दक्षिण अफ़्रीका से रिपोर्ट हुए ‘ओमिक्रोन’ कोरोना वायरस के ज़िम्मेदार हैं अमीर देश

covid 19

Rich countries are responsible for ‘Omicron’ corona virus reported from South Africa

जब तक दुनिया की सारी पात्र आबादी को कोविड वैक्सीन की पूरी खुराक (full dose of covid vaccine) समय-बद्ध तरीक़े से नहीं लग जाती तब तक कोरोना टीकाकारण से सम्भावित हर्ड इम्यूनिटी (सामुदायिक प्रतिरोधकता) नहीं उत्पन्न होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन जो संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च स्वास्थ्य एजेंसी है, उसने बारम्बार निवेदन किया कि २०२१ के अंत तक किसी भी देश में, पूरी खुराक वैक्सीन लगाए हुए लोगों को बूस्टर टीका न लगे (और पहले ग़रीब देशों में पात्र लोगों को टीके की पहली खुराक लगे) पर अमीर देशों ने इस चेतावनी को नज़रंदाज़ किया और अमीर देशों की जनता को बूस्टर लगायी। नतीजतन अनेक देशों में पहली खुराक तक अधिकांश जनता के नहीं लगी है और २ देशों में तो १ भी टीका अभी तक नहीं हुआ है (एरित्रिया और उत्तर कोरिया)।

कोरोना वायरस का नया वेरिएंट जिसे ओमिक्रोन या बी1.1.529 {Omicron (B.1.1.529): SARS-CoV-2 Variant} कहा गया है

वरिष्ठ संक्रामक रोग विशेषज्ञ और ऑर्गनायज़्ड मेडिसिन ऐकडेमिक गिल्ड (Senior Infectious Disease Specialist and Organized Medicine Academic Guild) के राष्ट्रीय सचिव डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि २४ नवम्बर २०२१ को दक्षिण अफ़्रीका से कोरोना वायरस का नया वेरिएंट रिपोर्ट हुआ है जिसे आज विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘ओमिक्रोन’  या बी1.1.529 कहा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसको वेरिएंट ऑफ कंसर्न‘ (‘Variants of Concern’) कहा है क्योंकि यह गम्भीर वाला वायरस लग रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक विशेष स्वतंत्र विशेषज्ञों के समूह जो कोरोना वायरस के नए प्रकार पर निरंतर निगरानी रखता है, उसके अनुसार, ओमिक्रोन में ५० म्यूटेशन हैं (१० स्पाइक प्रोटीन में हैं) जो अत्यंत चिंताजनक हैं।

ध्यान दें कि डेल्टा वेरिएंट में २ म्यूटेशन थे।

अधिक संक्रामक है नए प्रकार का कोरोना वायरस ओमिक्रोन

डॉ ईश्वर गिलाडा जो भारत के सर्वप्रथम चिकित्सकों में हैं जिन्होंने एचआईवी से संक्रमित लोगों की चिकित्सकीय देखभाल शुरू की थी जब पहला पॉज़िटिव केस भारत में रिपोर्ट हुआ था, ने बताया कि यह नए प्रकार का कोरोना वायरस अधिक संक्रामक है और वैक्सीन भी इस पर संभवतः कम कारगर रहेगी। हालाँकि इस नए प्रकार के कोरोना वायरस से अधिक गम्भीर परिणाम होंगे या मृत्यु अधिक होगी या नहीं, यह अभी ज्ञात नहीं है।

ओमिक्रोन ग्रीक वर्णमाला का भाग है जैसे कि अल्फ़ा, बीटा, थीटा, डेल्टा, गामा, एप्सिलॉन आदि। जब तीसरी कोरोना की लहर के आसार कम हो रहे थे और लोग और सरकार कोविड नियंत्रण पर ढिलाई दिखा रही थी, जैसे कि मध्य प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि कोविड उपयुक्त व्यवहार अब ज़रूरी नहीं रहा, तब यह नया ख़तरा मंडराने लगा है।

ऑर्गनायज़्ड मेडिसिन ऐकडेमिक गिल्ड के डॉ ईश्वर गिलाडा और राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ सुनीला गर्ग ने सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) से कहा कि ‘डेल्टा’ वेरिएंट (कोरोना वायरस का ‘डेल्टा’ प्रकार जिसे बी-1.617 भी कहा गया था) महाराष्ट्र के अमरावती से रिपोर्ट हुआ था जिसमें दो म्यूटेशन थे (ई४८४कियु और एल४५२आर)। जनवरी २०२१ तक डेल्टा वेरिएंट सिर्फ़ १ प्रतिशत रिपोर्ट हुआ था परंतु जून २०२१ तक वह भारत में ९९% संक्रमण का ज़िम्मेदार बन गया था। अगस्त २०२१ तक डेल्टा वेरिएंट १०० से अधिक देशों से रिपोर्ट हुआ था। जिस तरह से कोविड संक्रमण से बचाव के तरीक़े हम लोग सख़्ती से लागू नहीं कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि हमें डेल्टा वेरिएंट की अप्रैल-जून की हृदय विदारक तबाही स्मरण नहीं रही।

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि यदि कोरोना नियंत्रण को अधिक प्रभावकारी करना है तो आवश्यकता है कुशल सुनियोजित नीतियों की जिसमें विभिन्न वर्गों की भागेदारी हो, और हर स्तर पर सभी वर्ग पूर्ण समर्पण से एकजुट हो कर कोरोना नियंत्रण के साथ-साथ स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को सशक्त करने में लगें।

कोरोना वायरस ओमिक्रोन से निपटने के लिए ऑर्गनायज़्ड मेडिसिन ऐकडेमिक गिल्ड के सुझाव (Organized Medicine Academic Guild’s suggestions to deal with Corona Virus Omicron)

ऑर्गनायज़्ड मेडिसिन ऐकडेमिक गिल्ड जो चिकित्सकीय विशेषज्ञों की १५ संस्थाओं का समूह है, उसने सरकार को यह सुझाव दिए हैं:

* सिर्फ़ दक्षिण अफ़्रीका, बेलज़ियम, इसराइल और हांग कांग ही नहीं परंतु सभी देशों से आने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्री के आवागमन पर रोक लगे। हम लोग हवाई मार्ग खुला रख कर पहले भारी क़ीमत चुका चुके हैं जब सिर्फ़ चंद देशों की आने वाली फ़्लाइट पर रोक लगी थी (जैसे कि चीन, सिंगापुर, थाइलैंड आदि)।

* कोविड टीकाकरण की रफ़्तार में अनेक गुना अधिक तेज़ी आए जिससे कि सभी पात्र लोगों को पूरी खुराक लगे और जिनकी दूसरी खुराक नहीं लगी है वह भी समोचित ढंग से लगे। कोविशील्ड वैक्सीन की दो खुराकों के बीच जो समय अवधि है उसे घटाने की अत्यंत आवश्यकता है। जाइ-कोव-डी वैक्सीन जिसे अगस्त २०२१ में सरकार ने संस्तुति दे दी थी, उसे १२-१७ साल की उम्र के लोगों के लिए बिना विलम्ब टीकाकरण में लगना शुरू होना चाहिए। भारत में छह वैक्सीन सरकार द्वारा संस्तुति प्राप्त हैं पर लग सिर्फ़ तीन रही हैं। सभी संस्तुति प्राप्त वैक्सीन पूरी क्षमता से निर्मित हो और टीकाकरण कार्यक्रम में लगनी शुरू हों।

* भारत देश को ग़रीब और माध्यम आय वाले देशों को वैक्सीन निर्यात करना शुरू करना चाहिए क्योंकि कोविड महामारी पर नियंत्रण के लिए ज़रूरी है कि दुनिया की सभी पात्र आबादी का पूरा टीकाकरण हो (न कि सिर्फ़ हमारे देश की पात्र आबादी का)। वर्तमान में अफ़्रीका के अनेक देशों में टीकाकरण का दर सिर्फ़ ५ प्रतिशत या उससे भी कम है इसलिए वहाँ पर वैक्सीन की मदद पहुँचना ज़रूरी है।

यह विडम्बना ही कही जाएगी कि अमीर देश जैसे कि अमरीका और यूरोप के देशों ने वैक्सीन खुराक को बेकार जाने दिया है या बूस्टर की तरह अपनी आबादी को लगाई है पर ग़रीब और मध्यम आए वाले देशों को नहीं दी। इंगलैंड ने हाल ही में छह लाख वैक्सीन फेंकी क्योंकि वह रखे रखे ख़राब हो गयी थी।

* सभी कोरोना नियंत्रण तरीक़ों का ठोस तरह से पालन होना चाहिए। सभी लोग मास्क ठीक से पहनें, दूरी बना कर के रखें (ख़ासकर कि सामाजिक या राजनीतिक आयोजनों में, कार्यस्थल पर, धार्मिक आयोजन में, खेलकूद में, बाज़ार में, आदि)।

* जीनोम सीक्वेंसिंग जाँच (Genome Sequencing Testing) को नियमित करते रहना चाहिए जिससे कि किसी भी नए प्रकार के वायरस की खबर बिना विलम्ब हो और ओमिक्रोन यदि आबादी में आ गया तो उसकी खबर भी तुरंत हो सके और उचित कदम उठाए जा सकें।

बॉबी रमाकांत – सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

सीएसआईआर-सीएफटीआरआई कर रहा है सीरो-सर्वेक्षण

COVID-19 news & analysis

CSIR-CFTRI is doing sero-survey

नई दिल्ली, 10 फरवरी, 2021 : कोविड-19 (Covid-19) वैश्विक महामारी से निपटने में भारत दृढ़ता से जुटा हुआ है। इसी कड़ी में कार्य करते हुए वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से सम्बद्ध मैसूर स्थित प्रयोगशाला केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण (serological survey) की पहल की गई है।

यह सर्वेक्षण सीएसआईआर की नई दिल्ली स्थित एक अन्य प्रयोगशाला इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के साथ संयुक्त रूप से किया गया है।

इस सर्वेक्षण (phenome India pan-CSIR sero-surveillance) का उद्देश्य देशभर में फैली सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं के क्षेत्र में आने वाली जनसंख्या में कोविड-19 के प्रति प्रतिरोधक क्षमता स्तर और हर्ड इम्यूनिटी के स्तर को परखना है।

सीएसआईआर-सीएफटीआरआई द्वारा जारी वक्तव्य में कहा गया है कि इस अध्ययन के परिणाम देश में कोविड-19 टीकाकरण को प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं।

यह फेज-2 अध्ययन है, जो विगत 4 फरवरी से लेकर 8 फरवरी के बीच किया गया है। इस अभियान का उद्घाटन सीएसआईआर-सीएफटीआरआई की निदेशक डॉ श्रीदेवी अन्नपूर्णा सिंह द्वारा किया है।

उल्लेखनीय है कि लोगों में कोविड-19 की व्यापकता का आकलन करने के लिए सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण किया जाता है। यह वायरस के खिलाफ उत्पन्न होने वाली विशिष्ट एंटीबॉडी की उपस्थिति का पता लगाने के उद्देश्य से किया जाता है। सीरोलॉजिकल सर्वे में आईजीजी एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनोसॉरबेंट परीक्षण (ELISA) शामिल है। (इंडिया साइंस वायर)

हर्ड इम्यूनिटी की खबर को कोरोनावायरस की समाप्ति ना मानें, कोरोनावायरस से पूरे साल सतर्क रहने की जरूरत – डॉ अर्जुन खन्ना

Dr Arjun Khanna

Do not consider the news of herd immunity to be the end of coronavirus, need to be cautious throughout the year with coronavirus – Dr. Arjun Khanna

गाजियाबाद, 08 फरवरी 2020. कोविड-19 के टीकाकरण (Vaccination of COVID-19) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा किए गए सीरो सर्वे मे आए हर्ड इम्यूनिटी के नतीजों की खबर को कोविड-19 से मुक्ति या कोरोनावायरस की समाप्ति ना मान लें।

सीरो सर्वे में जारी आंकड़ों (सीरो सर्वे में जारी आंकड़ों) के अनुसार दिल्ली में करीब 56% लोगों को हर्ड इम्यूनिटी डेवलप हो चुकी है वहीं अगर राष्ट्रीय स्तर पर जारी किए गए आंकड़ों को देखें तो वह मात्र 21% ही है।

कोरोना रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अर्जुन खन्ना की सलाह

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के वरिष्ठ श्वांस रोग, फेफड़ा रोग  एवं कोरोना रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अर्जुन खन्ना बताते हैं कि जिन लोगों के शरीर में एंटीबॉडी बन गई है वह भी 3 महीने से 7 महीने तक ही हमारे शरीर में रहती है और उसके बाद नष्ट हो जाती है, और एंटीबॉडी होने का यह कतई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि उस व्यक्ति को कोरोनावायरस का संक्रमण नहीं हो सकता। विश्व के कई देशों में हमने ऐसी गलतियों का खामियाजा देखा है जहां लोग बिल्कुल ही रिलैक्स हो गए और मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन नहीं किया।

डॉ खन्ना ने कहा हमें यह समझने की गलती बिल्कुल नहीं करनी चाहिए कि कोरोनावायरस हमारी जिंदगी से चला गया है और विशेषता इस पूरे साल 2021 में हमें तीन बातों का जरूर ही पालन करना चाहिए जिसमें पहला है मास्क पहनना और दूसरा है सोशल डिस्टेंसिंग और तीसरा है सैनिटाइजेशन।

क्या उपाय करें

सबसे जरूरी है हाथ को बार-बार साबुन एवं पानी या सेनेटाइजर से धोना और बार-बार छुई जाने वाली सतहों को रोज़ साफ़ करना, हो सकें तो ग्लव्स पहनें, अपनी कोहनी से दरवाजे खोलने की कोशिश, ट्रेनों के ज़रिए आवाजाही करने वाले लोग इसके हैंडल को पकड़ने से बचें, ऑफ़िस कर्मचारी हर सुबह अपनी डेस्क डिसइंफेक्टेंट से साफ़ करें, साफ़-सफ़ाई पर ज़ोर बढ़ाएं, हेल्थकेयर वर्कर्स जो कोरोना के मरीजों के आस पास रहते हों,  प्रोटेक्टिव कपड़े पहनें, मॉल, बिल्डिंगों ,पार्कों और सड़कों पर डिसइन्फेक्टेंट्स (इनफ़ेक्शन को रोकने वाली दवाइयों) का छिड़काव, एटीएम मशीनों के की-पैड्स को भी साफ़ करें, मास्क लगा कर रखें, हाथ से चेहरा छूना, वायरस वाली किसी सतह या वस्तु को छूने के बाद अपने चेहरे को छूना बिल्कुल बंद कर दें।

हर्ड इम्युनिटी के भरोसे रहे तो पूरा भारत हो जायेगा कोरोनामय

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Credit NIAID NIH

What is herd immunity? | झुंड प्रतिरक्षा क्या है?

भारत में जैसे-जैसे कोरोना का प्रसार तेज हो रहा है,तो झुंड प्रतिरक्षा हर्ड इम्यूनिटी – को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है। हर्ड इम्यूनिटी यानी अगर लगभग 70-90 फीसद लोगों में बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए तो बाकी भी बच जाएंगे। लेकिन इसके लिए वैक्सीन जरूरी है।

क्या कोरोना वैक्सीन की अनुपलब्धता में हर्ड इम्युनिटी अपना काम कर पाएगी? | Will herd immunity be able to do its job due to non-availability of the corona vaccine?

कोरोना की शुरुआत में ब्रिटेन ने हर्ड इम्यूनिटी का प्रयोग करने की कोशिश की। हालांकि वहां के तीन सौ से अधिक वैज्ञानिकों ने सरकार के इस कदम का विरोध किया और कहा कि सरकार को सख्त प्रतिबंधों के बारे में सोचना चाहिए, ना कि ‘हर्ड इम्यूनिटी’ जैसे विकल्प के बारे में, जिससे बहुत सारे लोगों की जान को अनावश्यक खतरा हो सकता है। मगर ब्रिटेन की सरकार ने कुछ दिनों तक अपने प्रयोग जारी रखे और वहां कोरोना ने भीषण तबाही मचाई।

विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना वायरस से लोगों के बीच हर्ड इम्यूनिटी तभी विकसित होगी जब तकरीबन 60 प्रतिशत जनसंख्या संक्रमित हो चुकी हो, हालांकि इस साठ प्रतिशत के आंकड़े को लेकर भी अभी तक सभी विशेषज्ञों में एक राय नहीं है। इस समय समूचे विश्व में सिर्फ एक देश स्वीडन ही है जो हर्ड इम्यूनिटी के प्रयोग पर काम कर रहा है। मार्च में जब कोरोना वायरस फैला था तब ब्रिटेन में भी हर्ड इम्यूनिटी की बात कही गई थी लेकिन आलोचनाओं के बाद सरकार को अपनी बातों से पीछे हटना पड़ा था।

ब्रिटेन ने जब अपने देश में हर्ड इम्यूनिटी का प्रयोग शुरू किया, उसी के आसपास स्वीडन ने भी अपने यहां यही प्रयोग शुरू किया। शुरू-शुरू में स्वीडन को इसमें कुछ सफलता भी मिलती दिखी, लेकिन अब वहां भी कोरोना के मामले जोरों पर हैं। दरअसल हर्ड इम्यूनिटी की जरूरी शर्त (Essential condition of herd immunity) वैक्सीनेशन है, जिससे लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इमरजेंसी सर्विस के प्रमुख डॉ. माइक रयान (Dr Michael Ryan, Head of Emergency Services of the World Health Organization) का कहना है कि अभी पूरे यकीन के साथ ये नहीं कहा जा सकता कि नए कोरोना मरीजों के ठीक होने के बाद उनके शरीर में जो एंटीबॉडी बनी है, वह उन्हें दोबारा इस वायरस के संक्रमण से बचा पाएगी भी या नहीं।

हर्ड इम्यूनिटी के वैज्ञानिक आइडिया (Scientific Idea of Heard Immunity) के अनुसार अगर कोई बीमारी किसी समूह के बड़े हिस्से में फैल जाती है तो इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है. जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं।

What does immunity mean

इम्यूनिटी का मतलब यह है कि व्यक्ति को संक्रमण हुआ और उसके बाद उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुक़ाबला करने में सक्षम एंटी-बॉडीज़ तैयार कर लिया। जैसे-जैसे ज़्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का ख़तरा कम होता जाता है.

आज चीन ही नहीं, भारत में भी कोरोना के रिवर्स अटैक (Corona’s reverse attack in India too) देखने को मिल रहे हैं। लेकिन सच यही है कि सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (Mass immunity) का अभाव ही महामारी का विस्तार करता है।

What’s Herd Immunity, and How Does It Protect Us?,

महामारी विज्ञान (Epidemiology) के अनुसार किसी रोग का फैलाव वायरस या बैक्टीरिया की मारक शक्ति (Antidote of virus or bacteria) और मनुष्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति पर निर्भर है। जिन्हें रोग का टीका या दवा मिल चुकी है, उनका और संक्रमित लोगों का अनुपात और वातावरण की स्वच्छता रोग के प्रसार के निर्णायक पहलू हैं। अगर वायरस या बैक्टीरिया की मारक क्षमता मनुष्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति की अपेक्षा कमजोर है, तो रोग उत्पन्न नहीं होता। अगर दोनों की शक्ति समान है, तो कुछ नहीं होता। जब किसी एक पक्ष की शक्ति में अपेक्षाकृत वृद्धि हो जाती है तब संघर्ष शुरू हो जाता है।

The killing power of a germ depends on its number, aggressiveness, fertility and potency.

रोगाणु की मारक शक्ति उसकी संख्या, आक्रामकता, जनन-क्षमता तथा सामर्थ्य पर निर्भर करती है। जनता की रोग प्रतिरोधक शक्ति, प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिरोधक शक्ति को जोड़ने से बनी सामूहिक प्रतिरक्षा पर निर्भर करती है। महामारी का प्रकोप होने पर या तो लोग संक्रमित होकर मरते हैं, या निरोग हो जाने पर प्रतिरक्षित हो जाते हैं। ठीक होने वालों की संख्या बढ़ने से रोग प्रतिरोधी व्यक्तियों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है। ऐसा होते-होते एक दिन रोग प्रतिरोधक लोगों की संख्या रोगियों की संख्या से ज्यादा हो जाती है और महामारी शांत हो जाती है। यही हर्ड इम्यूनिटी का आधार है।

कोरोना तथा हर्ड इम्यूनिटी | Corona and herd immunity

अभी तक कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे थे। लेकिन हाल में ही दुनिया भर में पाए गए लगभग 79 लाख मामलों में 40 लाख लोगों के ठीक होने के भी समाचार आए हैं। भारत अपने आंकड़ों के जरिए 50 फीसद रिकवरी रेट बता रहा है तो अमेरिका- 41 फीसद, चीन- 90, जर्मनी- 91, इटली- 74 और फ्रांस 46 प्रतिशत के आसपास बता रहे हैं। लेकिन ये आंकड़े भी कुल संक्रमित लोगों की तुलना में हैं, न कि कुल आबादी की तुलना में। जबकि हर्ड इम्यूनिटी कुल आबादी की अवधारणा पर काम करती है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी (johns hopkins university covid 19) के मुताबिक हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचने के लिए 70 से 90 फीसद आबादी का इम्यून होना जरूरी है। फिर भी वैज्ञानिकों को आशा है कि सामुदायिक स्तर पर महामारी पहुंची (Community level epidemic reached) तो शायद हर्ड इम्यूनिटी काम आ जाए। लेकिन उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि वैक्सीन की अनुपलब्धता में यह काम कैसे आएगी ?

दुनिया भर में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या (Number of people infected with corona virus worldwide) 80 लाख के आंकड़े को पार कर गई है, लेकिन अभी तक इस वायरस की कोई सटीक दवा या फिर वैक्सीन विकसित नहीं हो पाई है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि कोरोना वायरस के संक्रमितों की संख्या प्रदर्शित किए आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकती है। दवा या वैक्सीन न मिलने की वजह से माना जा रहा है को कोरोना वायरस अभी बना रहेगा। सेकंड वेव का खतरा कई देशों पर बना हुआ है। लेकिन इसके बावजूद हर्ड इम्यूनिटी से दुनिया अभी बहुत दूर है.

क्या भारत में हर्ड इम्युनिटी संभव है? | Is herd immunity possible in India?

वॉशिंगटन स्थित सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के डायरेक्टर और अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सीनियर रिसर्च स्कॉलर डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण (Dr. Ramanan Laxminarayan, Director, Center for Disease Dynamics, Economics and Policy, Washington and Senior Research Scholar at Princeton University, USA) ने भारतीय संदर्भ में इसे समझाने की कोशिश की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉक्टर रामानन का मानना है कि

“भारत लॉकडाउन को बढ़ाते रहने और कोरोना वायरस के टीके का इंतज़ार करने की बजाय कोविड-19 को कंट्रोल करने की तरफ़ बढ़ सकता है जो कि हर्ड इम्यूनिटी नाम की वैज्ञानिक अवधारणा के ज़रिए संभव है।”

उन्होंने बताया है कि अगर भारत की 65 प्रतिशत आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर ठीक हो जाए, भले ही संक्रमण के दौरान उनमें हल्के या ना के बराबर लक्षण हों, तो बाक़ी की 35 प्रतिशत आबादी को भी कोविड-19 से सुरक्षा मिल जाएगी।

वायरस के बढ़ने की दर कम हुई है और संक्रमण के दोगुना होने का समय बढ़ा है। लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जैसे ज्यादा प्रभावित शहरों में मामले तेजी बढ़ रहे हैं और लोगों के अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु दर भी बढ़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कोविड-19 के मरीजों का इलाज कर रहे एक फिजिशियन ने कहा, ‘अगर इसी तरह संक्रमण बढ़ता रहा तो इन शहरों की हालत न्यूयॉर्क जैसी हो जाएगी।’ इन शहरों से भयावह रिपोर्टें आ रही हैं। अस्पतालों में मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा है और वे दम तोड़ रहे हैं। एक मामले में तो मरीज के टॉयलेट में मरने की भी खबर आई है। लैबों में क्षमता से ज्यादा नमूने आ रहे हैं जिससे टेस्ट में देरी हो रही है या टेस्ट पेंडिंग हैं।

प्रियंका सौरभ Priyanka Saurabh रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार.
प्रियंका सौरभ Priyanka Saurabh
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार.

 मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हार्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट (Harvard Global Health Institute) के डायरेक्टर आशीष झा ने कहा है, ‘मैं भारत में बढ़ रहे मामलों से चिंतित हूं। ऐसा नहीं है कि कोरोना पीक पर पहुंचने के बाद अपने आप कम हो जाएगा। उसके लिए आपको कदम उठाने होंगे।’

उन्होंने कहा है कि भारत हर्ड इम्युनिटी विकसित करने के लिए 60 फीसदी आबादी के संक्रमित होने का इंतजार नहीं कर सकता है। इससे लाखों लोगों की मौत होगी और यह कोई स्वीकार्य हल नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में बायोस्टैटिक्स के प्रोफेसर भ्रमर मुखर्जी कहती हैं कि भारत में अभी कोरोना के कर्व में गिरावट नहीं आई है। उन्होंने कहा, ‘हमें चिंता करनी चाहिए लेकिन यह चिंता घबराहट में नहीं बदलनी चाहिए।

प्रियंका सौरभ