंद्र में मानव रहित हवाई एवं स्थलीय वाहन विकसित किये जाएंगे।

डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि दुनिया भर में नियंत्रित वातावरण में मानव रहित और इनसे जुड़े वाहनों के संचालन की जांच के लिए सीमित टेस्टबेड या प्रोविंग ग्राउंड (जहाँ परीक्षण होता है) मौजूद हैं। इसमें वास्तविक जीवन के यातायात संचालन में होने वाले विभिन्न परिदृश्यों का अनुकरण किया जाता है। ब्रिटेन में मिलब्रुक प्रोविंग ग्राउंड, अमेरिका में एम-सिटी, सिंगापुर में सेट्रान, दक्षिण कोरिया में के-सिटी, जापान में जरी आदि उदाहरण के तौर पर शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भारत में स्वचालित वाहनों का आकलन करने के लिए वर्तमान में ऐसी कोई टेस्टबेड सुविधा नहीं है। इसीलिए, इस टेक्नॉलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनोमस नेविगेशन (TiHAN) टेस्टबेड की आवश्यकता है।

डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए इस केंद्र ने मोबिलिटी क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। उन्होंने कहा कि टीआईएचएएन टेस्टबेड राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर शिक्षा, उद्योग और अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं के बीच उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान के लिए एक अनूठा मंच प्रदान करेगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का मोबिलिटी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है और टीआईएचएएन – आईआईटीएच स्वायत्त वाहनों के लिए भविष्य की प्रौद्योगिकी सृजन का स्रोत होगा। उन्होंने यह भी बताया कि स्वायत्त नेविगेशन (हवाई और जमीनी) पर टीआईएचएएन-आईआईटीएच टेस्टबेड हमें अगली पीढ़ी की स्वायत्त नेविगेशन प्रौद्योगिकियों का सटीक परीक्षण करने और तेजी से प्रौद्योगिकी विकास और वैश्विक बाजार में प्रवेश के लिए समर्थ बनाएगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि टीआईएचएएन विशेष रूप से इस दशक के राष्ट्रीय महत्व के कई अनुप्रयोग क्षेत्रों के लिए स्वायत्त यूएवी और जमीनी/सतह वाहनों का उपयोग करके एक वास्तविक समय सीपीएस प्रणाली विकसित और तैनात कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस टेस्टबेड में सिमुलेशन प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जिससे एल्गोरिदम और प्रोटोटाइप के नॉन-डिस्ट्रक्टिव परीक्षण संभव होंगे। स्थलीय प्रणालियों में, इन परिदृश्यों के कुछ उदाहरण स्मार्ट सिटी, सिग्नल वाले चौराहे, साइकिल चालकों और पैदल चलने वालों के साथ स्वचालित वाहनों का परस्पर संपर्क, वाहनों और सड़क किनारे इकाइयों के बीच वायरलेस नेटवर्किंग आदि हैं। स्वायत्त वाहन टेस्टबेड में डमी साइनबोर्ड, पैदल यात्री, ओवरपास और बाइक चालक भी होंगे, ताकि सभी तरह की वास्तविक स्थितियों में परीक्षण हो सके।

डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत को भविष्य की प्रौद्योगिकियों का गंतव्य बनाने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। ऐसी ही एक पहल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की ओर से देश भर में बहु-विषयक साइबर भौतिक प्रणालियों (एनएम-आईसीपीएस) पर राष्ट्रीय मिशन के तहत 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्रों की स्थापना है। इस मिशन के तहत, आईआईटी हैदराबाद को स्वायत्त नेविगेशन और डेटा अधिग्रहण प्रणाली (यूएवी, आरओवी, आदि) की तकनीकी शाखा में प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र प्रदान किया गया है।

एनएम-आईसीपीएस टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनॉमस नेविगेशन (टीआईएचएएन) एक बहु-विषयक पहल है, जिसमें आईआईटी हैदराबाद में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग, मैकेनिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग, गणित, डिजाइन, लिबरल आर्ट्स और उद्यमिता के शोधकर्ता शामिल हैं। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान विभाग से टीआईएचएएन को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान संगठन (एसआईआरओ- सीरो) के रूप में मान्यता प्राप्त है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ श्रीवरी चंद्रशेखर ने बताया कि इस परीक्षण सुविधा में एक हवाई पट्टी, सॉफ्ट लैंडिंग क्षेत्र, ड्रोन रखने के लिए जगह (हैंगर), एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस), प्रदर्शन मूल्यांकन के लिए टेलीमेट्री स्टेशन शामिल है। एलआईडीएआर, रडार, कैमरा आदि जैसे पेलोड के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा रहा है। मैनुअल और स्वायत्त संचालन के बीच नियंत्रण संक्रमण और चालक रहित वाहनों की सार्वजनिक स्वीकृति पर अध्ययन किया जा रहा है। भारतीय परिदृश्य में विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए नियमों और संचालन नीतियों को तैयार करने में मानव रहित वाहनों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण सहायता करेंगी।

(इंडिया साइंस वायर)

TiHAN: India’s first technology innovation hub on autonomous navigation facility launched at IIT Hyderabad.

जानिए थर्माकोल क्यों प्रकृति के लिए हानिकारक है?

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Know why thermocol is harmful to nature?

थर्मोकोल के निपटान का आसान तरीका | Easy way to dispose of thermocol

देश में जोर-शोर से स्वच्छता अभियान (Cleanliness campaign) चलाया जा रहा है। हर नागरिक इसमें भागीदारी कर रहा है। लेकिन एक बड़ा सवाल ऐसे कचरे के निपटान का होता है जो प्रकृति में आसानी से विघटित नहीं होता। थर्मोकोल के साथ भी यही समस्या है। पैकिंग उद्योग और ई-कॉमर्स बाजार में वृद्धि के साथ थर्मोकोल का उपयोग काफी तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इसके निपटान का कोई आसान तरीका नहीं है।

थर्माकोल या पॉलीस्टायरीन का प्राकृतिक निपटान

असल में ताप अवरोधक पैकिंग जैसे कई कार्यों में थर्मोकोल या पोलीस्टायरीन का काफी उपयोग होता है। लेकिन पोलीस्टायरीन के प्राकृतिक निपटान (Natural disposal of thermocol or polystyrene) में सैकड़ों वर्ष लगते हैं तथा इसे दोबारा उपयोग करना काफी महंगा पड़ता है। इस समस्या के हल के लिए हैदराबाद के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में शोधकर्ताओं के एक समूह ने नारंगी के छिलकों के साथ मिलाकर पोलीस्टायरीन के दोबारा उपयोग का नायाब तरीका खोज निकाला है।

पुन: उपयोग या रिसाइक्लिंग जैसे शब्द अब हमारे लिए रोजमर्रा के शब्द बन चुके हैं। कचरा बीनने वाले इस काम में काफी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। हालांकि इकट्ठा करने में परेशानी तथा आर्थिक उपयोगिता के अभाव में वे थर्मोकोल जैसी सामग्रियों को अनदेखा कर देते हैं।

आम तौर पर थर्मोकोल के नाम से प्रसिद्ध पोलीस्टायरीन ऐसा ही एक पदार्थ है, जिसका प्राकृतिक रूप से निपटान नहीं होता। आम तौर पर इसे जला दिया जाता है। थर्माकोल का उपयोग (use of thermocol) सख्त तथा फोम दोनों रूपों में होता है। अपनी दृढ़ता, मजबूती, कम लागत तथा फोम के रूप में उपयोग की क्षमता के कारण डिस्पोजेबल थर्मोकोल प्लेट, कप, पैकिंग जैसे कार्यों में इसका काफी इस्तेमाल होता है। यह काफी ज्वलनशील होता है, तथा जलाने पर हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं।

काफी खर्चीली है थर्मोकोल के निपटान की विधि

थर्मोकोल के निपटान की वर्तमान विधि (method of disposal of thermocol) में काफी ऊर्जा खर्च होती है। इसमें उसे उच्च ताप पर नष्ट किया जाता है। यह तरीका महंगा होने के अलावा पर्यावरण के प्रतिकूल भी है। इन समस्याओं के निराकरण के लिए आईआईटी हैदराबाद में शोधकर्ताओं (Researchers at IIT Hyderabad) के एक ग्रुप ने नारंगी के छिलकों की मदद से इसके दोबारा इस्तेमाल (recycling of thermocol) की एक सस्ती, कम ऊर्जा खपतवाली, पर्यावरण हितैषी विधि खोज निकाली है।

अब आसान होगा थर्मोकोल का निपटान

संस्थान में रासायनिक इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर चन्द्रशेखर शर्मा ने आईआईटी हैदराबाद टेक्नॉलॉजी इनक्यूबेशन सेन्टर में स्टार्ट अप प्रारम्भ किया है तथा अपने शोध को पेटेंट करने का आवेदन भी किया है। इस विधि से विकसित की गई सामग्री में तेल सोखने की क्षमता देखी गई है, जो इसे घरेलू सफाई और तेल रिसाव की समस्या से निपटने के लायक बनाती है।

पोलीस्टायरीन (polystyrene in Hindi) को पहले नारंगी के छिलकों के साथ घोला जाता है और फिर गीले घोल से रेशे निकाले जाते हैं। इन रेशों को कपड़े के रूप में बुना जाता है। ये कपड़े अपने वजन का 40 गुना तेल सोख सकते हैं।

नवनीत कुमार गुप्ता 

देशबन्धु में 6 मार्च 2018 को प्रकाशित खबर का संपादित रूप

आईआईटी हैदराबाद ने विकसित की ब्लैक फंगस के लिए ओरल ड्रग

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IIT Hyderabad develops an oral drug for black fungus

नई दिल्ली, 01 जून : देश में जहाँ एक तरफ कोरोना संक्रमितों की संख्या में कमी देखने को मिल रही है, तो दूसरी ओर ब्लैक फंगस के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। ब्लैक फंगस के अधिकांश मरीज ऐसे हैं, जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, और हाल ही में कोरोना संक्रमण से ठीक हुए हैं।

Many states have declared black fungus a pandemic

देश के कई राज्यों ने ब्लैक फंगस को महामारी घोषित कर दिया है। हालांकि, ब्लैक फंगस के उपचार में प्रयुक्त होने वाली दवाएं अभी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने ब्लैक फंगस के उपचार (black fungus treatment) के लिए एक ओरल सॉल्यूशन विकसित किया  है।

आईआईटी हैदराबाद ने तैयार की है ब्लैक फंगस का दवा | IIT Hyderabad has prepared medicine for black fungus

आईआईटी हैदराबाद ने ब्लैक फंगस के उपचार के लिए एम्फोटेरिसिन बी (एएमबी) दवा की नैनोफाइबर-आधारित गोलियां विकसित की हैं, जो मौखिक रूप से ली जा सकती हैं। आईआईटी हैदराबाद ने कहा है कि रोगी के लिए 60 मिलीग्राम  दवा अनुकूल रहेगी और यह शरीर में धीरे-धीरे नेफ्रो-टॉक्सिसिटी के प्रभाव को कम कर सकती है। नेफ्रो-टॉक्सिसिटी का मतलब रासायनिक कारणों से किडनी को होने वाले नुकसान से है।

वर्ष 2019 में, आईआईटी हैदराबाद के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के सदस्य प्रोफेसर सप्तर्षि मजूमदार और डॉ चंद्रशेखर शर्मा ने अपने एक अध्ययन में कालाजार के इलाज के लिए ओरल नैनो फाइबर युक्त  एएमबी को प्रभावी पाया है। कालाजार के इलाज के लिए एम्फोटेरिसिन बी दवा की गोलियां बनाने का यह पहला प्रयास था।

वर्तमान में, काला जार उपचार का उपयोग ब्लैक फंगस और अन्य फंगस संक्रमण के उपचार के लिए किया जा रहा है। वैसे तो एम्फोटेरिसिन बी दवा का इंजेक्शन बाजार में उपलब्ध है। लेकिन, आईआईटी हैदराबाद ने इस दवा की गोलियां बनायी हैं।

डॉ चंद्रशेखर शर्मा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “एम्फोटेरिसिन बी दवा को इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाए तो विषाक्तता बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे किडनी फेल हो सकती है। इसलिए, इस दवा को डॉक्टर की निगरानी में ही दिया जाता है। दूसरी ओर, इंजेक्शन की कीमत भी ज्यादा है, जिससे इलाज में अधिक खर्च आता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अपनी एम्फीफिलिक प्रकृति के कारण यह दवा शरीर में बेहतर तरीके से घुल नहीं पाती है, और शरीर के आंतरिक तंत्र में अवरोध उत्पन्न करती है। इस कारण रिनल-फिल्ट्रेशन पर दबाव पड़ता है। इसलिए, इस दवा के सीधे मौखिक सेवन से बचा जाता है। हालांकि, मौखिक रूप से यह दवा लेना आरामदायक और प्रभावी तरीका माना जाता है। इसलिए, शोधकर्ताओं  ने अत्यधिक धीमी गति से एम्फोटेरिसिन बी दवा को मौखिक रूप से वितरित करने का निश्चय किया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस शोध का उद्देश्य है दवा शरीर में बेहतर तरीके से घुल जाए और इसकी वजह से जो समस्याएं आ रही हैं, वे कम हो जाएं।

डॉ चंद्रशेखर शर्मा ने कहा है कि इस दवा की तकनीक बौद्धिक संपदा अधिकार से मुक्त है, जिससे इसका व्यापक स्तर पर उत्पादन हो सकता है, और जनता को यह किफायती एवं सुगमता से उपलब्ध हो सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रौद्योगिकी बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपयुक्त फार्मा भागीदारों को हस्तांतरित की जा सकती है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के नैनो मिशन के अनुदान पर आधारित इस अध्ययन में आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर सप्तर्षि मजूमदार एवं डॉ चंद्रशेखर शर्मा के अलावा पीएचडी शोधार्थी मृणालिनी गेधाने और अनिंदिता लाहा शामिल हैं।

(इंडिया साइंस वायर)

जैविक ईंधन आपूर्ति श्रृंखला के अध्ययन में शोधकर्ता कर रहें हैं मशीन लर्निंग का उपयोग

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IIT Hyderabad Researchers use Machine Learning algorithms to study Supply Chain Network of Biofuels

नई दिल्ली, 2 जुलाई (उमाशंकर मिश्र): जीवाश्म ईंधन के घटते भंडार और इसके उपयोग से होने वाले प्रदूषण से जुड़ी चिंताओं ने दुनिया को वैकल्पिक ईंधन की खोज तेज करने के लिए प्रेरित किया है। जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैविक ईंधन के उपयोग की इस बढ़ती आवश्यकता (Increased need for use of organic fuels in place of fossil fuels) को देखते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद के शोधकर्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) आधारित ऐसी कम्प्यूटेशनल विधियों का उपयोग कर रहे हैं जो देश के ईंधन क्षेत्र में जैव ईंधन को शामिल करने से जुड़े कारकों और बाधाओं को समझने में मददगार हो सकती हैं।

Biofuel Supply Chain Network Design and Operations

आईआईटी हैदराबाद के शोधकर्ताओं द्वारा किए जा रहे इस कार्य की एक विशेषता यह है कि इसके ढाँचे में केवल जैविक ईंधन की बिक्री को राजस्व सृजन का आधार नहीं माना गया है, बल्कि इसके अंतर्गत पूरी परियोजना के चक्र में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के माध्यम से कार्बन क्रेडिट को भी शामिल किया गया है। यह अध्ययन शोध पत्रिका क्लीनर प्रोडक्शन में प्रकाशित किया गया है।

शोधकर्ताओं द्वारा विकसित मॉडल से पता चला है कि मुख्यधारा के ईंधन उपयोग में बायो-एथेनॉल क्षेत्र को शामिल करने पर उत्पादन पर सबसे अधिक 43 प्रतिशत खर्च का आकलन किया गया है। जबकि, आयात पर 25 प्रतिशत, परिवहन पर 17 प्रतिशत, ढाँचागत संसाधनों पर 15 प्रतिशत और इन्वेंटरी पर 0.43 प्रतिशत खर्च का आकलन किया गया है।

इस मॉडल ने यह भी दिखाया है कि अनुमानित माँग को पूरा करने के लिए कुल क्षमता के कम से कम 40 प्रतिशत तक फीड उपलब्धता की आवश्यकता है।

आईआईटी हैदराबाद के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख शोधकर्ता डॉ किसलय मित्रा ने कहा है, “भारत में, गैर-खाद्य स्रोतों से उत्पन्न जैविक ईंधन कार्बन-न्यूट्रल नवीकरणीय ऊर्जा का सबसे आशाजनक स्रोत है। इन दूसरी पीढ़ी के स्रोतों में कृषि अपशिष्ट जैसे- पुआल, घास और लकड़ी जैसे अन्य उत्पाद शामिल हैं, जो खाद्य स्रोतों को प्रभावित नहीं करते हैं।”

शोधकर्ताओं की टीम ने देश के कई क्षेत्रों में जैविक ऊर्जा उत्पादन के लिए उपलब्ध विभिन्न तकनीकों पर विचार किया है। इसके साथ-साथ, शोधकर्ताओं ने आपूर्तिकर्ताओं, परिवहन, भंडारण और उत्पादन के आंकड़ों का उपयोग करके इसकी व्यवहार्यता का भी अध्ययन किया है।

इस शोध के बारे में विस्तार से बताते हुए आईआईटी हैदराबाद के रिसर्च स्कॉलर कपिल गुमटे ने कहा,

“हम आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क को समझने के लिए मशीन लर्निंग की तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। मशीन लर्निंग कृत्रिम बुद्धिमत्ता की एक शाखा है, जिसमें कंप्यूटर उपलब्ध डेटा से पैटर्न को सीखता है और भविष्य के लिए सिस्टम और भविष्यवाणियों की समझ विकसित करने के लिए स्वचालित रूप से अपडेट होता है।”

डॉ मित्रा ने कहा है कि “देशव्यापी बहुस्तरीय आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क पर तकनीकी-आर्थिक-पर्यावरणीय विश्लेषण और मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग मांग पूर्वानुमान, आपूर्ति श्रृंखला मापदंडों में अनिश्चितता और उसके कारण परिचालन पर पड़ने वाले प्रभाव एवं दूरगामी निर्णय लेने में उपयोगी हो सकता है।” (इंडिया साइंस वायर)