आरएसएस-भाजपा के अधिनायकवादी प्रोजेक्ट पर अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का महत्वपूर्ण लेख

Akhilendra Pratap Singh

यह सही है कि मोदी सरकार के विरूद्ध आंदोलन उभर रहे हैं। नागरिक, सामाजिक और डॉक्टर अम्बेडकर के विचारों पर चल रहा दलित आंदोलन दमन का मजबूती से विरोध कर रहा है लेकिन इन धाराओं की राजनीतिक उपस्थिति नहीं है। यही वह बिंदु है जहां इन आंदोलनों को अपने को पुनर्परिभाषित करना चाहिए और देश के सामने आई राजनीतिक चुनौती को स्वीकार करना चाहिए।

यह मनुस्मृति का आधुनिक संस्करण है जो इस बार हिंदुत्व का नाम धर कारपोरेट की गोद में बैठकर आया है

narendra modi flute

हुआ वही जो होना था ? मगर क्यों हुआ जो नहीं होना था !! बादल सरोज सितम्बर के पहले सप्ताह में हुई जी – 2020 की अखिल भारतीय दाखिला प्रतियोगी परीक्षाओं में वही हुआ जो होना था। पहले दिन की परीक्षाओं में अनुपस्थिति डरावनी थी; करीब आधे ही परीक्षार्थी परीक्षा केंद्रों तक पहंच पाए। बाद

मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है, जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है

rabindranath tagore

पलाश विश्वास का यह लेख हस्तक्षेप पर उनकी शृंखला रवींद्र का दलित विमर्श के तहत 12 सितंबर 2017 को प्रकाशित हुआ था। हस्तक्षेप के पाठकों के लिए इस लेख का पुनर्प्रकाशन मैंने जिंदगी से लिखने पढ़ने की आजादी के सिवाय कुछ नहीं मांगा और गांव के घर से अलग कहीं और घर बसाने की नहीं

कारपोरेट बकायेदारों से सरकार करे वसूली, बैंकों का निजीकरण जनता के धन की लूट – एस. आर. दारापुरी

ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता और अवकाशप्राप्त आईपीएस एस आर दारापुरी (National spokesperson of All India People’s Front and retired IPS SR Darapuri)

लखनऊ, 19 जुलाई 2020, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 51 साल पूरे (51 years of nationalization of banks) होने पर बैंकों के कर्मचारियों की यूनियन द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बकायेदारों की सूची जारी करने का स्वागत करते हुए ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी ने मोदी सरकार