पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे : क्या होगी बहुवाद और प्रजातंत्र की दशा और दिशा

Dr. Ram Puniyani

Results of assembly elections of five states: what will be the condition and direction of pluralism and democracy

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों की समीक्षा (Review of results of assembly elections of five states) करते हुए आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ राम पुनियानी (Former IIT Professor Dr Ram Puniyani) इस आलेख में चर्चा कर रहे हैं कि वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों पर इन विधानसभा चुनाव के नतीजों का क्या असर पड़ेगा और किस तरह जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर के बावजूद उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्‍तराखंड, मणिपुर और गोवा में हुए विधानसभा चुनावों के न‍तीजे आ गए हैं. चार राज्‍यों में भाजपा को सत्‍ता मिली है और पंजाब में आप की सरकार बन गयी है. पंजाब में ‘आप की जीत’ के पीछे कांग्रेस में गुटबाजी और शिरोमणी आकाली दल की गलत नीतियां जिम्‍मेदार बताई जा रहीं हैं. गोवा में भाजपा को विपक्ष के बिखराव का भी लाभ मिला क्‍योंकि वहां कांग्रेस के अतिरिक्‍त आप और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी मैदान में थी.

उत्‍तराखंड और मणिपुर में भाजपा की शक्‍तिशाली चुनाव म‍शीनरी के सामने कांग्रेस ठहर नहीं सकी. यह इस तथ्‍य के बावजूद कि भाजपा को सत्‍ता में रहने के कारण स्वाभाविक विरोध का सामना करना पड़ रहा था.

उत्तर प्रदेश में थी असली लड़ाई

असली लड़ाई उत्तर प्रदेश में थी, जहाँ भाजपा ने शानदार जीत हासिल की. पूरे देश में, और विशेषकर उत्तर प्रदेश में, नोटबंदी, बेरोज़गारी और महंगाई ने जनता की कमर तोड़ दी थी. कोरोना के नाम पर तुरत-फुरत लगाए गए कड़े लॉकडाउन के कारण गरीब प्रवासी मजदूरों को सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर वापस जाना पड़ा था. आक्‍सीजन की कमी के चलते भारी संख्‍या में कोरोना पीड़ितों को अपनी जान खोनी पड़ी थी. उत्तर प्रदेश में ही उन्‍नाव और हाथरस में हुई बलत्‍कार और हत्‍या की जघन्य घटनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. यही वह राज्‍य है जहाँ एक केन्‍द्रीय मंत्री के पुत्र ने अपनी एसयूवी से किसानों को कुचलकर मार डाला था. यही वह राज्‍य है जहाँ बीफ और गौरक्षा के मुद्दों को लेकर समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण किया गया था और सरकार की नीतियों के चलते अवारा मवेशी किसानों की फसलें नष्‍ट कर रहे थे. यही वह राज्‍य है जहाँ मानव विकास सूचकांकों में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गिरावट आई है .

जातिगत समीकरणों की उत्तर प्रदेश चुनाव में भूमिका?

उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरणों पर भी खूब चर्चा हुई. चुनाव के ठीक पहले कई ओबीसी नेताओं ने भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाले गठबंधन का दामन थाम लिया. ज़मीनी स्‍तर पर काम कर रहे कई पत्रकारों ने यह दावा किया था कि चुनावों में समाजवादी पार्टी की जीत निश्‍चित है. फिर ऐसा क्‍या हुआ कि भाजपा ने बहुत आसानी से समाजवादी पार्टी को पटखनी दे दी?

समाजवादी पार्टी को मिला सत्‍ता-विरोधी लहर का लाभ

जहाँ जातिगत समीकरणों और सत्‍ता-विरोधी लहर का लाभ समाजवादी पार्टी को मिला (Samajwadi Party got the benefit of anti-incumbency wave), वहीं भाजपा के पक्ष में कई कारक काम कर रहे थे. साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण तो था ही, आरएसएस का अत्‍यंत प्रभावी नेटवर्क भी था. हमें यह याद रखना होगा कि भाजपा एक बड़े कुनबे का हिस्‍सा है, जिसका नेतृत्‍व हिंदू राष्‍ट्रवाद के पितृ संगठन आरएसएस के हाथों में है. जब भी कोई चुनाव होता है, संघ के हज़ारों प्रचारक और लाखों स्वयंसेवक भाजपा की ओर से मोर्चा सम्‍हाल लेते हैं.

उत्तर प्रदेश में चुनाव के पहले संघ के सर सहकार्यवाहक अरूण कुमार ने संघ के अनुषांगिक संगठनों के नेताओं की एक बैठक बुलाकर उन्‍हें यह निर्देश दिया था कि चुनाव अभियान में वे भाजपा की मदद करें.

इस बार तो संघ के मुखिया मोहन भागवत ने भी खुलकर कहा था कि‍ चुनाव अभियान में हिंदुत्‍ववादी कार्यक्रमों (राम मंदिर, काशी विश्‍वनाथ कॉरिडोर) व राष्‍ट्रवादी कार्यवाहियों (बालाकोट) को प्रमुखता से उठाया जाए.

चुनाव के दूसरे चरण की समाप्‍ति के बाद भागवत ने संघ के कार्यकर्ताओं से ज़ोर-शोर से भाजपा के पक्ष में काम करने का निर्देश दिया था क्योंकि ऐसा लग रहा था कि पहले दो चरणों में भाजपा का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था.

जातिगत समीकरणों की काट धार्मिक ध्रुवीकरण

जहाँ तक जातिगत समीकरणों का प्रश्‍न है उन्‍हें साधने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण को और गहरा किया गया. सोशल इंजीनियरिंग (social engineering) के जरिए पार्टी ने पहले ही पददलित वर्गों को अपने साथ ले लिया था. संघ के कुनबे के पास पहले से ही एक विशाल प्रचार तंत्र है जिसके जरिए वह समाज के प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति तक अपनी बात पहुंचा सकता है.

यह सचमुच अद्भुत है कि संघ ने किस प्रकार बढ़ती हुई कीमतों, युवाओं में बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली और अल्पसंख्‍यकों को आतंकित करने की अनेक घटनाओं के बावजूद मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल की .

गज़वा-ए-हिन्‍द का डर योगी आदित्‍यनाथ ने दिखाया

सन् 2017 के चुनाव में भाजपा गठबंधन ने यह प्रचार किया था कि केवल वही हिन्‍दुओं के हितों की रक्षा कर सकता है और समाजवादी पार्टी व कांग्रेस मुस्‍लिम परस्‍त हैं. इस बार योगी आदित्‍यनाथ ने गज़वा-ए-हिन्‍द का डर दिखाया (Yogi Adityanath showed the fear of Ghazwa-e-Hind) और कहा कि मुसलमान अपनी आबादी बढ़ाकर देश पर अपना नियंत्रण स्‍थापित करना चाहते हैं. योगी और मोदी दोनों मुस्‍लिम अल्‍पसंख्‍यकों को निशाना बनाते रहे. मोदी ने कहा कि साईकिल (समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्‍ह) का इस्‍तेमाल बम धमाके करने के लिए किया जाता रहा है.

यह दुष्‍प्रचार भी किया गया कि केवल मुसलमान ही आतंकवादी होते हैं.

योगी, समाजवादी पार्टी को मुसलमानों से और मुसलमानों को माफिया, अपराध और आतंकवाद से जोड़ते रहे. कैराना के नाम पर डर पैदा किया गया और मुज़फ्फरनगर हिंसा (Muzaffarnagar Violence) के लिए मुसलमानों को जिम्‍मेदार ठहराया गया. आदित्‍यनाथ ने 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की बात कहकर समाज को बाँटने का भरसक प्रयास किया. वे मुलायम सिंह यादव को अब्‍बाजान कहते रहे. इस बार योगी ने भाजपा के विघटनकारी एजेंडे को लागू करने में अपने सभी पिछले रिकॉर्ड ध्‍वस्‍त कर दिए.

इन नतीजों का 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर क्‍या असर होगा यह कहना अभी मुश्‍किल है. यद्यपि मोदी ने तो यह कह ही दिया है कि 2024 में इन्‍ही चुनावों के नतीजे दोहराए जाएंगे. यह सही है कि वर्तमान में देश में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ऐसी कोई राजनैतिक शक्‍ति नहीं है जो विभाजनकारी राजनीति के बढ़ते कदमों को थाम सके, हमारी प्रजातांत्रिक संस्‍थाओं में आ रही गिरावट को रोक सके, लोगों के लिए रोज़गार की व्‍यवस्‍था कर सके, आर्थिक असमानता को घटा सके और किसानों की बदहालही को दूर कर सके. आज हमारे देश में धार्मिक अल्‍पसंख्‍यक डरे हुए हैं और अपने मोहल्‍लों में सिमट रहे हैं.

देश में प्रजातांत्रिक अधिकारों और धार्मिक स्‍वतंत्रता से जुड़े सूचकांकों में गिरावट आ रही है. फिरकापरस्‍ती ने जनमानस में गहरी जड़ें जमा ली हैं. साम्‍प्रदायिक ताकतें अत्‍यंत कुशलतापूर्वक लोगों की राय बदल रही हैं. गोदी मीडिया, सोशल मीडिया, आईटी सेल और फेक न्‍यूज़ साम्‍प्रदायिक राष्‍ट्रवादियों को मजबूती दे रहे हैं.

विधानसभा चुनाव के नतीजों का संदेश क्या है? | What is the message of assembly election results?

विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह साफ हैं कि भाजपा-आरएसएस की चुनाव मशीनरी (BJP-RSS election machinery) अत्‍यंत शक्‍तिशाली है और बंटा हुआ विपक्ष उसका मुकाबला नहीं कर सकता. विपक्ष का हर नेता अपने आप को मोदी के विकल्‍प के रूप में प्रस्‍तुत कर रहा है. इससे न तो साम्‍प्रादियक ताकतें पराजित होंगी और ना ही देश संविधान के दिखाए रास्‍ते पर चल सकेगा. क्‍या सभी विपक्षी पार्टियां, संवै‍धानिक मूल्‍यों की रक्षा और जनकल्‍याण पर आधारित न्‍यूनतम सांझा कार्यक्रम तैयार कर एक गठबंधन नहीं बना सकतीं? इस गठबंधन का नेता कौन हो यह चुनाव के बाद तय किया जा सकता है. गठबंधन के जिस घटक के सबसे अधिक सांसद हो, प्रधानमंत्री का पद उसे दिया जा सकता हैं.

अब समय आ गया है कि जो लोग गाँधी, अम्‍बेडकर और भगतसिंह के मूल्‍यों की रक्षा करना चाहते हैं वे अपने व्‍यक्‍तिगत हितों की परवाह न करते हुए देश और उसके नागरिकों के हितों की चिंता करें. यह हमारे नेताओं के लिए परीक्षा की घड़ी है. क्‍या वे केवल अपनी प्रगति की सोचते रहेंगे या वे देश के करोंड़ों नागरिकों की फिक्र करेंगे?

-राम पुनियानी

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

और वह हार गयी – मगर क्या सिर्फ वही हारी है ?

ladki hoon lad sakti hoon

और वह हार गयी !! आशा सिंह चुनाव हार गयीं !!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों (Uttar Pradesh assembly election results) में से एक था उन्नाव का नतीजा जहां से आशा सिंह ठाकुर चुनाव लड़ रही थीं। आशा सिंह किसी कांग्रेस नेता के परिवार से नहीं आती हैं न ही वह राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया था।

आशा सिंह में क्या खास था कि उन्हें विधानसभा में पहुंचना चाहिये था ?

2017 में उन्हीं की बेटी के साथ तब के भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने जघन्य बलात्कार किया था और बाद में थाने में ही आशा के पति की पुलिस और सेंगर के लोगों ने हत्या भी कर दी थी। लेकिन आशा ने अपनी लड़ाई जारी रखी।

2017 के हौलनाक और जघन्य हादसे को झेलते हुये आशा ने पिछला समय न्याय के लिये लड़ते हुये गुजारा। आज कुलदीप सेंगर जेल की सलाखों के पीछे है और उस पर लगे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। ‘‘मैं लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के आत्मविश्वास और झंकार पैदा करने वाले माहौल में वे चुनाव मैदान में उतरीं।

इस विधान सभा चुनाव में आशा ने पीड़ित महिलाओं की आवाज को विधान सभा के जरिये उठाने के लिये चुनाव लड़ने का निर्णय किया। एक राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर वे खडी हुयीं। लेकिन जवाब में जनता ने उन्हें वोट कितने दिये ? केवल 478 !! ये वोट नोटा को मिले वोटों से भी कम थे।

क्या जनता के मन में मानवीय संवेदनाएं मर गई हैं?

आशा को मिले इतने कम वोटों ने इस देश में जनता के मन में मरती जाती मानवीय संवेदनाओं का सबूत एक बार फिर से सामने ला दिया है। एक हौलनाक हादसे को झेलकर हिम्मत के साथ संघर्ष करने वाली महिला के मुकाबले किसी बाहुबली को अपना जनप्रतिनिधि बनाने वाली जनता को अब पूरी तरह से तैयार कर दिया गया है। हुक्मरानों को ऐसी ही जनता चाहिये। इसलिये मानवीय संवेदनाओं से रहित ऐसा समाज सायास बनाया जा रहा है और यह कोशिश पिछले कई सालों से की जा रही है।

How many votes did Irom Sharmila get?

इसका एक उदाहरण 2017 में मणिपुर के विधानसभा चुनावों में इरोम शर्मिला का भी है। इन चुनावों में आयरन लेडी कहलाने वाली और प्रदेश से अफ्स्पा जैसे खतरनाक और नागरिक अधिकारों पर हमला करने वाले कानून को हटाने के लिये लगातार 17 सालों तक भूख हड़ताल करने वाली इरोम शर्मिला (Irom Sharmila) ने चुनाव लड़ने और जनविरोधी कानून हटाने के लिये लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी का फैसला किया। दुनियां भर के साथ साथ मणिपुर में भी लोकप्रिय इरोम शर्मिला को कितने वोट मिले ? केवल 90 !! जिस कानून को हटाने के लिये पूरे मणिपुर की जनता संघर्ष कर रही थी उसी संघर्ष को आगे ले जाने वाली इरोम को वही जनता विधानसभा में पहुंचाने के लिये तैयार नहीं हुयी। मीडिया ने इसके लिये खबर बनायी कि इरोम ने आप पार्टी से पैसे लिये थे इसलिये जनता ने उन्हें हराया। तो वही जनता शराब बांटने वाले, वोटरों को खरीदने वाले गुंडों, मवालियों और बलात्कारियों तक को क्यों वोट दे देती है ?

यानि आशा सिंह हो या इरोम शर्मिला जनता के लिए संघर्ष करने वाली कोई भी व्यक्ति आज वोट देने वाले नागरिकों के दिलों में नहीं उतर पाती।

सहानुभूति, प्यार और मानवीय संवेदनायें धीरे-धीरे खत्म की जा रही हैं। और यह हुक्मरानों के द्वारा अपनाई जा रही एक खास तरीके की मोडस ऑपरेंडी है कि जनता को उनके जीवन से जुड़े मुद्दों पर वोट देने के लिये तैयार होने ही मत होने दो।

उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों के दौरान हुयी आमसभायें, भाजपा के नेताओं को जनता के द्वारा भगाया जाना ये घटनाएं इस तरह के परिणामों की ओर संकेत नहीं करते थे। लेकिन वोट देने के लिये खड़े हुये व्यक्ति के दिल दिमागों में हिंदू मुसलमान के आभासीय मुद्दे इस कदर भर दिये गये थे कि वे अपनी बदहाली भूल कर भाजपा को वोट दे बैठे। यह काम किसी व्यापारी के द्वारा अपना माल बेचने के लिये दिखाये जा रहे विज्ञापन की तरह किया जा रहा है जिसमें खरीददार अपने घर के लिये जरूरी नमक के बजाये विज्ञापन में दिखायी जा रही क्रीम खरीद कर घर आ जाता है। जिस तरह से पूंजीवादी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिये माल ही नहीं उस माल को खरीदने वाली जनता भी तैयार करते हैं उसी प्रकार अब चुनावों में भाजपा उसे ही जीत दिलाये ऐसी अंधभक्त, लाचार और धर्म के नशे में चूर जनता को तैयार कर रही है। 

दुख की बात यह है कि ये नतीजे उस उत्तर प्रदेश में आये हैं जहां पर अभी पिछले साल गंगा में बहती लाशें लोगों के दिलों दिमाग में छाई हुयी हैं, बिना सोचे समझे लगे लॉकडाउन के कारण लाखों की संख्या में उत्तर प्रदेश का मजदूर पूरे देश से पैदल लौटा हुआ आज भी याद है, आगरा में पैसा न मिलने के कारण ऑक्सीजन बंद करके लोगों को मार डालने की घटनाओं के ज़ख्म जहां पर आज भी हरे हैं, जहां पर इलाहाबाद में ठीक चुनावों के पहले हजारों नौजवान नौकरी की मांग करते हुये सड़कों पर निकले और उन पर हुये बर्बर लाठी चार्ज के घाव आज भी ताजा हैं। उस प्रदेश में ऐसे नतीजे आयेंगे ऐसी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

लोकतंत्र में अपने वोट से किसी को सत्ताधारी बनाने वाली इस जनता को इतना लाचार और बेचारा बना दिया गया है कि 5 किलो अनाज का लालच देकर भाजपा के नेता यह कहते हैं कि हमारा नमक खाया है उसे भूलना मत।

यह बात सही है कि हमारे मध्यम वर्गीय को भाजपा नेताओं के ये भाषण हास्यास्पद और अपमानास्पद लगेंगे लेकिन हिदू मुसलमान के आभासीय भेदभाव में फंसी गरीब और लाचार जनता को यह लगता है कि उसे सरकार के नमक का फर्ज निभाना है। इस स्थिति से यदि निपटना है तो आंदोलनों में भागीदारी भर से जनता जागरूक नहीं बन सकती वरना जिस मुजफफरनगर में किसान आंदोलन के दौरान सबसे बड़ी महापंचायत हुयी और लाखों की संख्या में जनता जुटी वहां पर दोबारा भाजपा के उम्मीदवार नहीं जीतते।

मनुष्य को वहशी, संवेदनहीन और वंचित को याचक बना देने के ये प्रयास एक खास मुहिम के तहत जारी हैं – उसे समझना होगा। सरकार का नमक खाने के उलटे सोच को नियति मान बैठी जनता की समझ को पलटने के प्रयास भी आंदोलनों के साथ-साथ गंभीरता से करने होंगे वरना इसी तरह के शर्मसार करने वाले फैसले आते रहेंगे।

संध्या शैली

केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य अखिल जनवादी महिला समिति (AIDWA)

अखिलेश ने भाजपाई मीडियाकर्मी (!) को हड़काया, तो भाजपा ने वीडियो ट्वीट कर खुद की और मीडियाकर्मी की थू-थू कराई

akhilesh yadav abhishek upa

उत्तर प्रदेश विधानसभा 2022 का शंखनाद (Uttar Pradesh Vidhan Sabha 2022) चुका है। भाजपा ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तंज कसा (BJP took a jibe at SP President Akhilesh Yadav) है कि वो चुनाव में दिख रही हार से बौखला गए हैं

लखनऊ, 28 जनवरी 2022: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 का शंखनाद चुका है, और तमाम नेताओं के बीच आरोप – प्रत्यारोप की बाढ़ आ गई है। ऐसे में कॉरपोरेट वित्तपोषित मीडिया भाजपा के स्वयंसेवक की तरह आचरण कर रहा है और सपा मुखिया अखिलेश यादव उसके निशाने पर रहते हैं।

इस बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो भाजपाई मीडियाकर्मी समझे जाने वाले एक टीवी कर्मचारी को कह रहे हैं कि अब वो उनके चैनल पर नहीं बैठेंगे। सपा मुखिया के इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर तंज कसा और कहा कि वो चुनाव में दिख रही हार से बौखला गए हैं। लेकिन इस क्लिप को लेकर भाजपा ने खुद अपनी और भाजपाई मीडियाकर्मी समझे जाने वाले उक्त टीवी कर्मचारी की तू-थू करा ली है।

जानिए क्या है पूरा मामला?

बता दें कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव एक निजी समाचार चैनल चैनल टीवी9 भारतवर्ष के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। जहां वो एक एंकरिंग कर रहे मीडियाकर्मी से नाराज हो गए और कहने लगे कि अब आपका टाइम खत्म हो गया है, इसलिए मैं जाना चाहता हूं और मैं अब आपके चैनल पर कभी नहीं बैठूंगा। ये मेरा आखिरी इंटरव्यू है, इसके मैं नहीं बैठूंगा। इसके बाद जब एंकर ने यादव से दोबारा सवाल किया तो उन्हें गुस्सा आ गया। ऐसे में वो कहते नजर आए को आप लोग बायस्ड हैं। मैं नहीं बैठूंगा।

उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा कि यूपी में विकास को लेकर आप कुछ नहीं पूछ रहे और भाजपा में जो अपराधी हैं, उनका नाम भी नहीं ले रहे। यूपी को जिस तरह से बर्बाद किया गया, आपने उसके बारे में सवाल नहीं किया। बाद में अखिलेश यादव एंकर से ये भी कहते हुए नजर आए कि आपने तो आधे घंटे का समय मांगा था और मैं इससे अधिक नहीं बैठूंगा। मेरा समय हो चुका है, इसलिए मैं जा रहा हूं।

इस पर क्या बोली भाजपा?

अखिलेश यादव के इस साक्षात्कार को लेकर उत्तर प्रदेश भाजपा ने ट्वीट किया है। ट्वीट में एक छोटा का वीडियो भी है। वहीं, कैप्शन में लिखा है, “चुनाव में दिखती साफ हार से अखिलेश यादव बौखला गए हैं। उन्हें पता चल चुका है कि वो हार रहे हैं। इस वजह से गुस्सा उनकी नाक पर साफ दिखाई दे रहा है।”

अब ये समझ में नहीं आ रहा कि भाजपा अखिलेश यादव पर सवाल उठा रही है या अखिलेश यादव के सवालों को ट्वीट कर खुद की और उक्त मीडियाकर्मी की थू-थू करा रही है?

सोशल मीडिया पर चटखारे ले रहे हैं लोग

क्या भाजपा के दबाव में हैं अखिलेश यादव?

Is Akhilesh now under pressure from the BJP

ऐसा इसलिए क्योंकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा (UP CM Yogi Adityanath announcement to contest assembly elections from Gorakhpur) के बाद से लगातार खबरें आ रही हैं कि अब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव (Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav) भी यूपी विधानसभा चुनाव 2022 की जंग में कूद पड़ेंगे.

कहाँ से चुनाव लड़ेंगे अखिलेश यादव?

पहले अखिलेश के आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की चर्चा थी. लेकिन अब कुछ और सीटों की भी चर्चा शुरू हो गई है, क्योंकि अखिलेश ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि वह योगी जी से पहले चुनाव लड़ सकते हैं.

छठे चरण में है गोरखपुर में मतदान

आपको बता दें कि गोरखपुर में छठे चरण में मतदान होगा, जबकि आजमगढ़ में सातवें और आखिरी चरण में मतदान होगा. तो इसका मतलब यह भी है कि अखिलेश पांचवें चरण में किसी भी सीट से चुनाव लड़ेंगे।

खैर, यह जल्द ही पता चलेगा कि अखिलेश विधायक बनने के लिए कहां से उतरेंगे?

लेकिन अगर सपा को यह कवायद करनी ही है, यानी अखिलेश के लिए सुरक्षित सीट की तलाश चल रही है, तो इसका क्या मतलब होना चाहिए?

क्या अखिलेश अब भाजपा के दबाव में हैं? | Is Akhilesh now under pressure from the BJP?

वैसे भी पिछले दो दिनों में भाजपा ने न सिर्फ सपा में बल्कि सीधे यादव खानदान में सेंध लगाई है. मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा बिष्ट यादव पहले भाजपा में गईं, अब उनके ससुर यानी प्रमोद गुप्ता भाजपा में गए.

इसके साथ ही भाजपा ने कांग्रेस की पोस्टर गर्ल प्रियंका मौर्य को भी भगवा रंग में रंग दिया।

दो दिनों की यह रफ्तार बता रही है कि भाजपा में अमित शाह की रणनीति अब असर दिखा रही है. संभव है कि आने वाले समय में भाजपा विरोधी पार्टियों को कुछ और बड़े झटके लगे।

  • तो क्या भाजपा के इस दबाव के असर से बदलेगी यूपी चुनाव की तस्वीर?
  • क्या अखिलेश यादव अपने परिवार के टूटने के बावजूद मतदाताओं को जोड़ पाएंगे?
  • क्या प्रियंका मौर्य के जाने से कांग्रेस के लड़की हूं लड़ सकती हूं कैंपेन पर कोई फर्क पड़ेगा?

आज चर्चा में भाग ले रहे हैं: 1. जयशंकर गुप्ता (देशबंधु के कार्यकारी संपादक) 2. प्रो. रविकांत (लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) 3. पीयूष पंत (वरिष्ठ पत्रकार) 4. अमलेंदु उपाध्याय (ऑनलाइन संपादक-देशबंधु)

यूपी चुनाव 2022 : हो चुकी है मोदी राज के अंत की शुरूआत!

driven in bjp for the first time in 70 years under modi's rule

UP Elections 2022: The end of Modi Raj has begun! | 70 सालों में मोदी राज में पहली बार भाजपा में खदेड़ा

ओमिक्रॉन से संचालित कोरोना की तीसरी लहर (Omicron-powered third wave of corona) के ज्वार को देखते हुए, चुनाव आयोग को विधानसभाई चुनावों के अगले चक्र की तारीखों की घोषणा के साथ ही, चुनाव सभाओं, जुलूसों, आदि पर फिलहाल रोक लगानी पड़ी है। फिर भी मतदान की तारीखों के ऐलान के बाद के थोड़े से अर्से में ही काफी कुछ ऐसा घटा है, जिसने उत्तर प्रदेश समेत इन सभी राज्यों के चुनाव को, एक खुला मुकाबला बनाकर काफी दिलचस्प बना दिया है। हमारा इशारा मोदी राज में संभवत: पहली ही बार देखने में आए इस दृश्य से है कि चुनावों की ऐन पूर्व-संध्या में, दूसरे पार्टियों के नेताओं के तथा विशेष रूप से संभावित उम्मीदवारों के भाजपा की ओर पलायन का जो तांता लगा रहता था, इस बार उससे उल्टा हो रहा है।

भाजपा में मची भगदड़ के चुनावी अर्थ

इकतरफा तौर पर भाजपा से पलायन न सही, पर भाजपा से दूसरी पार्टियों की ओर उल्लेखनीय पलायन हो रहा है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) तथा दारा सिंह चौहान (Dara Singh Chauhan) के योगी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के साथ भाजपा में मची भगदड़, जिसके चुनावी अर्थ (Election meaning of stampede in BJP) की हम जरा बाद में चर्चा करेंगे, हवा में इस बदलाव का जाहिर है कि सबसे प्रमुख उदाहरण है। लेकिन, यह रुझान सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही देखने को नहीं मिल रहा है।

गोवा, उत्तराखंड में भी भाजपा में भगदड़

चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से गोवा में भी, भाजपा सरकार के एक मंत्री तथा एक विधायक, अब तक कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं, जबकि कांग्रेस से दलबदल कराने के अलावा जिन सहयोगी पार्टियों के सहारे भाजपा ने पांच साल गोवा में चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी रहने के बावजूद पांच साल सरकार चलाई थी, उनके भाजपाविरोधी खेमों के साथ जुड़ जाने से, भाजपा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

हरक सिंह रावत की उत्तराखंड कैबिनेट से त्यागपत्र की धमकी

इसी तरह, चुनाव की तारीखों की घोषणा से चंद रोज पहले उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, हरखसिंह रावत ने मंत्रिमंडल की बैठक से बहिर्गमन करने के बाद, इस्तीफा देने की धमकी (Harak Singh Rawat threatens to resign from Uttarakhand cabinet) दे दी थी। बाद में भाजपा बेशक इस संकट को टालने में कामयाब रही लगती है, लेकिन यह संकट सचमुच टल गया है या सिर्फ तत्काल टाला गया था, इसका पता उम्मीदवारों की सूचियां जारी होने के बाद ही चलेगा।

याद रहे कि उत्तराखंड में, कार्यकाल के बीच में से ही हटाए गए, दो पूर्व-मुख्यमंत्री भी बैठे हुए हैं, जिनकी मौजूदगी से वर्तमान मुख्यमंत्री की मुश्किलें बढ़ने ही जा रही हैं।

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के केंद्र में है उत्तर प्रदेश का चुनाव

इस तरह विधानसभाई चुनावों का यह चक्र, जिसके केंद्र में उत्तर प्रदेश का चुनाव (The election of Uttar Pradesh is at the center of the assembly elections of 5 states.) है, ऐसा चक्र है जिसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की निर्णायक रूप से हार भी हो सकती है। बेशक, पिछले साल के पूर्वार्द्ध में हुए विधानसभाई चुनावों में भी भाजपा को बाकायदा तगड़ा झटका लगा था। उस चक्र में वह सिर्फ असम में, वह भी वोटों के बहुत ही मामूली अंतर से ही, अपनी सरकार को बचाए रख पाई, जबकि केरल में उसका खाता ही बंद हो गया और तमिलनाडु में उसकी सहयोगी, एआईएडीएमके के हाथ से सरकार निकल गई। और बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद, मोदी-शाह जोड़ी को जैसी भारी हार झेलनी पड़ी, उसका दर्द तो अभी तक गया नहीं लगता है।

फिर भी, विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में, पिछले चक्र से यह बड़ा अंतर है कि इस चक्र में चुनाव में जा रहे पांच राज्यों में से, चार में भाजपा की सरकारें हैं, जबकि पिछले चक्र में असम में ही भाजपा की सरकार थी, जबकि तमिलनाडु में उसकी सहयोगी पार्टी की सरकार तो थी, लेकिन उसमें भाजपा की परोक्ष हिस्सेदारी ही थी।

पिछले विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन खराब तक ही रहा

इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि विधानसभा चुनाव के पिछले चक्र में ही नहीं बल्कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अब तक आए तमाम विधानसभाई चुनावों में और इसमें हम कुछ ही महीने पहले हुए करीब ढाई दर्जन विधानसभाई और तीन लोकसभाई सीटों के उपचुनाव के नतीजे भी जोड़ सकते हैं, मोदी के खुद चुनाव प्रचार का नेतृत्व करने के बावजूद, भाजपा का प्रदर्शन मामूली से लेकर खराब तक ही रहा है।

इसके बावजूद, मोदी के दूसरे कार्यकाल में हुए इन विधानसभाई चुनाव के नतीजों को, उस तरह से मोदी निजाम के भविष्य के संकेतक के रूप में नहीं देखा जा रहा था, जैसे इस फरवरी-मार्च में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों के नतीजों को देखा जाएगा। और इसकी वजह सिर्फ इतनी ही नहीं है कि विधानसभाई चुनावों का यह चक्र आने तक, मौजूदा मोदी सरकार के कार्यकाल का उत्तरार्द्ध शुरू हो चुका है और सरकार के कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में, अगले चुनाव की अटकलें लगना शुरू हो ही जाता है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव (Why is the Uttar Pradesh assembly election important?)

बेशक, इसका संबंध इससे भी है कि विधानसभाई चुनाव के इस चक्र में, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की भी किस्मत का फैसला होना है और लोकसभा में मोदी सरकार के पूर्ण बहुमत में, सबसे बड़ा हिस्सा इस राज्य का ही है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तो यह हिस्सा और भी बड़ा था।

उत्तर प्रदेश के चुनाव के इस असाधारण महत्व के बावजूद, विधानसभाई चुनाव के इस चक्र को मोदी राज के भविष्य का संकेतक मानने के कारण, इससे कहीं बड़े हैं।

चुनाव के इस चक्र के विशेष रूप से भविष्य के लिए संकेत माने जाने का संबंध इस तथ्य से है कि जिस तरह विधानसभाई चुनावों का यह चक्र, हिंदी हार्टलैंड पर केंद्रित है, उस तरह विधानसभाई चुनावों का हाल का कोई चक्र केंद्रित नहीं था। बेशक, इस चक्र में गोवा तथा मणिपुर के विधानसभाई चुनाव भी शामिल हैं, फिर भी इस चुनाव के महत्व का पलड़ा हिंदीभाषी क्षेत्र की धुरी, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के पक्ष में ही झुका हुआ है, जो वैसे भी दो दशक पहले तक उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था। पंजाब बेशक, सीधे-सीधे इस क्षेत्र का हिस्सा नहीं है और वहां के राजनीतिक समीकरण भी इस क्षेत्र से काफी भिन्न हैं, जहां भाजपा सत्ता की दावेदार न पहले कभी थी और न अब है। फिर भी, अपनी इन विशिष्टïताओं के बावजूद, उत्तरी भारत के हिस्से के तौर पर पंजाबियों का राजनीतिक झुकाव हमेशा, शेष उत्तरी भारत यानी हिंदी पट्टी की संगति में ही रहा है।

दरक चुका लगता है हिंदी पट्टी का भाजपा का आधार (BJP’s base of Hindi belt seems to have cracked)

और हिंदी-भाषी क्षेत्र, भाजपा-आरएसएस की सत्ता का ही नहीं, उसकी सत्ता को वैचारिक आधार मुहैया कराने वाले विचारों तथा मूल्यों का भी, मुख्य आधार रहा है। इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक-सामाजिक-वैचारिक वर्चस्व के आधार पर ही आरएसएस-भाजपा के लिए, देश के दूसरे अनेक हिस्सों में अपने पांव फैलाना संभव हुआ है, हालांकि दक्षिण भारत में और उससे कम हद तक पूर्वी भारत में भी, उसे अब भी बहुत उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिल पाई है। यह उसके बहुसंख्यक सांप्रदायिक गोलबंदी (majority communal mobilization) और इजारेदार पूंजी के आशीर्वाद की चमक-दमक के सारे योग को आजमाने के बावजूद है। लेकिन, मोदी राज के दुर्भाग्य से, हिंदी पट्टी का उसका यही आधार, कम से कम राजनीतिक स्तर पर काफी दरक चुका लगता है। मोदी के राज में ही पहले दिल्ली तथा बिहार और उसके बाद, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने, उसके राजनीतिक वर्चस्व को नकार दिया था। यह दूसरी बात है कि भाजपा ने बाद में, कर्नाटक की ही तरह, मध्य प्रदेश में भी नंगी खरीद-फरोख्त के जरिए, जोड़-गांठ कर फिर से अपनी सरकार बना ली।

संघ-भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी सारी ताकत क्यों झोंक दी है?

हिंदी पट्टी के नक्शे पर रखकर देखें तो, मोदी की भाजपा का राजनीतिक बोलबाला पहले ही, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा हिमाचल तक ही सिमट कर रह गया है। इसे ध्यान में रखें तो, चुनावों के इस चक्र का मोदी राज के भविष्य के लिए अर्थ, खुद ही उजागर हो जाता है। अचरज की बात नहीं है कि संघ-भाजपा ने खासतौर पर उत्तर प्रदेश में और उत्तराखंड में भी, अपनी सारी ताकत झोंक दी है। इसमें एक ओर मोदी सरकार का, खुद प्रधानमंत्री के तथा उनके अधिकांश मंत्रियों के समय समेत, सरकारी एजेंसियों सहित केंद्र व राज्य के सभी संसाधनों का झोंका जाना शामिल है, तो दूसरी ओर भाजपा द्वारा बढ़ती नंगई से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (communal polarization) की अपनी तुरप का सहारा लिया जाना भी शामिल है। इसमें मुख्यमंत्री, आदित्यनाथ द्वारा आने वाले चुनाव को 80 फीसद बनाम 20 फीसद का चुनाव कहकर, इसे हिंदू-मुसलमान के चुनाव के रूप में पेश किए जाने से लेकर, इस चुनाव की ही संगति में सांप्रदायिक ताप बढ़ाने के लिए तथाकथित ‘धर्म-संसदों’ के ऐलान तक शामिल हैं। अचरज नहीं कि इसमें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव में उतारे जाने के जरिए, राम मंदिर के मुद्दे को और भी प्रत्यक्ष रूप से भुनाने की कोशिश भी जुड़ जाए।

मोदी निजाम की बदहवासी क्यों बढ़ गई है?

कहने की जरूरत नहीं है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ज्यादा से ज्यादा खुलकर इस्तेमाल करने की ये कोशिशें, संघ-भाजपा के चरित्र को ही नहीं, मोदी निजाम की बदहवासी को भी दिखाती हैं। यह बदहवासी, इसलिए और भी बढ़ गई है कि 2014 से भाजपा ने, जाहिर है कि अपनी सांप्रदायिक दुहाई के सीमेंट के सहारे, अपने मूल सवर्ण-संपन्न आधार के गिर्द, गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के अच्छे-खासे हिस्से की, जो सपा-बसपाविरोधी या यादव-जाटव विरोधी लामबंदी कर ली थी, वह अब बिखरती नजर आ रही है। जाहिर है कि इस गोलबंदी के बिखरने में भाजपा की डबल इंजन सरकारों की हर मोर्चे पर विफलता (BJP’s double engine governments failure on every front) से लेकर, योगी की ठाकुरशाही में पिछड़ी जातियों व दलितों के साथ अन्यायों का बहुत बढ़ जाना तक शामिल हैं।

भाजपा में पिछड़े वर्ग के नेताओं की बगावत का क्या कारण है?

भाजपा में संघ के रास्ते नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से आए पिछड़े वर्ग के नेताओं की बगावत, संघ-भाजपा के किले की इसी दरकन की शुरूआत है। इनमें से ज्यादातर ताकतों के समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के नेतृत्ववाली कतारबंदी की ओर बढ़ने ने, उत्तर प्रदेश में भाजपा राज के लिए सचमुच खतरा पैदा कर दिया है।

तो क्या अमित शाह भाँप गए थे यूपी से शुरुआत हो गई है मोदीराज के अंत की?

अमित शाह ने लखनऊ में एक रैली में ऐलान किया था कि 2024 के चुनाव का रास्ता, 2022 से होकर जाता है। जाहिर है कि इस तरह वह मोदी राज के भविष्य को, उत्तर प्रदेश के चुनाव से जोड़कर, इस प्रदेश के चुनाव को मोदी राज के लिए चुनाव बताकर, तमाम मोदी समर्थकों को इस चुनाव में गोलबंद करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, लगता है कि 2022 के चुनाव और खासतौर पर उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के चुनावों से, 2024 में मोदी राज के अंत की ही शुरूआत हो सकती है।

राजेंद्र शर्मा

तो पोस्टल बैलट से तय होगी यूपी की कुर्सी !

Election Commission of India

Next government in UP will be decided by postal ballot

पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव (Assembly elections to be held in five states) में खास तौर से उत्तर प्रदेश में पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल (Use of postal ballot in Uttar Pradesh) करने वाले मतदाता तय करेंगे कि अगली सरकार किसकी होगी। यह बात आपको चौंकाने वाली जरूर लग सकती है लेकिन भरमाने वाली नहीं है। चुनाव आयोग ने पोस्टल बैलेट से वोट करने वाले मतदाताओं के आधार में जो बदलाव किया है उससे यही स्थिति बन रही है।

यूपी के अलावा बाकी राज्यों में भी ऐसा ही होगा, मगर हम यहां उत्तर प्रदेश के आंकड़ों के जरिए इस स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं।

यूपी चुनाव में कौन डाल सकेगा पोस्टल वोट? | Who will be able to cast postal vote in UP elections?

चुनाव आयोग ने पोस्टल वोट का दायरा बढ़ा दिया है। इसमें 80 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग वोटर के साथ-साथ कोविड पॉजिटिव या कोविड संदिग्ध (covid positive or covid suspect) भी शामिल हैं। चुनाव आयोग ने पोस्टल बैलेट के लिए जो आधार तय किए हैं उन पर गौर करें-

>> मतदाता सूची में जो दिव्यांग के रूप में दर्ज हैं।

>> अधिसूचित आवश्यक सेवाओं में जो मतदाता रोजगार में हों

>> जिनकी उम्र 80 साल से अधिक है।

>> जो मतदाता सक्षम अधिकारी से कोविड पॉजिटिव/संदिग्ध के तौर पर सत्यापित हों और क्वारंटीन (होम या इंस्टीच्यूशनल) में हों।

यूपी में 80 साल से अधिक उम्र के मतदाताओं की संख्या | Voters above 80 years of age in UP

उत्तर प्रदेश में 80 साल से अधिक उम्र के मतदाताओं की संख्या चुनाव आयोग के अनुसार 24 लाख 3 हजार 296 है। आयोग के ही अनुसार यूपी में दिव्यांग मतदाताओं की तादाद (Number of Divyang Voters in UP) 10 लाख 64 हजार 266 है। अधिसूचित आवश्यक सेवाओं के तहत कार्यरत मतदाताओं की संख्या स्पष्ट नहीं है। फिर भी इसकी अनुमानित संख्या 6 लाख के करीब है। इस तरह कोविड के ऐक्टिव केस को छोड़कर यह तादाद 40 लाख के आसपास हो जाती है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में यह संख्या प्रति विधानसभा 10 हजार मतदाताओं के बराबर है।

उत्तर प्रदेश में 77 सीटों पर जीत-हार का अंतर दस हजार से कम

यूपी में 77 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां 2017 में 10 हजार से कम वोटों के अंतर से हार-जीत का फैसला हुआ था। इनमें 36 सीटें बीजेपी ने जीती थीं, तो 22 सीटें सपा ने। बीएसपी 14, कांग्रेस 2 और 3 सीटें छोटे दलों ने जीती थी।

जाहिर है कि बगैर कोविड के एक्टिव केस को जोड़े सिर्फ 80 साल से अधिक उम्र के वोटरों और दिव्यांग मतदाता ही 77 सीटों पर जीत-हार को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। अगर कोविड के एक्टिव केस को जोड़ दिया जाएगा तो पोस्टल बैलेट से वोट करने वालों से जीत-हार तय होने वाली सीटों की संख्या और भी अधिक हो जाएगी।

कोरोना की दूसरी लहर (second wave of corona) के दौरान जब आंकड़े ऊंचाई पर थे तब 1 मई को 3 लाख से ज्यादा एक्टिव केस यूपी में थे। इसके एक हफ्ते पहले या एक हफ्ते बाद एक्टिव केस 2.5 लाख के स्तर पर था। उस हिसाब से भी 7 दिन के एक्टिव केस का योग 17 लाख से 20 लाख के बीच होता है।

कोरोना की तीसरी लहर में उत्तर प्रदेश में एक्टिव केस की संख्या : मतदान के वक्त 35 से 40 लाख एक्टिव केस हो सकते हैं

कोविड की तीसरी लहर (third wave of covid) में जिस रफ्तार से कोरोना के केस बढ़ रहे हैं एक्टिव केस की संख्या (Number of active cases in Uttar Pradesh in the third wave of Kovid) उत्तर प्रदेश में पिछली लहर के मुकाबले दुगुनी हो सकती है। ऐसे में अकेले कोविड की महामारी से जूझते वोटरों की तादाद 35 से 40 लाख तक हो सकती है। उस स्थिति में बैलेट पेपर से वोट देने वाले वोटरों की संख्या कुल 80 लाख तक हो जाएगी। यानी औसतन 50 हजार के वोट हर विधानसभा में बैलेट पेपर से होंगे। जाहिर है बैलेट पेपर के ये वोटर उत्तर प्रदेश की सरकार तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे।

चुनाव आयोग के लिए यह गंभीर चुनौती होगी कि कोविड के मरीज बैलेट पेपर पर निर्भीक तरीके से कैसे मतदान करें। इसके अलावा ऐसे मतदान पत्रों को निरस्त करने की घटनाएं भी भौतिक रूप से मतगणना केंद्र पर ली जाती है जिसमें खूब पक्षपात होता है। बैलेट पेपर से दिए गये वोट को पहले गिनें या बाद में गिनें इस पर भी चुनाव परिणाम प्रभावित होने लग जाता है। एक-एक वोट के लिए रस्साकशी होती है।

बैलेट पेपर क महत्व : अब राजनीति का मोहरा बनने जा रहे हैं कोविड के मरीज

बैलेट पेपर के महत्व (importance of ballot paper) में अचानक बढ़ोतरी की वजह से राजनीतिक दल अपनी रणनीति में भी इसे जरूर शुमार करेंगे। कोविड संक्रमित मरीज को डराना या लुभाना कहीं अधिक आसान है। उसकी सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा होगा। इसके अलावा चुनाव के मौसम में अधिक टेस्टिंग और कोविड केस सामने लाने की भी होड़ लग जा सकती है ताकि बैलेट पेपर से वोट बढ़ जाएं। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थक माने जाने वाले मरीजों के लिए ऐसी होड़ में शामिल हो सकते हैं। इस कवायद से कोविड की महामारी से जूझते मरीजों को सहूलियत कितनी मिलेगी, कहा नहीं जा सकता। मगर, ये तय है कि कोविड के मरीज अब सियासत का मोहरा जरूर बनने जा रहे हैं।

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में 21,40,278 मतदाताओं के नाम हटाए हैं। इनमें 10 लाख 50 मतदाता दिवंगत हुए हैं। 3,32,905 मतदाताओं ने स्थान बदल लिया, जबकि 7,94,029 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में रिपीट हो रहे थे।

प्रेम कुमार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।

कॉमरेड क्या ऐसे ही ‘भाजपा हराओ और वामपंथ को मजबूत करो’ नारा साकार होगा?

dipankar bhattacharya akhilesh yadav

उत्तर प्रदेश में भाजपा हराने के लिए धारदार विपक्ष की एकता बने या सपा के तरफ से आए यह बयान कि भाकपा (माले) राष्ट्रीय महासचिव ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के नेतृत्व में लोकतंत्र सशक्त हो सकता है और इनकी समावेशी राजनीति और राजनैतिक सोच मौजूदा समय के लिए बेहद जरूरी है। इस  दो तरह के बयान एक दूसरे के अन्तर विरोधी हैं….

लेकिन पहले हम अपनी बात यहाँ से शुरू करना चाहते हैं…

एक नारा देखा हमने कि भाजपा हराओ वामपंथ मजबूत करो ( सीपीआई के तरफ से आया है) माकपा भाकपा की बात अभी छोड़ दे. अभी वहीं कुछ लोगों से जो हमें जानकारी मिली कि भाकपा (माले) राष्ट्रीय महासचिव, राज्य सचिव, पोलिट ब्यूरो सदस्य, केन्द्रीय कमेटी सदस्य घंटों सपा के दफ्तर में सपा नेतृत्व से चुनाव के सम्बन्ध में बात करने के लिए बैठे रहे। खैर यह इनका निजी मामला है, वह कहीं जाए, किसी से भी वार्ता करें. लेकिन लम्बे समय हम इस पार्टी में रहे हैं और जब यह नारा दिया जहाँ एक वामपंथी द्वारा नारे दिए जाते है कि भाजपा हराओ और वामपंथ को मजबूत करो (यह नारा वामपंथी दलों की बैठक के बाद जो फेसबुक आया था) का क्या मतलब है? उत्तर प्रदेश में जो कुछ आधार और वामपंथी प्रतिष्ठा है वह माकपा की है! लेकिन भाजपा हराओ और वामपंथ को मजबूत करो, का क्या मतलब है?

दो दिन पहले आप तय करते हैं कि वामपंथी ताकत को एकजुट करना है, एकजुट होकर चुनाव लड़ना है, वामपंथ को मजबूत करना हैं और ठीक दो दिन के बाद आपका राष्ट्रीय नेतृत्व सपा नेतृत्व से मिलने के लिए उनके दफ्तर में घंटों बैठा रहता है, यह समझ से परे है.

इसको हम यही समझें कि बिहार में जिस तरह से राजद से आपने दोस्ती की उसी तरह आप उत्तर प्रदेश में भी कर रहे हैं. अभी तक पार्टी से पार्टी की वार्ता होती थी! आप वामपंथ मजबूत करो की बातें करते हैं लेकिन आप कितने सीटों पर लड़ेंगे, यह भी सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं जबकि भाकपा ने दर्जनों सीट लड़ने की घोषणा पहले ही कर दी है।

वामपंथ की आपस में भी समझदारी नहीं बनी है। सपा से आपका गठबंधन होता है, तो अन्य वामपंथी दलों के साथ चुनाव में आपका चुनावी सम्बन्ध क्या होगा? यह भी साफ होना चाहिए।

वहीं हमारे सामने दो तरह के बयान सामने आ रहे हैं। एक सपा उत्तर प्रदेश के प्रमुख प्रवक्ता ने कहा कि सीपीआई (एम एल) के नेताओं ने कहा है कि श्री अखिलेश यादव की समावेशी राजनीति और राजनैतिक सोच मौजूदा समय में जरूरी है और उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में श्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में ही लोकतंत्र सशक्त रह सकता है! वहीं भाकपा माले के तरफ से यह बयान आ रहा हैं कि भाजपा हराने के लिए विपक्षी एकता बनाने के लिए यह वार्ता हुयी है। अब कौन सही बयान है और कौन गलत, हम क्या कह सकते हैं? लेकिन यह जरूर है भाकपा की तरफ से यह जो नारे हैं वह भाजपा हराओ और वामपंथ मजबूत करो, तो क्या वामपंथी दलों का आपस में सीटों पर एकताबद्ध होकर चुनाव लड़ने की समझदारी बन गयी है, जो सपा से भाजपा हराने के लिए विपक्ष की एकता पर बात करने के लिए माले का राष्ट्रीय नेतृत्व सपा नेतृत्व से मिलने सपा मुख्यालय पहुँच गया, यह भी साफ होना चाहिए।

अजय राय

लेखक लम्बे समय तक भाकपा माले के होलटाइमर थे और अब आईपीएफ उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी के सदस्य हैं। यह उनका अपना विचार है।

जब पं. नेहरू के मंच से कांग्रेस के खिलाफ भाषण देकर एनडी तिवारी बन गए थे विधायक

jawahar lal nehru

कैसे चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं से मिले बिना, उनसे संवाद किये बिना लोग चुनाव जीत जाते हैं?

कैसे बड़ी-बड़ी रैली, रोड शो, विज्ञापन और आईटी सेल के जरिये चुनाव प्रचार में मतदाताओं से सम्पर्क किये बिना चुनाव नतीजे तय होते हैं?

कैसे होती है कारपोरेट फंडिंग और विदेशी फंडिंग, पार्टियों और उम्मीदवार के करोड़ों के खर्च का क्या हिसाब है? कोई इसका विरोध क्यों नहीं करता?

कैसे पेड समाचार छपते हैं?

चुनावी घोषणा, खैरात और शराब मांस बांटकर, दंगाई रणनीति से चुनाव जीतते हैं लोग?

बदमाश, भ्रष्टाचार में गले तक डूबे, गुंडा, अपराधी के मुकाबले ईमानदार साफ छवि वाले उम्मीदवार के बदले हर मामले में उससे ज्यादा बदमाश, दागी, अपराधी और दंगाई को मैदान में उतरती है पार्टियां?

सड़क, नाली जैसी बुनियादी सुविधाओं के वायदे करके कैसे वायदा पूरा किये बिना एक के बाद एक चुनाव जीत जाते हैं प्रत्याशी?

चुनाव आयोग चुनाव कितना निष्पक्ष बना पाता है?

सड़कों पर चुनाव के दौरान उड़ाए जाने वाले अरबों रुपये कहाँ से आते हैं?

क्या पहले भी राजनेता इस तरह मतदाताओं को हाशिये पर रखकर चुनाव जीत सकते थे?

हमारे जन्म से पहले 1952 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हल्द्वानी में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चुनाव सभा करने आये थे।

कांग्रेस के प्रत्याशी थे स्वतंत्रता सेनानी श्याम लाल वर्मा जी। पंडित जी ने अपने भाषण में वर्मा जी को जिताने की अपील की।

इसके बाद बोलने का मौका आया वर्मा जी का, जो तुतलाकर बोलते थे। वे तुतलाते रहे तो नेहरू जी उखड़ गए और उनसे माइक छीनकर कहा- मैंने कांग्रेस को वोट देने की अपील की थी, अयोग्य उम्मीदवार को नहीं। कहकर वे चल दिये।

पहली बार चुनाव लड़ने वाले लखनऊ में कानून के छात्र नारायण दत्त तिवारी श्रोताओं में शामिल थे। वे फौरन मंच पर चढ़ गए और माइक पकड़ ली। इतना अच्छा बोले कि कांग्रेस को हराकर वे चुनाव जीत गए।

आज ऐसा सम्भव है?

1967 के आम चुनाव की मुझे याद है। मैं तब कक्षा 6 का छात्र था। काशीपुर विधानसभा सीट से नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के उम्मीदवार थे। केसी पंत लोकसभा उम्मीदवार।

पिताजी पुलिनबाबू कांग्रेस का विरोध कर रहे थे। वे एमएलए के लिए एस एन शर्मा और लोकसभा के लिए अपने मित्र स्वतंत्रता सेनानी रामजी त्रिपाठी का समर्थन करते थे।

नारायण दत्त तिवारी ने बसंतीपुर आकर हमारे घर में डेरा डाल दिया। बोले ,आप चाहे किसी का समर्थन करें, हम तो आपके घर से ही चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने मुझसे नागरिक शास्त्र और राजनीति विज्ञान पर ढेरों बातें की। बसंतीपुर वालों को अपने पक्ष में करने के लिए बार-बार आते रहे। लेकिन बसंतीपुर वालों ने उनको वोट नहीं दिए।

क्या अब कोई राजनेता अपने मतदाताओं की इतनी परवाह करता है? क्यों नहीं करता है?

तिवारी जी हार गए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के गरीब और ईमानदार प्रत्याशी रामदत्त जोशी से। वे भी पिताजी के मित्र थे जैसे तिवारीजी।

पंत जी लोकसभा चुनाव जीते। लेकिन नैनीताल खटीमा सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप भैया ने कांग्रेस को हरा दिया। वे संविद सरकार में मंत्री भी बने।

क्या आज ऐसा सम्भव है?

कहीं से भी कोई गरीब और ईमानदार आदमी विधानसभा लोकसभा की छोड़िए, गांव की प्रधानी का चुनाव भी जीत सकता है?

1952 से आज तक लोकतंत्र कितना मजबूत हुआ चुनाव से और राजनीतिक चेतना का विकास कितना हुआ।

कौन जीतता है, कौन हारता है, चुनावी समीकरण पर करोड़ों पन्ने रंगे जाएंगे।

लेकिन हम इन सवालों का जबाब खोज रहे हैं।

है कोई जवाब आपके पास?

जनता से मतलब नहीं, पैसे और प्रचार के जरिये हम किन्हें चुनते हैं और इससे हमारा और देश का कितना भला होता है तो लोकतंत्र का क्या बनता है?

क्या इस पर संवाद और गहन चिन्तन मनन की जरूरत नहीं है?

पलाश विश्वास

जानिए यूपी चुनाव में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करना क्यों जरूरी है?

opinion debate

Know why it is necessary to protect secularism in UP elections?

यूपी में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करना प्रथम चुनौती

Protecting secularism in UP is the first challenge

भारत में धर्मनिरपेक्षता की पुख्ता जड़ें हैं

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में सबसे बड़ी चुनौती है उन दलों को परखा जाए जो धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खरे उतरे हैं।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी इस संवाद में बता रहे हैं कि यूपी चुनाव में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करना क्यों जरूरी है।

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जेवर एयरपोर्ट : भाजपा का चुनावी हित या विकास की राष्ट्रनीति ?

prime minister, shri narendra modi at the foundation stone laying ceremony of noida international airport, jewar

Jewar Airport: BJP’s electoral interest or national policy of development?

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

उत्तरप्रदेश में भाजपा की स्थिति (BJP’s position in Uttar Pradesh) मजबूत करने के लिए परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यासों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 नवंबर गुरुवार को जेवर में अंतरराष्ट्रीय विमानतल की नींव रखी। यह विमानतल उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है और भाजपा शुरु से जिस विकास के नारे को बुलंद करती आई है, यह एयरपोर्ट उसकी ही एक मिसाल है। शाइनिंग इंडिया और अच्छे दिन आने वाले हैं का मिला-जुला मिश्रण है जेवर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Jewar International Airport), जिसमें जनता को लुभा कर अपनी जमीन पुख्ता करने की तैयारी भाजपा की है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Election 2022) से चंद महीनों पहले प्रधानमंत्री ने विकास की गाड़ी को चौथे गियर पर डाल दिया है।

पूर्वांचल एक्सप्रेस वे (Purvanchal Expressway), कुशीनगर एयरपोर्ट और अब जेवर का एयरपोर्ट, इन परियोजनाओं से भाजपा जनता को यही संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका फोकस विकास कार्यों पर है। इन परियोजनाओं को इस चकाचौंध के साथ प्रस्तुत किया जाता है कि अक्सर उसमें कुछ जरूरी सवाल गुम हो जाते हैं। जैसे पांच सालों तक विकास की यह रफ्तार क्यों नहीं दिखी। जिन परियोजनाओं को चुनाव के पहले उद्घाटित किया जा रहा है या जिनमें नींव के पत्थर रख कर लाखों रोजगार और करोड़ों के निवेश के सपने दिखाए जा रहे हैं, वही काम अगर सत्ता संभालने के कुछ अंतराल में कर लिया जाता तो क्या उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी और गरीबी से लोग बेहाल होते।

विकास का उद्घाटन और पिछली सरकारों को कोसना

आज जेवर एयरपोर्ट के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री मोदी ने फिर पिछली सरकारों को कोसा कि पहले की सरकारों ने झूठे सपने दिखाए, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विकास (Development of Western Uttar Pradesh) को नजरंदाज किया।

उन्होंने कहा कि हम चाहते तो 2017 में ही भूमिपूजन कर देते, लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर हमारे लिए राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति का हिस्सा है। हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि तय समय पर ही काम पूरा हो जाए। देरी होने पर हमने जुर्माने का प्रावधान किया है। बड़ी चालाकी से प्रधानमंत्री ने चुनाव के पहले किए जाने वाले शिलान्यास को तर्कसंगत ठहराने की कोशिश की। और साथ ही देरी पर जुर्माने की बात कर यह संदेश भी जनता को दे दिया कि 2022 में अगर भाजपा की सरकार फिर से बनी तो ये एयरपोर्ट वक्त से शुरु होगा, अन्यथा इसका काम लटक सकता है।

जितना चार्तुय प्रधानमंत्री लोगों को अपनी बातों और दावों में उलझाने में लगाते हैं, अगर उतनी ही चतुराई देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था और सामाजिक, धार्मिक समीकरणों को बनाने में लगा दें तो वाकई देश की सूरत बदल जाएगी। मगर फिलहाल प्रधानमंत्री का पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित करना है। पूर्वांचल और बुंदेलखंड को साधने के बाद अब प्रधानमंत्री मोदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को संभालने में जुट गए हैं।

अब किसानों के हितैषी बनने का दावा कर रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी

तीन कृषि कानूनों की वापसी को मंजूरी के बाद अब यहां अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के जरिए किसानों के हितैषी बनने का दावा प्रधानमंत्री कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब यहां के किसान साथी, फल, सब्जी, मछली जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज को सीधे एक्सपोर्ट कर पाएंगे। इसके साथ ही अलीगढ़, मथुरा, मेरठ, आगरा, बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली ऐसे अनेक औद्योगिक क्षेत्रों के लिए यह मददगार साबित होगा।

क्या जेवर एयरपोर्ट बनने से वाकई किसान अपनी फसलें एक्सपोर्ट कर पाएंगे? (Will the construction of Jewar airport really enable farmers to export their crops?)

किसान अपनी फसलें एक्सपोर्ट यानी निर्यात कर पाएंगे, यह विचार ही अपने आप में बड़ा लुभावना है। क्योंकि अब तक तो देश ने किसानों को जूझते, संघर्ष करते, अपने हक के लिए लाठी खाते ही देखा है। ऐसे में एयरपोर्ट तक किसान की पहुंच और वहां से कृषि उपज को बाहर भेजने की सुविधा, क्रांतिकारी विचार लगता है। भारत में पूंजीवाद से प्रेरित सरकार (Capitalism Driven Government in India) न होती, तो यह विचार हकीकत में साकार होते देखने की उम्मीद बांधी जा सकती थी। मगर जहां अधिकतर नीतियां पूंजीपतियों के हित साधन के लिए बनी हों, जहां अभी कुछ दिन पहले तक ऐसे कानून बने थे, जो किसान से उसकी ही उपज और जमीन पर मालिकाना हक छीन रहे थे, वहां सरकार की इस बात पर आंख मूंद कर कैसे यकीन किया जा सकता है कि एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट तक किसानों की पहुंच होगी।

वैसे भी भारत के सबसे बड़े इस एयरपोर्ट को बनाने के लिए जो 5,845 हेक्टेयर जमीन ली गई है, वो आसपास के छह गांवों की है, और जिन किसानों से ये जमीन ली गई है, उनमें से बहुत से किसान अब भी सही मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।

चुनाव की चालाकियों और विकास की चकाचौंध से परे एक हकीकत ये है कि बहुत से ग्रामीण अपने पक्के घरों को देकर तंबुओं में रहने को मजबूर हैं। कुछ रिपोर्ट्स में जरूर ऐसा बताया जा रहा है कि इस एयरपोर्ट के लिए जमीन के बदले जो मुआवजा मिला, उससे किसान मालामाल हो गए हैं। बहुत से किसानों ने कार और बाइक खरीद ली है, बहुतों ने व्यवसाय शुरु कर दिया है। लेकिन इस तात्कालिक लाभ में क्या किसानों के दूरगामी हितों के बारे में सोचा गया है। मुआवजे के पैसों से जो अभी गाड़ियां खरीद रहे हैं या व्यवसाय शुरु कर रहे हैं, क्या उससे उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा। देश की बाकी सार्वजनिक संपत्तियों की तरह यह एयरपोर्ट भी देर-सबेर किसी उद्योगपति मित्र के हवाले हो जाएगा, फिर आम जनता के हाथ में क्या आएगा, यह भी सोचना होगा।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorialका संपादित रूप साभार.

युवा और किसान होंगे लोक संकल्प-2022 के केंद्र बिंदु : जयंत चौधरी

राष्ट्रीय लोकदल उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव हाईटेक स्ट्रेटेजी से लड़ेगा। लोक संकल्प समिति के प्रयासों से जनता के सुझाव ट्विटर,फेसबुक,व्हाट्सएप और ई-मेल के जरिए लिए जाएंगे। इन सुझावों से ही लोक संकल्प-2022 आकार लेगा, फिर चुनावी एजेंडा तैयार किया जाएगा।

 

नई दिल्ली, 5 अगस्त दिल्ली 2021. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणनीति (Uttar Pradesh Assembly Election Strategy) बनाने में जुटे राष्ट्रीय लोकदल ने अपनी मुहिम तेज कर दी है। नवगठित लोक संकल्प समिति-2022 की प्रथम बैठक का आयोजन आज नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में किया गया।

बैठक में राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी, लोक संकल्प समिति के अध्यक्ष डॉ. यशवीर सिंह, सह अध्यक्ष प्रो.अजय कुमार के साथ सभी सदस्य उपस्थित रहे।

बैठक की शुरुआत में मौन रखकर राष्ट्रीय लोकदल के संस्थापक चौधरी अजित सिंह जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। 

लोक संकल्प समिति की प्रथम बैठक में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े बुद्धिजीवियों के बीच रायशुमारी हुई। लोक संकल्प संवाद कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में अगले एक माह में आयोजित किए जाएंगे।

राष्ट्रीय लोकदल उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव हाईटेक स्ट्रेटेजी से लड़ेगा।

लोक संकल्प समिति के प्रयासों से जनता के सुझाव ट्विटर,फेसबुक,व्हाट्सएप और ई-मेल के जरिए लिए जाएंगे। इन सुझावों से ही लोक संकल्प-2022 आकार लेगा, फिर चुनावी एजेंडा तैयार किया जाएगा।

लोक संकल्प समिति का उद्देश्य युवाओं को रोजगार, कृषि क्षेत्र में सुधार व किसान-मजदूर का कल्याण, सभी के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा की बेहतर व्यवस्था, सामाजिक न्याय, महिला सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दें को उठाकर सभी वर्गों की लड़ाई लड़ना है।

लोक संकल्प समिति में मंझे हुए राजनीतिज्ञ, पूर्व अधिकारी, शिक्षाविद्, अधिवक्ता, पत्रकारिता जगत के लोगों समेत बीस बुद्धिजीवियों को शामिल किया गया है।

पहली ही बैठक में समिति के सदस्यों ने लोक संकल्प को जनोपयोगी और पार्टी के लिए बेहद जरूरी बताया।

इस मौके पर राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा कि युवा और किसान लोक संकल्प 2022 के केंद्र बिंदु होंगे। लोक संकल्प समिति अपनी विकासवादी सोच को लेकर जनता के बीच जाकर रायशुमारी करेगी।

समिति के अध्यक्ष डॉ.यशवीर सिंह ने बताया कि 7 अगस्त को गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के बीच जाकर रायशुमारी करेगी लोक संकल्प समिति।

सह अध्यक्ष पूर्व विधायक प्रो.अजय कुमार ने कहा कि लोक संकल्प संवाद कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के सभी ज़िलों में आयोजित होंगे।

बैठक में लोक संकल्प समिति के सदस्य विनम्र शास्त्री, एस. के. वर्मा, मेजर जेपी सिंह, पंकज चतुर्वेदी, रामाशीष राय, जी.एस. धामा, प्रो. दुष्यंत कुमार, डॉ. शहंशाह खान, चौ. निरपाल सिंह, पुष्पेंद्र शर्मा, रमा नागर, चमनलाल प्रेमी, संतोष यादव, प्रशांत कनौजिया, सुखबीर सिंह गठीना, अखिल बंसल, बदर महमूद और डॉ. सुशील गौतम मौजूद रहे।

यह जानकारी एक प्रेस विज्ञप्ति में दी गई है।