वो चितरंजन सिंह बीमार हैं जिन्हें देखकर महसूस किया कि जनसंघर्ष की आग में कैसे इस्पात ढलता है

Chitranjan singh

पलाश विश्वास मन बहुत दुःखी है। कोलकाता में इंडियन एक्सप्रेस की नौकरी के दिनों हम देश के किसी भी कोने में जब तब पहुंच जाते थे। अब कोरोना काल में पांव में बेड़ियां पड़ी हुई हैं। मेरे पिता पुलिन बाबू की बात अलग थी। वे कभी भी खाली जेब देश विदेश कहीं नकल सकते थे।