लोगों का रंग गोरा और काला क्यों होता है?

general knowledge in hindi

Why do people have blond and black colours?

लोगों का रंग गोरा या काला होना हमारी त्वचा में पाए जाने वाले मेलेनिन नामक वर्णक की मात्रा के आधार पर तय होता है People have a fair complexion based on the amount of pigment called melanin found in our skin.

आइए हम मनुष्यों की त्वचा के रंग के इतिहास (History of human skin color) पर एक नजर डालते हैं। साँवली या काले रंग की त्वचा किस तरह हमारी रक्षा करती है? इस कहानी की जड़ें बालों में हैं! काली त्वचा वाले लोगों में मेलेनिन (Melanin in people with dark skin) अधिक होता है जो त्वचा की कोशिकाओं को पराबैंगनी किरणों के विकिरण से होने वाले नुकसान (damage caused by ultraviolet radiation to skin cells) से बचाता है, और कैंसर के खतरे (cancer risk) को कम करता है

साँवली या काली त्वचा (Dark skin) वाले लोगों में मेलेनिन (अधिकांश जीवों की त्वचा की कोशिकाओं में पाए जाने वाले प्राकृतिक पिगमेंट के समूह के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) अधिक होता है जो त्वचा की कोशिकाओं को पराबैंगनी किरणों के विकिरण से होने वाले नुकसान से बचाता है, और इस तरह कैंसर के खतरे (Cancer risk) को कम करता है।

लोगों का रंग गोरा या काला होना हमारी त्वचा में पाए जाने वाले मेलेनिन नामक वर्णक की मात्रा के आधार पर तय होता है। जिसके शरीर/त्वचा में मेलेनिन की मात्रा अधिक होती है, वह काला दिखता है व जिसकी त्वचा में मेलेनिन की मात्रा कम होती है, वह गोरा दिखता है।

शरीर के अलग-अलग भाग में मेलेनिन की मात्रा अलग-अलग हो सकती है। हम कह सकते हैं कि काला या गोरा होने के लिए बने कारक मेलेनिन को सूर्य प्रकाश प्रभावित करता है। लेकिन इसके लिए सूर्य प्रकाश को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं माना जा सकता क्योंकि नए पैदा होने वाले बच्चे भी काले-गोरे होते हैं। वे तो अभी सूर्य प्रकाश के सम्पर्क से बहुत दूर हैं। काले व गोरे होने के लिए कुछ तो आनुवंशिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं।

संक्षेप में कहें तो हमारी त्वचा का रंग इस बात से तय होता है कि त्वचा के रंग के पिगमेंट (वर्णक/रंजक) बनाने वाले किस तरह के जीन्स हमने अपने माता-पिता से विरासत में प्राप्त किए हैं। जीन्स के प्रकार किसी स्थान-विशेष पर पड़ने वाले पराबैंगनी विकिरण की मात्रा द्वारा प्रभावित होते हैं। इस तथ्य को समझने के लिए आइए हम मनुष्यों की त्वचा के रंग के इतिहास पर एक नजर डालते हैं।

इस कहानी की जड़ें बालों में हैं!

Things you should know

हालाँकि, मनुष्यों में बालों के फॉलिकल (रोमकूप) की संख्या और घनत्व काफी कुछ वानरों के जैसा ही होता है, लेकिन हमारे शरीर पर जो बाल होते हैं, वे न तो इतने मोटे होते हैं और न ही इतने लम्बे जितने कि हमारे कुछ सबसे नज़दीकी रिश्तेदारों, जैसे चिम्पांज़ियों, के बाल। लेकिन लगभग 50 लाख साल पहले तक हमारे पूर्वजों के शरीर के बाल इन वानरों जैसे ही थे। उस समय तक वे अपने पैरों से चलने लगे थे, और भोजन व पानी की तलाश में खुले और विस्तृत परिवेशों में अधिक समय बिताने लगे थे। ऐसे में उनके लिए एक बहुत बड़ा खतरा था — शरीर के भीतरी तापमान का बहुत अधिक बढ़ना। प्रचलित सिद्धान्त के अनुसार प्राचीन मनुष्य के शरीर में जिन परिवर्तन के  विकास के कारण उनके शरीर का तापमान बहुत अधिक न बढ़ा, वे थे-

शरीर पर बालों का कम होना, और स्वेद-ग्रन्थियों (पसीना निकालने की ग्रन्थियाँ) की संख्या में बढ़ोत्तरी।

हमारा ऐसा मानना है कि इन परिवर्तनों ने साथ में असर दिखाया होगा और हमारे पूर्वजों के शरीर पसीना बेहतर ढंग से निकल पाने और उसके वाष्पीकरण के कारण ठण्डे हो जाते थे।

इन सबका रंग से क्या वास्ता?

बात दरअसल यह है कि लगभग 15 लाख साल पहले, हमारे ग्रह के विस्तृत क्षेत्रों ने बहुत लम्बे समय तक अस्वाभाविक शुष्क जलवायु का सामना किया। ऐसी शुष्क परिस्थितियों में बहुत बड़ी संख्या में पेड़ मर गए, छाँव की बहुत कमी हो गई जिस वजह से होमो (आधुनिक मनुष्य या होमो सेपियन भी इसी वंश की प्रजाति हैं और ऐसी एकमात्र बची हुई प्रजाति है, बाकी सभी प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं) वंश के प्रारम्भिक सदस्यों की बालों रहित त्वचा पर पहले की तुलना में सीधी धूप अधिक पड़ती थी और ज़्यादा लम्बे समय तक उसे पराबैंगनी विकिरण के ऊँचे स्तरों को झेलना पड़ता था।

यहाँ पर यह सवाल पूछा जा सकता है कि सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों का हमारी त्वचा पर क्या बुरा असर पड़ता है। हालाँकि, पराबैंगनी किरणें सूर्य के प्रकाश का बहुत छोटा अंश होती हैं, पर धूप से हमारे शरीर को होने वाला ज़्यादातर नुकसान इन्हीं की वजह से होता है। पराबैंगनी किरणें त्वचा के कैंसर का कारण बन सकती हैं क्योंकि ये हमारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद डीएनए को क्षति पहुँचा सकती हैं जिसके कारण वे असामान्य व्यवहार करने लगती हैं।1 और यही वजह है जिसके कारण हमें लगता है कि हमारे पूर्वजों की त्वचा धीरे-धीरे साँवली और काले रंग की होने लगी।

साँवली या काले रंग की त्वचा किस तरह हमारी रक्षा करती है?

How does dark skin protect us?

साँवली या काली त्वचा वाले लोगों में मेलेनिन (अधिकांश जीवों की त्वचा की कोशिकाओं में पाए जाने वाले प्राकृतिक पिगमेंट के समूह के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) अधिक होता है जो त्वचा की कोशिकाओं को पराबैंगनी किरणों के विकिरण से होने वाले नुकसान से बचाता है, और इस तरह कैंसर के खतरे को कम करता है। मनुष्यों में किस मात्रा में और किस प्रकार का मेलेनिन बनेगा, यह मुख्यत: मेलेनिन को बनाने वाली मेलैनोसाइट  नामक  त्वचा  की कोशिकाओं में मौजूद तमाम जीन्स और उनके प्रकारों द्वारा तय होता है। हमारी त्वचा की रंगत इस बात से तय होती है कि हमने अपनी माँ और पिता से मेलेनिन बनाने वाले कौन-से जीन्स  प्राप्त  किए,  और  हमारी कोशिकाओं पर उनका क्या संयुक्त प्रभाव पड़ सकता है। मनुष्य के इतिहास में सम्भवत: यह वह समय था जब मेलेनिन का ज़्यादा उत्पादन करने वाले जीन्स विभिन्न आबादियों में फैले। और सम्भवत: इसी तरह मनुष्यों में साँवली और काली त्वचा पाई जाने लगी।

पर इससे यह कहाँ स्पष्ट होता है कि कुछ लोग गोरे क्यों होते हैं? Why are some people white?

करीब 1,00,000-70,000 साल पहले, शारीरिक रूप से आधुनिक, कुछ मनुष्यों (होमो सेपिएन्स) ने उष्ण-कटिबन्धों से निकलकर, उत्तर की ओर जाना शु डिग्री कर दिया जहाँ उन्हें अपेक्षाकृत कम तेज़ धूप मिलती थी। शायद इन ऊँचे अक्षांशों की सर्द जलवायु से बचाव के लिए अपने शरीरों को ढाँकने के लिए ज़्यादा कपड़ों के इस्तेमाल ने भी उन्हें पराबैंगनी किरणों से और ज़्यादा बचाया होगा। इन परिस्थितियों में, प्राकृतिक चयन के नज़रिए से उजले रंग की त्वचा वाले जीन्स के प्रभाव किसी व्यक्ति में दिखने के बाद भी, उनके जीवित रहने की सम्भावना कम नहीं होती थी। इस तरह यहाँ के मनुष्यों में उजले रंग की त्वचा वाले जीन्स फैल गए।

हमारे विकसित होने के इतिहास में मनुष्यों के अलग-अलग समूह जब हमारे ग्रह के अलग-अलग हिस्सों में फैलने लगे तो न सिर्फ धूप की अलग-अलग तेज़ी से उनका सामना हुआ, बल्कि धीरे-धीरे मनुष्यों के अन्य समूहों से उनका सम्पर्क हुआ जो या तो पहले से वहाँ रह रहे थे या इन लोगों के बाद वहाँ पहुँचे थे। समय बीतने के साथ, इस समूह के सदस्यों ने आपस में यौन सम्बन्ध बनाना शु डिग्री कर दिए और अलग-अलग प्रकार के पिगमेंट बनाने वाले उनके जो मूल जीन्स थे, उनके बच्चों के शरीरों में उन सबका मिश्रण हो गया।

इसके साथ ही जिस तरह से पृथ्वी पर जलवायु दशाएँ बदलती रही हैं, उसके परिणामस्वरूप आज पूरे ग्रह पर हमें अपने चारों तरफ भिन्न-भिन्न प्रकार के त्वचा के रंग दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक आजकल यह कहते हैं कि पराबैंगनी किरणों के विकिरण के अलग-अलग स्तरों वाले विभिन्न क्षेत्रों में स्थानान्तरित होने से पिछले 50,000 सालों में काली या साँवली त्वचा वाली आबादियाँ उजली त्वचा वाली, और उजली त्वचा वाली आबादियाँ साँवली या काली त्वचा वाली आबादियों में बदल गई हैं। और त्वचा के रंग में इतने बड़े परिवर्तन सम्भवत_ सिर्फ पिछली 100 पीढ़ियों में ही हुए होंगे (करीब 2500 सालों में)।

मुझे लगता है कि अपने शरीरों पर लगाने के लिहाज़ से आज के अरबों रुपए वाले सौन्दर्य उद्योग के उत्पादों की तुलना में जीवविज्ञान और भूगोल का यह कहीं बेहतर और प्रमाणित मिश्रण बेहतरीन नतीजे देगा!

– रुद्राशीष चक्रवर्ती

देशबन्धु

गजब ! सोना से भी महंगा है आपके बालों का कचरा, कैंसर थैरेपी में हो सकता है उपयोगी

Waste of your hair is more expensive than gold

Amazing ! Waste of your hair is more expensive than gold, may be useful in cancer therapy

नई दिल्ली, 3 फरवरी 2020 : कैंसर थेरेपी में मेलेनिन (Melanin in cancer therapy) और कॉस्मेटिक उद्योग में केराटिन का उपयोग (Keratin use in cosmetic industry) बड़े पैमाने पर होता है। भारतीय वैज्ञानिकों ने अब एक ऐसी पद्धति विकसित की है, जो बालों के कचरे से मेलेनिन और केराटिन को अलग करने और उससे जैविक फर्टीलाइजर प्राप्त करने में उपयोगी हो सकती है।

Around three lakh tons of human hair waste is produced every day

मेलेनिन और केराटिन मनुष्य के बालों में भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं और दुनियाभर में हर दिन करीब तीन लाख टन मनुष्य के बालों का कचरा पैदा होता है। बाल जैविक रूप से अपघटित तो हो सकते हैं, पर अपशिष्टों के प्रवाह तंत्र में इनकी मौजूदगी पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दे सकती है।

मेलानिन एक प्राकृतिक रंगद्रव्य (पिगमेंट) है, जो अधिकतर जीवों में पाया जाता है। जबकि, केराटिन (application of keratin) एक रेशेदार संरचनात्मक प्रोटीन के परिवार का हिस्सा है, जिसे स्क्लेरोप्रोटीन के रूप में जाना जाता है। एक किलोग्राम केराटिन का बाजार मूल्य (Market Price of one kilogram of keratin) 15 हजार से 20 हजार रुपये है। वहीं, मेलेनिन सोने से भी महंगा है और इसका मूल्य करीब पांच हजार रुपये प्रति ग्राम तक है। इस लिहाज से देखें तो इन दोनों तत्वों का महत्व काफी अधिक है।

केराटिन और मेलेनिन को अलग करने के लिए हाइड्रेटेड आयनिक घोल का उपयोग किया गया है। इस घोल में बाल अपघटित होकर घुल जाते हैं। गुजरात के भावनगर में स्थित केंद्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) के शोधकर्ता डॉ कमलेश प्रसाद ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “आमतौर पर उपयोग होने वाले लवण (सॉल्ट) कमरे के तापमान पर ठोस होता है, लेकिन इस घोल में विशिष्ट लवण का उपयोग किया गया है, जो सामान्य कमरे के तापमान पर तरल अवस्था में होता है।”

मानव बालों के नमूने को सबसे पहले एक खास सॉल्यूशन की मदद से साफ किया गया है। इसके बाद हाइड्रेटेड आयनिक तरल में डालकर नौ घंटे तक इसे हिलाया गया, ताकि बाल उसमें पूरी तरह घुल जाएं। ऐसा करने पर एक काले रंग का घोल बन जाता है। इस घोल में हाइड्रोक्लोरिक एसिड मिलाया गया, तो ब्लैक मेलेनिन तलछट के रूप में बच जाता है।

मेलेनिन निकालने के बाद, बचे हुए सॉल्यूशन में एसीटोन मिलाया गया, जिससे केराटिन प्राप्त किया गया है।

डॉ. प्रसाद ने बताया कि

“मनुष्य के बालों के करीब 25 प्रतिशत कचरे को घोलने में हाइड्रेटेड आयनिक घोल को प्रभावी पाया गया है। इस पद्धति से 10 से 22 प्रतिशत मेलेनिन और 36 से 38 प्रतिशत तक केराटिन अलग करने में सफलता मिली है। इन तत्वों को अलग करने के बाद बचे अपशिष्ट को समुद्री शैवाल के साथ बराबर अनुपात में मिलाकर फर्टीलाइजर के रूप में उपयोग किया जा सकता है। एक किलोग्राम मनुष्य के बालों से 200 ग्राम मेलेनिन, 360 ग्राम केराटिन और 300 मिलीलीटर आयनिक तरल मिल सकता है।”

डॉ. प्रसाद का कहना है कि

“इस अध्ययन में फिलहाल मेलेनिन का अपरिष्कृत रूप प्राप्त किया गया है। अगर परिष्कृत करके इसे सल्फर रहित कर दिया जाए तो इसका मूल्य और भी बढ़ सकता है।”

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)