खतरे आधुनिक खेती के : जिस डाल पर बैठे हैं, हम उसी को काट रहे हैं

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प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है जिसमें भरपूर उत्पादन होता है, वह भी बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल किए हुए, परंतु इस उत्पादन को वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसके पास प्रकृति के नियम-कायदों, कानूनों को समझने का नजरिया हो। लालच और अंहकार में डूबे व्यक्तियों को यह उत्पादन दिखेगा ही नहीं क्योंकि ये लोग प्रकृति के सहायक हैं ही नहीं। इन लालची व्यक्तियों को प्रकृति के अमूल्य तत्वों का सिर्फ दोहन (Only harnessing the priceless elements of nature) करना आता है, बेहिसाब खर्च करना आता है। इसके चलते जब ये तत्व रीत जाते हैं और प्रकृति का संतुलन (balance of nature) बिगड़ने लगता तो ये लालची लोग इसका ठीकरा किसी और पर फोड़ने लगते हैं।

आधुनिक सुविधाभोगी इंसान के लिए जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ी चुनौती

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन सुविधाभोगी आधुनिक इंसान के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती (Climate change a big challenge for modern convenience man) बनकर सामने आ रहा है। दिन-ब-दिन यह समस्या बढ़ती ही जा रही है, पर मजाल है कि किसी व्यक्ति के कान पर जूं भी रेंग जाए। व्यक्ति तो छोड़िए, सरकारों के कानों पर भी जूं नहीं रेंग रही है, सिर्फ बड़ी-बड़ी घोषणाएं हो रही हैं, पर जमीनी स्तर पर सब निल बटे सन्नाटा ही पसरा हुआ है।

तो किसान होने के नाते हमें क्या करना चाहिए?

यहां हम इस पर बात नहीं करेंगे कि दुनिया भर की सरकारों को क्या करना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है। हम तो इस पर बात करेंगे कि किसान होने के नाते (being a farmer), भू-स्वामी होने के नाते और एक धरतीवासी होने के नाते हम क्या कर सकते हैं। अव्वल तो हमको अपनी भूलने की आदत सुधारनी होगी, बारम्बार आ रहीं आपदाओं को खतरे की घंटी मानना होगा और भविष्य में इन आपदाओं की तीव्रता और न बढ़े, इसके लिए अपने लालच पर लगाम लगाना सीखना होगा। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन बंद करते हुए हमें आवश्यक और अनावश्यक में अंतर (difference between necessary and unnecessary) करना सीखना होगा। हमें अपने उपभोग की गति का प्रकृति के पुनर्चक्रण की गति से सामंजस्य बैठाना होगा।

प्रकृति के पुनर्चक्रण में हमें सहयोग करना होगा।

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Farmer File photo

दूसरे हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं, उतना ही वापस लौटाने का संकल्प करना पड़ेगा। पहले जमाने में यदि कोई रिश्तेदार या पड़ोसी कोई वस्तु आपको देने घर आता था तो लोग उसको खाली हाथ नहीं जाने देते थे, बल्कि उसी के बर्तन में कुछ-न-कुछ भरकर वापस देते थे। प्रकृति के साथ हमें भी यही करना है। यदि हम प्रकृति से 100 प्रतिशत तत्व ले रहे हैं, तो कम-से-कम 70 प्रतिशत तो उसे लौटाएं, तब जाकर संतुलन बनेगा और तब हम भी खुश रहेंगे और प्रकृति भी खुश रहेगी।

प्रकृति से जो ले रहे हैं हम उसको वापस लौटाना होगा

कृषि उत्पादन के लिए हम प्रकृति से जो दो चीज़ें -पानी और पेड़- सबसे अधिक ले रहे हैं उन्हें प्रकृति को वापस लौटाना होगा। पानी की सबसे ज्यादा खपत खेती में होती है और खेती के लिए साल-दर-साल अधिकाधिक जंगल साफ किए जा रहे हैं। इन दो चीजों की भरपाई कैसे करेंगे? इसके लिए हमें अपने-अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब एवं कुएं बनवाने होंगे और खूब सारे पेड़ लगाने होंगे। किसानों को कुल जमीन के 10 प्रतिशत हिस्से में बागवानी और 10 प्रतिशत हिस्से में तालाब या कुएं की व्यवस्था करनी चाहिए।

तालाब और कुएं बनाने से जहां एक ओर सिंचाई के लिए भरपूर पानी उपलब्ध होगा, वहीं खेत की मिट्टी और हवा में नमी बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि होगी। साथ ही भू-जल स्तर भी बढ़ेगा। बागवानी से पेड़ों की संख्या में इजाफा होगा, जिससे तापमान कम होगा, वातावरण में कार्बन का स्तर घटेगा और बारिश बढ़ेगी। मिट्टी का क्षरण रुकेगा, जमीन अधिक उपजाऊ बनेगी। किसानों के मित्र पक्षियों एवं कीटों की संख्या बढ़ने से फसलों का परागण एवं कीट-नियंत्रण अधिक प्रभावी तरीके से होगा।

तीसरे, हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, ताकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले काम बंद हो सकें। उदाहरण के लिए, आज बिजली हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है जितनी कि हवा। अभी अधिकांश बिजली कोयला जलाकर पैदा की जाती है, और कोयले का दहन (combustion of coal) जलवायु परिवर्तन की समस्या का सबसे बड़ा कारण है। इसका दूसरा बड़ा कारण है – जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस) का दहन। यदि हम अपनी बिजली और अपना ईंधन किन्हीं और स्रोतों से प्राप्त कर सकें तो हम प्रकृति को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।

हम किसानों को घरों और खेतों में अधिक-से-अधिक सोलर-ऊर्जा का उपयोग करना चाहिए। यदि हर खेत में सोलर पंप लगा दिए जाएं तो कितनी बिजली की बचत होगी। ईंधन के लिए गोबर-गैस या बॉयो-गैस का उपयोग बहुत अच्छा विकल्प है।

तीसरी चीज है- प्राकृतिक खाद का उपयोग।

रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के उत्पादन एवं परिवहन में बड़ी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है तथा जीवाश्म ईंधनों का उपयोग (use of fossil fuels) होता है। ये रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक मिट्टी, पानी और हवा को भी बुरी तरह प्रदूषित करते हैं। इनके स्थान पर प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग करें। एकल फसल खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और जैव-विविधता खतरे में पड़ जाती है, इसलिए हमें चाहिए कि हम बहुफसलीय खेती करें, इससे खेती में हमारा जोखिम भी कम होगा और प्रकृति का संतुलन भी बना रहेगा।

उपरोक्त सुझावों पर ईमानदारी, दृढ़ निश्चय और संकल्पता के साथ कार्य करना अत्यावश्यक है। इसमें सरकार, जनता और किसान सभी की भागीदारी जरूरी है। इस काम में सबसे बड़ा रोड़ा हमारा लालच है, जिसने हमें अंधा कर दिया है। हम देख नहीं पा रहे हैं कि हम उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर बैठे हैं। हमें इस लालच को तुरंत छोड़ना होगा और प्रकृति से नाता जोड़ना होगा। तभी जाकर हम पर्यावरण से संबंधित सभी समस्याओं से निजात पा सकेंगे। इससे किसानों की समस्याओं का भी निराकरण हो जाएगा।

पवन नागर

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख

amazing view of nature in India | भारत में प्रकृति का अद्भुत दृश्य | hastakshep | हस्तक्षेप

Dangers of modern farming: We are cutting the branch on which we are sitting

भारत की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील का नाम जानते हैं आप?

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उत्तरी भारत के सबसे बड़ा ताजा झील का नाम क्या है?

ताजे पानी की सबसे बड़ी झील कौन सी है?

भारत में ताजे पानी की सबसे बड़ी झील किस राज्य में स्थित है?

लोकटक झील, भारत में ताजे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह झील मणिपुर की राजधानी इम्फाल (Imphal, capital of Manipur) से 53 किलोमीटर दूर और दीमापुर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। 34.4 डिग्री सेल्सियस का तापमान, 49 से 81 प्रतिशत तक की नमी, 1,183 मिलीमीटर का वार्षिक वर्षा औसत तथा पबोट, तोया और चिंगजाओ पहाड़ मिलकर इसका फैलाव तय करते हैं। इस पर तैरते विशाल हरित घेरों की वजह से इसे तैरती हुई झील कहा जाता है।

एक से चार फीट तक मोटे ये विशाल हरित घेरे वनस्पति मिट्टी और जैविक पदार्थों के मेल से निर्मित मोटी परतें हैं। परतों की मोटाई का 20 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूबा रहता है; शेष 80 प्रतिशत सतह पर तैरता दिखाई देता है। ये परतें इतनी मजबूत होती हैं कि स्तनपायी जानवरों को वजन आराम से झेल लेती हैं।

फूमदी (फुमड़ी) क्या है?

स्थानीय बोली में इन्हें फुमदी (Phumdis are a series of floating islands, exclusive to the Loktak Lake in Manipur state, in northeastern India) कहते हैं। फूमदी के भी मुख्यत: दो प्रकार हैं- ‘फूमदी एटाओबा’ यानी तैरती हुई फूमदी और ‘फूमदी अरुप्पा’ यानी डूबी हुई फूमदी। इनके नाते से ही लोकटक लेक को दुनिया की इकलौती तैरती झील का दर्जा प्राप्त है।

फूमदी पर संरक्षित पार्क (Protected Park on Phumdi)

नमी, जलजीव, वनस्पति और पारिस्थितिकी की दृष्टि से लोकटक (Ecologically Loktak) काफी धनी झील मानी जाती है। जहाँ तैरती हुई फूमदी पर कई तरह की घास, नरकुल तथा अन्य पौधे मौजूद हैं, वहीं डूबी हुई फूमदी पर पनपी वनस्पति उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाली साबित होती रही है।

विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय पार्क

दिलचस्प है कि फूमदी का सबसे बड़ा घेरा 40 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का है। इस घेरे के रूप में निर्मित इस भूभाग को भारत सरकार ने ‘ केयबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान(Keibul Lamjao National Park) का नाम व दर्जा दिया है।

फूमदी निर्मित इस पार्क को संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए भारत सरकार ने ‘रामसर साइट’ घोषित किया गया है। ‘केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय पार्क’ दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय पार्क भी है।

पार्क में संरक्षित क्षेत्र का रकबा पहले चार हजार हेक्टेयर था। स्थानीय निवासियों के दबाव में अप्रैल, 1988 में घटाकर 2,160 हेक्टेयर कर दिया गया है। फूमदी का रकबा बढ़ने-घटने के साथ पार्क का रकबा भी घटता-बढ़ता रहता है। संरक्षित क्षेत्र, सरकार के अधिपत्य में है और शेष पर थांग, बरेल और मारिल जनजाति के स्थानीय निवासियों का मालिकाना है।

समृद्ध पारिस्थितिकी (rich ecology) : डांसिंग डियर का घर

प्राप्त जानकारी के मुताबिक एक वक्त में मान शर्मा ने इस पार्क की स्थापना की थी। कई खास वनस्पतियों, पुष्पों और जीवों से समृद्ध होने के कारण भी यह पार्क खास है। संगमरमरी व, एशियन सुनहरी बिल्ली, कई खास तरह के साँप, अजगर, काला हिमालयी व मलायन भालू, जंगली कौआ, स्काईलार्क, स्पॉटबिल, बर्मी सारस जैसे कई विविध रंग-बिरंगे पक्षी 2014 के आँकड़ों के अनुसार यह पार्क, स्थानीय बोली में संगाई के नामकरण वाले दुर्लभ प्रजाति के मौजूदा 216 हिरणों का भी घर है। खास अदा के कारण संगाई हिरणों को यहां ‘डांसिंग डियर’ भी कहते हैं।

संगाई हिरणों (Sangai in Manipur society) को मणिपुर के ‘राज्य पशु’ (state animal of Manipur) का दर्जा प्राप्त है। वन्यजीव गणना के मुताबिक, वर्ष 1975 में इनकी संख्या (Sangai deer in Manipur) मात्र 14 थी। 1995 में 155 और पिछले वर्ष 2016 का आँकड़ा 216 संगाई हिरणों का है।

संगाई हिरणों को प्रिय जिजानिया लेतीफोलिया’ नामक पौधा यहाँ काफी है।

यहाँ गर्मियों में अधिकतम तापमान 35 डिग्री और सर्दियों में न्यूनतम 01.7 डिग्री सेंटीग्रेड तक जाता है।

आर्द्रता का आँकड़ा, अगस्त में अधिकतम 81 प्रतिशत और मार्च में न्यूनतम 49 प्रतिशत का है। ये आँकड़े भी संगाई हिरणों की बढ़त में सहायक सिद्ध जरूर हुए हैं, लेकिन मानव निर्मित कई परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जो पार्क के लिये अहितकर सिद्ध हो रही हैं।

समृद्धि पर संकट का कारण बना बैराज (Barrage caused crisis on prosperity)

आजकल यहाँ झील और पार्क के बीच में एक द्वन्द्व खड़ा हो गया है। द्वन्द्व का कारण बना है एक बैराज। गौर कीजिए कि लोकटक बहुउद्देशीय परियोजना के अन्तर्गत 1983 में यहाँ एक बैराज बनाया गया। इस ‘इथाई बैराज’ के बनने के बाद से झील का अधिकतम जलस्तर 768 से 768.5 मीटर रहने लगा। लगभग एक समान जलस्तर के कारण फूमदियों के डूबने और तैरने का प्राकृतिक चक्र टूट गया।

पहले ऋतु अनुसार फूमदियाँ डूबती-उतराती थीं; अब पार्क में अक्सर बाढ़ का ही दृश्य रहता है। पहले पार्क में नरकुल क्षेत्र ही था। परियोजना बनने के बाद से पार्क का एक-तिहाई हिस्सा पानी में डूबा रहता है और दो-तिहाई इलाका फूमदी क्षेत्र है।

माना जा रहा है कि लगातार बनी बाढ़ के कारण ही फूमदियों की मोटाई में गिरावट आई है; वनस्पतियों की वृद्धि दुष्प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों को भोजन देने वाली वनस्पतियों और मछलियों का संकट भी इस बैराज ने बढ़ाया है। खासकर छोटे जीवों पर तो संकट बढ़ा ही है।

वनस्पतियों की वृद्धि को स्थानीय लोकटक पनबिजली परियोजना ने एक और तरह से दुष्प्रभावित किया है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले जब स्थानीय नदी – खोरदक तथा अन्य धाराओं में बाढ़ आती थी, तो उनका प्रवाह उलट जाता था। वह उलटा प्रवाह आकर लोकटक की सतह पर फैल जाता था।

नदियों से आया यह जल कई ऐसे पोषक और धातु तत्व अपने साथ लाता था, जो सूखे मौसम में नीचे जमकर उर्वरा क्षमता बढ़ाते थे। वनस्पतियों की वृद्धि अच्छी होती थी; अब कम होती है।

नगरीय प्रदूषण, रासायनिक खेती का प्रदूषण वन कटान, मिट्टी कटान, वनस्पतियों के सडऩे और फूमदियों के ऊपर तक डूबे रहने के कारण लोकटक झील के पानी की गुणवत्ता में भी कमी (Decreased water quality in Loktak lake) दर्ज की गई है। एक जाँच में लोकटक के पानी का पीएच मान 04 से 08.5 तक पाया गया। चिन्तित करता सवाल है कि इन सब कारणों से यदि फूमदी नष्ट होती रही, तो एकमात्र तैरती झील और पार्क का रुतबा कब तक बचेगा?

मूल कारण पर हो ध्यान

समाधान के तौर पर अधिक ऊँचाई वाले ऐसे स्थानों का निर्माण सुझाया गया है, जीव जहाँ निवास कर सकें। शोध, प्रशिक्षण, जन-जागृति अभियान, पारिस्थितिकी अनुकूल पर्यटन, ईंधन पर पाबन्दी जैसे उपाय भी सुझाए गए हैं। क्या गजब की बात है जो समस्या परियोजनाओं ने पैदा की है, हम उसका समाधान शोध, प्रशिक्षण, जागृति और पर्यटन में खोज रहे हैं।

भारत में आजकल यही हो रहा है। पहले समस्या पैदा करो, फिर उसका समाधान करने के लिये प्रोजेक्ट बनाओ, पैसा खपाओ; किन्तु समस्या के मूल कारण को यथावत बना रहने दो। कई अन्य की तरह इथाई बैराज भी कुदरती सम्पदाओं को बर्बादी की ओर ले जाती हमारी बेसमझी का एक नमूना है।

इस बेसमझी को और गहरे से समझना तथा समाधान की आवाज उठाना भी लोकटक भ्रमण का एक उद्देश्य हो सकता है। कभी चलिए।

अरुण तिवारी

नैचुरल फार्मिंग कॉन्क्लेव में क्या बोले प्रधानमंत्री

the prime minister, shri narendra modi addressing at the constitution day celebrations, at parliament house, in new delhi on november 26, 2021. (photo pib)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राकृतिक खेती सम्मेलन को संबोधित किया

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कल 10 जुलाई 2022 को वीडियो कॉन्‍फ्रेंस के माध्‍यम से गुजरात के सूरत में आयोजित प्राकृतिक कृषि सम्‍‍मेलन/ नैचुरल फार्मिंग कॉन्क्लेव (Natural Farming Conclave) को संबोधित किया।

नैचुरल फार्मिंग कॉन्क्लेव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का मूल पाठ

Text of Prime Minister Narendra Modi’s address at the Natural Farming Conclave

गुजरात के राज्यपाल श्रीमान आचार्य देवव्रत जी, गुजरात के लोकप्रिय मृदु एवं मक्कम मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र भाई पटेल, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, उपस्थित सांसद और विधायक गण, सूरत के मेयर और जिला परिषद के अध्यक्ष, सभी सरपंचगण, कृषि क्षेत्र के सभी विशेषज्ञ साथी, और भारतीय जनता पार्टी गुजरात प्रदेश के अध्यक्ष श्रीमान सी आर पाटिल और सारे मेरे प्यारे किसान भाइयों और बहनों !

कुछ महीने पहले ही गुजरात में नैचुरल फार्मिंग के विषय पर नेशनल कॉन्क्लेव का आयोजन हुआ था। इस योजन में पूरे देश के किसान जुड़े थे। प्राकृतिक खेती को लेकर देश में कितना बड़ा अभियान चल रहा है, इसकी झलक उसमें दिखी थी। आज एक बार फिर सूरत में ये महत्वपूर्ण कार्यक्रम इस बात का प्रतीक है कि गुजरात किस तरह से देश के अमृत संकल्पों को गति दे रहा है। हर ग्राम पंचायत में 75 किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के मिशन में सूरत की सफलता पूरे देश के लिए एक उदाहरण बनने जा रही है और इसके लिए सूरत के लोगों का अभिनंदन, सूरत के किसानों को इसके लिए अभिनंदन, सरकार के सभी साथियों को अभिनंदन।

मैं ‘प्राकृतिक कृषि सम्मेलन‘ के इस अवसर पर इस अभियान से जुड़े हर एक व्यक्ति को, अपने सभी किसान साथियों को अनेक-अनेक शुभकामनायें देता हूँ|

जिन किसान साथियों को, सरपंच साथियों को आज सम्मानित किया, मैं उन्हें भी हार्दिक बधाई देता हूँ| और खास करके किसानों के साथ-साथ सरपंचों की भी भूमिका बहुत प्रशंसनीय है। उन्होंने ही यह बीड़ा उठाया है और इसलिए हमारे ये सभी सरपंच भाई-बहनें भी उतने ही प्रशंसा के पात्र है। किसान तो है ही।

साथियों,

आज़ादी के 75 साल के निमित्त, देश ने ऐसे अनेक लक्ष्यों पर काम करना शुरू किया है, जो आने वाले समय में बड़े बदलावों का आधार बनेंगे। अमृतकाल में देश की गति-प्रगति का आधार सबका प्रयास की वो भावना है, जो हमारी इस विकास यात्रा का नेतृत्व कर रही है। विशेष रूप से गाँव-गरीब और किसान के लिए जो भी काम हो रहे हैं, उनका नेतृत्व भी देशवासियों और ग्राम पंचायतों को दिया गया है।

मैं गुजरात में प्राकृतिक खेती के इस मिशन को लगातार करीब से देख रहा हूँ। और इसकी प्रगति देखकर मुझे सही में मुझे खुशी मिलती है और खास करके किसान भाइयों और बहनों ने इस बात को अपने मन में उतार लिया है और दिल से अपनाया है, इससे अच्छा प्रसंग कोई और हो ही नहीं सकता है।

सूरत में हर गाँव पंचायत से 75 किसानों का चयन करने के लिए ग्राम समिति, तालुका समिति और जिला समिति बनाई गईं। गाँव स्तर पर टीमें बनाई गईं, टीम लीडर बनाये गए, तालुका पर nodal officers को जिम्मेदारी दी गई।

मुझे बताया गया है कि इस दौरान लगातार training programs और वर्कशॉप्स का आयोजन भी किया गया। और आज, इतने कम समय में साढ़े पांच सौ से ज्यादा पंचायतों से 40 हजार से ज्यादा किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं।

यानी एक छोटे से इलाके में इतना बड़ा काम, ये बहुत अच्छी शुरूआत है। ये उत्साह जगाने वाली शुरुआत है और इससे हर किसान के दिल में एक भरोसा जगता है। आने वाले समय में आप सभी के प्रयत्नों, आप सभी के अनुभवों से पूरे देश के किसान बहुत कुछ जानेंगे, समझेंगे, सीखेंगे।

सूरत से निकल नैचुरल फॉर्मिंग का मॉडल, पूरे हिंदुस्तान का मॉडल भी बन सकता है।

भाइयों और बहनों,

जब किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देशवासी खुद संकल्पबद्ध हो जाते हैं, तो उस लक्ष्य की प्राप्ति से हमें कोई रुकावट नहीं आती है, ना हमें कभी थकान महसूस होती है। जब बड़े से बड़ा काम जनभागीदारी की ताकत से होता है, तो उसकी सफलता खुद देश के लोग सुनिश्चित करते हैं।

जल जीवन मिशन का उदाहरण हमारे सामने है। गाँव-गाँव साफ़ पानी पहुंचाने के लिए इतने बड़े मिशन की जिम्मेदारी देश के गाँव और गाँव के लोग, गांव में बनी पानी समितियां यही तो सब लोग संभाल रहे हैं।

स्वच्छ भारत जैसा इतना बड़ा अभियान, जिसकी तारीफ आज सभी वैश्विक संस्थाएं भी कर रही हैं, उसकी सफलता का भी बड़ा श्रेय हमारे गांवों को है। इसी तरह, Digital India Mission की असाधारण सफलता भी उन लोगों को देश का जवाब है जो कहते थे गाँव में बदलाव लाना आसान नहीं है। एक मन बना लिया था लोगों ने, भाई गांव में तो ऐसे ही जीना है, ऐसे ही गुजारा करना है। गांव में कोई परिवर्तन हो ही नहीं सकता है, ऐसा मानकर बैठे थे। हमारे गांवों ने दिखा दिया है कि गाँव न केवल बदलाव ला सकते हैं, बल्कि बदलाव का नेतृत्व भी कर सकते हैं।

प्राकृतिक खेती को लेकर देश का ये जन-आन्दोलन भी आने वाले वर्षों में व्यापक रूप से सफल होगा। जो किसान इस बदलाव से जितनी जल्दी जुड़ेंगे, वो सफलता के उतने ही ऊंचे शिखर पर पहुंचेंगे।

साथियों,

हमारा जीवन, हमारा स्वास्थ्य, हमारा समाज सबके आधार में हमारी कृषि व्यवस्था ही है। अपने यहां कहते ना जैसा अन्न वैसा मन। भारत तो स्वभाव और संस्कृति से कृषि आधारित देश ही रहा है। इसलिए, जैसे-जैसे हमारा किसान आगे बढ़ेगा, जैसे-जैसे हमारी कृषि उन्नत और समृद्ध होगी, वैसे-वैसे हमारा देश आगे बढ़ेगा।

इस कार्यक्रम के माध्यम से, मैं देश के किसानों को फिर एक बात याद दिलाना चाहता हूं। प्राकृतिक खेती आर्थिक सफलता का भी एक जरिया है, और उससे भी बड़ी बात यह हमारी मां, हमारी धरती मां हमारे लिए तो यह धरती मां, जिसकी रोज हम पूजा करते हैं, सुबह बिस्तर से उठकर पहले धरती माता से माफी मांगते हैं, ये हमारे संस्कार हैं। यह धरती माता की सेवा और और धरती मां की सेवा का भी ये एक बहुत बड़ा माध्यम है।

आज जब प्राकृतिक खेती करते हैं तो खेती के लिए जरूरी संसाधन आप खेती और उससे जुड़े हुए उत्पादों से जुटाते हैं। गाय और पशुधन के जरिए आप ‘जीवामृत’ और ‘घन जीवामृत’ तैयार करते हैं। इससे खेती पर खर्च होने वाली लागत में कमी आती है। खर्चा कम हो जाता है। साथ ही, पशुधन से आय के अतिरिक्त स्रोत भी खुलते हैं। ये पशुधन पहले जिससे आय हो रही थी, उससे अंदर आय बढती है।

इसी तरह, जब आप प्राकृतिक खेती करते हैं तो आप धरती माता की सेवा करते हैं, मिट्टी की क्वालिटी, जमीन की तबियत उसकी उत्पादकता की रक्षा करते हैं।

जब आप प्राकृतिक खेती करते हैं तो आप प्रकृति और पर्यावरण की सेवा भी करते हैं।

जब आप प्राकृतिक खेती से जुड़ते हैं तो आपको सहज रूप से गौमाता की सेवा का सौभाग्य भी मिल जाता है, जीव सेवा का आशीर्वाद भी मिलता है।

अब मुझे बताया गया कि, सूरत में 40-45 गौशालाओं के साथ अनुबंध करके उन्हें गौ जीवामृत उत्पादन का जिम्मा सौंपा जायेगा। आप सोचिए, इससे कितनी गौमाताओं की सेवा होगी।

इस सबके साथ ही, प्राकृतिक खेती से उपजा अन्न जिन करोड़ों लोगों का पेट भरता है, उन्हें कीटनाशकों और केमिकल्स से होने वाली घातक बीमारियों से भी बचाता है। करोड़ों लोगों को मिलने वाले आरोग्य का ये लाभ, और हमारे यहां तो स्वास्थ्य का आहार के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्वीकारा गया है। आप किस तरह के आहार को ग्रहण करते हैं, उसके ऊपर आपके शरीर के स्वास्थ्य का आधार होता है।

साथियों,

जीवन की ये रक्षा भी हमें सेवा और पुण्य के अनगिनत अवसर देती है। इसलिए, प्राकृतिक खेती व्यक्तिगत खुशहाली का रास्ता तो खोलती ही है, ये ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः‘ इस भावना को भी साकार करती है।

साथियों,

आज पूरी दुनिया ‘Sustainable Lifestyle‘ की बात कर रही है, शुद्ध खान-पान की बात कर रही है। ये एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें भारत के पास हजारों सालों का ज्ञान और अनुभव है। हमने सदियों तक इस दिशा में विश्व का नेतृत्व किया है। इसलिए, आज हमारे पास अवसर है कि हम प्राकृतिक खेती जैसे अभियानों में आगे आकर कृषि से जुड़ी वैश्विक संभावनाओं का काम सभी तक लाभ पहुंचाएं। देश इस दिशा में पिछले आठ सालों से गंभीरता से काम कर रहा है।

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परंपरागत कृषि विकास योजना‘ और ‘भारतीय कृषि पद्धति‘ जैसे कार्यक्रमों के जरिए आज किसानों को संसाधन, सुविधा और सहयोग दिया जा रहा है। इस योजना के तहत देश में 30 हजार क्लस्टर्स बनाये गए हैं, लाखों किसानों को इसका लाभ मिल रहा है।

परंपरागत कृषि विकास योजना‘ के तहत देश की करीब 10 लाख हेक्टेयर जमीन कवर की जाएगी। हमने प्राकृतिक खेती के सांस्कृतिक, सामाजिक और इकोलॉजी से जुड़े प्रभावों को देखते हुए इसे नमामि गंगे परियोजना से भी जोड़ा है।

प्राकृतिक खेती को प्रमोट करने के लिए आज देश में गंगा के किनारे अलग से अभियान चलाया जा रहा है, कॉरिडोर बनाया जा रहा है।

प्राकृतिक खेती की उपज की बाजार में अलग से मांग होती है, उसकी कीमत भी ज्यादा मिलती है।

अभी मैं दाहोद आया था, तो दाहोद में मुझे हमारी आदिवासी बहनें मिली थीं और वो लोग प्राकृतिक खेती करते हैं और उन्होंने यह कहा कि हमारा तो एक महीने पहले ऑर्डर बुक हो जाता है। और रोज हमारी जो सब्जी होती है, वो रोजाना बिक जाती है, वो ज्यादा भाव से बिकती है। जैसे गंगा के आस-पास पांच-पांच किमी प्राकृतिक खेती का अभियान चलाया गया है। जिससे कि कैमिकल नदी में ना जाएं, पीने में भी कैमिकल युक्त पानी पेट में ना जाएं।

भविष्य में हम तापी के दोनों किनारों, मां नर्मदा के दोनों किनारों की ओर ये सभी प्रयोग हम कर सकते हैं। और इसलिए, हमने natural farming की उपज को certify करने के लिए, क्योंकि इसमें से जो उत्पादन होगा, उसकी विशेषता होनी चाहिए, उसकी पहचान होनी चाहिए और इसके लिए किसानों को ज्यादा पैसा मिलना चाहिए, इसलिए हमने इसे सर्टिफाइड करने की व्यवस्था की है।  उसे प्रमाणित करने के लिए quality assurance system भी बनाये हैं। इस तरह की सर्टिफाइड फसलें हमारे किसान अच्छी कीमत पर एक्सपोर्ट कर रहे हैं।

आज दुनिया के बाजार में केमिकल फ्री उत्पाद यह सबसे बड़ी आकर्षण का केंद्र बना है। हमें ये लाभ देश के ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाना है।

साथियों,

सरकार के प्रयासों के साथ ही हमें इस दिशा में अपने प्राचीन ज्ञान की तरफ भी देखना होगा। हमारे यहाँ वेदों से लेकर कृषि ग्रंथों और कौटिल्य, वराहमिहिर जैसे विद्वानों तक, प्राकृतिक खेती से जुड़े ज्ञान के अथाह भंडार मौजूद हैं।

आचार्य देवव्रत जी हमारे बीच में हैं, वो तो इस विषय के बहुत बड़े जानकार भी हैं और उन्होंने तो अपना जीवन मंत्र बना दिया है खुद ने भी बहुत प्रयोग करके सफलता पाई है और अब वो सफलता का लाभ गुजरात के किसानों को मिले इसलिए वो जी जान से लगे हुए हैं।

लेकिन, साथियों, मेरी जितनी जानकारी है, मैंने देखा है कि हमारे शास्त्रों से लेकर लोक-ज्ञान तक, लोक बोली में जो बातें कही गईं हैं, उसमें कितनी गहरे सूत्र छिपे हैं।

अपने को जानकारी है कि अपने यहां घाघ और भड्डरी जैसे विद्वानों ने साधारण भाषा में खेती के मन्त्रों को जनसाधारण के लिए उपलब्ध करवाया है। जैसे कि एक कहावत है, अब हर किसान जानता है इस कहावत को- ‘गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेत दूनी फली’| यानी, गोबर आदि और नीम की खली अगर खेत में पड़े तो फसल दोगुनी होगी।

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इसी तरह और एक प्रचलित कथा है, वाक्य है- ‘छोड़े खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई’। यानी, खेत में खाद छोड़ कर फिर जुताई करने से खेती का मजा दिखाई पड़ता है, उसकी ताकत पता चलती है।

मैं चाहूँगा कि यहाँ जो संस्थाएं, जो NGOs और विशेषज्ञ बैठे हैं, वो इस पर अपना ध्यान केंद्रित करें। अपनी मान्यताओं को खुले मन से एक बार टटोलें। यह पुराने अनुभवों से क्या निकल सकता है, हिम्मत करके आप आगे आइए वैज्ञानिकों से मेरा विशेष आग्रह है।

हम नए नए शोध करें, हमारे उपलब्ध संसाधनों के आधार पर हमारे किसान को ताकतवर कैसे बनाएं, हमारे खेती को अच्छी कैसे बनाएं, हमारी धरती माता को कैसे सुरक्षित रखें, इसके लिए हमारे वैज्ञानिक हमारे शैक्षिक संस्थाएं जिम्मेवारी निभाने के लिए आगे आए। समय के हिसाब से कैसे किसानों तक इन सारी चीजों को पहुँचाया जा सकता है, लेबोरेटरी में सिद्ध किया हुआ विज्ञान किसान की भाषा में किसान तक कैसे पहुंचे।

मुझे विश्वास है कि देश ने प्राकृतिक खेती के जरिए जो शुरुआत की है, उससे न केवल अन्नदाता का जीवन खुशहाल होगा, बल्कि नए भारत का पथ भी प्रशस्त होगा।

मैं काशी क्षेत्र से लोकसभा का member हूं, तो मेरा काशी के किसानों से कभी कभी मिलने का जब भी मौका मिलता है, बातें होती है, मुझे आनंद होता है मेरे काशी इलाके के किसान प्राकृतिक खेती के संबंध में काफी कुछ जानकारियां इकट्ठी करते हैं, खुद प्रयोग करते हैं, दिन रात मेहनत करते हैं और उनको लगने लगा है कि अब उनके द्वारा जो पैदावार हुई है, वह दुनिया के बाजार में बिकने के लिए तैयार हो गई है और इसलिए मैं चाहूंगा और सूरत तो ऐसा है शायद ही कोई गांव ऐसा होगा जहां के लोग विदेश में ना हों।

सूरत की तो एक पहचान भी विशेष है और इसलिए सूरत का इनिशिएटिव, यह अपने आप में जगमगा उठेगा।

साथियों,

आपने जो अभियान उठाया है हर गांव में 75 किसान और मुझे पक्का विश्वास है कि आज भले 75 का आपने लक्ष्य तय किया है हर गांव में 750 किसान तैयार हो जाएंगे देखना और एक बार पूरा जिला इस काम के लिए हो जाएगा तो दुनिया के जो खरीदार है ना वो हमेशा एड्रेस ढूंढते-ढूंढते आपके पास ही आएंगे कि भाई यहां पर केमिकल नहीं है, दवाइयां नहीं है, सीधा-साधा प्राकृतिक उत्पादन है, तो अपने स्वास्थ्य के लिए लोग दो पैसा ज्यादा देकर के ये माल ले जायेंगे।

सूरत शहर में तो सारी सब्जी आप ही के यहां से जाती है, अगर सूरत शहर को पता चलेगा कि आप की सब्जी प्राकृतिक खेती की है, मैं पक्का मानता हूं कि हमारे सूरती लोग इस बार का उद्योग तो इस बार का उंधियू आपकी प्राकृतिक खेती की सब्जी में से ही बनाएंगे। और फिर सूरत वाले बोर्ड लगाएंगे, प्राकृतिक खेती की सब्जी वाला उंधियू। आप देखना एक बाजार इस क्षेत्र में बन रहा है।

सूरत की खुद की ताकत है, सूरत के लोग जैसे डायमंड को तेल लगाते हैं, वैसे इसको तेल लगा देंगे, तो सूरत में ये जो अभियान चल रहा है, उसका लाभ उठाने के लिए सभी लोग आगे आएंगे। आप सभी के साथ बात करने का मौका मिला, इतना अच्छा अभियान शुरू किया है और मैं इसके लिए आप सभी को फिर से बधाई देता हूं। और इसी के साथ, आप सभी का एक बार फिर से बहुत बहुत धन्यवाद।

बहुत बहुत शुभकामनाएं।

भारत के लिए भविष्य की प्रौद्योगिकी पर विशेषज्ञों का मंथन

tifac

Experts brainstorm on future technology for India

नई दिल्ली, 05 जून : हम 2047 में स्वतंत्र भारत की 100वीं वर्षगांठ मनाएंगे। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष में देश को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए समर्पण के साथ-साथ एक विस्तृत रूपरेखा की आवश्यकता है। आगामी 25 वर्षों के दौरान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को दुनिया के शीर्ष देशों की कतार में शामिल करने के लिए भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संबद्ध संस्थान सूचना, पूर्वानुमान एवं मूल्यांकन परिषद् (Technology Information Forecasting and Assessment Council, Tifac – टाइफैक) ने एक दृष्टिपत्र तैयार करने की पहल की है।

भारत के लिए भविष्य की प्रौद्योगिकी आवश्यकता एवं विकास से संबंधित दृष्टिपत्र तैयार करने से जुड़ी टाइफैक की इस पहल के अंतर्गत 28-29 अप्रैल को दो दिवसीय ‘टेक्नोलॉजी एंड सस्टेनेबिलिटी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया(Technology and Sustainability for Transforming India) मंथन सत्र का आयोजन किया गया।

टाइफैक द्वारा आयोजित मंथन सत्र में नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार ने वर्तमान में विदेशों में कार्यरत भारत की मेधा को वापस आकर्षित करने के लिए अभिनव एवं प्रभावी योजनाओं तथा कार्यक्रम निर्माण पर जोर दिया है।

उन्होंने वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों से अलग-अलग काम करने के एकाकी दृष्टिकोण के बजाय सहयोगात्मक प्रयासों को आवश्यक बताया है।

देश के समग्र विकास में प्रौद्योगिकी की भूमिका सुनिश्चित करने के लिए डॉ राजीव कुमार ने टाइफैक से प्रौद्योगिकी विजन-2047 दस्तावेज () में प्रभावी कार्ययोजना को शामिल किये जाने का आह्वान भी किया है। उन्होंने आग्रह किया कि भविष्य की अर्थव्यवस्था की अवधारणा में विकास और स्थिरता की जरूरतों और लक्ष्यों का समावेश होना चाहिए, जहाँ प्रौद्योगिकी विकास का हर पहलू संसाधनों के इष्टतम उपयोग से प्राप्त होता है।

डॉ कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आगामी 25 वर्षों के दौरान देश के विकास में प्रौद्योगिकी की भूमिका को लेकर अपना एक समग्र दृष्टिकोण है।

स्थायी विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए डॉ कुमार ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों (challenges related to climate change) से लड़ने में अनुकूलन एवं रोकथाम जैसे प्रयासों को नाकाफी बताते हुए कार्बन कैप्चर, और कार्बन को मिट्टी में स्थापित करने जैसे टिकाऊ विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया है।

एग्रो-इकोलॉजी में रसायन मुक्त खेती की भूमिका

एग्रो-इकोलॉजी के बारे में बताते हुए उन्होंने इसमें सायन मुक्त खेती (chemical free farming) की भूमिका भी उल्लेख किया।

टाइफैक के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव ने कहा है कि ‘बदलते भारत के लिए प्रौद्योगिकी और स्थिरता’ पर केंद्रित मंथन सत्र भारत की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 के लिए प्रौद्योगिकी दृष्टिपत्र तैयार करने की कवायद का हिस्सा है।

प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव ने बताया कि टाइफैक द्वारा पहले विज़न-2020 और विज़न-2035 जैसे दृष्टिपत्र तैयार किए गए हैं। स्वाधीनता के 100वें वर्ष में भारत को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व स्तर पर शीर्ष पंक्ति में खड़ा करने के लिए इसी प्रकार का दृष्टिपत्र टाइफैक द्वारा तैयार किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि यह मंथन सत्र दृष्टिपत्र तैयार करने के लिए आवश्यक विमर्श की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।

‘टेक्नोलॉजी ऐंड सस्टेनेबिलिटी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ मंथन सत्र बदलते भारत में स्थायी विकास के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों पर गहन चर्चा की गई। मंथन सत्र में स्थायी स्वास्थ्य, स्थायी पोषण, संसाधनों का टिकाऊ उपयोग और सस्ती एवं सुलभ शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रौद्योगिकी की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों द्वारा गहन चर्चा की गई।

मंथन सत्र के पहले दिन डॉ राजीव कुमार के अलावा टाइफैक के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव, टाइफैक के चेयरमैन प्रोफेसर देवांग खाखर, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर पंजाब सिंह, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी के पूर्व निदेशक अमूल्य कुमार पांडा और एकोर्ड सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, फरीदाबाद के निदेशक डॉ जितेंद्र कुमार जैसे प्रबुद्ध विशेषज्ञ चर्चा में शामिल थे।

प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव ने मुख्य रूप से प्रौद्योगिकी सूचना, प्रौद्योगिकी विजनिंग, प्रौद्योगिकी मूल्यांकन, प्रौद्योगिकी पायलटिंग और प्रदर्शन आदि में टाइफैक की भूमिका के बारे में प्रतिनिधियों को अवगत कराया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि वर्ष 2047 के लिए प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करना हमारा दृष्टिकोण होना चाहिए।

प्रोफेसर श्रीवास्तव ने कहा कि प्रौद्योगिकी और स्थिरता पर केंद्रित विमर्श प्रौद्योगिकी विज़न-2047 की रूपरेखा तैयार करने की हमारी अगली पहल की प्रस्तावना में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि यह मंथन स्थायी स्वास्थ्य, स्थायी पोषण, संसाधनों का स्थायी उपयोग, किफायती एवं सुलक्ष शिक्षा नीतियों को परिभाषित करने के लिए एक बहुत ही बोल्ड लाइन देगा, जिसमें देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रभावी कार्यबिंदु शामिल हैं।

टाइफैक के चेयरमैन प्रोफेसर देवांग खाखर ने कहा कि भारत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सशक्त क्षमता रखता है, और हमें अपनी इस क्षमता को स्थायी विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में लगाना है।

मंथन सत्र में अपने विचार रखने वाले वक्ताओं में विभिन्न सरकारी संस्थानों और निजी संगठनों दोनों के विषय विशेषज्ञ शामिल थे।

(इंडिया साइंस वायर)

जानिए कृषि में रोजगार के अवसर क्या हैं

farming

क्या आप भी जानना चाहते हैं कि एग्रीकल्चर से कौन कौन सी नौकरी मिल सकती है? बीएससी एग्रीकल्चर में करियर कैसे बनाएं? बीएससी एग्रीकल्चर (Bsc Agriculture in Hindi) क्या है कैसे करें? आइए बीएससी कृषि पाठ्यक्रम विवरण हिंदी में (Bsc Agriculture Course Details in Hindi) जानें और जानें कि कृषि में रोजगार के अवसर क्या हैं।

कृषि में पेशेवर कैरियर (Professional career in agriculture) बनाने के लिए इस विषय में कम से कम स्नातक उपाधि प्राप्त करनी चाहिए, जिसे संक्षेप में बी.एस.सी. (कृषि)/ बीएससी एग्रीकल्चर (Bsc Agriculture)  कहा जाता है।

बीएससी एग्रीकल्चर में प्रवेश पात्रता

जिन लोगों ने 10+2 स्तर पर विज्ञान या कृषि एक विषय के रूप में लिया हो, वे बीएससी एग्रीकल्चर पाठ्यक्रम में प्रवेश के पात्र समझे जाते हैं। देश में लगभग सभी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में एक कृषि विभाग होता है, जो उस विषय में स्नातक और उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों का संचालन करता है।

बीएससी कृषि कॉलेजों सूची/ एग्रीकल्चर कॉलेज कहां कहां है

कृषि स्नातक पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय से सम्बद्ध अनेक कॉलेजों में भी उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा विशेष कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना (Establishment of special agricultural universities) भी की गई है। कुछ जाने माने कृषि विश्वविद्यालय इस प्रकार हैं –

  • गोविंद वल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंत नगर,
  •  तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय कोयम्बटूर,
  • कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़, राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर,
  • ओडिशा – कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर,
  • चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार
  • पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना,
  • चन्द्रशेखर आजाद कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर,
  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर,
  • नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, फैजाबाद
  • राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा समस्तीपुर

ये विश्वविद्यालय कृषि में सामान्य और विशेषज्ञतापूर्ण पाठ्यक्रमों का संचालन करते हैं। इसके अतिरिक्त कई ऐसे संस्थान हैं, जहां पर ज्यादातर विशेषज्ञतापूर्ण विषयों का अध्ययन और अनुसंधान कराया जाता है। इन संस्थानों के उदाहरणों में केंद्रीय मत्स्य उद्योग शिक्षा संस्थान, मुम्बई (Central Institute of Fisheries Education, Mumbai- CIFE Mumbai) और राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा (NDRI-National Dairy Research Institute (Deemed University)) शामिल हैं। ये दोनों ही समकक्ष विश्वविद्यालय हैं। इच्छुक उम्मीदवार कृषि अर्थशास्त्र और कृषि इंजीनियरी जैसे पाठ्यक्रमों में भी प्रवेश ले सकते हैं।

organic farming

बीएससी एग्रीकल्चर में रोजगार के अवसर (job opportunities in bsc agriculture)

क्या आप भी सोचते हैं, कि खेती का अध्ययन केवल भूस्वामियों और खेती की पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए है? तो तनिक ठहरकर इस पर फिर से विचार करें। खेती का प्रभाव अत्यंत व्यापक है और यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई तरह से अर्थव्यवस्था और समाज से सम्बद्ध है।

वास्तव में कृषि में शिक्षा से बहुमुखी रोजगार के अवसर (Versatile Employment Opportunities) मिलते हैं, जो स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ हैं –

प्रत्यक्ष खेती (direct farming)

खेती हमारी करीब 60 प्रतिशत आबादी के लिए आजीविका का साधन है। परंतु, अनेक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने खेती को किसी भी अन्य व्यापार की तरह एक वाणिज्यिक गतिविधि के रूप में अपनाया है। बड़े फार्म रखने वाले व्यक्तियों और कंपनियों को फार्म मैनेजरों की आवश्यकता पड़ती है।

खेती स्वयं की भूमि पर और पट्टे पर धारित भूमि पर की जा सकती है। कुछ मामलों में सरकार भी खेती के व्यवसाय (farming business) में शामिल होने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करती है। परियोजना की व्यवहार्यता और प्रोमोटरों की साख (credit of promoters) के आधार पर बीज, उर्वरक, उपकरण आदि कृषि निवेश के लिए बैंक ऋण (Bank loans for agricultural investments) प्राप्त किए जा सकते हैं। अनुबंध खेती (Contract farming) ऐसे कृषि उद्यमों में से एक हो सकती है।

उच्च प्रौद्योगिकी खेती/ हाई टेक खेती (High Tech Farming) एक अन्य क्षेत्र है, जिसमें टेक्नोलोजी और अधिक पैदावार देने वाले बीजों के इस्तेमाल के साथ अधिक उत्पादकता सुनिश्चित की जा सकती है।

कृषि अनुसंधान (agricultural research)

खेती अनुसंधान उन्मुख विषय (research oriented) है। खेती से नई प्रवृत्तियों, उभरती हुई आवश्यकताओं और कृषि के क्षेत्र में सर्वोत्तम पद्धतियों की जानकारी प्राप्त की जाए। खेती में अनुसंधान (research in agriculture) को बढ़ावा देने के लिए हमारे देश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research-ICAR) एक शीर्ष निकाय है। इस परिषद के अंतर्गत करीब 100 अनुसंधान संस्थान हैं, जिनमें सभी प्रमुख फसलों और अन्य कृषि विषयों के लिए अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।

भारत में कुछ प्रमुख कृषि अनुसंधान केंद्र (Some of the Major Agricultural Research Centers in India)-
  • केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर
  • भारतीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, रांची
  • केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला
  • केंद्रीय उपोष्णकटिबंधीय बागवानी संस्थान, लखनऊ
  • केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद
  • भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ
  • भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुवनेश्वर
  • राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र, पुणे
  • भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, रांची

इसके अतिरिक्त विश्वभर में बड़ी संख्या में कृषि अनुसंधान संस्थान हैं। इस प्रकार आप वैश्विक आधार पर अनुसंधान के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर अनुसंधान के लिए बड़ी संख्या में छात्रवृत्तियां भी प्रदान की जाती हैं।

बी.एससी कृषि से बैंकिंग क्षेत्र में रोजगार के अवसर (Employment Opportunities in Banking Sector from B.Sc Agriculture)

हमारे देश में सार्वजनिक क्षेत्र के अधिसंख्य बैंकों की शाखाएं ग्रामीण और अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। सरकार ने कृषि और संबद्ध गतिविधियों का वित्तपोषण के लिए बैंकों को विशेष लक्ष्य प्रदान किए हैं। कृषि आधारित कार्यक्रमों (agriculture based programs) सहित सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न कार्यक्रम बैंकों के जरिए कार्यान्वित किए जाते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों में कृषि लिपिकों और अधिकारियों के पद होते हैं। ऐसे पदों के लिए बी.एससी कृषि, बी.वी.एससी आदि योग्यताएं रखने वाले उम्मीदवारों को पात्र समझा जाता है। कुछ बैंकों में ऐसे अधिकारियों को ग्रामीण विकास अधिकारी जैसे पदनाम दिए गए हैं। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (National Bank for Agriculture and Rural Development) (नाबार्ड) समूह ‘ख’ अधिकारियों के रूप में ऐसे योग्य लोगों की भर्ती करता है। संबंधित भर्तियां लगभग हर वर्ष विज्ञापित की जाती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कृषि अधिकारी के रूप में भर्ती (Recruitment as Agriculture Officer in Public Sector Banks) होने वाले व्यक्ति इसी पद पर निरंतर काम करने अथवा सामान्य बैंकिंग अधिकारी के रूप में परिवर्तित होने का विकल्प अपना सकते हैं, जो सेवा में अपेक्षित वर्षों की संख्या पूरी करने के बाद प्रदान किया जाता है।

कृषि स्नातक सामान्य लिपिकों और परिवीक्षाधीन अधिकारियों के रूप में भी आवेदन के पात्र समझे जाते हैं।

वैज्ञानिक के रूप में रोजगार के अवसर (job opportunities as scientist)

कृषि एक वैज्ञानिक विषय है। अत: सरकारी और निजी क्षेत्र के संगठनों में कृषि वैज्ञानिक (Agricultural scientists in government and private sector organizations) के रूप में काम करने के अवसर उपलब्ध होते हैं।

कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल की स्थापना गजेन्द्र गडकर समिति की संस्तुति के आधार पर एक स्वतंत्र भर्ती निकाय के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल, भारत सरकार की मंजूरी से 1973 में की गई थी। सरकार ने कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल की स्थापना इसलिए की, ताकि सरकारी प्रयोगशालाओं और संस्थानों में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों की भर्ती प्रक्रिया को केंद्रीकृत किया जा सके।

निजी क्षेत्र की कंपनियां भी कृषि वैज्ञानिकों के रूप में रोजगार के अवसर प्रदान करती हैं। उर्वरकों, कीटनाशकों, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि उपकरणों आदि के व्यापार में लगी कंपनियों में आपके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

कृषि स्नातकों के लिए अखिल भारतीय सेवाओं में रोजगार के अवसर। कृषि स्नातकों के लिए विभिन्न सरकारी नौकरी के अवसरों को जानें (know various Government Job Opportunities for Agriculture Graduates)

अखिल भारतीय सेवाओं के लिए आवेदन करने हेतु स्नातक उपाधि अपेक्षित है। ये स्नातक उपाधि कृषि में भी हो सकती है. परंतु, कृषि स्नातकों के लिए अतिरिक्त अवसर उपलब्ध होते हैं क्योंकि वे भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service आईएफएस) परीक्षा में भी बैठ सकते हैं। आईएफएस परीक्षा संघ लोक सेवा आयोग द्वारा हर वर्ष आयोजित की जाती है। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले उम्मीदवारों को व्यापक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है और उसके बाद संभागीय वन अधिकारी (Divisional Forest Officer डीएफओ) आदि के रूप में नियुक्त किया जाता है। यह एक अखिल भारतीय सेवा है और अत्यंत प्रतिष्ठित समझी जाती है।

कृषि स्नातकों और स्नातकोत्तरों के लिए शिक्षण के क्षेत्र में रोजगार के अवसर (Employment opportunities in the field of teaching for agricultural graduates and postgraduates)

बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं, जो खेती में शिक्षा प्रदान करते हैं। कृषि में अध्यापन के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए इन संस्थानों में प्रचुर मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। आप स्नातक, स्नातकोत्तर और/अथवा डॉक्टरल विद्यार्थियों को पढ़ाने का विकल्प चुन सकते हैं। शिक्षण व्यवसाय के लिए आपको कृषि में स्नातकोत्तर उपाधि यानी एम.एससी कृषि (M.Sc Agriculture) होना चाहिए। अनुसंधान की योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों को शिक्षण और अनुसंधान संबंधी पदों के लिए निश्चित वरीयता दी जाती है। खेती में शिक्षा से खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण और अनेक ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।

उच्चतर योग्यताएं और बहुमूल्य कार्य अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय निकायों में भी रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। इन निकायों में खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ), सार्क कृषि केंद्र, बांग्लादेश, सेंटर फार इंटरनेशनल फोरेस्टरी रिसर्च, इंडोनेशिया, इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रापिकल एग्रीकल्चर, तंजानिया, यूएस एड आदि शामिल हैं।

कृषि में रोजगार चाहने वाले उम्मीदवारों (Candidates seeking employment in agriculture) के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड आदि की वेबसाइट्स पर उपयोगी जानकारी उपलब्ध है।

कुछ उपयोगी वेबसाइस के लिंक-

https://www.icar.org.in/hi

https://www.iihr.res.in/

https://www.dic.gov.in/

https://www.cicr.org.in/

https://www.csir.res.in/hi

(इनपुट- देशबन्धु से भी)

प्रेरक कहानी : मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़, कर रहे प्राकृतिक खेती

natural farming

Inspirational story: leaving the job of a multinational company, doing natural farming

दिल्ली-एनसीआर, गुरुग्राम की प्रदूषित हवा (Polluted air of Delhi-NCR, Gurugram) से तंग आकर कुछ युवा अपने गांव वापस लौटकर न केवल प्राकृतिक खेती को अपना आजीविका का साधन बनाया बल्कि गांव के किसानों को भी इसी ओर प्रेरित कर रहे हैं. इनमें भोपाल के इंजीनियर शशिभूषण (Bhopal engineer Shashibhushan), पीएचडी फार्मा अनुज, सुधांशु और सुष्मिता और आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur), आईआईएम लखनऊ तथा इंफोसिस से पढ़ाई करने के बाद विदेश में नौकरी करने वाले संदीप सक्सेना के नाम उल्लेखनीय है.

संदीप के प्रोफाइल में कई पुरस्कारों का उल्लेख है, इनमें  अटल बिहारी वाजपेई द्वारा सम्मानित होना उल्लेखनीय है.

इंजीनियर शशि भूषण गुरुग्राम के अलावा बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में बड़ी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य के प्रति सजग होने के कारण वे बहुत जल्दी नौकरी छोड़कर गांव वापस आकर पुश्तैनी 25 एकड़ जमीन पर जैविक खेती करने लगे.

पड़ोसी बने ग्राहक

शशि ने बहुत दिलचस्प बातें बताई कि उनकी उपज के ग्राहक उसी के आस-पास के ग्रामीण हैं. उन्होंने कहा कि आस-पास गांव के सभी किसान अपनी जमीन पर गेहूं बोते हैं. परंतु वे उनसे गेहूं खरीद के ले जाते हैं कारण यह है कि चूंकि वे अपने खेतों में जहर उगाते (growing poison in the fields) हैं, इसलिए शशि से शुद्ध खाने के लिए अनाज (pure food grains) खरीदते हैं और अपना रसायन युक्त उपज बाजार में बेच देते हैं.

मल्टीनेशनल की नौकरी छोड़ सुधांशु और सुष्मिता की जोड़ी ने शुरू की जैविक खेती

सुधांशु और सुष्मिता की जोड़ी थोड़ी अलग है, वे अपने तथा अन्य लोगों के स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती (Organic farming) कर रहे हैं. दरअसल सुधांशु और सुष्मिता उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद गुरुग्राम में करोड़ों की पैकेज पर नौकरी करने गए थे. करीब एक दशक तक नौकरी के बाद अपने गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए दोनों ने यह निर्णय लिया कि वापस अपने शहर लौटकर जैविक खेती करना इससे बेहतर है. मल्टीनेशनल की नौकरी छोड़ दोनों ने दो साल के भीतर जैविक खेती से न केवल अपने लिए शुद्ध आहार का प्रबंध किया, बल्कि गांव के अन्य छोटे किसानों को जोड़कर उन्हें भी जैविक खेती करने के लिए प्रेरित किया.

आज प्रसिद्ध हो  चुका है जैविक जीवन ब्रांड

आज सुधांशु का जैविक जीवन ब्रांड इतना प्रसिद्ध हो गया कि उसके पास ग्राहकों की लम्बी फेहरिस्त है, जिन्हें वह ऑर्गेनिक स्टोर, अमेज़ॅन और व्हाट्सएप के जरिए जैविक खाद्य सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं. सुधांशु बताते हैं कि करोड़ों का पैकेज न सही, लेकिन खुद को और दूसरों को स्वस्थ रखने के लिए वे जो प्रयास कर रहे हैं, उससे उन्हें आत्मसंतोष मिल रहा हैं.

वहीं सुष्मिता एक दशक से अधिक समय तक सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रही थीं. उन्हें जमीनी स्तर से लेकर नीति निर्माण तक का व्यापक अनुभव हो गया था. स्वास्थ्य के बारे में उनकी समझ व्यापक है. वह कहती हैं कि दूषित हवा से 70 फीसदी लोग फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे हैं. वह एक प्रमाणित पोषण विशेषज्ञ, फिटनेस ट्रेनर और क्रॉसफिटर भी हैं जबकि सुधांशु ने यूके में लीड्स यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल से स्नातक (Graduated from Leeds University Business School in UK) किया और भारत की प्रमुख बीमा कंपनी के साथ काम किया.

सुधांशु के पास स्वास्थ्य बीमा, शिक्षा और चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है, यानी सुधांशु और सुष्मिता दोनों के पास स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की जानकारी पहले से थी.

मध्यप्रदेश में पले-बढ़े सुधांशु और सुष्मिता को जब बड़े शहरों का जीवन उबाऊ लगने लगा, तो दोनों ने कुछ नया करने का सोचा. नए में खेती का आईडिया सबसे पहले उनके जेहन में आया.

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सुष्मिता कहती हैं कि बड़े शहरों में कोई भावनात्मक संबंध नहीं, कोई ठहराव नहीं, सिर्फ लोग पैसे के पीछे दिन-रात भागते हैं, इससे उनके स्वास्थ्य पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ रहा है.

नौकरी छोड़ने का निर्णय कैसे ले पाए?

उन्होंने यह भी बताया कि असल में नौकरी मिलते ही लोग पहले कर्ज लेकर गाड़ी, बंगला खरीद लेते हैं और पूरी जिंदगी ईएमआई चुकाने के लिए भागते रहते हैं. हम लोगों के साथ अच्छी बात यह थी कि हमने ऐशो-आराम के लिए बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया था. हमें लग्जरी जीवन नहीं जीना था, हमें सुकून की जिंदगी चाहिए थी. ईएमआई का कोई पंगा नहीं था, इसलिए आसानी से नौकरी छोड़ने का निर्णय ले पाए.

अब दोनों ने मिलकर विदिशा मुख्यालय से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर धनौरा हवेली गांव में अपनी पुश्तैनी 14 एकड़ जमीन पर 2018 से जैविक खेती का सफर शुरू किया. शुरुआत दोनों ने जैविक औषधि से की थी. परंतु धीरे-धीरे खेत को एकीकृत जैविक खेत में बदल दिया. वर्तमान में उनके खेत में कई प्रकार की सब्जियां, हल्दी, अरहर, हरा चना, ज्वार, मक्का, मूंगफली, तिल, काले चने, भूरे चने, प्राचीन खापली और बंसी गेहूं, जौ, सरसों, धनिया, मवेशियों के चारे के लिए बरसीम घास, कई पौधे उगाए जाते हैं. अमरूद, केला और नींबू का उत्पादन हो रहा है. खेत में ही एक प्रसंस्करण केंद्र है जहां उत्पादित सामग्रियों को प्रसंस्करित कर पैक किया जाता है. उसके सारे अवशेष गौशाला में गायों के लिए चला जाता है. जिससे जीरो वेस्ट फार्म की कल्पना साकार होने में मदद मिलती है.

बेसहारा गायों के सहारा बने सुधांशु

सुधांशु के गौशाला में इस समय बिना दूध देने वाली 15 गायें हैं,  जिन गायों को लोगों ने सड़कों पर छोड़ दिया था, उन्होंने उन गायों को गोद लिया, ताकि उसे जैविक खेती के आवश्यक गौमूत्र और गोबर मिल सके.

सुधांशु ने अपने खेत में ही एक बड़ा तालाब बनाया है, जहां बरसात का पानी इकट्ठा होता है, जो साल भर सिंचाई के लिए काम आता है. वर्तमान में उनके पास ग्राहकों की एक लम्बी फेहरिस्त है, जिन्हें वह जैविक उत्पाद बेचते हैं. उनकी कंपनी जैविक जीवन का उत्पाद ग्राहक अमेजन से मंगवाते हैं. अब तो हाल यह है कि उनके ग्राहकों की संख्या को देखते हुए 14 एकड़ कृषि भूमि भी उसके लिए कम पड़ने लगी है.

सुधांशु बताते हैं कि मेरा खेती करने का अनुभव रोमांचक और चुनौतीपूर्ण रहा है, परंतु अब दुनिया को स्वस्थ बनाने का यह तरीका मुझे अच्छा लगने लगा है. वे गांव में छोटे-छोटे किसानों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं और उन्हें जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

उन्होंने कहा कि शुरू में किसानों के मन में यह डर था कि जैविक से उत्पादन बहुत कम हो जाएगा. लेकिन अब यह भ्रम टूट चुका है.

जीरो बजट खेती कैसे संभव है?

organic farming
organic farming

जैविक खाद के सिलसिले में उन्होंने कहा कि सड़कों पर बहुत सारी गाय विचरण करती रहती है. हम उन्हें आसरा देकर उनके गोबर और गौमूत्र को खाद के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. इस तरह जीरो बजट वाली खेती को संभव कर सकते हैं.

सब्जियों की खेती के संबंध में उन्होंने कहा कि केवल दो से ढाई महीने में सब्जियां तैयार हो जाती हैं. किसान खेतों को टुकड़े-टुकड़े में बांटकर अलग-अलग मौसम की सब्जियां उगाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. हम उन्हें बाजार उपलब्ध कराने में मदद कर रहे हैं ताकि वे जैविक खेती करने के लिए उत्साहित हों.

अब सुधांशु जीरो बजट वाली खेती की सीख (zero budget farming) को सैकड़ों सीमांत किसानों तक ले जाना चाहते हैं ताकि वे भी इस अमूल्य श्रृंखला का हिस्सा बनकर लाभान्वित हो सके. इससे न केवल उन्हें अपनी उपज के लिए बाजार प्राप्त करने में मदद मिलेगी बल्कि उन्हें अपने खेतों को टिकाऊ बनाने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी मदद मिलेगी.

रूबी सरकार

भोपाल, मप्र

(चरखा फीचर)

रासायनिक, जैविक या प्राकृतिक खेती : क्या करे किसान

farming

Chemical, organic or natural farming: what a farmer should do?

मध्य प्रदेश सरकार की असंतुलित नीति ‘प्राकृतिक खेती’ की नई घोषणा

बीते 20 वर्ष से रसायन मुक्त या जैविक खेती (chemical free or organic farming) कर रहे युवा प्रगतिशील किसान आनन्द सिंह ठाकुर इन दिनों मप्र की शिवराज सिंह चौहान सरकार की खेती-बाड़ी की नित- नई विरोधाभासी नीतियों से हैरान-परेशान हैं। उनकी परेशानी का कारण, मध्यप्रदेश सरकार की प्राकृतिक खेतीकी नई घोषणा (Madhya Pradesh government’s new announcement of ‘natural farming’) है। यह नीति असंतुलित है। उन्हें और उन जैसे ही, पर्यावरण संरक्षण में जुटे अन्य लोगों को आशंका है कि इस तरह दोहरी खेती के फेर के विरोधाभास में फंसकर किसानों से न जैविक खेतीहो पाएगी और न ही प्राकृतिक खेती। आखिर में फिर वही रासायनिक कृषि पर निर्भरता हो जाएगी। जहरीले रसायन व रासायनिक उर्वरकों की कम्पनियों का बोल – बाला हो जाएगा। चूंकि इन कम्पनियों की वैश्विक आर्थिक ताकत है इसलिए कहा यह भी जा रहा है कि हो सकता है रासायनिक कृषि को बनाए रखने का यह सोचा- समझा खेल हो?

जैविक खेती के लिए जाने जाते हैं आनन्द सिंह ठाकुर

इंदौर के समीप उमरिया-खुर्द गांव के आनंद, सूबे में जैविक खेती के लिए जाने जाते हैं। ‘भारतीय किसान संघ’ के वे जैविक खेती के झंडाबरदार हैं और मालवा सूबे के प्रमुख भी। उनकी और उनके जैसे अन्य किसानों की नाराजगी प्राकृतिक खेतीके मापदण्ड (Criteria for ‘Natural Farming’) व अव्यवहारिक तौर-तरीकों से है। इनकी तरह और लोग भी हैं जो अब जैविक व प्राकृतिक खेती-किसानी के ‘रहस्य’ में उलझ गए हैं।

रहस्य इसलिए कि इस खेती में पैदावार कैसे होगी और ज़्यादा उत्पादन कब, कैसे, किस तरीके से मिलेगा? दोनों पद्धतियां किस तरह अलग-अलग हैं, यह स्पष्ट नहीं है। ‘प्राकृतिक कृषि’ की शुरुआत कहां से, कैसे होनी है? ऐसे सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं।

क्यों असंभव है प्राकृतिक खेती?

‘जीरो बजट’ या ‘कृषि’ या ‘प्राकृतिक खेती’ पूरी तरह से आदर्श स्थिति में होने वाली खेती है। यानी बाहरी इनपुट का उपयोग बिलकुल नहीं होगा। बीज से लेकर खाद – दवाई, हल-बख्खर की निंदाई – गुड़ाई कुछ नहीं।

Farmer

यह कहने-सुनने में अच्छा है, पर इसे करना अधिकांश किसानों के बूते की बात नहीं है। वजह साफ है, जमीन व वातावरण दोनों में रच-बस गए प्रदूषण को दूर होने में समय लगता है, तब तक इस खेती में भी जैविक की तरह फायदा नहीं होता, फिर उत्पादन के बढ़े दाम भी नहीं मिलते।

क्या किसानों के लिए फायदे का सौदा है जैविक खेती? | Is ‘organic farming’ profitable?

‘जैविक खेती’ में भी शुरुआत के तीन सालों तक नुकसान होता है। उपज के लिए बाजार व दाम की निश्चितता नहीं होती। वहीं ‘जैविक खेती’ से कठिन ‘प्राकृतिक खेती’ है। ‘जैविक खेती’ में गोबर की खाद, ट्रैक्टर का उपयोग, निंदाई-गुड़ाई व अन्य प्राकृतिक, बाहरी इनपुट प्रतिबंधित नहीं हैं, परन्तु रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशक आदि का उपयोग कतई नहीं किया जाता। इसलिए यह सुरक्षित व पर्यावरण अनुकूल है। इस पर शोध भी हुए हैं।

ग्रीन हाउस गैस में बढ़ोतरी करती है जैविक खेती

‘जैविक खेती’ से भी मीथेन व कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है जो ग्रीन हाउस गैसमें बढ़ोतरी (Increase in ‘green house gas’) कर रहा है। मशीनों के उपयोग से मिट्टी के जीवाणु नष्ट होते हैं। मल्चिंग (मिट्टी को ढंकने) में प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है जो मिट्टी के साथ फसल व पानी के स्रोतों को जहरीला करता है। विदेशी केंचुए सिर्फ मिट्टी खाते हैं, खाद नहीं बनाते, फिर भी जैविक व अन्य कृषि में इनका बिना सोचे-समझे उपयोग हम वर्षों से कर रहे हैं।

मिट्टी उर्वर बनाने के लिए क्या है वैज्ञानिकों का मत?

What is the opinion of scientists to make the soil fertile?

वैज्ञानिकों का मत है कि मिट्टी के पर्याप्त पोषण के लिए कार्बन, नाइट्रोजन, पोटेशियम आदि तत्वों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है तभी मिट्टी उर्वर बनी रहती है। देश की उपजाऊ मिट्टी कमजोर हो चुकी है। पोषक तत्वों की भयावह कमी हो गई है। कार्बन की कमी बड़ा संकट है, इसलिए गोबर की खाद (cow dung Manure) बेहद जरूरी है। वैकल्पिक खेती (alternative farming) में उर्वर पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।

close up shot of assorted fruits
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दूसरी ओर ‘प्राकृतिक खेती’ के विशेषज्ञ व इस पद्धति के पैरोकार वैज्ञानिक कहते हैं कि इन सब तथ्यों, आशंकाओं और आधुनिक खेती के खतरों के जवाब सिर्फ ‘प्राकृतिक खेती’ में हैं। जैसा कि ‘प्राकृतिक खेती’ के जनक सुभाष पालेकर द्वारा बताया गया है कि रासायनिक खेती से धरती बंजर हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग‘ व ‘जलवायु परिवर्तन’ (‘Global warming and climate change’) के साथ खेती सम्बंधित प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन नए-नए संकट ला रहा है।

प्राकृतिक खेती : किसानों को सरकार पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा?

सरकार ‘प्राकृतिक खेती’ का तालमेल ‘जैविक खेती’ व ‘रासायनिक खेती’ के साथ बैठाए बिना ‘प्राकृतिक खेती’ की घोषणाएं करती जा रही है। ‘प्राकृतिक खेती’ के सफल, जीवंत प्रयोगों से किसानों को निकट से परिचित करवाये बिना इसका ऐलान कर दिया जाता है। इससे किसानों को सरकार पर भरोसा नहीं हो रहा। सरकार को चाहिए था कि पहले ‘जैविक कृषि’ वाले किसानों को ‘प्राकृतिक खेती’ अपनाने के लिए सहमत किया जाता। इन किसानों के लिए यह आसान होता।

देश में इस समय जैविक या ऑर्गेनिक खेती के उत्पादों का बाज़ार प्रसार पा रहा है। ऐसे में सरकारें लम्बी कसरत के बावजूद प्राकृतिक व जैविक खेती में तालमेल बैठाने की बजाय जल्दबाजी में ‘प्राकृतिक खेती’ की घोषणा करती जा रही हैं।

मध्य प्रदेश से पहले हरियाणा सरकार ने भी ‘प्राकृतिक खेती’ को बढ़ावा देने की घोषणा करते हुए ‘प्राकृतिक खेती बोर्ड’ बनाने का ऐलान किया है।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के साइड इपेक्ट्स

असल में, हरित क्रांति की आधुनिक कृषि के शुरुआती फायदों के बाद बीते चार-पांच दशकों से रासायनिक खेती-किसानी के फायदे लगातार घटते जा रहे हैं, तो वहीं, जानलेवा दुष्प्रभाव भयावह तरीके से बढ़ते ही जा रहे हैं। इससे चिंतित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबसे प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की अपील की है तब से बीजेपी शासित सरकारों में इसे लेकर फटाफट घोषणाओं की होड़ सी लग रही है।

क्या है प्राकृतिक खेती?

‘प्राकृतिक खेती’ एक रसायन मुक्त, पारंपरिक कृषि पद्धति है। इसे कृषि पारिस्थितिकी आधारित विविध कृषि प्रणाली के रूप में माना जाता है जो कार्यात्मक जैव विविधता (Biodiversity) के साथ फसलों, पेड़ों और पशुधन को एकीकृत करती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है- जैसे, जंगल का पारिस्थितिकी तन्त्र पूर्णतया प्राकृतिक है। वहां मानवीय दखल नहीं होता है। यह प्रकृति नियंत्रित वैज्ञानिक व्यवस्था है।

जंगल में बिना बोवाई, बिना जुताई, बिना सिंचाई, बिना खाद, बीज, बिना कीट नियंत्रक के जीवन बखूबी पीढ़ी-दर-पीढ़ी फलता-फूलता है। जंगल में प्राकृतिक संसाधनों-सूर्य ऊर्जा, प्रकाश, हवा, वर्षा, तापमान, मिट्टी, जल के उपयोग से वनस्पति व जंगल के जीव अपना जीवन जीते हैं। जितना प्रकृति से लेते हैं, उससे ज्यादा उसे लौटाते हैं और यह चक्र चलता रहता है। इसी तर्ज पर प्रकृति आधारित खेती-किसानी, ‘प्राकृतिक खेती’ है।

प्राकृतिक खेती की मोदी सरकार की योजना

selective focus photography of green vegetables
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‘प्राकृतिक खेती’ को मोदी सरकार ने केंद्र प्रायोजित योजना बनाया है। परम्परागत कृषि विकास योजना‘ (Paramparagat Krishi Vikas Yojana पीकेवीवाई) के तहत भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम‘ (बीपीकेपी) {The Paramparagat Krishi Vikas Yojana (PKVY) } लागू किया गया है। ‘बीपीकेपी’ का उद्देश्य पारंपरिक स्वदेशी पद्धतियों व तकनीकों को बढ़ावा देना है। इससे लागत में कमी आएगी। यह बड़े पैमाने पर ‘बायोमास मल्चिंग’ पर ‘ऑन-फार्म बायोमास रीसाइक्लिंग’ सिद्धांत पर आधारित है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘प्राकृतिक खेती’ से खरीदे जाने वाले आदानों पर निर्भरता कम होगी और छोटे किसानों को ऋण के बोझ से मुक्त करने में मदद मिलेगी।

‘बीपीकेपी’ कार्यक्रम आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश और केरल राज्य में अपनाया गया है।

कई अध्ययनों में पाया है कि ‘प्राकृतिक खेती’ वृद्धि, स्थिरता, पानी के उपयोग की बचत, मिट्टी के स्वास्थ्य और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इस पद्दति को रोजगार बढ़ाने और ग्रामीण विकास की गुंजाइश के साथ एक लागत प्रभावी कृषि पद्धति के रूप में माना जाता है।

‘नीति आयोग‘ ने कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय(Ministry of Agriculture & Farmers’ Welfare) के साथ प्राकृतिक कृषि पद्धतियों परि वैश्विक विशेषज्ञों के साथ कई उच्च स्तरीय चर्चाएं की हैं। मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में लगभग 2.5 मिलियन हेक्टयर में किसान पहले से ही मिली – जुली पुरातन कृषि का अभ्यास कर रहे हैं। अगले 5 वर्षों में, इसके 20 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने की उम्मीद है।

डॉ सन्तोष पाटीदार

पूरे प्रदेश में मनाया जाएगा 15 मार्च को कॉर्पोरेट विरोधी दिवस

Kisan Sabha

निजीकरण के खिलाफ होंगे प्रदर्शन

रायपुर, 13 मार्च 2021. अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और 500 से अधिक किसान संगठनों के साझे मोर्चे संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर छत्तीसगढ़ में भी छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन और छत्तीसगढ़ किसान सभा सहित इससे जुड़े अन्य घटक संगठन 15 मार्च को कॉर्पोरेट विरोधी दिवस मनाएंगे और महंगाई और निजीकरण के खिलाफ जिलों और ब्लॉकों में प्रशासन को ज्ञापन सौंपेंगे।

यह जानकारी एक बयान में छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के संयोजक सुदेश टीकम, आलोक शुक्ला, संजय पराते, नंद कश्यप, रमाकांत बंजारे आदि ने दी।

उन्होंने बताया कि इस दिन प्रदेश में कुछ स्थानों पर मजदूर संगठनों के साथ मिलकर रेलवे स्टेशनों पर भी निजीकरण के खिलाफ  प्रदर्शन किये जायेंगे। इन ज्ञापनों और प्रदर्शनों के जरिये कृषि विरोधी कानून वापस लेने, सी-2 लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का कानून बनाने, डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस व अन्य आवश्यक वस्तुओं के बढ़ रहे दामों को रोकने और रेलवे, बैंक, बीमा सहित अन्य सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण पर रोक लगाने की मांग की जाएगी।

उन्होंने कहा है कि हमारे देश के किसान न केवल अपने जीवन-अस्तित्व और खेती-किसानी को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, बल्कि वे देश की खाद्यान्न सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा संप्रभुता की रक्षा के लिए भी लड़ रहे हैं। उनका संघर्ष उस समूची अर्थव्यवस्था के कारपोरेटीकरण के खिलाफ भी हैं, जो नागरिकों के अधिकारों और उनकी आजीविका को तबाह कर देगा। इसलिए देश का किसान आंदोलन इन काले कानूनों की वापसी के लिए खंदक की लड़ाई लड़ रहा है और अपनी अटूट एकता के बल पर इस आंदोलन को तोड़ने की सरकार की साजिशों को मात दे रहा है।

उन्होंने बताया कि इस देशव्यापी आंदोलन को तेज करने के लिए पूरे प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर किसान पंचायतें आयोजित करने का सिलसिला भी शुरू किया जा रहा है।

सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं में विकसित हो रही फूलों की उन्नत किस्में

Nature And Us

Advanced varieties of flowers growing in CSIR laboratories

शुरू हुआ भारत में फूलों की खेती अभियान

नई दिल्ली, 8 मार्च 2021, (इंडिया साइंस वायर): देश में फूलों की खेती (Floriculture in India) को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने सीएसआईआर ( वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद – (Council of Scientific and Industrial Research)के फूलों की खेती अभियान के शुभारंभ की घोषणा की  है। इसके लिए नई दिल्ली में आयोजित एक वर्चुअल कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि फूलों की खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में किसानों को लगभग पांच गुना अधिक तक लाभ देने में सक्षम है। यह पहल किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किये गये प्रयासों की एक कड़ी है।

इसके लिए डॉ हर्षवर्धन ने वैज्ञानिकों का आह्वान करते हुए कहा कि इसे सफल बनाने और अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं में इसके उन्नत मॉडल विकसित किए जाए। इससे फूल-उत्पादन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद मिलेगी।

सीएसआईआर का फूलों की खेती के लिए अभियान | CSIR’s campaign for floriculture

सरकार ने हाल में ही ‘फूलों की खेती के लिए सीएसआईआर के अभियान’  को हरी झंडी दिखाई थी। आरंभिक स्तर पर इसे देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाएगा। इसके लिए सीएसआईआर के संस्थानों में उपलब्ध जानकारियों का उपयोग किया जाएगा। इस अभियान के माध्यम से देश के किसानों और उद्योगों को निर्यात-स्तर की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में सक्षम बनाने पर जोर दिया जाएगा। यह अभियान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), निदेशक-बागवानी खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी), कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा), वाणिज्य मंत्रालय, ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राइफेड), खुशबू और स्वाद विकास केंद्र (एफएफडीसी) कन्नौज, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) और विश्वविद्यालयों के सहयोग से चलाया जा रहा है।

जानिए क्या हैं फूलों की खेती से होने वाले फायदे | Benefits of flower cultivation | फूलों की खेती के बारे में जानकारी

फूलों की खेत से होने वाले फायदों पर डॉ.हर्षवर्धन ने कहा,

“किसानों को फूलों की खेती के बारे में बहुत कम जानकारी है। यह परंपरागत फसलों की तुलना में 5 गुना अधिक लाभ दे सकती है।  इसमें नर्सरी , फूलों की खेती, नर्सरी व्यापार के लिए उद्यमिता विकास, मूल्य संवर्धन और निर्यात के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्रदान करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि भारत में विविध कृषि-जलवायु, विभिन्न तरह की मिट्टी और समृद्ध पादप विविधता के बावजूद फूलों की खेती के वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 0.6 प्रतिशत हिस्सा है। इसका नतीजा यह है कि भारत विभिन्न देशों से हर साल कम से कम 1200 मिलियन अमरीकी डॉलर के फूल का आयात करता है।

सीएसआईआर वर्ष 1953 से फूलों की नई किस्मों और कई मूल्यवर्धन प्रौद्योगिकियों का विकास कर रहा है। सीएसआईआर द्वारा, कृषि-प्रौद्योगिकियों, फूलों की नई किस्मों और सीएसआईआर के संस्थानों में उपलब्ध मूल्यवर्धित प्रौद्योगिकियों के माध्यम से किसानों और उद्यमियों को उनकी आय बढ़ाने की दिशा में लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बाजार तक पुष्प उत्पादों को पहुंचाने  और उनके व्यापार के मुद्दों को एपीडा (एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फ़ूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी), राज्य बागवानी विभागों और ट्राइफेड (ट्राइबल कोपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया) की साझेदारी से हल किया जाएगा। अभियान में फूलों की खेती के साथ मधुमक्खी पालन को जोड़ने की परिकल्पना के अधिक लाभदायी होने की बात कही जा रही है|

सीएसआईआर  द्वारा शुरू किये गए फूलों की खेती अभियान से उद्यमिता विकास और रोजगार के बड़े अवसर सृजित होने की उम्मीद है।

Commercial floriculture for beekeeping

इस अभियान के तहत मधुमक्खी पालन के लिए वाणिज्यिक फूलों की खेती, मौसमी तथा सालभर होने वाले फूलों की खेती, जंगली फूलों की फसलों पर ध्यान दिया जाएगा। कुछ लोकप्रिय फूलों की फसलों में ग्लैडियोलस, कन्ना, कार्नेशन, गुलदाउदी, जरबेरा, लिलियम, मैरीगोल्ड, रोज, ट्यूबरोज आदि शामिल हैं। वर्ष 2018 में भारतीय फूलों की खेती का बाजार 15700 करोड़ रुपये का था। 2019-24 के दौरान इसके  47200 करोड़ रुपये तक का हो जाने का अनुमान है।

डॉ हर्षवर्धन ने इस अवसर पर एंड्रायड ऐप के साथ सीएसआईआर का सामाजिक पोर्टल भी जारी किया। इस पोर्टल को सीएसआईआर की टीम ने माईजीओवी की टीम की मदद से विकसित किया है। यह पोर्टल लोगों को सामाजिक समस्याओं का हल विज्ञान और प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों की मदद से तलाशने की सुविधा प्रदान करता है। यह समाज में विभिन्न हितधारकों के समक्ष मौजूद चुनौतियों और समस्याओं पर उनकी राय जानने की दिशा में पहला कदम है।

डॉ हर्षवर्धन ने वैज्ञानिकों से इस पोर्टल को लोगों की समस्याओं को व्यक्त करने और उनका वैज्ञानिक हल निकालने के लिए सबसे अधिक लोकप्रिय पोर्टल बनाने का आह्वान किया।

(इंडिया साइंस वायर)

कृषि संकट से आंख चुराने वाला बजट — किसान सभा

Demonstrations held in many places in Chhattisgarh against anti-agricultural laws

छत्तीसगढ़ बजट 2021-22 : किसान सभा की प्रतिक्रिया

Chhattisgarh Budget 2021-22: Response of Kisan Sabha

रायपुर, 02 मार्च, छत्तीसगढ़ किसान सभा ने कांग्रेस सरकार द्वारा पेश बजट को किसानों के लिए निराशाजनक और कृषि संकट से आंख चुराने वाला बताया है।

किसान सभा ने कहा है कि न्याय योजना के बावजूद प्रदेश में फिर किसान आत्महत्याएं शुरू हो चुकी हैं और फसल बीमा के प्रावधान से उन्हें कोई मदद नहीं मिलने वाली है, क्योंकि यह केवल निजी कंपनियों और कार्पोरेटों के मुनाफे ही बढ़ाएगी।

आज यहां जारी बजट प्रतिक्रिया में छग किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने कहा है कि धान का लाभकारी मूल्य देना तो स्वागतयोग्य है, लेकिन केवल इतने से ही किसानों की समस्याएं हल होने वाली नहीं है। यह सरकार मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने में विफल रही है। देशव्यापी मंदी और कोरोना संकट के कारण पैदा हुई बेरोजगारी से उबरने के लिए ग्रामीणों को रोजगार की जरूरत है, लेकिन मनरेगा के बजट में ही कटौती कर दी गई है। इस मद में केवल 1603 करोड़ रुपये ही आबंटित किये गए हैं, जबकि इस वित्तीय वर्ष में ही 2600 करोड़ रुपयों की मजदूरी वितरित की गई है।

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष के बजट में प्रदेश में 20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करने की योजना का जोर-शोर से ढोल पीटा गया था, लेकिन इस वर्ष सिंचाई मद में केवल 300 करोड़ रुपयों के आबंटन से इसकी पोल खुल गई है, जबकि पिछले वर्ष 2000 करोड़ रुपयों का आबंटन किया गया था। इस बजट में कृषि के क्षेत्र में कथित रूप से जिन नवाचारों की घोषणा की गई है, इस सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण उन सबका यही हश्र होने वाला है। लकिसान सभा नेता नेताओं ने कहा कि प्रदेश में आदिवासियों और गरीब किसानों का विस्थापन सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन इसे रोकने के लिए वनाधिकार कानून, पेसा कानून, 5वीं अनुसूची और भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को लागू करने के प्रति यह सरकार गंभीर नहीं है।

छत्तीसगढ़ किसान सभा ने प्रदेश के सभी किसान संगठनों से इस निराशाजनक बजट के खिलाफ किसान समुदाय को लामबंद करने की अपील की है, ताकि खेती-किसानी की समस्याओं पर एकजुट संघर्ष छेड़ा जा सके।

सहकारी खेती को मजबूत करे सरकार, नेताओं व अन्नदाता किसानों पर दमन सरकार के डर का प्रतीक-एआईपीएफ

BJP-RSS government bent on suppression due to successful farmer movement

The government should strengthen cooperative farming, repression on politicians and farmers symbolizes fear of government – AIPF

पूरे प्रदेश में एआईपीएफ कार्यकर्ताओं ने किया प्रदर्शन

AIPF workers demonstrated across the state

लखनऊ, 14 दिसम्बर 2020, सरकार अगर छोटे-मझोले किसानों के प्रति ईमानदार है तो उसे कांट्रैक्ट फार्मिंग (Contract farming) के जरिए उन्हें कारपोरेट के सामने मरने के लिए छोडने की जगह सहकारी खेती के लिए उनकी मदद करनी चाहिए। इसके लिए उसे दो या तीन गांव का कलस्टर बनाकर गांव स्तर पर ही उनकी फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद और वहीं उसके सार्वजनिक वितरण प्रणाली से वितरण, ब्याज मुक्त कर्ज, कृषि आधारित उद्योग, फसल के संरक्षण व भंडारण की व्यवस्था और सस्ते दर पर लागत सामग्री मुहैया करानी चाहिए। उसे राजकोषीय घाटे पर रोक के एफबीआरएम कानून 2003 को रद्द कर कृषि, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य पर बजट बढाना चाहिए।

यह मांग आज किसान विरोधी तीनों कानून की वापसी (Return of three anti-farmer laws), एमएसपी पर कानून बनाने, विद्युत संशोधन विधेयक वापस लेने की मांग पर किसानों के अखिल भारतीय विरोध दिवस पर आयोजित प्रदर्शनों में आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और मजदूर किसान मंच के कार्यकर्ताओं ने उठाई।

      प्रदर्शनों में कहा गया कि किसानों के बढ़ रहे राष्ट्रव्यापी आक्रोश से संघ और भाजपा की सरकार डर गई है। यहीं कारण है कि उसके आला नेता और मंत्री अम्बानी-अडाणी की रक्षा के लिए आज से रैली कर रहे हैं।

आरएसएस-भाजपा की सरकार ने बौखलाहट में एआईपीएफ प्रदेश उपाध्यक्ष योगीराज सिंह पटेल, चंदौली के नेता अजय राय, बुनकर वाहनी के अध्यक्ष इकबाल अंसारी व इलाहाबाद में युवा मंच अध्यक्ष अनिल सिंह समेत तमाम जनपदों में नेताओं व अन्नदाता किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। बावजूद इसके वकीलों, कर्मचारियों, मजदूरों व व्यापारियों का व्यापक समर्थन आंदोलन को मिला है।

     आज हुए कार्यक्रमों का नेतृत्व एआईपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस. आर. दारापुरी, बिहार के सीवान में पूर्व विधायक व एआईपीएफ प्रवक्ता रमेश सिंह कुशवाहा, पटना में एडवोकेट अशोक कुमार, लखीमपुर खीरी में एआईपीएफ के प्रदेश अध्यक्ष डा. बी. आर. गौतम, सीतापुर में एआईपीएफ के महासचिव डा. बृज बिहारी, मजदूर किसान मंच नेता सुनीला रावत, युवा मंच के नागेश गौतम, अभिलाष गौतम, लखनऊ में लाल बहादुर सिंह, दिनकर कपूर, उपाध्यक्ष उमाकांत श्रीवास्तव, शगुफ्ता यासमीन, वर्कर्स फ्रंट नेता प्रीती श्रीवास्तव, हाईकोर्ट के एडवोकेट कमलेश सिंह, सोनभद्र में प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कोल, प्रदेश सचिव जितेन्द्र धांगर, कृपाशंकर पनिका, राजेन्द्र प्रसाद गोंड़, सूरज कोल, श्रीकांत सिंह, रामदास गोंड़, शिव प्रसाद गोंड़, आगरा में वर्कर्स फ्रंट उपाध्यक्ष ई. दुर्गा प्रसाद, चंदौली में आलोक राजभर, डा. राम कुमार राजभर, गंगा चेरो, रामेश्वर प्रसाद, इलाहाबाद में युवा मंच संयोजक राजेश सचान, बलिया में मास्टर कन्हैया प्रसाद, बस्ती में एडवोकेट राजनारायण मिश्र,श्याम मनोहर जायसवाल ने किया।

कृषि क्रांति की दिशा : कारपोरेट हमले के खिलाफ जुझारू किसान

Modi government is Adani, Ambani's servant. Farmers and workers will uproot it - Randhir Singh Suman

The peasant movement has shaken the foundation of the Modi government.

किसान आंदोलन ने मोदी सरकार की बुनियाद हिला दी है। उसके फासीवादी दमन की धज्जियां उड़ा दी हैं। अमेरिका, विश्व व्यापार संगठन (WTO) और कारपोरेट पूंजीपतियों के दबाव में आरएसएस/भाजपा द्वारा लाए गए नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलित हैं। इन कानूनों के कारण लाखों गरीब और छोटे किसानों की जमीन छिन जाएगी। इनके जरिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमसीपी) पर सरकारी खरीद समाप्त करने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। राशन की द‌ुकानों (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) की व्यवस्था की जगह बैंक खातों में सीधे पैसे जमा (ङीबीटी) करने के रास्ते से सरकार खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहती है। कृषि मंडियों के मुकाबले देशी-विदेशी कंपनियां छा जाएंगी। ये कंपनियां उन जिन्सों का ही उत्पादन करेंगी, जिनसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो। वे कृषि उत्पादों का विदेशों में निर्यात कर मुनाफा बटोरने में लगी रहेंगी, चाहे जनता भूखों मरे। खुले बाजार के नाम पर कालाबाजारी और जमाखोरी को इजाजत मिल जाएगी, खाद्यान्न महंगाई बेलगााम हो जाएगी।

श‌ुरूआत में जनसंघ (अब भाजपा) का सामाजिक आधार शहरी मध्य वर्गीय व्यापारी और छोटे-मझोले किसान थे, हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) शुरू से ही हिंदुत्व के नाम पर राजे-महाराजे, जमींदार-सामन्तों और साम्राज्यवाद का हिमायती (आज़ादी के आंदोलन के समय बरतानिया साम्रज्यवाद फिर अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादियों का तरफदार) रहा है। आरएसएस/भाजपा की मोदी सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी के बाद अब तीन कानून पारित करके कृषि क्षेत्र को कारपोरेट कंपनियों के हवाले करने का रास्ता तैयार कर दिया है।

तीन कृषि कानून | Three Agricultural Laws

तीन में से दो कानून नए हैं- ‘1)” कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण)अधिनियम, 2020” और ” कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य अश्वासन और 2) कृषि सेवा करार अधिनियम, 2020।”. तीसरा कानून जमाखोरी रोकने के लिए बने कानून में संशोधन- ”आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020′‘ है।

”कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020” कृषि मंडी समितियों (एपीएमसी) के मुकाबले देशी-विदेशी कंपनियों को खड़ा करने की योजना है। सरकार इसे ही खुला बाजार बता रही है। इन निजी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बाध्यता नहीं होगी।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अनुसार सरकार रबी और खरीफ की फसल बोने से पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है। फसल के समय किसान को अपनी फसल बेचने की जल्दी होती है। उसे घाटा नहीं हो इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की व्यवस्था की जाती है। यह अनाज गोदाम (भारतीय खाद्य निगम FCI) में जमा होता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बंटने वाला राशन यहीं से आता है। नियम तो यह है, मंडी में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम मिल रहा हो तो सरकार किसान की फसल तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदे लेकिन ऐसा होता नहीं है। एफसीआई अधिकारियों और आढ़तियों के बीच सांठगांठ रहती है। किसान गरीब है तो कह दिया जाता है, गोदाम में जगह नहीं है।

At present, there are 7000 mandis in the country, whereas the requirement is 42000 mandis.

यह सही है कि मंडियों में गरीब और छोटे किसान की लूट होती है। पांच आढ़ती मिल करके किसान की फसल की कीमत तय करते हैं। इसमें बेईमानी और जम कर धांधली होती है। इसका समाधान मंडी समितियों का सुधार है, न कि किसान को मंडी समितियों की जगह निजी कंपनियों (मगरमच्छों)के हवाले करना।

हर पांच मील के दायरे में कृषि मंडी होनी चाहिए। इस समय देश में कुल 7000 मंडियां हैं, जबकि जरूरत 42000 मंडियों की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की बाध्यता के लिए कोई कानून नहीं है। सरकार को ऐसा कानून बनाना चहिए। निजी कपनियों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर फसल खरीदना जरूरी करना, ऐसा न करने पर दंडित करने के लिए कानून होना चाहिए।

Contract farming law

“कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य अश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम, 2020संविदा खेती या ठेके पर खेती से संबंधित कानून है। संविदा खेती के लिए 2003 में कानून बना था। इसके अनुसार कंपनी या कोई व्यक्ति किसान के साथ अनुबंध करता है कि वह फसल को एक निश्चित समय पर तय दाम पर खरीदेगा। इसमें खाद-बीज, सिंचाई व मजदूरी सहित अन्य खर्चे ठेकेदार करता है।

नए कानून के तहत बड़ी कंपनियां सैंकड़ों एकड़ के बड़े-बड़े कृषि फार्म बनाएंगी, गांव के गांव खरीद लेंगी। गरीब और छोटे किसान खेतिहर मजदूर बन जाएंगे। देश का पूरा कृषि परिदृश्य बदल जाएगा।

Modernization of agriculture

नीति अयोग ने 2017 में एक उच्च-स्तरीय बैठक आहूत की थी। इसमें सम्मलित लगभग 150 व्यक्तियों में सरकारी अधिकारी, कृषि और आर्थिक विशेषज्ञ, कारपोरेट क्षेत्र के प्रतिनिधि और कुछ किसान नेता थे। बैठक का विषय था कृषि का आधुनिकीकरण। इसके लिए बड़े स्तर पर निवेश की जरूरत समझी गई। किसान इतना निवेश करने की स्थिति में नहीं हैं, इस आकलन के साथ बैठक में कारपोरेट क्षेत्र (देशी-विदेशी कंपनियों) कृषि में निवेश करें यह कहा गया। कंपनियों की शर्त थी, “सरकार उन्हें दस हज़ार एकड़ भूमि खेती के लिए उपलब्ध कराए। किसान इस भूमि पर खेतिहर मजदूर की हैसियत से काम कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त उनका किसी प्रकार का दखल नहीं होगा।”

आवश्यक वस्तु अधिनियम कब बना.

“आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020”.अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने के लिये यह कानून है। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बना था। अब इसमें संशोधन करके जमाखोरी और काला बाजारियों को खुली छूट दे दी गई है। फसल के समय कंपनियां अपने गोदाम भरेंगी, बाद में अधिक दाम पर बेचेंगी। इस तरह मंहगाई बढ़ेगी। यह सिर्फ किसानों के लिए ही नहीं, आम जनता के लिए भी खतरनाक है।

ङब्ल्यूटीओ, अमेरिका और कारपोरेट की हुक्मबरदारी

इन जन विराधी कानूनों को विश्व व्यापार संगठन (ङब्ल्यूटीओ), आमेरिका और अंबानी-अडानी जैसे कारपोरेट पूंजीपतियों के दबाव में पारित किया गया है। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना अप्रैल, 1994 में मराकेश (मोरक्को) संधि के जरिए हुर्इ थी। उस समय नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री औरर डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। कांग्रेस को संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं था। इसलिए संसद में पारित किए बिना ही भारत को विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना दिया गया था। इसके प्रावधानों के अनुसार मुक्त व्यापार औरर खुले बाजार के लिए कृषि क्षेत्र में छूट या किसी भी स्वरूप में सरकार द्वारा प्रदत्त सहयोग, सहायता समाप्त करना होगा। खाद्य सुरक्षा को छोड़कर सरकार को कृषि व्यापार से अलग रहना होगा।

विश्व व्यापार सगठन की बैठकों में कृषि में छूट (सब्सिडी) समाप्त किए जाने के सवाल पर विकसित (साम्राज्यवादी) और विकासशील/अल्पविकसित देशों के बीच लगातार टकराव चला आ रहा है। क्रांतिकारी उथल-पुथल की संभावना का तर्क देकर खाद्य सुरक्षा के नाम पर भारत सरकार ने अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य और अनाज की सरकारी खरीद जारी रखी है।

विश्व व्यापार संगठन की 2013 में एक बैठक में तय हुआ था कि कृषि क्षेत्र को मुक्त व्यापार के लिए खोलना होगा। भारत को पांच साल की मोहलत दी गई थी। उस समय वामपंथियों द्वारा समर्थित काग्रेस नीत संप्रग सरकार थी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। डब्ल्यूटीओ की बैठक में तय ह‌ुआ था कि 2018 तक कृषि उपज की सरकारी खरीद और कृषि संबंधित सभी छूटें समाप्त कर दी जाएंगी।

भारत सरकार पर आरोप है कि वह अब भी किसानों को छूट, समर्थन मूल्य पर अनाज की सरकारी खरीद औरर अन्य सुविधाएं देकर मुक्त व्यापार समझौते का उल्लंघन कर रहा है। अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विवाद निपटान अधिकरण में इसकी शिकायत दर्ज की है। मोदी सरकार ने कृषि संबंधित ये तीनों जनविरोधी कानून अमेरिका कहने पर पारित किए हैं।

साम्राज्यवाद के हुक्मबरदार आरएसएस/भाजपा की मोदी सरकार ने आंदोलनरत किसानों का दमन करने की भरपूर कोशिश की, उन पर आंसू गैस के गोले बरसाए, तेज धार के साथ पानी की बौछार की गई। रास्ते में बेरिकेड लगाकर, गहरी खंदक खोद करके उन्हें रोकना चाहा। सभी बेकार गया। अंदोलन में फूट डालने और इसे बदनाम करने की भरपूर कोशिश की गई। सरकार इन तीन कानूनों को खतम करने के लिए हजगिज तैयार नहीं है, जिन्हें उसने अपने आकाओं- डब्ल्यूटीओ, अमेरिका, अडानी-अंबानी कारपोरेट पूंजीपतियों के हुक्म पर पारित किया है।

कृषि क्रांति की दिशा में भारत | India towards agricultural revolution

भारत एक कृषि प्रधान देश है। किसान समस्या भारत की प्रमुख समस्या है। (भारत एक कृषि प्रधान देश है। किसान समस्या भारत की प्रमुख समस्या है।) राजे-महाराजों का रूप बदला है, जमींदारी/जागीरदारी उन्मूलन, भूमि सुधार कानून बने हैं, आसामी किसानों को भूमिधर अधिकार भी मिले हैं। इसके बावजूद, देश का 80 प्रतिशत किसान भूमिहीन-गरीब(सीमांत),छोटा- मझौला किसान है। छोटी-अलाभकारी जोतें और उपभोग प्रधान कृषि अर्द्ध सामंती उत्पादन संबंधों की निशानी हैं। कृषि उद्योग नहीं बन सका है, इसकी म‌ुख्य वजह यह है कि हमने जोतने वाले की जमीन के अधार पर कृषि क्रांति के जरिए सामंतवादी उत्पादन संबंधों का जड़ से उन्मूलन नहीं किया है। हमारे यहां मनुवाद या सवर्ण वर्चस्व के रूप में जातिवाद या सांप्रदायिकता जैसा पिछड़ापन अर्द्ध सामंती संबंधों का ही सबूत है।

The problem is how to modernize backward agriculture?

समस्या यह है पिछड़ी कृषि को आधुनिक कैसे बनाया जाए? तीन कृषि कानूनों के जरिए देशी-विदेशी पूंजीपति कंपनियों के हवाले कृषि व्यवस्था करने की जिस दिशा में बढ़ा जा रहा है उससे अंतर्विरोध तेज होंगे। जमीन से बेदखल सीमांत-छोटे किसानों के लिए शहर या मिल-कारखानों में रोजगार नहीं है। इन तीन कानूनों का मुख्य निशाना गरीब और छोटे किसान हैं। इस हमले के दायरे में मझोले और धनी किसान तथा व्यापारी वर्ग भी है।

ये कानून किसानों की आमदनी नहीं बल्कि कंपनियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए हैं। इस आंदोलन ने एक नई क्रांतिकारी चेतना जाग्रत की है। यदि सरकार ने कानून वापस नहीं लिए, दमन या किसानों में फूट पैदा करके कामयाबी हासिल करने की कोशिश की तो शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे जुझारू किसानों के पास एक ही विकल्प बचेगा, साम्राज्यवाद कारपोरेट पूंजीपतियों की हिमायती सरकार और व्यवस्था के खिलाफ क्रांति!

कमल सिंह

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

कमल सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
कमल सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

पीएम का चंदौली वाला जुमला ‘काला चावल’ सब्जबाग

Narendra Modi flute

Chandauli district status rejects PM Modi’s ground reality

अभी हाल ही में मोदी जी ने वाराणसी दौरे के समय अपनी सरकार द्वारा लाए कृषि कानूनों पर बात रखते हुए वाराणसी से अलग होकर बने चंदौली जनपद के किसानों द्वारा काला चावल प्रजाति के चावल की खेती के अनुभव (Experiences of rice cultivation of black rice species) बताते हुए कहा कि इसके निर्यात से चंदौली के किसान मालामाल हो गए. पीएम मोदी के दावे को जमीनी हकीकत खारिज करती है.

जिस चंदौली जनपद के किसानों के विकास के कसीदे मोदी जी पढ़ रहे थे, वह जनपद नीति आयोग के अनुसार देश के सर्वाधिक पिछले जनपदों में एक है.

प्रदेश सरकार ने जब वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट की बात शुरू की तो चंदौली जनपद में शुगर फ्री चावल के नाम पर चाको हाओ यानि काला चावल (Black rice) की खेती शुरू करा दी गयी। इस काले चावल की खेती में और विपणन और प्रचार प्रसार में सरकार की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। इसके लिए एक गैर सरकारी संगठन चंदौली काला चावल समिति बनाई गई है जो इसे बेचने पैदा करने से जुड़ी समस्याओं को हल करने में लगी है।

सन 2018 में करीब 30 किसानों ने इसकी खेती की शुरूआत की, उन्हें काफी महंगे दर पर बीज मिला और इन सभी किसानों ने एक से लेकर आधा एकड़ में धान लगाया। ऐसे जमुड़ा (बरहनी ब्लाक) और सदर ब्लाक के दो किसानों से बात किया गया तो बातचीत में उन्होंने बताया कि कृषि विभाग के सलाह मशवरे से मैंने खेती किया करीब बारह कुन्तल धान पैदा हुआ उसका न तो कोई बीज में खरीदने वाला मिला और न तो चावल लेने वाला मिला.

आज मेरे पास चावल है जिसका उपयोग हम खुद कर रहे हैं। वहीं इसके विपरीत समिति के अध्यक्ष शशीकांत राय पहले साल आधे एकड़ में नौ कुन्तल चावल पैदा होने और कुम्भ मेला के दौरान 51 किलो चावल बिकने की बात बताते हैं।

कृषि विभाग के अनुसार 2018 में 30 किसान 10 हेक्टेयर तो सन् 2019 में 400 किसान 250 हेक्टेयर तो सन् 2020 मे 1000 किसानों ने काला चावल वाले धान की खेती (Black Rice Paddy Cultivation) की है। अनुमानतः सन् 2019 में 7500 कुन्तल धान पैदा हुआ जिसमें से मात्र 800 कुन्तल धान सुखवीर एग्रो गाजीपुर ने रूपया 85/-प्रति किलो की दर से खरीद किया है। बाकी चावल किसानों ने खुद ही उपयोग किया, जिसे निर्यातक बताया जा रहा है वह भी इस साल खरीदने में रूचि नहीं ले रहे हैं। उनके पास आज भी 6700 कुन्तल धान है जो बर्बाद हो रहा है।

प्रधान मंत्री मोदी के वाराणसी दौरे के दौरान काला चावल की तारीफ के बाद अधिकारियों द्वारा बैठकों का दौर शुरू है। काले चावल के भविष्य को लेकर इसके उत्पादक बहुत आशान्वित नहीं दिख रहे. वहीं समिति के अध्यक्ष बड़े ग्राहक न होने की बात स्वीकार करते हैं। जिसकी तलाश समिति और इसके प्रमोटर पिछले तीन सालों से कर रहे हैं। काला चावल का उत्पादन जिले में खरीददार के अभाव में कभी भी बंद हो सकता है, ऐसा इसे पैदा करने वाले किसानों का कहना है। वैसे इसकी खासियत के तौर भारतीय चावल अनुसन्धान हैदराबाद की रिपोर्ट के मुताबिक जिंक की मात्रा जहां सामान्य चावल में 8.5 पीपीएम काला चावल में 9.8 पीपीएम वही पूर्व में पैदा होने वाले काला नमक (धान की एक किस्म) में 14.3 पीपीएम तो आइरन काला चावल में 9.8 पीपीएम काला नमक में 7.7 पीपीएम पायी जाती है।

कुल मिलाकर काले चावल की खेती मोदी जी के कृषि कानूनों की तरह ही महज एक सब्जबाग है इससे ज्यादा कुछ नहीं है। अमित शाह के शब्दों में कहें तो जुमला है।

धमेन्द्र सिंह

लेखक खुद किसान हैं और चंदौली जनपद में अधिवक्ता हैं, साथ ही मजदूर किसान मंच के जरिये किसानों को कारपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ संगठित कर रहे हैं।

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विशेषक्षों ने चेताया वायु प्रदूषण का उच्च स्तर बढ़ा सकता है कोरोना से होने वाली मौतों की संख्‍या

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कोविड-19 संक्रमण के मद्देनजर इस साल सर्दियों में वायु प्रदूषण में बढ़ोत्‍तरी पहले के मुकाबले ज्यादा चिंताजनक

कृषि अवशेष दहन पर परिप्रेक्ष्‍य – Perspectives on agricultural waste combustion

विशेषज्ञों ने कोविड-19 संक्रमण (Covid-19 infection) के मद्देनजर इस साल सर्दियों में वायु प्रदूषण के स्तरों में संभावित बढ़ोत्‍तरी को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा चिंताजनक करार दिया है। उन्‍होंने आगाह किया है कि वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का असर कोरोना से होने वाली मौतों की संख्‍या में और इजाफे (Higher levels of air pollution further increase the number of deaths from corona) के तौर पर सामने आ सकता है।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो डॉक्टर संतोष हरीश का कहना है ‘‘कोविड-19 संक्रमण के हालात बदतर होने के खतरे के मद्देनजर इस साल सर्दियों में वायु प्रदूषण के स्तरों में संभावित बढ़ोत्‍तरी पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा चिंता का सबब है। केंद्र तथा राज्य सरकारों को अगले दो महीने के दौरान इस मसले का प्राथमिकता के आधार पर समाधान करना होगा।’’

भारत के नामी डॉक्‍टर्स के संगठन ‘द डॉक्‍टर्स फॉर क्‍लीन एयर’ के मुताबिक जहां वायु प्रदूषण की समस्‍या (Air pollution problem) गम्‍भीर होती है, वहां खासकर बच्‍चों और बुजुर्गों के फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। उनके लिये कोविड-19 जानलेवा हो सकता है। ऐसे में सरकार को हर साल सर्दियों में विकराल रूप लेने वाली वायु प्रदूषण की समस्‍या से निपटने के लिये ठोस कदम उठाने ही होंगे, वरना इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सक‍ती है।

पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ में कम्युनिटी मेडिसिन एंड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर रवींद्र खैवाल के मुताबिक चीन और इटली में किए गए अध्ययनों से यह जाहिर होता है कि वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का असर कोविड-19 से होने वाली मौतों में वृद्धि के रूप में सामने आ सकता है।

उन्‍होंने कहा कि पंजाब के किसानों ने चेतावनी दी है कि वह पिछले दिनों संसद में विवादास्पद तरीके से कृषि विधेयक पारित कराए जाने के विरोध में इस साल पराली जलाएंगे। इससे पहले से ही खराब हालात और भी बदतर हो जाएंगे। इससे किसानों समेत हर किसी की सेहत को नुकसान होगा।

वायु प्रदूषण का विश्‍लेषण | Air pollution analysis

सीईईडब्‍ल्‍यू और आईएआरआई के अध्‍ययन में भले ही वर्ष 2016 से 2019 के बीच खेतों में कृषि अवशेष या पराली जलाये जाने की दर में साल-दर-साल गिरावट दिख रही हो, मगर एक अध्‍ययन के मुताबिक वर्ष 2018 और 2019 में सितम्‍बर और अक्‍टूबर के महीनों में पंजाब के 10 में से 5 जिलों में प्रदूषण के स्‍तर पिछले साल के मुकाबले अधिक ही रहे हैं। हरियाणा में इसकी तुलना करना मुश्किल है क्‍योंकि ज्‍यादातर कंटीनुअस एम्बिएंट एयर क्‍वालिटी मॉनीटरिंग सिस्‍टम (सीएएक्‍यूएमएस) तो वर्ष 2019 में ऑनलाइन हुए हैं। पीएम10 के लिये गुरुग्राम और पीएम2.5 के लिये फरीदाबाद, गुरुग्राम, पंचकुला और रोहतक को छोड़ दें तो वर्ष 2018 में हरियाणा के अन्‍य जिलों में वायु प्रदूषण के स्‍तर सम्‍बन्‍धी आंकड़े (Air pollution level data) मौजूद नहीं हैं। यह अध्‍ययन अरबन साइंस ने कराया है।

समस्‍या क्‍या है? what’s the problem?

भारत में खेती का शुद्ध रकबा (Net area of cultivation in India) 141.4 मिलियन हेक्टेयर है। विभिन्न फसलों की कटाई से खेत के अंदर और उनके बाहर भारी मात्रा में कृषि अवशेष (पराली) निकलते हैं। भारत में निकलने वाली पराली की सालाना अनुमानित मात्रा (Estimated annual quantity of straws originating in India) लगभग 60 करोड़ टन है। इसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। यहां कुल बायोमास का 17.9% हिस्सा निकलता है। इसके बाद महाराष्ट्र (10.52%), पंजाब (8.15%), और गुजरात (6.4) प्रतिशत की बारी आती है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल 14 करोड़ टन कृषि अवशेष (Agricultural waste) जलाए जाते हैं। यह पराली खरीफ की फसल की कटाई के दौरान निकलती है। इसे जलाए जाने से उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में जबरदस्त वायु प्रदूषण (air pollution) फैलता है।

एक अनुमान के मुताबिक हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हर साल तीन करोड़ 90 लाख टन भूसा जलाया जाता है।

1980 के दशक के शुरू में फसल उगाने की तर्ज में व्यापक बदलाव और भूगर्भीय जलस्तर में खतरनाक दर से गिरावट साफ नजर आने लगी थी। हालांकि पंजाब ने सूरजमुखी और मक्का की फसलों की खेती को बढ़ावा देकर विविधता लाने की कोशिश की, लेकिन किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के चलन के मद्देनजर धान की रोपाई को तरजीह दी। उसी समय खेती के लिए मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने की नीति (Policy to provide free electricity for farming) की भी खासी आलोचना की गई क्योंकि मुफ्त बिजली मिलने से भूगर्भीय जल का और ज्यादा दोहन होने लगा। पंजाब में एक किलोग्राम चावल पैदा करने के लिए 5337 लीटर पानी की जरूरत होती है। जाहिर है कि पंजाब भूगर्भीय जल का जबरदस्त दोहन कर रहा है।

भूगर्भीय जलस्तर में खासी गिरावट के मद्देनजर राज्य सरकार ने अत्यधिक दोहन में कमी लाने और धान की रोपाई में देर करने के लिए एक प्रशंसनीय नीति लागू करके अप्रैल-मई की छोटी अवधि में उगाई जाने वाली साथी फसल पर रोक लगा दी। पानी बचाने की फौरी जरूरत के मद्देनजर पंजाब और हरियाणा सरकार ने वर्ष 2009 में ‘पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ़ सबसॉयल वॉटर एक्ट(Punjab Preservation of Subsoil Water Act) और ‘हरियाणा प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉयल वाटर एक्ट(Haryana Preservation of Subsoil Water Act) लागू किया। इसके जरिए मानसून की शुरुआत से पहले धान की रोपाई पर प्रतिबंध लगाया गया ताकि भूगर्भीय जल को बचाया जा सके। इन नीतियों की वजह से धान की रोपाई का समय 1 जून से आगे बढ़कर 20 जून हो गया (प्रदेश में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो यह घटकर 13 जून हो गया)। धान की रोपाई में की गई इस करीब एक पखवाड़े की देर से पंजाब ने 2000 अरब लीटर पानी बचाया। धान की रोपाई में एक पखवाड़े की देर से फसल कटाई में निश्चित रूप से विलंब हुआ है लेकिन इससे ऐसे समय में पराली जलाने पर भी रोक लगी है जब दिल्ली एनसीआर के इलाकों में हवा की रफ्तार मद्धिम हो जाती है।

इस बीच, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-कानपुर (Indian Institute of Technology-Kanpur) की अगुवाई में सेटेलाइट डाटा के इस्तेमाल से किए गए एक अध्ययन से यह जाहिर होता है कि पराली जलाने के समय में करीब 10 दिन की देर होने से वर्ष 2016 में मॉनसून के बाद के मौसम में (दिल्ली के ऊपर 3%) हवा की गुणवत्ता को बदतर होने से रोकने में कुछ मदद जरूर मिली (दिल्ली के ऊपर 3%)। हालांकि अगर पराली जलाने के काम को और ज्यादा टाला जाएगा तो दहन स्रोत क्षेत्र (जैसे कि लुधियाना) और दिल्ली के लिए हवा की गुणवत्ता क्रमशः 30% और 4.4% और खराब हो सकती है। पूर्व के वर्षों के हालात, पराली जलाने के समय में बदलाव के पड़ने वाले असर में खासी अंतर वार्षिक परिवर्तनशीलता को उजागर करते हैं। साथ ही पीएम 2.5 के संकेंद्रण की तीव्रता और दिशा (The intensity and direction of concentration of PM 2.5) भी मौसम संबंधी खास हालात पर निर्भर करते हैं, इसलिए मॉनसून के बाद सिंधु गंगा के मैदानों में वायु की गुणवत्ता (Air quality in Indus Ganga plains after monsoon), मौसम विज्ञान और उत्तर-पश्चिमी भारत के खेतों में जलाई जाने वाली पराली की मात्रा के लिहाज से कहीं ज़्यादा संवेदनशील हो जाती है।

आईआईटीके ने यह अध्ययन यूनिवर्सिटी आफ लीसेस्टर, किंग्स कॉलेज लंदन पंजाब विश्वविद्यालय और पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ के सहयोग से कराया है। इस अध्ययन से यह जाहिर होता है कि मौसमी चक्र से इतर जलाई जाने वाली पराली की मात्रा और उसे जलाने के इलाके में पिछले करीब दो दशक के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है। खेती का रकबा बढ़ने के सरकारी आंकड़ों में इसका अक्स नजर आता है। वर्ष 2009 में भूगर्भीय जल संरक्षण नीति (Geological Water Conservation Policy) लागू होने के बाद से कृषि अवशेष या पराली जलाए जाने के काम में देर संभव हुई है और इसकी वजह से भूजल स्तरों पर सकारात्मक असर भी पड़ा है लेकिन जलाई जाने वाली पराली की मात्रा में भी वृद्धि हुई है और मानसून के बाद वायुमंडलीय गतिशीलता से बहुत ज्यादा प्रभावित होने की वजह से इसमें साल दर साल अतिरिक्त बदलाव हो रहा है। हवा की गति बहुत धीमी हो जाने की वजह से मौसमी वायु संचार की रफ्तार बहुत कम हो जाती है जिसकी वजह से वायु को प्रदूषित करने वाले तत्व (Air pollutants) हवा की सतह पर ठहर से जाते हैं और इसी बीच पराली जलाए जाने की वजह से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्व पूरे सिंधु गंगा के मैदान की फिजा में पीएम2.5 की परत चढ़ा देते हैं।

पराली जलाए जाने की समस्या के समाधान के लिए उठाए गए नीतिगत कदम – Policy steps taken to solve the problem of stubble burning

वर्ष 2014 में कृषि मंत्रालय ने नेशनल पॉलिसी फॉर मैनेजमेंट ऑफ क्रॉप रेसिड्यू (-National Policy for Management of Crop Residue– एनपीएमसीआर) नामक नीति बनाई थी और इससे सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा था।

नेशनल पॉलिसी फॉर मैनेजमेंट ऑफ क्रॉप रेसिड्यू के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-

1)- कृषि अवशेषों के अनुकूलतम इस्तेमाल और खेत में ही उनके निस्तारण की प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, 2)- कृषि पद्धतियों के लिए समुचित मशीनरी के उपयोग को बढ़ावा देना, 3)- राष्ट्रीय दूर संवेदी एजेंसी (एनआरएसए) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की मदद से पराली के निस्तारण पर नजर रखने के लिए सेटेलाइट आधारित प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करना और 4)- इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नए विचारों और परियोजना प्रस्तावों के लिए विभिन्न मंत्रालयों में बहु विषयक दृष्टिकोण और फंड जुटाकर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।

आर्थिक मामलों से जुड़ी एक कैबिनेट समिति ने मार्च 2018 में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कृषि अवशेषों के खेत में ही निस्तारण संबंधी कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय सेक्टर स्कीम (Central sector scheme) के तहत 1151.80 करोड रुपए मंजूर किए थे, ताकि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण हो और कृषि मशीनरी पर अनुदान (Grant on Agricultural Machinery) दिया जा सके। इसके परिणामस्वरूप जनवरी 2020 में 16000 ‘हैप्पी सीडर्स’ सामने आए हैं।

हालांकि काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर – Council on Energy, Environment and Water (CEEW) द्वारा कराए गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि हर साल 5683000 एकड़ क्षेत्र में पराली जलाई जाती है और इस रकबे में इस नुकसानदेह गतिविधि को रोकने के लिए करीब 35000 हैप्पी सीडर्स की जरूरत होगी। बहरहाल, कृषि अवशेषों के खेत में ही निस्तारण के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीन के निर्माण का कार्य वर्ष 2018 में मांग के मुकाबले काफी पीछे था। इन मशीनों की कोई मानक किराया दर नहीं है। इसके अलावा ऐसी प्रौद्योगिकियों की  किराया दरें भी  कुछ किसानों के लिये बहुत ऊंची हैं। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसानों के लिए ऐसी मशीनों पर  धन खर्च करना काफी महंगा साबित होता है जिन्हें साल के कुछ ही दिनों में इस्तेमाल किया जाता है और बाकी महीनों में वे बेकार खड़ी रहती हैं।

हालांकि वर्ष 2019 में सरकार की सोच बदली और उसने माना कि सिर्फ प्रौद्योगिकी उपायों से ही पराली जलाए जाने की समस्या से नहीं निपटा जा सकता। पंजाब और हरियाणा में सरकार ने एक नीति बनाई जिसके तहत किसानों को पराली नहीं जलाने और उसका वैकल्पिक तरीके से निस्तारण करने के लिए ढाई हजार रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराने की पेशकश की गई, मगर दुर्भाग्य से यह घोषणा नवंबर के आखिरी हफ्ते में की गई। उस वक्त तक काफी मात्रा में पराली जलाई जा चुकी थी। अनेक पंचायतों ने  इसके दुरुपयोग की शिकायत की जिसके बाद इस साल इस योजना को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।

हैप्पी सीडर्स क्या है – The Happy Seeder is a tractor-mounted machine that cuts and lifts rice straw, sows wheat into the bare soil, and deposits the straw over the sown area as mulch.

नीति विशेषज्ञों द्वारा बार-बार सुझाए जाने वाले दीर्घकालिक समाधान

विशेषज्ञों ने खेती के तौर-तरीके और तर्ज में विविधता लाने और बेतहाशा पानी की जरूरत वाली धान की फसल को छोड़कर मक्का अन्य फसलें उगाने को तरजीह देने की जरूरत पर जोर दिया है। पंजाब ने धान की जगह सूरजमुखी और मक्का की खेती करने की कोशिश की थी मगर यह प्रयोग बेहद अनमने ढंग से किया गया था, लिहाजा नाकाम साबित हुआ। द एनर्जी रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) के एक अध्ययन पत्र में कहा गया है कि सिंधु गंगा के क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों में रोटेशन का पुनर्मूल्यांकन (Revaluation of rotation in crops) करने की जरूरत है। इसके लिए किसानों को धान गेहूं फसल प्रणाली के अलावा अन्य फसल चक्र अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पंजाब और हरियाणा में भूगर्भीय जल संकट (Geological water crisis in Punjab and Haryana) को देखते हुए कृषि विविधीकरण की दिशा में प्रयास जारी हैं। यहां तक कि पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनके राज्य में धान की फसल का कोई भविष्य नहीं है। विविधीकरण की इस कोशिश में कोविड-19 महामारी से पैदा हुई अव्यवस्था (Disorganization caused by COVID-19 epidemic) के कारण और तेजी आई है। जून-जुलाई में धान की रोपाई के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूर उपलब्‍ध न होने की वजह से मक्का और कपास जैसी वैकल्पिक फसलों की खेती के रकबे में और ज्यादा इजाफा हुआ है। इस रूपांतरण को बनाए रखना और इन फसलों को बाजार में न सिर्फ जगह दिलाना बल्कि उनके वाजिब दाम दिलाना भी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। धान की फसल से दूरी बनाने का पैमाना, दायरा और टिकाऊपन भविष्य में पराली जलाए जाने के कारण होने वाले वायु प्रदूषण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण निर्धारक हैं।

टेरी के एक अन्य अध्ययन पत्र ‘अ फिसकली रिस्पांसिबल ग्रीन स्टिमुलस’ में कृषि अवशेषों को बिजली बनाने में इस्तेमाल (Agricultural residues used to make electricity) किए जाने का सुझाव दिया गया है। इससे कृषि अवशेष के रूप में निकलने वाला कचरा एक वस्तु के तौर पर इस्तेमाल होगा और इसे बेचने से मिलने वाली कीमत से किसानों को खेत से पराली निकालने में होने वाले खर्च की भरपाई करने और कुछ पैसे बचाने में भी मदद मिलेगी। इससे खेत में पराली जलाए जाने से छुटकारा मिलेगा। उच्‍चतम न्यायालय ने भी पिछले वर्ष वायु प्रदूषण संकट से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कुछ ऐसा ही सुझाव दिया था। कृषि अवशेषों को बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कोयले के साथ मिलाकर उसके मूल्यवर्धन में प्रयोग किया जा सकता है। इनसे बनने वाली टिकिया (पैलेट) को औद्योगिक बॉयलर (Industrial boiler) में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा इन पैलेट को बिजली उत्पादन के लिए कोयले (ब्रिकेट) के साथ मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) ने बताया है कि 10% से ज्यादा कृषि अवशेषों के ब्रिकेट को कोयले के साथ सफलतापूर्वक मिलाकर बिजली घरों में इस्तेमाल किया जा सकता है। ओपन टेंडर के जरिए पैलेट खरीदने वाले एनटीपीसी (NTPC) ने यह पाया है कि कैलोरीफिक वैल्यू के लिहाज से इन पेलेट्स की कीमत उस कोयले के बराबर ही है जिसे वह बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि कोयले की 10% मात्रा घटाकर उसके स्थान पर कृषि अवशेष से बनने वाले पेलेट्स जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत (Renewable energy source) का इस्तेमाल करने पर उनकी बिजली उत्पादन लागत (Power generation cost) में कोई बढ़ोत्‍तरी नहीं हुई।

इसके अलावा तीसरा सुझाव भी बार बार दिया जाता है, जिसमें ईट भट्ठे जैसी कोयला आधारित औद्योगिक गतिविधियों में कृषि अवशेषों के विकेंद्रीकृत इस्तेमाल (Decentralized use of agricultural residues in coal based industrial activities) की बात कही गई है। भारत में ईंट-भट्ठा उद्योग कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। इसमें सालाना 6 करोड़ 20 लाख टन कोयले का इस्तेमाल होता है। आमतौर पर ईंट-भट्टे ऐसे स्थानों पर स्थित हैं जहां पराली जलाए जाने का चलन सबसे ज्यादा (असम, बिहार, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में देश के 65% हिस्‍से के बराबर ईंटें बनाई जाती हैं) है। ऐसे में अगर ईंट बनाने में कोयले के स्थान पर बायोमास ब्रिकेट का इस्तेमाल किया जाए तो कृषि अवशेषों की बहुत बड़ी मात्रा का सदुपयोग हो सकता है।

कृषि अवशेषों का इस्तेमाल (Use of agricultural residues) बिजली कृषि प्रसंस्करण और ग्रामीण स्तर पर विकेंद्रित कोल्ड स्टोरेज संचालन जैसी ट्रीजनरेशन एप्लीकेशंस के लिए बायोमास गैसीफायर को चलाने में भी किया जा सकता है। इससे किसानों को औद्यानिकी संबंधी फसलों को उगाने का विकल्प भी मिलेगा। अभी तक स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज की सीमित क्षमता की वजह से किसान ऐसी फसलें उगाने से बचते हैं। हालांकि बायोमास आधारित बिजली घरों (Biomass-based power houses) के लिए इस वक्त बाजार टुकड़ों में ही उपलब्ध है। पंजाब में इस वक्त बायोमास पावर प्लांट्स में 10 लाख मैट्रिक टन धान का भूसा इस्तेमाल किया जाता है। यह मात्रा हर साल निकलने वाले एक करोड़ 97 लाख मैट्रिक टन भूसे के मुकाबले काफी कम है।

कागज तथा कार्ड बोर्ड की फैक्ट्रियों में भी धान के भूसे का इस्तेमाल किया जा सकता है।

विशेषज्ञों की राय

काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट वाटर में रिसर्च एनालिस्ट (Research Analyst in Council on Energy Environment Water) कुरिंजी के मुताबिक – पंजाब को पराली जलाने के चलन पर रोक लगाने के लिए बहुआयामी प्रयासों की जरूरत है। सरकार के रिकॉर्ड यह बताते हैं कि वर्ष 2018 में कुल दो करोड़ टन में से सिर्फ 11 लाख टन पराली का ही खेत के अंदर या फिर उसके बाहर निस्तारण किया जा सका था। वर्ष 2019 में सिर्फ 29.2 लाख हेक्टेयर रकबे में ही धान की फसल बोई गई जबकि वर्ष 2018 में यह रकबा 30.42 लाख हेक्टेयर था। पराली जलाने का चलन रोकने के साथ-साथ धान की फसल को छोड़कर अन्य फसलें उगाए जाने से पंजाब में भूगर्भीय जल स्तर में गिरावट की समस्या से निपटा जा सकता है। ऐसे में किसानों को कृषि अवशेषों के निस्तारण में आसानी पैदा करने के लिए अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के साथ-साथ रेंटल मॉडल्‍स को भी प्रोत्साहित करना होगा। इसके अलावा दीर्घकाल में राज्य सरकार को फसल विविधीकरण पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा।

आईआईटी कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के मुखिया और एनसीएपी स्टीयरिंग कमेटी के सदस्य प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी (Professor SN Tripathi, Head of Civil Engineering Department and Member of NCAP Steering Committee at IIT Kanpur) के मुताबिक

‘‘उत्तर भारत खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पराली जलाए जाने के कारण वायु की गुणवत्ता पर पढ़ने वाले दुष्प्रभाव को कम करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की जरूरत है। इसमें किसानों को वैकल्पिक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहन देने और बायोमास के कारोबार में फौरी सुधार लाने की जरूरत है। इसके अलावा गांव के स्तर पर विकेंद्रीकृत बायोमास आधारित ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि करने और वायु प्रदूषण के कारण सेहत को होने वाले नुकसान के बारे में किसानों को बताने के लिए मुस्तैदी  से कदम उठाने की जरूरत है। साथ ही साथ पराली जलाए जाने के खिलाफ कानून भी लागू किया जाना चाहिए। यह कोई विशिष्ट कदम नहीं है और अगर इन्हें साथ-साथ लागू किया जाए तो इनके सकारात्मक नतीजे निश्चित रूप से सामने आएंगे।’’

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो डॉक्टर संतोष हरीश (Fellow Dr. Santosh Harish of Center for Policy Research) के मुताबिक –

‘‘कोविड-19 संक्रमण के हालात बदतर होने के खतरे के मद्देनजर इस साल सर्दियों में वायु प्रदूषण के स्तरों में संभावित बढ़ोत्‍तरी पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा चिंता का सबब है केंद्र तथा राज्य सरकारों को अगले दो महीने के दौरान इस मसले का प्राथमिकता के आधार पर समाधान करना होगा। पंजाब और हरियाणा में हैप्पी सीडर्स जैसे प्रौद्योगिकी उपाय पहले से ही लागू किए जाने के मद्देनजर मुझे उम्मीद है कि इन उपकरणों का पराली जलाने की घटनाओं को न्यूनतम करने में प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा।’’

द डॉक्‍टर्स फॉर क्‍लीन एयर (The doctors for clean air) में भारत के नामी डॉक्‍टर्स के संगठन के मुताबिक जहांवायु प्रदूषण की समस्‍या गम्‍भीर होती है वहां फेफड़ों खासकर बच्‍चों और बूढ़ों के फेफड़े कमजोर हो जाते है, उनके लिये कोविड-19 जानलेवा हो सकता है।

पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ में कम्युनिटी मेडिसिन एंड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर रवींद्र खैवाल (Dr. Ravindra Khaival, Additional Professor in Community Medicine and School of Public Health at PGIMER Chandigarh) के मुताबिक –

‘‘कृषि अवशेषों को थर्मल पावर प्लांट में इस्तेमाल होने वाले कोयले के साथ मिलाया जाए तो यह ऊर्जा मांगों के 10% के बराबर का योगदान कर सकते हैं। चूंकि सरकार द्वारा लिए जाने वाले निर्णय जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पाते इसलिए किसानों को इस समाधान के बारे में जानकारी देने के लिए बहु-हितधारकों के जुड़ाव की जरूरत होगी। पंजाब और हरियाणा की सरकारें हैप्पी सीडर्स को सब्सिडी उपलब्ध कराती हैं लेकिन इससे इन मशीनों की कीमतों में भी साथ ही साथ बढ़ोत्‍तरी होती है, नतीजतन किसानों को सब्सिडी का लाभ कभी नहीं मिल पाता। पंजाब के किसानों ने चेतावनी दी है कि वह पिछले दिनों संसद में विवादास्पद तरीके से कृषि विधेयक पारित कराए जाने के विरोध में इस साल पराली जलाएंगे, लेकिन इससे किसानों समेत हर किसी की सेहत को नुकसान होगा। चीन और इटली में किए गए अध्ययनों से यह जाहिर होता है कि वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का असर कोविड-19 से होने वाली मौतों में वृद्धि के रूप में सामने आ सकता है।

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