तेल के दामों की बहार देखो, अडानी के मुनाफे की धार देखो, शिवराज का गेहूं व्यापार देखो

Gautam Adani (गौतम अदाणी) Chairman of Adani Group

Rapidly rising prices of mustard oil and the same proportion of other edible oils across the country

पूरे देश में सरसों के तेल और उसी अनुपात में बाकी खाद्य तेलों की बेतहाशा तेजी से बढ़ती कीमतों की वजह से पूरा देश स्तब्ध और परेशान है। लम्बी चुप्पी के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मुंह खोला तो लगा जैसे उनकी तकलीफों का मजाक उड़ाने के लिए बोले हैं। उन्होंने फ़रमाया कि कीमतों में यह वृद्धि इसलिए हुयी है कि सरकार ने खाने के तेलों में मिलावट पर रोक लगा दी है। इसके लिए लगता है वे केंद्र सरकार के 17 मई 2021 के उस गजट नोटिफिकेशन को आधार बना रहे थे जिसमें खाद्य तेलों की पैकिंग, उनकी बिक्री और शुद्धता के बारे नए नियम प्रावधान बनाये गए हैं, जिस पर अभी सभी संबंधितों और आम जनों से राय माँगी गयी है। इस नोटिफिकेशन में अभी तक प्रचलित 2012 की उन छूटों को खत्म किया गया है जिनके तहत अपने अपने खाद्य तेल को बेचने के लिए ब्लेंडिंग करते समय उसमें किसी दूसरे स्वीकृत खाद्य तेल को 20 प्रतिशत तक की मात्रा में मिलाये जाने का प्रावधान था।

मोदी सरकार और कृषि मंत्री का दावा है कि अब नए प्रावधानों के बाद यह “मिलावट” पूरी तरह रुक जाएगी – इसलिए भले तेल की कीमत थोड़ी बढ़ेगी, लेकिन उपभोक्ताओं को खाने के लिए अच्छा तेल मिलेगा और किसानों को भी बढ़ी हुयी कीमत मिलेगी।

यह ठीक वैसी बात है जैसी बिजली के निजीकरण के वक़्त कही गयी थी कि “अब अच्छी बिजली मिलेगी।”

जानिए तेल के खेल की असलियत है क्या

असलियत क्या है यह पिछले कुछ सप्ताहों में सरसों उत्पादक जिलों में आये एक ख़ास तरह के परिवर्तन से समझा जा सकता है। इन दिनों चम्बल में सरसों से उसका तेल निकालने वाले जितने भी एक्सपेलर (मशीन चलित कोल्हू) और मिल हैं उनके सारे तेल को अडानी खरीद रहे हैं। मुरैना, भिण्ड, ग्वालियर वाले इधर के चम्बल में भी और धौलपुर, भरतपुर वाले उधर के चम्बल में भी। खुले तेल के व्यापार को पहले ही प्रतिबंधित किया जा चुका था। अब इस बाजार में अडानी कूद पड़े हैं तो थोक व्यापार भी ठहर गया है। जगह-जगह स्थापित अडानी के कलेक्शन सेंटर्स पर यह तेल जमा हो रहा है। तेल के स्टॉक की ये मोनोपोली ही इन बढ़ी-चढ़ी कीमतों का मुख्य कारण है। ध्यान रहे, अभी यह सिर्फ शुरुआत है – इब्तिदा है। आगे-आगे देखिये होता है क्या ?

आगामी कल में तेल का दाम कहाँ तक पहुंचेगा यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। दुनिया भर में मोनोपॉली – एकाधिकार – कायम करने के बाद कंपनियां अपने उत्पाद की कीमतें किस तरह तय करती हैं और उसका खामियाजा कौन भुगतता है इसके उदाहरण देश दुनिया में बिखरे पड़े हैं, उन्हें गिनाने की जरूरत नहीं।

इस एकाधिकार को जायज ठहराने के लिए यह मुगालता देना कि इसका फ़ायदा किसानों को पहुंचेगा, उसकी सरसों और तिलहनों की उपज के दाम भी बढ़ेंगे, रेगिस्तान में मृग मरीचिका से प्यास बुझाने की उम्मीद जगाने जैसा है।

अडानी के भंडारों में तेल की जमाखोरी उसे समय समय पर बाजार में आपूर्ति की रफ़्तार को घटा कर उपभोक्ताओं की जेबें काटने का सामर्थ्य देगी, तो वहीँ पर्याप्त भण्डार की उपलब्धता के बहाने सरसों की मांग घटने की कृत्रिम स्थिति पैदा कर उसे पैदा करने वाले किसानों को ठेंगा दिखाएगी। यह सिर्फ आशंका भर नहीं है। कहीं भी कितना भी माल जमा करने की निर्द्वन्द्व छूट देने वाला क़ानून मोदी बना ही चुके हैं।

इस बार केंद्र सरकार द्वारा एमएसपी की दरों की बेहद अपर्याप्त घोषणा के बावजूद उसके अगले ही दिन पक्के कारपोरेट समर्पित अखबार इण्डियन एक्सप्रेस के सम्पादकीय लेख में यह तर्क दिया भी जा चुका है। इस अखबार ने एमएसपी की इस मामूली वृद्धि पर स्यापा करते हुए सवाल खड़ा किया कि जब गेहूं और चावल का भण्डार पर्याप्त से अधिक जमा है तो फिर एमएसपी में इतनी बढ़ोत्तरी भी क्यों की जानी चाहिए ?

बहरहाल दूकान जमाने के लिए अडानी और ऐसे ही दूसरे कार्पोरेटिये शुरू के एक दो साल थोड़ी बहुत ज्यादा कीमतें दे भी सकते हैं। बाजार हड़पने का यह आदिम नुस्खा है। किन्तु जब पूरा वर्चस्व कायम हो जाएगा तब उपज का क्या दाम मिलेगा इसे ब्राजील के कॉफ़ी उत्पादक किसानों के अनुभवों के रूप में दुनिया देख चुकी है। भारत में भी ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं।

इसके बाद शुरू होगा तीसरा चरण; तेल देखो, तेल की धार देखो, चतुर अडानी का तेल का व्यापार देखो। शुरू होगी सरसों की ठेका खेती, जिसकी तार्किक परिणति यह होनी तय है कि कुछ समय के बाद किसान अपनी ही जमीन पर अडानी को सरसों पैदा करते हुए भी देखेगा।  

 17 मई का नोटिफिकेशन अभी तेल व्यापार और उसके बाद सरसों और तिलहनों की खेती में अडानी और उसकी नस्ल के भेड़ियों की निर्बाध आमद का खुला लाइसेंस है। कारपोरेट द्वारा, कारपोरेट के लिए, कारपोरेट की सरकारें किस तरह उनका वर्चस्व कायम करने के लिए कठपुतली बन क़ानून – प्रावधान बनाती और तोड़ती मरोड़ती है इसका दूसरा उदाहरण शिवराज सरकार द्वारा 2 लाख मीट्रिक टन गेंहू की नीलामी के लिए जारी किये गए टेण्डर्स हैं। इन टेण्डर्स में बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए जो शर्तें तय की गयी हैं वे इस बिक्री को सिर्फ और केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आरक्षित करने वाली हैं।

इन शर्तों के मुताबिक़ कमसेकम बोली एक लाख मीट्रिक टन खरीदने की लगाई जा सकती है, बोली वही लगा सकता है जिसकी नेट वर्थ एक करोड़ से अधिक हो और जिसकी मासिक उत्पादन क्षमता कमसेकम 25 हजार मीट्रिक टन हो।

इनका नतीजा यह निकलेगा कि मध्यप्रदेश की तकरीबन सारी आटा और मैदा मिलें देहरी के भीतर ही दाखिल नहीं हो पाएंगी। सरकार का यह दावा कि ऐसा करने से उसे ज्यादा दाम मिलेंगे – नीलामी शुरू होने से पहले ही झूठा साबित हो जाता है।

शिवराज सरकार ने 2019-20 के 1840 रूपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदे गए गेंहू की नीलामी का आधार मूल्य 1580 रुपया प्रति क्विंटल रखा है। जबकि छोटे और मझौले व्यापारी इसे 1900 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदने की पेशकश अभी से कर चुके हैं। जब सिर्फ दो ही कंपनियां इस नीलामी में बोली लगाने की हैसियत में होंगी तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि बोली 1700 से पहले ही टूट जाये और दोनों मगरमच्छ आपस में आधा आधा बाँट लें।

इसी का नाम है दरबारी पूंजीवाद

तीन कृषि कानूनों के जरिये मोदी की “ऑफ़ द कारपोरेट, बाय द कारपोरेट, फॉर द कारपोरेट” सरकार क्या करने जा रही है यह उसका आरंभिक संकेत हैं। इस बात का एलान भी कि ये क़ानून सिर्फ किसानों के खिलाफ ही नहीं हैं, छोटे मंझौले व्यापारियों और नागरिकों की थाली के विरुद्ध भी हैं। इस बात का आव्हान भी कि अब सिवाय मिलकर लड़ने के कोई और दूसरा रास्ता नहीं है।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन,

संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है किसान आंदोलन

Farmer

Farmer movement can cause political damage to BJP

नई कृषि नीति के लिए केंद्र सरकार की तरफ से लाये गए कानूनों के बाद पंजाब सहित देश के कई हिस्सों में किसानों की अगुवाई में विरोध हो रहा है। दिल्ली राज्य के तीन प्रवेश द्वारों पर किसानों ने अपने खेमे लगा दिए हैं। किसान आन्दोलन (Kisan Andolan Hindi News) शुरू होने के बाद जब पहली बार कोई चुनाव हुआ तो साफ समझ में आ गया कि किसानों का आन्दोलन (Kisan Andolan News) भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है। पंजाब में नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे आए वे केन्द्र की भाजपा सरकार के लिए बुरी खबर के रूप में आए।

कांग्रेस की पंजाब में सरकार है और पिछले चार साल से अमरिंदर सिंह की सरकार ने बहुत सारे ऐसे काम किए हैं जिनके कारण उनका विरोध भी है लेकिन नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे बताते हैं कि अकाली दल और भाजपा से नाराज लोगों ने टूट कर कांग्रेस को समर्थन दिया है। इन नतीजों से भाजपा की उन उम्मीदों को झटका लगा है जिसके तहत उसके नेता सोच रहे थे कि यह चुनाव मूल रूप से शहरी इलाकों में हुए हैं। कृषि कानूनों का विरोध करने वाले ज्यादातर किसान गांवों में रहते हैं।

बंगाल में भाजपा को अब शुवेंदु अधिकारी पर नहीं असदुद्दीन ओवैसी पर भरोसा

बंगाल में भी भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। वहां इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। सबको मालूम है कि नंदीग्राम में किसानों की समस्याओं को मुद्दा बना कर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2011 का चुनाव लड़ा था और दशकों से जमी हुई वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस आन्दोलन का प्रमुख नौजवान चेहरा था शुवेंदु अधिकारी। शुवेंदु को बाद में ममता बनर्जी ने मंत्री बनाया। उनके पूरे परिवार को राजनीति से जो भी लाभ संभव है, मिलता रहा लेकिन भाजपा ने उनको तोड़ लिया। कोशिश यह थी कि किसानों के नेता के रूप में बनी उनकी छवि का लाभ लिया जाएगा। बहुत ही बाजे-गाजे के साथ उनको भाजपा में भर्ती किया गया। लेकिन जब किसान आन्दोलन से उपजी नाराजगी की आंच बंगाल में भी दिखने लगी तो पार्टी ने चुनावी रणनीति में बदलाव किया। अब मुस्लिम नेता, असदुद्दीन ओवैसी को मैदान में लाया गया है और भाजपा के सभी नेता अपने भाषणों में ममता सरकार की तुष्टिकरण की नीति की आलोचना (Criticism of Mamta government’s appeasement policy) कर रहे हैं, जय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं और ममता को हिंदुत्व की पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

तीनों कानून वापस भी ले सकती है भाजपा सरकार, लेकिन …

इस बात में दो राय नहीं है कि भाजपा को नई कृषि नीति की वजह से चुनावी नुकसान हो रहा है। यह भी संभव है कि राजनीतिक नुकसान का आकलन करने के बाद भाजपा और उनकी सरकार किसानों की मांग को मान भी ले और तीनों कानून वापस ले ले लेकिन उससे भी कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला है क्योंकि किसान आन्दोलन तो यही साबित करने की कोशिश करेगा कि उनके दबाव के कारण ऐसा संभव हुआ है। दिल्ली में कुछ ऐसे भी ज्ञानी मिल जायेंगे तो बता देंगे कि दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आन्दोलन कमजोर पड़ गया है लेकिन यह सच नहीं है। आन्दोलन का असर गांवों में किसानों की नाराजगी के रूप में साफ नजर आ रहा है। भाजपा को अगर इस बात का सही अंदाजा लग गया तो खेती के औद्योगीकरण और पूंजीवादीकरण (Industrialization and Capitalization of Farming) पर रोक लग जायेगी और किसानी उसी हरित क्रान्ति के दौर में बनी रह जायेगी। पूंजीवादी आर्थिक विकास की दिशा कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है लेकिन जब पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था उसी ढर्रे पर जा रही हो तो खेती को उससे बाहर रखने से उन्हीं लोगों का नुकसान होगा जो खेती पर ही निर्भर हैं।

यह भी सच है कि जिस रूप में नए कानूनों को लाया गया है उसमें बहुत कमियां हैं। पूरा कानून वापस लेने की जिद पर अड़े किसानों को चाहिए कि उसमें जो खामियां हैं उनको दुरुस्त करने की बात करें।

जरूरी है कृषि कानून में बदलाव | Changes in agricultural law are necessary

कृषि कानून में बदलाव जरूरी है, क्योंकि हरित क्रान्ति के बाद कोई भी बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। 1991 में जब डॉ. मनमोहन सिंह ने जवाहरलाल नेहरू के सोशलिस्टिक पैटर्न के आर्थिक विकास को खतम करके देश की अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी विकास के रास्ते पर डाला था तो उन्होंने कृषि में भी बड़े सुधारों की बात की थी। खेती को अगर विकास का औजार और ग्रामीण गरीबी को घटाने के वाहक रूप में रखना है तो कृषि सुधारों का पूरी तरह से विरोध नहीं किया जाना चाहिए। आज भारतीय खेती में खेत मजदूर की संख्या, जमीन के मालिक से ज्यादा है। पंजाब और हरियाणा के अलावा बाकी देश में किसानों के पास बहुत कम क्षेत्रफल की जमीन खेती लायक है।

पंजाब सहित बाकी देश में जमीन के नीचे पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। धान और गेहूं की खेती में बहुत पानी लगता है। चावल का तो देश के बाहर भी बाजार है लेकिन गेहूं को निर्यात करना असंभव है। ऐसी खेती की जरूरत है जिससे जलस्तर का संतुलन भी बना रहे और खेती से प्रति एकड़ आर्थिक उपज भी ऐसी हो जिससे किसान के परिवार की देखभाल भी हो सके। साथ-साथ औद्योगीकरण को भी रफ्तार दी जाए जिससे खेती से बाहर निकलने वाले कामगारों को उद्योगों में खपाया जा सके।

जरूरत है कम पानी वाली खेती को देश की आदत बनाया जाए

सबसे जरूरी बात तो कम पानी वाली खेती को देश की आदत बनाने की जरूरत है। इजरायल में इसी तरह के प्रयोग किये गए और अब बहुत बड़े पैमाने पर सफलता मिल चुकी है। रेगिस्तान में महंगी निर्यात होने लायक फसल पैदा करके उन्होंने अपने यहां के जमीन मालिकों की संपन्नता को कई गुना बढ़ा दिया है। कीनू, नींबू, खजूर और जैतून की खेती को बढ़ावा दिया गया जिसमें कम से कम पानी लगता है और सभी उत्पादन निर्यात किये जाते हैं।

नई कृषि नीति में खामियां, इससे ग्रामीण भारत में समस्याओं का अम्बार लग जायेगा

जरूरत इस बात की है एक एक बूंद पानी बचाया जाय और सीमित जमीन से ज़्यादा आर्थिक लाभ लिया जाए। नई कृषि नीति को इस दिशा में जाना चाहिए था लेकिन उसमें खामियां बहुत सी हैं। इन खामियों के साथ-साथ अगर यह नीति पूरी तरह से लागू कर दी गई और आर्थिक असमानता और बढ़ेगी और ग्रामीण भारत में समस्याओं का अम्बार लग जायेगा।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि, ‘हमको जमीन अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिलती, हम उसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं।’ यानि हमें इस जमीन को उनके मालिकों तक उसी तरह से पहुंचाना है जैसी हमको मिली थी। साफ मतलब है कि जमीन का जलस्तर घटाए बिना खेती करने की जरूरत है।

शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।
शेष नारायण सिंह
शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।

(देशबन्धु)

कृषि अधोसंरचना सुधार एवं विकास के कोई ठोस काम नहीं हुए मोदी कार्यकाल में

Narendra Modi flute

There was no concrete work for improvement and development of agricultural infrastructure in Modi’s tenure

मोदी सरकार ने अपने लगभग छः-सात साल के कार्यकाल में देश के कृषि विकास एवं कृषि क्षेत्र के लिए ठोस अधोसंरचना सुधार एवं विकास की दिशा में कोई महत्वपूर्णं काम एवं पहल नहीं किया है। पुरानी नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों एवं कानूनों को बदलने के सिवाय बदलाव के नाम मोदी कार्यकाल में एक भी ऐसा ठोस काम नहीं हुआ है जिससे खेती किसानी, किसानों एवं खेतिहर समाज के आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों, परिस्थितियों में महत्वपूर्णं, सकारात्मक एवं सार्थक सुधार, बदलाव एवं परिवर्तन आ सके।

2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का मामला वैसे भी जुमलेबाजी से कम नहीं था, इसके बावजूद इस दिशा में भी कोई काम नहीं हुआ है जिससे कि किसानों की आमदनी दुगनी हो सके।

आज कृषि लागतें जिस हिसाब से बढ़ रहीं हैं, इसकी तुलना में साल में छः हजार की आर्थिक सहायता किसानों के साथ मजाक से कम नहीं है।

इस समय देश में दलहन, तिलहन, आलू, प्याज जैसी रोजाना की जरूरत की फसलों के उत्पादन के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है जिसके कारण साल के आधे से अधिक दिनों में इनकी कीमतें आम आदमी के बजट के बाहर होती हैं। उत्पादन से अधिक इन वस्तुओं के भंडारण, जमाखोरी एवं कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार ने अपने कार्यकाल में कोई ठोस नीति नहीं बनाई, बल्कि उपर इनके भंडारण की सीमा ही खत्म कर दी। सिंचाई सुविधाओं के विकास एवं विस्तार के लिए आज देश में कोई ठोस परियोजनाएं नहीं हैं। किसानों की आत्महत्याएं रोकने की दिशा में सरकार ने एक भी काम नहीं किये जिसका परिणाम यह है आज देश में दर्जनों किसान रोजाना आत्महत्या कर रहे हैं।

देश़ में यद्यपि खेती-किसानी एवं कृषि विकास की दिशा में आजादी के बाद से ही सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं, हर वर्ष के बजट में सरकार द्वारा कृषि विकास से संबंधित अनेक योजनाओं एवं कार्यक्रमों की घोषणा की जाती रही है, इसके बावजूद कृषि क्षेत्र की स्थिति एवं दशा-दिशा में अपेक्षित सकारात्मक सुधार बहुत कम दिखलाई देते हैं, यही कारण है कि आज आजादी के सात दशक बाद भी किसानों को सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है। देश में कृषि विकास की सैकड़ों बल्कि ढ़ेरों योजनाओं, कार्यक्रमों एवं नीतियों के बावजूद कृषिक्षेत्र की गंभीर चिंताएं, चुनौतियां एवं समस्याएं आज भी जस की तस हैं, जिन पर सरकार को गंभीरतापूर्वक चिंतन और विचार-विमर्श करने की जरूरत है।

देश में आवश्यकता के मुकाबले उत्पादन कई गुना बढ़ गया है।

आज सारे कृषि जिंसों एवं उत्पादों का उत्पादन आवश्यकता से इतना अधिक है कि भंडारण आदि की समुचित व्यवस्था के अभाव में प्रतिवर्ष करोड़ों का कृषि उत्पाद बर्बाद हो रहा है। इनकी उचित व्यवस्था करने के बजाय सरकार, नौकरशाह, अधिकारी एवं कर्मचारी हमेशा नये-नये बहाने बनाकर देश को गुमराह करते रहते हैं। लाखों-करोंड़ों टन कृषि उत्पादों की बर्बादी कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चिंता एवं चुनौती है, जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।

इस समय देश में कृषिक्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक दवाईयों का अंधाधुंध प्रयोग बड़ी चिंता की बात है, जिसके कारण कृषि भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता शक्ति दिनोंदिन गिरती जा रही है। देश में कृषि भूमि तेजी से जहरीली होती जा रही है। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक दवाईयों के अंधाधुंध उपयोग के कारण प्रति एकड़ या हैक्टेयर कुल उत्पादकता या पैदावार कुछ जगहों में बढ़ तो रही है लेकिन ज़मीन की प्राकृतिक उर्वराशक्ति लगातार गिर रही है। इसके कारण खेती में अत्यधिक मात्रा में पानी की जरूरत पड़ने से देश के भूजल स्रोतों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव के कारण रबी फसलों के उतपादन पर इसका प्रभाव अब स्पष्ट तौर से दिखने लगा है।

आज भी देश की दो-तिहाई से अधिक कृषि जमीनों पर खेती-किसानी मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। सरकारों ने इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं किये हैं। वर्तमान सरकार के आने के बाद सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किये जा रहे हैं, बल्कि सरकार किसानों सहित देष के नागरिकों को केवल गुमराह करने के काम लगी है।

इन दिनों देश में कृषि विकास के नाम पर खेतीकिसानी के लिए जो निवेश हो रहा है वह अधिकांशतया पूंजीपतियों, उद्योगपतियों एवं बड़े कार्पोरेट घरानों के द्वारा ही हो रहे हैं, जिससे सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली आर्थिक सहायता, अनुदान इन्हीं वर्ग के खाते में जा रही है। सरकार के द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता में उर्वरक, सिंचाई, खाद, बीज, कृषि यंत्र एवं उपकरण, विद्युत, और फसल बीमा आदि पर दी जाने वाली सहायता सम्मिलित होती है। लेकिन चिंता की बात यह है कि सरकार के द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता से कृषि क्षेत्र का विकास नहीं बल्कि इस राशि का दुरूपयोग अधिक हो रहा है। सरकार के दी जाने वाली इस आर्थिक सहायता का अधिकांश हिस्सा चंद बड़े किसान ही ले पा रहे हैं, और छोटे एवं मध्यम किसानों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।

सरकार द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है। इसलिए यह सवाल भी उठता है कि कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली आर्थिक सहायता न तो न्याय संगत है और नहीं फलोत्पादक सिद्ध हो पा रही है।

शेनगेन फैन, अशोक गुलाटी एवं सुखदेव थोराट ने 2008 में जो शोध किया था, उसके अनुसार ‘कृषि सामग्री पर दी जाने वाली सब्सिडी से गरीबी दूर करने अथवा कृषि विकास को गति देने की दिशा में कोई विशेष लाभ नहीं होता। इसके मुकाबले ग्रामीण सड़कों या कृषि शोध एवं विकास या सिंचाई, यहां तक स्वास्थ्य और शिक्षा पर होने वाले निवेश से अधिक लाभ प्राप्त होता है।’ इसका तात्पर्य यह है कि सरकार के द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता से कुछेक व्यक्तियों को ही लाभ होता है जबकि सार्वजनिक एवं सामाजिक जन कल्याण नहीं हो पाता है। इस आर्थिक सहायता की रकम को ग्रामीण सामाजिक अधोसंरचना के विकास में खर्च करके धन को समुचित सदुपयोग एवं गांवों का पर्याप्त विकास किया जा सकता है। इस पर सरकार को गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

इस समय कृषि क्षेत्र में फसल विविधिकरण या फसल चक्र का अभाव है जिसके भूमि की उर्वरता शक्ति प्रभावित हो रही है।

कृषि सहकारिता, कृषि साख समितियों आदि में हर राज्यों में भारी भ्रष्टाचार है। इस समय देश की अधिकांश कृषि खुदकाश्त पद्धति के अंतर्गत हो रही है, जिसके कारण कृषि में तकनीक एवं प्रौद्योगिकी का प्रयोग व्यापक रूप से नहीं हो रहा है और प्रति एकड़/हेक्टेयर उत्पादकता बहुत कम है। अधिकांश राज्यों में सिंचाई सुविधाओं का समुचित विकास नहीं हो पाया है। उत्पादों के भंडारण की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण इसके खराब होने की समस्या आम है। कृषि मजदूरों का पलायन एक बड़ी समस्या है, इस पर सरकार बुरी तरह नाकाम रही है।

यह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के किसानों, खेती पर पूर्णं रूप से निर्भर रहने वाले लोगों, खेती-किसानी, एवं गांवों की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार या प्रगति नहीं हो पा रही है। पिछले 5-7 वर्षों से कृषि विकास का जो ढ़िंढ़ोरा पीटा जा रहा है, उससे न तो किसानों की स्थिति सुधरी और न ही गांवों की स्थिति बदली है, यहां तक कि कृषि एवं उसके सहायक कार्य-व्यवसाय पर निर्भर रहने वाले परिवारों एवं छोटे, मझोले, मध्यमवर्गीय किसानों की हालत या दशा में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।

यह बात इससे और भी स्पष्ट एवं पुष्ट हो जाती है कि देश की जानी मानी संस्था ‘नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) के 70 वें दौर के सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार देश के गांवों में 55 से 58 प्रतिशत परिवारों की रोजी, रोटी एवं जिंदगी खेती-किसानी से ही चलती है, एवं इन परिवारों की औसत मासिक आय 6426 रूपया है तथा देश के 52 प्रतिशत कृषक परिवार कर्ज के बोझ से दबे हैं। देश के 42 प्रतिशत कृषक विकल्प मिलने पर हमेशा के लिए खेती-किसानी छोड़ने को तैयार हैं। देश के 52.9 प्रतिशत किसानों पर आज औसतन 47,000 रूपए का ऋण है।’

अब समय आ गया है कि सरकार जागे और कृषि, खेती-किसानी, किसानों एवं खेतीहर ग्रामीण समाज की वास्तविक समस्याओं की दिशा में उचित समाधान प्रस्तुत करने के लिए सार्थक पहल करे। देश के सभी छोटी-बड़ी नदी-नाले पर हजारों की संख्या में ‘एनीकट’ बनाये जाने की तत्काल जरूरत है, जिससे वर्षा जल का संरक्षण हो सके, गिरते भू-जल स्तर पर लगाम लगे, वहीं इस पानी से खरीफ़ एवं रबी दोंनो मौसम में सिंचाईं हो सके। इससे नदी-नालों के आसपास पेड़-पौधे पनपने लगेंगे, जिससे पर्यावरणीय-पारिस्थिकीय संतुलन भी बना रहेगा।

अब देश में रबी मौसम में धान की फ़सलों के उत्पादन को हतोत्साहित किया जाये और फ़सल विविधिकरण या ‘फ़सल चक्र’ अपनाने के लिए किसानों को तैयार किये जाने की जरूरत है।

रबी मौसम में दलहन, तिलहन, साग-सब्जियों एवं अन्य नकदी फ़सलों के उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत है। इससे देश में कृषि का संतुलित विकास होगा, गिरता भूजल स्तर रूकेगा, भूमि की उर्वराशक्ति बनी रहेगी, महंगाई रूकेगी। सार यह है कि कृषि में फ़सल चक्र अपनाकर कृषि में आत्मनिर्भरता की संकल्पना को साकार किया जा सकता है।

डॉ. लखन चौधरी

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

Dr-Lakhan-Choudhary

किसान आंदोलनों की परंपरा और किसान आंदोलनों का संक्षिप्त इतिहास

Agriculture Bill will destroy agriculture - Mazdoor Kisan Manch

The tradition of peasant movements and a brief history of peasant movements

26 नवम्बर को किसानों का दिल्ली कूच कार्यक्रम है। वे वहां पहुंच पाते हैं या नहीं यह तो अभी नहीं बताया जा सकेगा, लेकिन तीन नए कृषि कानूनो के असर देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ने लगे है। धान की खरीद पर इसका असर साफ दिख रहा है। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और इस प्रकार किसानों का जो शोषण (Exploitation of farmers,) हो रहा है इसके लिये कोई समाधान निकालने के बजाय सरकार खुद ही इस शोषण का एक उपकरण बन गयी है। न सिर्फ किसान अपने उत्पाद के उचित मूल्य से वंचित हैं, बल्कि उनके उत्पाद की जमाखोरी से बिचौलिए भरपूर लाभ कमा रहे हैं और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। सरकार ने इन्हीं कृषि कानूनों के अंतर्गत आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) को खत्म कर दिया है जो जमाखोरी के खिलाफ सरकार को एक मजबूत कानूनी प्राविधान देता था। लेकिन अब कोई ऐसा प्रभावी कानून नहीं रहा। इसका असर महंगाई पर पड़ रहा है।

देश भर के किसान आंदोलित क्यों हैं | Why are farmers across the country agitated

इन कृषि कानून के कारण, एक तो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना बंद हो गया और दूसरे बाजार पर आधारित कृषि विपणन व्यवस्था पर बाजार के दलालों और बिचौलियों का वर्चस्व हो गया। न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) अब केवल फ़र्ज़ अदायगी बन कर रह गया है और सरकारी मंडियां अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खोती जा रही है। इन्हीं सब कारणों से देश भर के किसान आंदोलित हैं और वे नए कृषि कानूनों के खिलाफ हैं (Farmers are against new agricultural laws)

The government is openly in favor of the capitalists

सरकार एमएसपी की बात तो करती है पर जब यह कहा जाता है कि एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद को कानूनन दंडनीय अपराध बना दिया जाय तो, सरकार एक खामोशी ओढ़ लेती है।

सरकार का पूरा दृष्टिकोण और रवैया न केवल किसान विरोधी है, बल्कि वह खुल कर पूंजीपतियों के पक्ष में है। इसी से किसान आंदोलित हैं और वे एक निर्णायक आंदोलन की ओर बढ़ रहे हैं।

यह देश का पहला किसान आंदोलन नहीं है और न ही अंतिम है। देश के इतिहास में किसान आंदोलनों का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। प्रायः यह समझा जाता है कि भारतीय समाज और इतिहास में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, और किसान इन बदलाव की आंधी से अलग रहे हैं, लेकिन यह धारणा, किसान आंदोलनों के इतिहास (History of peasant movements,) को देखते हुए सही नहीं है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में आदिवासियों, जनजातियों और किसानों के आंदोलनों का अहम योगदान रहा है और व्यापक जन जागरण में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

स्वतंत्रता से पहले हुए बड़े किसान आंदोलन, गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन उन आंदोलनों ने ब्रिटिश साम्राज्य को भी अपनी किसान विरोधी नीतियों को बदलने के लिये बाध्य कर दिया था।

Why was satyagraha organised in champaran in 1916

ऐसे आंदोलनों में चंपारण का निलहे गोरों के खिलाफ किया गया किसान आंदोलन सबसे महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका से आते ही महात्मा गांधी ने चंपारण के राज कुमार शुक्ल नामक एक किसान के द्वारा जब बिहार के एक बेहद पिछड़े इलाके चंपारण में किसानों की व्यथा सुनी तो वे वहां गए। वहीं गांधी जी की पहली गिरफ्तारी होती है और वहीं भारत में ब्रिटिश हुक़ूमत ने गांधी जी की दृढ़ता और विनम्रता की पहली झलक भी देखी।

हालांकि गांधी, साम्राज्य के लिये अनजान नहीं थे। दक्षिण अफ्रीका में उनके आंदोलनों से अंग्रेजी सरकार भलीभांति परिचित हो चुकी थी। चंपारण में भी गांधी का आंदोलन सफल रहा। यह आंदोलन भी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ किसानों का आंदोलन था। पर पूरी तरह से गांधी जी की अहिंसा और असहयोग पर आधारित था। चंपारण को भविष्य में होने वाले स्वाधीनता संग्राम की एक प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है।

देश में नील पैदा करने वाले किसानों द्वारा पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली के प्रमुख आंदोलन हुए थे, पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की संगठित शुरुआत सन् 1859 से हुई थी। चूंकि अंग्रेजों की मुनाफाखोरी पर आधारित नीतियों से किसान सबसे अधिक प्रभावित और पीड़ित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों के कारण, किसान आक्रोश औऱ आंदोलनों का सूत्रपात हुआ।

सन् 1857 का विप्लव असफल रहा। इसके अनेक कारण हैं। लेकिन इस विप्लव ने अंग्रेजों और भारतीयों को भी कुछ सीखें दी। अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज खत्म कर भारत को सीधे क्राउन के अंतर्गत ले लिया और देश लगभग 600 देसी रियासतों को छोड़ कर, सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में चला गया। रियासतें भी अपने स्थानीय प्रशासन को छोड़ कर वायसराय के आधीन ही थीं। उक्त असफल विप्लव के बाद सरकार की नीतियों के विरोध का नेतृत्व समय-समय पर, किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन, किसानों के शोषण के नतीजे थे।

सच तो यह है कि, स्वाधीनता के पूर्व, जितने भी ‘किसान आंदोलन’ हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध थे। तत्कालीन समाचार पत्रों, जिंसमे वर्नाक्यूलर प्रेस अधिक महत्वपूर्ण हैं, ने भी किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों की ज्यादतियों, पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

आंदोलनकारी किसान चाहे तेलंगाना के हों या नक्सलवाड़ी के हिंसक लड़ाके, सभी ने छापामार आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम योगदा‍न दिया था।

सन् 1857 के विप्लव को अंग्रेजों ने कुछ देशी रियासतों की मदद और कुछ उनके अनियोजित होने के कारण, दबा तो दिया था, लेकिन देश में कई स्‍थानों पर आज़ादी के इस संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन होने शुरू हो गए। इन आंदोलनों में, नील की खेती करने वाले किसानों का विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह, मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में इतिहास में दर्ज हैं।

हालांकि किसानों का सबसे प्रभावी और व्यापक आंदोलन नील पैदा करने वाले किसानों का चंपारण आंदोलन (champaran movement of indigo planters) था जो भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में सन् 1859-1860 में किया गया। अपनी आर्थिक मांगों के संदर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आंदोलन उस समय का एक विशाल आंदोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिए ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली-सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को ‘ददनी प्रथा’ कहा जाता था।

Who translated the novel Neel Darpan in English

दीन बंधु मित्र द्वारा 1860 में लिखा गया बांग्ला का प्रसिद्ध नाटक, नील दर्पण, निलहे किसानों की व्यथा का एक जीवंत उल्लेख है। ‘नील दर्पण’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नाट्यकृति है, जो अपने समय का एक सशक्त दस्तावेज भी है। 1860 में जब ‘नील दर्पण’ प्रकाशित हुआ था तब बंगाली समाज और शासक दोनों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। जेम्स लॉग ने नील दर्पण का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया (James Log published English translation of the play Nil Darpan by Dinabandhu Mitra,) तो अँग्रेज सरकार ने उन्हें एक माह की जेल की सजा सुना दी। यह उन अंग्रेजों का कुकृत्य था जो खुद को दुनियाभर के संसदीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का सिरमौर मानते हैं। शोषक, शोषक ही रहता है और सत्ता का मूल स्वरूप शोषक का ही रहता है। अंग्रेज भी उस पनप रहे पूंजीवादी व्यवस्था में अलग नहीं थे।

भारत का पहला कृषक आंदोलन किसे माना जाता है

पहला महत्वपूर्ण आंदोलन बंगाल के पबना का किसान आंदोलन (Pabna Peasant Uprising (1873–76) in Bengal) था। 1873-76 में बंगाल के पबना नामक जगह में भी किसानों ने जमींदारी शोषणों के विरुद्ध विद्रोह किया था। पबना राजशाही राज की जमींदारी के अन्दर था और यह वर्धमान राज के बाद सबसे बड़ी जमींदारी थी। उस जमींदारी के संस्थापक राजा कामदेव राय थे। पबना विद्रोह जितना अधिक जमींदारों के खिलाफ था उतना सूदखोरों और महाजनों के विरुद्ध नहीं था। 1870-80 के दशक के पूर्वी बंगाल (अभी का बांग्लादेश) के किसानों ने जमींदारों द्वारा बढ़ाए गए मनमाने करों के विरोध में यह विद्रोह किया था। पबना में 1859 में कई किसानों को भूमि पर स्वामित्व का अधिकार दिया गया था। किसानों को मिले इस अधिकार के अंतर्गत किसानों को उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। लगान की वृद्धि पर भी रोक लगाई गई थी।

कुल मिलाकर किसानों के लिए पबना में एक सकारात्मक माहौल था, पर कालांतर में जमींदारों का दबदबा पबना में बढ़ने लगा। जमींदार मनमाने ढंग से लगान बढ़ाने लगे. अन्य तरीकों से भी जमींदारों द्वारा किसानों को प्रताड़ित किया जाने लगा।

अंततः 1873 ई. में पबना के किसानों ने जमींदारों के शोषण के रुद्ध एक संघ बनाया और किसानों की सभाएँ आयोजित की। कुछ किसानों ने अपने परगनों को जमींदारी नियंत्रण से मुक्त घोषित कर दिया और स्थानीय सरकार बनाने की चेष्टा भी की। उन्होंने एक सेना भी बनायी जिससे कि जमींदारों का सामना किया जा सके। जमींदारों से न्यायिक रूप से लड़ने के लिए धन चंदे के रूप में भी किसानों द्वारा जमा किया गया। किसानों ने लगान देना भी कुछ समय के लिए बंद कर दिया। यह आन्दोलन धीरे-धीरे सुदूर क्षेत्रों में भी, जैसे ढाका, मैमनसिंह, त्रिपुरा, राजशाही, फरीदपुर, राजशाही फैलने लगा।

पबना विद्रोह एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था। किसान शांतिपूर्ण तरीके से अपने हितों की सुरक्षा की माँग कर रहे थे। उनका आन्दोलन सरकार के विरुद्ध भी नहीं था इसलिए पबना आन्दोलन को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का समर्थन प्राप्त हुआ। 1873 ई. बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर कैंपवेल ने किसान संगठनों को उचित ठहराया। पर बंगाल के जमींदारों ने इस आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग देना चाहा।

एक अखबार हिंदू पेट्रियट ने लिखा कि यह आन्दोलन मुसलमान किसानों द्वारा हिन्दू जमींदारों के विरुद्ध शुरू किया गया है। पर कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग देना इसलिए गलत है क्योंकि पबना विद्रोह में हिन्दू और मुसलमान दोनों वर्ग के किसान शामिल थे। आन्दोलन के नेता भी दोनों समुदाय के लोग थे, जैसे ईशान चन्द्र राय, शम्भु पाल और खुदी मल्लाह। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप 1885 का बंगाल काश्तकारी कानून (Bengal Tenancy Act of 1885) पारित हुआ जिसमें किसानों को कुछ राहत पहुँचाने की व्यवस्था की गई।

उल्लेखनीय है कि किसान चेतना, एक दो स्थानों तक ही सीमित नहीं रही, वरन देश के विभिन्न भागों में इसका व्यापक प्रसार हुआ। यह चेतना दक्षिण में भी फैलने लगी, क्योंकि महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर जिलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार सारे हथकंडे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे। दिसंबर सन् 1874 में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के खिलाफ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया। इन साहूकारों के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत सन् 1874 में शिरूर तालुका के करडाह गांव से हुई।

होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरी, सन् 1918 में उत्तर प्रदेश में ‘किसान सभा’ का गठन किया गया। यह उत्तर प्रदेश या तत्कालीन यूनाइटेड प्रविन्सेस का पहला किसान संगठन (The First Farmers Organization of the then United Provinces) कहा जाता है। सन् 1919 के अं‍तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आ गया। उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने ‘एका आंदोलन’ नामक एक प्रभावी आंदोलन भी चलाया था। अवध किसान आंदोलन के नायकों में मदारी पासी निराले और हाशिये के समाज के विरले नायक थे।

गरीब किसानों की बेदखली, लगान और अनेक गैर कानूनी करों से मुक्ति के लिए उन्होंने संगठित और विद्रोही आंदोलन चलाया था। जब दक्षिणी अवध प्रांत का उग्र किसान आंदोलन सरकार और जमींदारों के क्रूर दमन के कारण 1921 के मध्य में दबा दिया गया था तथा असहयोग आंदोलनकारियों द्वारा निगल लिया गया था, ठीक उसी समय, मदारी पासी का ‘एका आंदोलन’ हरदोई जिले के उत्तरी और अवध के पश्चिमी जिलों में 1921 के अंत में और 1922 के प्रारम्भ में प्रकाश में आया।

मालाबार विद्रोह | Malabar rebellion (मोपला विद्रोह)

मोपला लोग केरल के मालाबार क्षेत्र में रहने वाले इस्लाम धर्म में धर्मांतरित अरबी एवं मलयाली मुसलमान थे। अधिकांश मोपला छोटे किसान या व्यापारी थे, जो अपनी गरीबी और अशिक्षा के कारण थंगल कहे जाने वाले काजियों और मौलवियों के प्रभाव में थे। मोपला किसान मालाबार के हिन्दू नम्बूदरी एवं नायर उच्च जाति, भूस्वामियों के बटाईदार या आसामी काश्तकार थे। नम्बूदरी और नायर जैसे उच्च जाति के भूस्वामियों को शासन, पुलिस और न्यायालय से संरक्षण प्राप्त था। मोपला या मोपला विद्रोह इसलिए सांप्रदायिक हो गया क्योंकि अधिकांश जमींदार या भूस्वामी हिन्दू थे और काश्तकार अधिकांश मुसलमान थे।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्नीसवीं सदी का मोपला विद्रोह ग्रामीण विद्रोह का विशिष्ट उदाहरण है,जिसकी जड़ें स्पष्टत: कृषि व्यवस्था में थीं। यह मोपला विद्रोह का प्रथम चरण था।

1920 – 21 में द्वितीय मोपला विद्रोह हुआ जिसके कारणों में भी कृषिजन्य असंतोष था, लेकिन कालांतर में असहयोग आंदोलन स्थगित किए जाने पर इस आंदोलन ने साम्प्रदायिक, राजनैतिक स्वरूप धारण कर लिया। 1921 में केरल के मालाबार जिले के काश्तकारों ने जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। 15 फरवरी 1921 को सरकार ने इस क्षेत्र में निषेधाज्ञा घोषित कर खिलाफत तथा कांग्रेस के नेता यू गोपाल मेनन, पी मोइनुद्दीन कोया, याकूब हसन तथा के माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। मोपला विद्रोह की उग्रता को देखते हुए सरकार ने सैनिक शासन की घोषणा कर दी और परिणामस्वरूप मोपला विद्रोह को कुचल दिया गया।

कूका विद्रोह कब हुआ था | kuka vidroh in Hindi | kuka andolan in Hindi

इसी प्रकार पंजाब में 1871 – 72 में कूका लोगों (नामधारी सिखों) द्वारा एक सशस्त्र विद्रोह किया गया था। कूका लोगों ने पूरे पंजाब को बाईस जिलों में बाँटकर अपनी समानान्तर सरकार बना ली थी। कूका वीरों की संख्या सात लाख से ऊपर थी लेकिन अधूरी तैयारी में ही विद्रोह भड़क उठा और इसी कारण वह दबा भी दिया गया। सिखों के नामधारी संप्रदाय के लोग कूका भी कहलाते हैं। इस पन्थ का आरम्भ 1840 ईस्वी में हुआ था। इसे प्रारम्भ करने का श्रेय सेन साहब अर्थात भगत जवाहर मल को जाता है। कूका विद्रोह के दौरान 66 नामधारी सिख शहीद हो गए थे। नामधारी सिखों की कुर्बानियों को भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में ‘कूका लहर’ के नाम से अंकित किया गया है। कृषि संबंधी समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज़ सरकार से लड़ने के लिए बनाए गए इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। सन् 1872 में इनके शिष्य बाबा रामसिंह ने अंग्रेजों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कैद कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहां पर सन् 1885 में उनकी मृत्यु हो गई।

इसी प्रकार वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रामोसी किसानों ने जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया। इसी तरह आंध्रप्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ, जो सन् 1879 से लेकर सन् 1920-22 तक छिटपुट ढंग से चलता रहा।

बिहार में एक अन्य किसान आंदोलन भी हुआ था, जिसे ताना भगत आंदोलन के नाम से जानते हैं। इस आन्दोलन की शुरुआत सन् 1914 में हुई थी। यह आन्दोलन लगान की ऊंची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक ‘जतरा भगत’ थे। ‘मुण्डा आन्दोलन’ की समाप्ति के करीब 13 वर्ष बाद ‘ताना भगत आन्दोलन’ शुरू हुआ। यह ऐसा धार्मिक आन्दोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नए ‘पंथ’ के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन (Birsa Munda movement- बिरसा मुंडा आंदोलन) का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धारित किए थे।

Tebhaga movement (तेभागा आंदोलन) | Tebhaga andolan kahan hua tha

किसान आन्दोलनों के इतिहास में सन् 1946 का बंगाल का तेभागा आन्दोलन (tebhaga andolan in hindi) सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, जिसमें किसानों ने ‘फ्लाइड कमीशन’ की सिफारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। बंगाल का ‘तेभागा आंदोलन’ फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने के लिए किया गया था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। ‘किसान सभा’ के आह्वान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

आंध्रप्रदेश का तेलंगाना आन्दोलन जमींदारों एवं साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ सन् 1946 में शुरू किया गया था। सन् 1858 के बाद हुए किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश मांगें आर्थिक होती थीं। किसान आन्दोलन ने राजनीतिक शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, लेकिन इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।

एक अनोखा आंदोलन, बिजोलिया किसान आंदोलन का भी उल्लेख मिलता है। यह ‘किसान आन्दोलन’ भारतभर में प्रसिद्ध रहा जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन् 1847 से प्रारंभ होकर करीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुकाबला किया, वह इतिहास बन गया।

किसान सभा की स्थापना | Establishment of Kisan Sabha

आंदोलनों के साथ-साथ किसान संगठन भी अस्तित्व में आये। सन् 1923 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘बिहार किसान सभा’ का गठन किया। सन् 1928 में : आंध्र प्रांतीय रैयत सभा’ की स्थापना (Establishment of Andhra Provincial Ryots Sabha) एनजी रंगा (Gogineni Ranga Nayukulu, also known as N. G. Ranga) ने की। उड़ीसा में मालती चौधरी ने ‘उत्‍कल प्रान्तीय किसान सभा’ की स्थापना की। बंगाल में ‘टेंनेंसी एक्ट’ को लेकर सन् 1929 में ‘कृषक प्रजा पार्टी’ की स्थापना हुई। अप्रैल, 1935 में संयुक्त प्रांत में किसान संघ की स्थापना हुई। इसी वर्ष एनजी रंगा एवं अन्य किसान नेताओं ने सभी प्रान्तीय किसान सभाओं को मिलाकर एक ‘अखिल भारतीय किसान संगठन’ बनाने की योजना बनाई। चंपारण का मामला बहुत पुराना था। चम्पारण के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया पद्धति’ कहते थे। 19वीं शताब्दी के अंत में रासायनिक रंगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाजार समाप्त हो गए।

चंपारण के बाद गांधीजी ने सन् 1918 में खेड़ा किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। खेड़ा गुजरात में स्थित है। खेड़ा में गांधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की। खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत की मांग की, लेकिन उन्‍हें कोई रियायत नहीं मिली। गांधीजी ने 22 मार्च, 1918 को खेड़ा आन्दोलन की बागडोर संभाली। अन्य सहयोगियों में सरदार वल्लभभाई पटेल और इन्दुलाल याज्ञनिक थे। सूरत, (गुजरात) के बारदोली तालुका में सन् 1928 में किसानों द्वारा ‘लगान’ न अदायगी का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल ‘कुनबी-पाटीदार’ जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि सभी जनजाति के लोगों ने हिस्सा लिया। इसी आंदोलन के बाद गांधी जी ने बल्लभभाई पटेल को सरदार कह कर सम्बोधित किया और सरदार, सच में स्वाधीनता संग्राम के सरदार ही सिद्ध हुए।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

मोदी सरकार अब तक की सबसे ज्यादा किसान, मजदूर विरोधी सरकार साबित हुई – दारापुरी

ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता और अवकाशप्राप्त आईपीएस एस आर दारापुरी (National spokesperson of All India People’s Front and retired IPS SR Darapuri)

किसानों के राष्ट्रीय विरोध में शामिल हुआ मजदूर किसान मंच

प्रदेश के कई जिलों में प्रधानमंत्री को भेजा मांग पत्र

27 मई 2020, मोदी सरकार अब तक की सबसे ज्यादा किसान, मजदूर विरोधी सरकार साबित हुई है। कोरोना महामारी के इस संकटकालीन समय में भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ किसानों और मजदूरों को अपने भीमकाय 20 लाख करोड़ के पैकेज में एक पैसा देना इस सरकार ने स्वीकार नहीं किया। उलटे कृषि के कारपोरेटाइजेशन (Corporatization of agriculture) के जरिए वित्त मंत्री ने भारतीय खेती किसानी की बर्बादी (Waste of Indian farming) का ही रास्ता ही खोल दिया। देश के बिजली, रक्षा, कोयला आदि सार्वजनिक उद्योगों व सम्पत्तियों को बेचने का निर्णय लिया। हद यह है कि सरकार ने इस संकट में पांच हजार रूपए हर गरीब को देने की तमाम संगठनों द्वारा उठाई जा रही न्यूनतम मांग तक को नहीं माना। मनरेगा में दिए चालीस हजार करोड़ से मौजूदा जाबकार्डधारी परिवारों को महज दो दिन ही रोजगार मिल सकता है। यहीं वजह है कि प्रदेश में आमतौर पर मनरेगा में कराएं जा रहे काम की मजदूरी बकाया है। यह बातें आज प्रेस को जारी बयान में मजदूर किसान मंच के अध्यक्ष व पूर्व आई जी एसआर दारापुरी और महासचिव डा. बृजबिहारी ने व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि देशभर के दो सौ से ज्यादा किसान संगठनों की अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के 27 व 28 मई के राष्ट्रीय विरोध में आज पहले दिन मजदूर किसान मंच की सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, मऊ आगरा, लखनऊ ईकाईयों ने लाकडाउन के नियमों पालन करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से प्रधानमंत्री को मांग पत्र भेजा। कई जिलों कल भी मांग पत्र दिया जायेगा।

उन्होंने बताया कि इस मांग पत्र में सहकारी खेती को मजबूत करने, किसानों के सभी कर्ज माफ करने, ब्याज मुक्त कर्ज देने, सस्ती लागत सामग्री उपलब्ध कराने, पचास गुना ज्यादा दाम पर सरकारी खरीद की गारंटी, मनरेगा में सालभर काम और 6 सौ रूपया मजदूरी, प्रवासी मजदूर समेत हर मजदूर व किसान को तत्काल नकद और राशन किट देने, प्रवासी मजदूरों की निःशुल्क वापसी की गारंटी, प्राकृतिक आपदा तूफान, ओलावृष्टि आदि से प्रभावित किसानों को मुआवजा, गन्ना किसानों के बकाए के तत्काल भुगतान, वनाधिकार कानून में पट्टा देने, सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बहाल करने और किसान विरोधी बिजली संशोधन बिल 2020 वापस लेने जैसी मांगें शामिल रही।