आपातकाल की 45वीं बरसी : जेलों में कैद साठ साल से अधिक आयु के कैदियों को अंतरिम ज़मानत या आपातकाल पैरोल दिए जाने की मांग

Justice

45th Anniversary of Emergency: Demand for interim bail or emergency parole to prisoners above sixty years of age in jails

आपातकाल की 45वीं बरसी पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से जेलों के अमानवीय हालात के खिलाफ की कार्रवाई की मांग

देश के विभिन्न संगठनों ने पत्र भेजकर जेलों में कैद साठ साल से अधिक आयु के कैदियों को अंतरिम ज़मानत या आपातकाल पैरोल दिए जाने की मांग की

कोविड-19 के खतरे के मद्देनज़र गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवर राव समेत वरिष्ठ नागरिकों की रिहाई की मांग की

नई दिल्ली, 26 जून 2020. देश के विभिन्न संगठनों ने कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण के मद्देनज़र महाराष्ट्र की जेलों और कथित क्वारंटीन सेंटरों की दुर्दशा पर महराष्ट्र सरकार को पत्र लिखा है।

पत्र में वरिष्ठ मानवाधिकारवादी गौतम नवलखा द्वारा उनकी पत्नी को बताई गई बातों का हवाला देते हुए कहा गया है कि महराष्ट्र की तालोजा, धुले और यरावदा जेलों में 4 संक्रमित कैदियों की मौत हो चुकी है, जेलों में क्षमता से काफी अधिक बंदी कैद हैं। जिससे बंदियों में संक्रमण फैलने का जोखिम बहुत बढ़ जाता है।

पत्र में जनपद रायगढ़ के नामदार कृष्ण गोखले हाई स्कूल स्थित क्वरंटीन सेंटर का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि वहां 350 कैदियों को छः कक्षाओं में भर दिया गया है। सुविधा के नाम पर केवल तीन शौचालय, सात मूत्रालय और एक स्नान गृह जहां बाल्टी और मग तक नहीं है। लोग राहदारी और बरामदे तक में सोने को मजबूर हैं।

पत्र में वरिष्ठ नागरिकों और विभिन्न रोगों से ग्रस्त कैदियों के जीवन के खतरों को रेखांकित करते हुए महाराष्ट्र सरकार से मांग की गई है कि किसी भी अपराध में आरोपित साठ साल से अधिक आयु के कैदियों को आंतरिम ज़मानत या आपातकाल पैरोल दिया जाए। क्वरंटीन सेंटरों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्वारंटीन मानकों को लागू किया जाए और कैदियों के परिजन से नियमित सम्पर्क की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

पत्र का मजमून निम्न है –

माननीय मुख्यमंत्री,

महाराष्ट्र

विषयः महाराष्ट्र की जेलों में अमानवीय हालात के मद्देनज़र तत्काल कार्यवाही की ज़रूरत

महोदय,

आपातकाल की 45वीं बरसी पर, उस दिन को याद करते हुए जब देश पर आपातकाल थोप दिया गया था और राजनीतिक मतभिन्नता रखने वाले हज़ारों लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया था, हम महाराष्ट्र की जेलों और क्वारंटीन केंद्रों के खेदजनक और अत्यंत दयनीय हालात को आपके संज्ञान में लाना चाहते हैं। कुख्यात भीमा कोरेगांव मामले में फ़ँसाए गए राजनीतिक कैदी गौतम नवलखा द्वारा हाल ही में वहां के हालात के बारे में सूचित किया गया था। इस मामले में जो लोग आरोपी बनाए हैं उनमें से गौतम नवलखा और वरवर राव समेत नौ को नवी मुम्बई के तालोजा केंद्रीय कारागार में रखा गया है और दो महिला कैदी बाइकुला जेल में निरुद्ध हैं।

20 जून 2020 को गौतम नवलखा ने टेलीफोन पर क्वारंटीन केंद्र में अपने अनुभव को अपनी पत्नी से साझा किए। उन्होंने सूचना दी कि खारगर (जनपद रायगढ़) स्थित नामदार कृष्ण गोखले हाई स्कूल में लगभग 350 कैदियों को रखा गया था। अधिकांश कैदियों को छः कमरों में ठूँस दिया गया था, वहीं लोग गलियारों और बरामदों में भी सो रहे थे। इससे भी बुरा यह कि 350 कैदियों के लिए मात्र 3 शौचालय, 7 मूत्रालय और 1 स्नान गृह, जिसमें न तो बाल्टी थी और न कोई मग्गा। चूंकि कैदियों को ज़्यादातर बंद रखा जाता था, इसलिए ताज़ा हवा तक उनकी रिसाई नहीं थी, न ही उनके टहलने या शारीरिक व्यायाम के लिए कोई स्थान निर्धारित किया गया था। यह महाराष्ट्र जेल नियमावली का उल्लंघन है, जो प्रति छः कैदियों के लिए कम से कम एक शौचालय और अन्य सुविधाओं समेत पूरी तरह हवादारी का प्रावधान करता है।

यह खौफनाक स्थिति ज़ाहिर करती है कि किस तरह क्वारंटीन केंद्र, जो असल में महामारी से बचने के लिए बनाए गए थे, अब कैदियों में वायरस फैलाने वाले प्रजनन स्थल में परिवर्तित हो रहे हैं और इस तरह जेलों के विसंकुलन के उद्देश्य ही विफल हो रहे हैं। ऐसे में, कैदियों को रिहा करने के बजाए, जेल अधिनियम 1894 की धारा 7 के अंतर्गत राज्य में 36 स्थानों को सरकार द्वारा अस्थाई जेल या क्वारंटीन केंद्र घोषित किया जाना चिंताजनक है। जेल अधिकरियों द्वारा कैदियों को हिरासत में सुरक्षित रखने के संवैधानिक दायित्व का खुलेआम हनन हो रहा है। इसके अतरिक्त, इन केंद्रों के बारे में नियमों और अधिसूचनाओं के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने और नियमित संचार सुविधाओं के अभाव में, यह अस्थाई जेल ऐसी काल-कोठरियाँ बन गए हैं जहां विचाराधीन बंदी अनिश्चित काल के लिए कैद रखे जा रहे हैं।

यह भी पता चला है कि रायगढ़ में इस केंद्र में लोगों को मनमाने ढंग से 14 दिनों की क्वारंटीन अवधि से अधिक रखा जा रहा है क्योंकि तालोजा केंद्रीय कारागार नए कैदियों को समायोजित कर पाने में असमर्थ है।

जानकारी के अनुसार इस जेल में पहले ही क्षमता से 1,000 अधिक कैदी हैं। राज्य में अति भीड़भाड़ वाले आठ जेलों को तालाबंद करना पड़ा है। सामाजिक दूरी के नियमों को लागू करने के लिए जेल की आबादी कम से कम दो-तिहाई घटाने की महाराष्ट्र उच्चाधिकार समिति के निर्णय का इससे दूर-दूर तक भी कोई संकेत नहीं मिलता।

भीमा कोरेगांव मामले में तीन आरोपियों सुरेंद्र गाडलिंग, अरुण फ़रेरा और वरनन गोनसालविज़ को, जो अपनी पैरवी खुद कर रहे हैं, अपने पांच हज़ार पृष्ठों के आरोप पत्र को जेल में रखने की जगह के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। सामान्य रूप से भी, महाराष्ट्र जेल नियमावली हर कैदी के लिए प्रत्येक शयन बैरक में कम से कम 3.71 वर्ग मीटर जगह अनिवार्य बनाती है।

अब जानकारी मिली है कि आर्थर रोड जेल में 158 बंदी कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए हैं। इससे थोड़ा भी संदेह नहीं रह जाता कि सामाजिक दूरी के दिशा-निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है और हिरासत में हज़ारों कैदियों का जीवन दावं पर लगा दिया गया है।

पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (पीआईएल न0 5/2020) मामले में मुम्बई हाई कोर्ट द्वारा की जा रही सुनवाई में अतरिक्त पुलिस महानिदेशक और जेल एवं सुधार सेवाएं महारिनीक्षक द्वारा दाखिल जवाब के अनुसार तालोजा, धुले और येरावदा जेल में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद चार कैदियों की मौत हो गई।

तालोजा जेल में मरने वाले दो कैदियों में से एक डाइबीटीज़ से पीड़ित था। इस जेल में 277 कैदी गंभीर बीमारियों से ग्रसित बताए गए हैं जो राज्य के सभी जेलों में सबसे अधिक संख्या है।

अब यह आम समझ है कि अन्य बीमारियों से ग्रसित व्यक्तियों को कोविड-19 के खिलाफ ख़तरा ज़्यादा है। फिर भी तालोजा जेल में रखे गए और कई बीमारियों से ग्रसित 81 वर्षीय वरवर राव की अंतरिम ज़मानत याचिका मार्च के अंत में खारिज कर दी गई। जेल अधिकारियों द्वारा उनकी मेडिकल रिपोर्ट देरी से जमा करने के कारण एनआईए न्यायालय के सामने उनकी वर्तमान ज़मानत याचिका की सुनवाई में भी विलंब हुआ है।

इसी प्रकार, डाइबीटीज़, हृदय रोग और फेफड़ों से सम्बंधित टीबी के कारण असुरक्षित होने के आधार पर सुधा भारद्वाज की अंतरिम ज़मानत अर्ज़ी भी मई के अंत में खारिज कर दी गई। पहले सुधा की बेटी को लगभग एक महीने तक उनसे बात नहीं करने दिया गया, और फिर जेल अधिकारियों ने ज़मानत का यह कहते हुए विरोध किया कि उनकी हालत “स्थिर’’ है। हालांकि, 67 वर्षीय गौतम नवलखा के मामले में जेल अधिकारियों द्वारा उनके वकील को सूचना दी गई थी कि उनकी कोविड-19 जांच की जा चुकी है और रिपोर्ट नेगेटिव है, लेकिन बाद में उन्होंने अपने परिवार को बताया कि उनकी जांच कभी की ही नहीं गई।

यह बात समझ से परे है कि ऐसे विचाराधीन क़ैदियों, जिन्हें मात्र उनके असुविधाजनक विचारों के लिए कैद किया गया है, को मौत जैसी सज़ा क्यों दी जा रही है।

पीयूसीएल व अन्य की याचिका पर 16 जून को सुनवाई करते हुए मुम्बई हाई कोर्ट ने जेल महानिरीक्षक द्वारा दाखिल रिपोर्ट देखने के बाद महाराष्ट्र की जेलों की बुरी परिस्थितियों पर टिप्पणी की थी। बताये जा रहे हालात गंभीर और तात्कालिक चिंता का स्रोत हैं और राज्य की हिरासत में कैदियों के लिए बीमारी और मौत के खतरे की स्थिति उत्पन्न करते हैं।

इसके लिए हम आप से तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने का अनुरोध करते हैंः

  1. विचाराधीन या दोषी करार दिए जा चुके 60 साल से अधिक आयु वाले और अन्य बीमारियों से ग्रसित कैदियों की आतंरिम ज़मानत या पेरोल का विरोध न किया जाए, चाहे वे किसी भी अपराध के अंतर्गत कैद किए गए हों।
  2. जेलों और सभी क्वरंटीन केंद्रों में बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए सामाजिक दूरी के नियमों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्युएचओ) के दिशा-निर्देशों के अनुसार कड़ाई से लागू किया जाए।
  3. जब तक व्यक्तिगत मुलाकातें शुरू नहीं हो जातीं, तब तक कैदियों और उनके परिजनों व अधिवक्ताओं के बीच फोन और वीडियो कांफ्रेन्सिंग के माध्यम से नियमित और प्रभावी संपर्क सुनिश्चित किया जाए।

25 जून 2020

हस्ताक्षरकर्ताः

  1. आल्टरनेटिव लॉ फोरम, बंगलुरू
  2. एम्नेस्टी इंटरनेशनल, इंडिया
  3. असोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, पंजाब
  4. असोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, पश्चिम बंगाल
  5. सिविल लिबर्टीज़ कमेटी, आंध्र प्रदेश
  6. सिविल लिबर्टीज़ कमेटी, तेलंगाना
  7. ह्युमन राइट्स डिफेंडर्स एलर्ट, इंडिया
  8. जम्मू कश्मीर कोलीशन ऑफ सिविल सोसाइटी, जम्मू एंड कश्मीर
  9. नेशनल एलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट, इंडिया
  10. पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, दिल्ली
  11. प्रिज़ंस फोरम, कर्नाटक
  12. रिहाई मंच, उत्तर प्रदेश
  13. साउथ एशियन राइट्स डॉक्युमेंटेशन सेंटर, दिल्ली
  14. वूमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन, इंडिया

सभ्यता और विकास’ नामक वायरस आदिवासियों को मार रहा है पर वे हैं कि मरते ही नहीं!

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

The virus called ‘civilization and development’ is killing the tribals but they are not dying at all!

करीब दो हफ्ते से हम तराई के गांवों में प्रेरणा अंशु का मई अंक और मास्साब की किताब गांव और किसान लेकर जा रहे हैं। आज घर के कामकाज और आराम की गरज से नहीं निकला।

मैंने पहले ही लिखा है कि जिन गांवों में मेरा बचपन बीता है, जहां कॉलेज के दिनों में मेरा अक्सर डेरा रहता था आंदोलन के साथियों के साथ, उन गांवों में हमारे लिए अब भी उतनी ही मुहब्बत है, इसका अहसास मुझे हैरान कर रहा है।

डीएसबी में पढ़ते हुए या कोलकाता तक नौकरी करते हुए कभी नैनीताल मेरा होम टाउन हुआ करता था। पहाड़ के गांवपन में छात्र जीवन में नैनीताल समाचार लेकर खूब घूमता रहा हूँ। अब नैनीताल दूर किसी दूसरे अंतरिक्ष में बसा लगता है। गिरदा और दूसरे साथियों के बिना पहाड़ अब अनजाना सा लगता है।

तराई के हर गांव में मेरे प्रवास के दैरान कई पीढ़ियां बदल गई हैं। पुराने साथियों, दोस्तों में बहुत कम लोग बचे हैं। लेकिन वे मुझे भूले नहीं हैं। जो लड़कियां दिनेशपुर स्कूल में मुझसे नीचे की कक्षाओं में पढ़ती थीं, जिन्हें कभी मैं जाना ही नहीं, अब बूढ़ी हो गई हैं। जहां भी जा रहा हूँ, वे चली आती हैं और उन दिनों के याद से मुझे जोड़ती हैं।

भूले बिसरे दिनों की सुलगती यादों के दरम्यान एक गंगा सी भी निकलती है हर गांव में।

मास्साब को हर गांव में लोग जानते हैं।

हर गांव में पुलिनबाबू अभी ज़िंदा हैं।

उनके सारे रिश्ते और उनकी सारी गतिविधियों के बीच लोग हमें भी शामिल मान रहे हैं।

विकास और मै, विकास रूपेश और मैं, मैं और रूपेश, रवि और विकास, विकास और असित अलग-अलग टीम बनाकर गांव गांव जा रहे हैं।

शाम सात बजे तक लौटना होता है।

कोरोना काल है।

सरकारी कोरोना दिशा निर्देश भी मानने होते हैं।

रोज़ी रोटी का अभूतपूर्व संकट है।

कारोबार ठप है।

युवा नौकरी से बेदखल हैं।

प्रवासी मज़दूर क्वारंटाइन सेंटरों में हैं।

ऐसे माहौल में बुनियादी मुद्दों और जरूरतों के अलावा तराई बसने की कथा, पुराने दिनों की याद में डूबे स्त्री पुरुष की गर्मजोशी और बेइंतहा प्यार से सम्मोहित हूँ।

हम दिनेशपुर, गदरपुर, गूलरभोज और रुद्रपुर के गांवों में घूम चुके हैं। आगे यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा।

रूपेश ने रोविंग रीपोर्टिंग का सिलसिला शुरू कर दिया है।

गावों से ही देश, प्रकृति और पृथ्वी को बचाने का रास्ता निकलेगा।

मास्साब और पुलिनबाबू दोनों यही कहते थे कि राजधानियों के मठों से नहीं, गांवों के मेहनतकश किसानों और मज़दूरों के मजबूत हाथों से ही बदलाव का रास्ता निकलेगा।

धूल और कीचड़, खड्डों से लबालब, खेतों की हरियाली से सरोबार जंगल की आदिम गन्ध से लिपटा उस सड़क की खुशबू हमें गांव-गांव खींचकर ले जा रही है।

चंडीपुर के सन्यासी मण्डल तराई बसाने वाले लोगों की पीढ़ी से हैं। हाल में उनके बेटे का निधन हुआ है। फिर भी अद्भुत जोश हैं उनमें। कहते हैं, फिर आना पूरे इलाके के लोगों को बुला कर बात करेंगे।

गूलर भोज लालकुआं रेल लाइन के पास बुजुर्ग गणेशसिंह रावत ने तराई बसने की कथा सिलसिलेवार बताई और पंडित गोविंद बल्लभ पंत, जगन्नाथ मिश्र और पुलिनबाबू को तराई बसाने का श्रेय दिया।

हरिपुरा में मेरे बचपन के दोस्त राम सिंह कोरंगा और उनके छोटे भाई मानसिंह मिले। उनका बड़ा भाई मोहन मेरा खास दोस्त था,जो याब नहीं हैं। उनके पिता नैन सिंह  दिनेशपुर हाईस्कूल में हमारे गुरुजी और पुलिनबाबू उनके मित्र थे। राम सिंह के घर मास्साब और पुलिनबाबू जब तब पहुंच जाते थे। मेरा भाई पद्दोलोचन भी मास्साब के साथ थारू बुक्सा और तराई के गांव-गांव घूमता रहा है।

दिनेशपुर, बाजपुर, गदरपुर और रूद्रपुर पोस्ट आफिस के पोस्ट मास्टर समीर राय ने रुद्रपुर के नन्दबिहार के अपने घर में हमसे कहा, पुलिनबाबू और मास्साब कहाँ नहीं जाते थे, यह पूछो।

समीर ने प्रेरणा अंशु का आजीवन सदस्यता शुल्क दो हजार रुपये तुरन्त दे दिए। उसके बड़े भाई बिप्लव दा का निधन गांव हरिदास पुर में हुआ तो मैं और रूपेश पहले घर  गए, फिर श्मशानघाट। हम तेरहवीं में भी उनके साथ थे।

गांव सुंदरपुर में तराई बसाने वालों में सबसे खास राधाकांत राय के बेटे प्रदीप राय से बातचीत हुई। तराई में जनता के हक़हकूक के लिए आंदोलन करने वाली उदवास्तु समिति के अध्यक्ष थे राधाकांत बाबू, जो अपढ़ अपने साथियों में एकमात्र पढ़े लिखे थे। पुलिनबाबू तब समिति के महासचिव थे और वे कक्षा दो तक पढ़े थे।

राधाकांतबाबू के छोटे भाई हेमनाथ राय अभी नहीं हैं, जिनसे मेरी बहुत घनिष्ठता थी।

सुन्दरपुर से दिनेशपुर हाई स्कूल में सबसे ज्यादा लड़के पढ़ते थे, जिनमें जगदीश मण्डल बागेश्वर से सीएमओ पद से हाल में रिटायर हुए। कमल कन्नौज के एसीएमओ है।

ननीगोपाल राय बहुत बीमार हैं। उनसे मिलने गए तो पता चला उनके बड़े भाई डॉ फणीभूषन राय का निधन हो गया।

राधकांतपुर नें तराई नें बसे बंगालियों में पहले ग्रेजुएट रोहिताश्व मल्लिक घर में अकेले थे। लेकिन उन्होंने हमें बिठाया और सिलसिलेवार बात की। वे तराई की बसावट के चश्मदीद गवाह हैं।

लक्खीपुर में तराई बसाने वालों में खास हरिपद मास्टर के घर गए। उनके बेटे दिवंगत अमल दा सरपंच थे।

हरिपद मास्टर जी के बेटे पीयूष दा 77 साल के हैं और बचपन से हमारे वैचारिक मित्र हैं। वहीं मुहम्मद शाहिद से मुलाकात हो गई। वह भी हमारा वैचारिक साथी है। उसके साथ अलग से गांवों में निकलना है।

लक्खीपुर से प्रफुल्लन गर गए। शिवपद जी पुराने मित्र निकले। फिर दीपक चक्रवर्ती के घर गये। उनकी बेटी अंकिता ने बारहवीं में उत्तराखण्ड टॉप किया था और इस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। विज्ञान पर शोध करना चाहती है लेकिन कविता भी लिखती है।

दीपक के घर मेरे गांव की शीला करीब चालीस साल बाद मिली। वहां महिलाओं से खूब बातें हुईं।

सर्वत्र प्रेरणा अंशु और गांव और किसान का स्वागत हुआ। किताब को लेकर बुजुर्गों में ज्यादा गर्मजोशी है। सबने किताब के सौ-सौ रुपये दिए।

पूर्वी बंगाल में पाकिस्तानी सैन्य दमन से पहले प्रोफेसरों, पत्रकारों, साहित्यकारों और छात्रों को उनके विश्वविद्यालयों और हॉस्टलों के साथ टैंक की गोलाबारी से उड़ाया गया था। हमारे यहां क्या आगे वही होना है?

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता व पत्रकार गौतम नवलखा की भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ़्तारी से कैसे जूझ रही हैं उनकी जीवन साथी सहबा हुसैन, यह जानने के लिए वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह पहुंची उनके घर। बातचीत में सहबा ने बताया कि आज UAPA को तमाम एक्विस्टों पर जिस तरह से लगाया जा रहा है, उससे लगता है कि यह एक नया औज़ार मिल गया है असहमति के स्वर को कुचलने का। साथ ही उन्होंने कहा कि गौतम सहित बाक़ी तमाम 11 लोगों की रिहाई के लिए बड़ा आंदोलन करना होगा। इस पर भाषा सिंह का वीडियो साझा कर चुका हूं।

एके पंकज के शब्दों में

तीन हजार साल से

‘सभ्यता और विकास’ नामक वायरस

आदिवासियों को मार रहा है

पर वे हैं कि मरते ही नहीं!

पलाश विश्वास

ट्रम्प और मोदी में फर्क क्या है? जुमला और झूठ और फरेब का मनुस्मृति एजेंडा कोरोना संकट की आड़ में लागू किया जा रहा है

Namaste Trump

सविता जी नाराज हो रही थी। डॉ. आनंद तेलतुंबडे जैसे विशुद्ध अम्बेडकरवादी अम्बेडकर परिवार के सदस्य और गौतम नौलखा जैसे प्रतिबद्ध पत्रकार की गिरफ्तारी (The arrest of Dr. Anand Teltumbde and Gautam Navlakha) का कहीं कोई विरिध नहीं हो रहा है। कोरोना के बहाने गरीब मेहनतकश जनता को मारने का चाक चौबंद इंतज़ाम हो गया। आप लोग लिखकर क्या कर लेंगे? दस बीस लोग भी नहीं पढ़ते।

कोलकाता में रहते हुए आनंद तेलतुंबड़े से अम्बेडकर मिशन और विचारधारा पर रोज़ घण्टों बात (Talk to Anand Teltumbde on Ambedkar mission and ideology) होती थी।

जनसत्ता के सारे साथी जानते है। पर हम सही तरीके से आवाज़ भी नहीं उठा सके। बेहतर होता कि उनके साथ हम भी गिरफ्तार कर लिए जाते। लिखने की नपुंकसता से ऐसा फिर भी बेहतर होता।

वर्ष 2020 में भारत की विकास दर (India’s growth rate in the year 2020) शून्य होने की आशंका जताई जा रही है। कृषि विकास दर (Agricultural growth rate) दशकों से लगातार गिर रही है। अब तो औद्योगिक उत्पादन दर भी शून्य होने को है।

कोरोना के कहर से बढ़कर भुखमरी, बेरोज़गारी और दूसरी बीमारियों से भारी संख्या में लोगों के मारे जाने का अंदेशा है। कृषि के साथ उद्योग धंधे, कारोबार, बाज़ार, दफ्तर सब कुछ बन्द और जनजीवन ठप हो जाने से इस आपदा से निबटने और जनता की मदद के लिए सरकारी खजाना खाली है।

ऐसे में एक खबर पढ़कर खुद को रोक नहीं पा रहा।

लिखना ही पढ़ रहा है।

खबर है कि मोदी जी के मित्र ने भारत को इस ग्लोबल कोरोना संकट से निबटने के लिए मदद नहीं बल्कि, भारत को 1100 करोड़ की मिसाइलों की बिक्री को मंजूरी दी है।

अमेरिका में अभी कोरोना से 26 हजार लोगों की मौत की खबर है। करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए हैं।

आप जब दुनिया के सारे देश कोरोना संक्रमण से ज़िंदगी की  निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं, जब समूची मनुष्यता खतरे में है, सभ्यता खतरे में है तो विश्व भर में स्वास्थ्य के लिए काम कर रहे संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन को ट्रम्प ने मदद बन्द कर दी है।

यह भी पढ़ें – Are Ventilators Killing More People Than They’re Saving??

चीन से कोरोना वायरस के फैलने की खबर छुपाने के डब्ल्यूएचओ पर आरोप लगाकर अपनी गलती और लापरवाही छुपाने के लिए ट्रम्प ने ऐसा किया है। जिसकी दुनियाभर में निंदा हो रही है, पर हमारे हुक्मरान ऐसे मौके पर उनके साथ हथियारों का सौदा तय कर रहे हैं।

बिल्कुल कृष्ण सुदामा की दोस्ती है यह।

डॉ पार्थ बनर्जी ने कुछ देर पहले न्यूयार्क से लिखा है कि कोरोना की जांच नही हो रही है। संक्रमितों और मृतकों की जानकारी छुपाई जा रही है। इस पर तुर्रा यह कि ट्रम्प पूंजी और कारपोरेट हित में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए दो लाख लोगों के मरने की आशंका मानते हुए भी लॉक डाउन खत्म करने की सोच रहे हैं।

न बीमार लोगों के इलाज का इंतज़ाम है और न बेरोज़गार भूखे लोगों की कोई चिंता।

हथियार, युद्ध और गृहयुद्ध उद्योग बदस्तूर जारी है और इसलिये मिसाइलें भारत को बेची जा रही हैं।

ट्रम्प और मोदी में फर्क क्या है? | What is the difference between Trump and Modi?

भारत में भी न जांच हो रही है और न हालात पर नियंत्रण की कोई कारगर कोशिश, न अर्थव्यवस्था की चिंता, न किसानों मजदूरों आम नागरिकों की परवाह, न भूख और बेरोज़गारी से निपटने की पहल।

जुमला और झूठ और फरेब का मनुस्मृति एजेंडा कोरोना संकट की आड़ में लागू किया जा रहा है, बजरंगी सेना और गोदी मीडिया की मदद से फ़िज़ा में नफरत और हिंसा का ज़हर घोलकर।

ट्रम्प भी ठीक यही कर रहे हैं अमेरिका और अमेरिकी जनता के साथ।

सही मायने में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

दोनों एक दूसरे के मित्र हैं।

AMBEDKAR JAYANTI : Defend freedom of expression and respect individuals to build Fraternity

अब कोरोना का जो वैक्सीन 21 अमेरिकी कम्पनियां तैयार कर रही हैं, ज़ाहिर हैं कि उनका बाजार भी भारत ही होगा।

कल हमने पुण्य प्रसून वाजपेयी का भारत में स्वास्थ्य पर लाखों कागजी योजनाओं और इसके लिए वैश्विक संस्थाओं की ओर से मिले लाखों करोड़ की मदद की बन्दर बांट की वीडियो रिपोर्ट शेयर की थी।

भारत हेल्थ हब है। स्वास्थ्य का बाजार है भारत।

इसीलिए हर किस्म की बीमारी यहां महामारी है।

कोरोना से बड़ी बीमारी तो गरीबी, बेरोज़गारी और भुखमरी है। कोरोना से बच भी गए तो भुखमरी, बेरोज़गारी और गरीबी से बच नहीं सकते।

पीएम ने बुजुर्गों की इज़्ज़त करने की बात कही है।

सरकार बुजुर्गों के लिए क्या कर रही है?

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।

जो गाइड लाइन आज 20 अप्रैल को छूट देने के लिए जारी की गई है, किसानों मजदूरों को राहत दिए बिना उसमें अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने की अगर आप उम्मीद करते हैं तो कीजिये। हम नहीं करते।

अमेरिका की तरह भारत में भी रोज़गार खत्म करना, किसानों मजदूरों को भुखा मारना, दलितों और आदिवासियों, गैर नस्ली गैर हिन्दू नागरिकों का दमन राजकाज और राष्ट्रवाद दोनों हैं।

न्यूयॉर्क से डॉ. पार्थ बनर्जी ने लिखा है –

It is shameful that to avoid political embarrassment, they are not testing new patients for Coronavirus, flouting laws. And they are hiding the real numbers. This criminal negligence and hiding of facts will explode COVID-19. This is unthinkable.

पलाश विश्वास