जीवाश्म ईंधन का जलना प्रति मिनट 13 मौतों का बनता है कारण, वायु प्रदूषण के साथ दहका रहा है जलवायु परिवर्तन की आग

Climate change Environment Nature

Burning of fossil fuels causes 13 deaths per minute

कोविड से उबरने के लिए WHO ने किये जलवायु कार्रवाई के दस आह्वान, बड़ी स्वास्थ्य आपदा को टालने के लिए वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल ने किया वैश्विक कार्रवाई का आग्रह

नई दिल्ली, 12 अक्तूबर 2021. यदि देशों को COVID-19 महामारी (COVID-19 pandemic) से स्वस्थ और पर्यावरण अनुकूल रूप से उबरना है, तो उन्हें महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को निर्धारित करना चाहिए।

ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र के ग्लासगो में होने वाले जलवायु महासम्मेलन के पहले डब्ल्यूएचओ COP26 जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य पर कल जारी हुई विशेष रिपोर्ट जलवायु और स्वास्थ्य के बीच संबंध स्थापित करने वाले अनुसंधान के आधार पर जलवायु कार्रवाई के लिए वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय की रणनीति का वर्णन करती है।

रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक ट्रेडोस अदनोम घेबियस (Tedros Adhanom Ghebreyesus, Director General of the World Health Organization (WHO)) कहते हैं,

“कोविड-19 महामारी ने मनुष्यों, जानवरों और हमारे पर्यावरण के बीच घनिष्ठ और नाजुक संबंधों पर प्रकाश डाला है। जो अस्थिर विकल्प हमारे ग्रह को मार रहे हैं, वही लोगों को मार रहे हैं। डब्ल्यूएचओ सभी देशों से ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए COP26 पर निर्णायक कार्रवाई करने का आह्वान करता है – सिर्फ इसलिए नहीं कि यह करना सही है, बल्कि इसलिए कि यह हमारे अपने हित में है। डब्ल्यूएचओ की नई रिपोर्ट लोगों के स्वास्थ्य और हमें बनाए रखने वाले ग्रह की सुरक्षा के लिए 10 प्राथमिकताओं पर प्रकाश डालती है।”

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट उस वक़्त आई है जब एक खुले पत्र के रूप में वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल के दो तिहाई से अधिक सदस्य संस्थाओं के हस्ताक्षर हैं। इस पत्र के माध्यम से दुनिया भर में कम से कम 45 मिलियन डॉक्टरों और स्वास्थ्य पेशेवरों का प्रतिनिधित्व करने वाले 300 संगठन, राष्ट्रीय नेताओं और COP26 देश के प्रतिनिधिमंडलों से जलवायु कार्यवाई को बढ़ाने के लिए कहते हैं।

स्वास्थ्य पेशेवरों के पत्र में लिखा है,

“जहां भी हम दुनिया भर में अपने अस्पतालों, क्लीनिकों और समुदायों में देखभाल करते हैं, हम पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का जवाब दे रहे हैं। हम हर देश के नेताओं और COP26 में उनके प्रतिनिधियों से ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 ° C तक सीमित करके आसन्न स्वास्थ्य तबाही को रोकने और मानव स्वास्थ्य और इक्विटी को सभी जलवायु परिवर्तन शमन और अनुकूलन कार्यों के लिए केंद्रीय बनाने का आह्वान करते हैं।”

Changes in weather and climate are threatening food security

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट और यह खुला पत्र तब आ रहे हैं जब अभूतपूर्व चरम मौसम की घटनाओं के रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं। गर्मी की लहरें, तूफान और बाढ़ जैसी लगातार बढ़ती मौसम की घटनाएं, हजारों लोगों की जान ले लेती हैं और लाखों लोगों के जीवन को बाधित करती हैं, जबकि स्वास्थ्य प्रणालियों और सुविधाओं को सबसे ज्यादा जरूरत पड़ने पर खतरे में डाल देती हैं। मौसम और जलवायु में परिवर्तन से खाद्य सुरक्षा को खतरा हो रहा है और भोजन, पानी और मलेरिया जैसी वेक्टर जनित बीमारियों को बढ़ावा मिल रहा है, जबकि जलवायु प्रभाव भी मानसिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

मानवता के सामने सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा है जलवायु परिवर्तन

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “जीवाश्म ईंधन का जलना हमें मार रहा है। जलवायु परिवर्तन मानवता के सामने सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा है। जबकि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों से कोई भी सुरक्षित नहीं है, वे सबसे कमजोर और वंचितों द्वारा असमान रूप से महसूस किए जाते हैं। ”

इस बीच, वायु प्रदूषण, मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के जलने का परिणाम है, जो जलवायु परिवर्तन को भी प्रेरित करता है, और दुनिया भर में प्रति मिनट 13 मौतों का कारण बनता है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऊर्जा, परिवहन, प्रकृति, खाद्य प्रणाली और वित्त सहित हर क्षेत्र में परिवर्तनकारी कार्रवाई की आवश्यकता है। और यह स्पष्ट रूप से बताता है कि महत्वाकांक्षी जलवायु कार्यों को लागू करने से सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ लागत से कहीं अधिक है।

पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के डब्ल्यूएचओ निदेशक डॉ मारिया नीरा ने कहा,

“यह कभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है कि जलवायु संकट सबसे जरूरी स्वास्थ्य आपात स्थितियों में से एक है जिसका हम सभी सामना करते हैं।” उदाहरण के लिए, वायु प्रदूषण को डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों के स्तर तक लाने से, वायु प्रदूषण से होने वाली वैश्विक मौतों की कुल संख्या में 80% की कमी आएगी, जबकि जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नाटकीय रूप से कमी आएगी। डब्ल्यूएचओ की सिफारिशों के अनुरूप अधिक पौष्टिक, पौधे आधारित आहार में बदलाव, एक अन्य उदाहरण के रूप में, वैश्विक उत्सर्जन को काफी कम कर सकता है, अधिक लचीला खाद्य प्रणाली सुनिश्चित कर सकता है, और 2050 तक एक वर्ष में 5.1 मिलियन आहार से संबंधित मौतों से बच सकता है।

पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने से वायु गुणवत्ता, आहार और शारीरिक गतिविधि में सुधार के साथ-साथ अन्य लाभों के कारण हर साल लाखों लोगों की जान बच जाएगी। हालाँकि, वैश्विक स्तर पर जलवायु निर्णय लेने की अधिकांश प्रक्रिया फ़िलहाल इन स्वास्थ्य सह-लाभों और उनके आर्थिक मूल्यों का आकलन नहीं करती।

139 मिलियन से अधिक लोग जलवायु संकट और कोविड-19 की चपेट में : नया विश्लेषण

climate change

More than 139 million people hit by climate crisis and COVID-19, new IFRC analysis reveals

न्यूयॉर्क, जिनेवा, 18 सितंबर 2021: इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, चरम मौसम की घटनाओं और महामारी ने एक साथ लाखों लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनका कहना है कि जलवायु और कोविड संकट के संयोजन ने रिलीफ़ (राहत-सहायता प्रतिक्रिया) प्रयासों में बाधा डालने के साथ-साथ अभूतपूर्वमानवीय ज़रूरतें पैदा की हैं।

IFRC की रिपोर्ट के अनुसार, 140 मिलियन लोग – रूस की लगभग पूरी आबादी के बराबर – महामारी के दौरान बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग से प्रभावित हुए हैं। 65 से अधिक या पांच साल से कम उम्र के 660 मिलियन लोग हीटवेव (गर्मी की लहर) की चपेट में आ गए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का लगभग दोगुना है।

The paper also highlights the need of addressing both crises simultaneously as the COVID-19 pandemic has affected livelihoods across the world and has made communities more vulnerable to climate risks.

कोविड की चपेट में आने के बाद से सबसे घातक घटना (जिसके लिए डाटा उपलब्ध है) पश्चिमी यूरोप में 2020 की हीटवेव थी, जिसमें बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और यूके में 11,000 से अधिक मौतें हुईं। जबकि भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 20.6 मिलियन लोगों को प्रभावित करने वाली महामारी के दौरान चक्रवात अम्फान ने सबसे गंभीर जलवायु संकट बनाया। हीटवेवों ने शीर्ष तीन सबसे घातक घटनाओं में से दो को बनाया, और आज होने वाली हर हीटवेव जलवायु परिवर्तन से अधिक संभावित और अधिक तीव्र हो जाती है। जून 2020 में आई बाढ़ से भारत में क़रीब 2000 लोग प्रभावित हुए थे।

The compound impact of extreme weather events and COVID-19

वैज्ञानिक घटना एट्रिब्यूशन अध्ययनों में पाया गया है कि ग्लोबल हीटिंग ने कई विशिष्ट घटनाओं को शक्तिशाली, लंबा या अधिक संभावित बना दिया। कुछ घटनाएं – जैसे कि प्रशांत नॉर्थवेस्ट में 2021 हीटवेवजलवायु परिवर्तन के बिना दुनिया में लगभग असंभवहोती।

जलवायु परिवर्तन मौजूदा संवेदनशीलताओं और खतरों को बदतर बना देता है, और इसने विशेष रूप से उन लोगों को प्रभावित किया है जो पहले से ही महामारी की वजह से संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, सीरिया और इराक़ में जारी सूखा पानी की उपलब्धता और बिजली आपूर्ति दोनों को कम कर रहा है क्योंकि जलविद्युत बांध सूख जाते हैं, जिससे स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवा प्रभावित होती है। होंडुरास और दक्षिण एशिया में तूफ़ान के दौरान, रिलीफ़ (राहत-सहायता) कार्यों को अपने घरों से भागने वालों के लिए अतिरिक्त सार्वजनिक आश्रयों की तलाश करनी पड़ी ताकि सामाजिक दूरी को बनाए रखा जा सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य जगहों पर जंगल की आग से होने वाले धुएं ने लोगों के फेफड़ों को परेशान कर दिया और इससे कोविड के मामलों और कोविड से होने वाली मौतों में वृद्धि हुई।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) का कहना है कि समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रति एडाप्ट होने के लिए और अधिक सहायता की आवश्यकता है, और यह कि जलवायु और महामारी को एक साथ संबोधित करने से आर्थिक रूप से अधिक लचीली रिकवरी होगी।

कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से, जलवायु संबंधी आपदाओं ने कम से कम 139.2 मिलियन लोगों के जीवन को प्रभावित किया है और यह 17,242 से अधिक लोगों की मौत का कारण बनी हैं।

यह एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं और कोविड-19 के मिश्रित प्रभावों पर यह इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) और रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर द्वारा आज प्रकाशित एक नए विश्लेषण की खोज है। और अनुमानित 658.1 मिलियन लोग अत्यधिक तापमान के संपर्क में आए हैं। नए डाटा और विशिष्ट केस स्टडीज़ के माध्यम से, रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे दुनिया भर में लोग कई संकटों का सामना कर रहे हैं और ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संवेदनशीलताओं से जूझ रहे हैं।

पेपर दोनों संकटों को एक साथ संबोधित करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है क्योंकि कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में आजीविका को प्रभावित किया है और समुदायों को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है।

The world is facing an unprecedented humanitarian crisis where the climate change and COVID-19 are pushing communities to their limits

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के अध्यक्ष, फ्रांसेस्को रोक्का (The IFRC President, Francesco Rocca), जिन्होंने बीती 16 दिसंबर को न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई रिपोर्ट पेश की, ने कहा:

“दुनिया एक अभूतपूर्व मानवीय संकट का सामना कर रही है जहाँ जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 समुदायों को उनकी सीमा तक धकेल रहे हैं। COP26 के होने तक के समय में, हम विश्व के नेताओं से न केवल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए, बल्कि जलवायु परिवर्तन के मौजूदा और होनेवाला मानवीय प्रभावों को सम्भोदित करने के लिए भी तत्काल कार्रवाई करने के लिए आग्रह करते हैं।”

रिपोर्ट कोविड-19 संकट के दौरान हुई एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं के ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) जोखिमों के प्रारंभिक विश्लेषण[1] के एक साल बाद आई है। महामारी का कहर दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों के साथ जारी है, लेकिन साथ ही बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष प्रभाव भी है, जो थोड़ा-बहुत महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए प्रतिक्रिया उपायों के कारण है। मौसम की एक्सट्रीम (चरम सीमा) के कारण होने वाली खाद्य असुरक्षा को कोविड-19 ने और बढ़ा दिया है। स्वास्थ्य प्रणालियों को उनकी सीमा तक धकेल दिया गया है और सबसे संवेदनशीलत लोगों को ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) सदमों का सामना करना पड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

अफ़ग़ानिस्तान में, भीषण सूखे के प्रभाव संघर्ष और कोविड-19 के कारण और भी बढ़ गए हैं। सूखे ने कृषि खाद्य उत्पादन को अशक्त बना दिया है और पशुधन को कम कर दिया है, जिससे लाखों लोग भूखे और कुपोषित रह गए हैं। अफ़ग़ान रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने सहायता बढ़ाई है, जिसमें लोगों के खाद्य आपूर्ति खरीदने के लिए भोजन और नकद सहायता, सूखा-प्रतिरोधी खाद्य फसलें लगाने और अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए सहायता शामिल है।

होंडुरास में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

होंडुरास में, महामारी के दौरान तूफ़ान एटा और आइओटा का सामना करने में, का मतलब अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना भी था। अस्थायी आश्रयों में हजारों लोग बेघर हो गए। उन आश्रयों में एंटी-कोविड-19 उपाय कार्यवाही के लिए शारीरिक दूरी और अन्य सुरक्षात्मक उपायों की आवश्यकता थी, जिनसे क्षमता सीमित हुई।

केन्या में, कोविड-19 के प्रभाव एक साल में बाढ़ और अगले साल सूखे के साथ-साथ टिड्डियों के प्रकोप से टकरा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 2.1 मिलियन से अधिक लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। देश में और पूर्वी अफ्रीका के पार, कोविड-19 प्रतिबंधों ने बाढ़ का सामना करने की सहायता प्रतिक्रिया और प्रभावित आबादी तक आउटरीच को धीमा कर दिया जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ गई।

IFRC (आईएफआरसी) के बारे में

IFRC दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय नेटवर्क है, जिसमें 192 नेशनल रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसाइटी शामिल हैं, जो दुनिया भर में लोगों की जान बचाने और सम्मान को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

दुनिया भर में रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसायटीयां न केवल उन ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संकटों की प्रतिक्रिया में सहायता दे रही हैं बल्कि समुदायों को जलवायु जोखिमों के लिए तैयार करने और उनका अनुमान लगाने में भी मदद कर रही हैं।

उदाहरण के लिए बांग्लादेश में, रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के नामित धन का उपयोग बाढ़ से संबंधित अर्ली वार्निंग मेसेजेस (पूर्व चेतावनी संदेशों) को लाउडस्पीकर के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रसारित करने के लिए किया है ताकि लोग आवश्यक उपाय कार्यवाही कर सकें और यदि आवश्यक हो तो इवैक्यूएट (इलाक़ा ख़ाली) कर सकें।

RCRC (आरसीआरसी) क्लाइमेट सेंटर की एसोसिएट डायरेक्टर जूली अरिघी ने कहा :

“खतरों को आपदा बनने की ज़रूरत नहीं है। अगर हम स्थानीय स्तर पर संकटों की आशंका, शीघ्र कार्रवाई और जोखिम में कमी लाना जैसे करते हैं इसे बदलते हैं तो हम बढ़ते जोखिमों की प्रवृत्ति का मुक़ाबला कर सकते हैं और जीवन बचा सकते हैं। अंत में, हमें समुदायों को अधिक लचीला बनने में मदद करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से सबसे संवेदनशील संदर्भों में।”

कोविड-19 महामारी का जलवायु जोखिमों पर अधिक देर तक रहने वाला प्रभाव पड़ा है। सरकारों को सामुदायिक एडाप्टेशन, प्रत्याशा प्रणाली और स्थानीय अभिनेताओं में निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध होने की ज़रुरत है।

कोविड-19 रिकवरी में बड़े पैमाने पर खर्च यह साबित करता है कि सरकारें वैश्विक खतरों का सामना करने के लिए तेज़ी से और प्रबलतीव्र रूप से कार्य कर सकती हैं। यह शब्दों को क्रिया में बदलने और उसी ताक़त को जलवायु संकट के लिए समर्पित करने का समय है। हर दिन, हम मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देख रहे हैं। जलवायु संकट यहाँ है, और हमें अभी कार्य करने की आवश्यकता है,” रोक्का ने कहा।

मौसम बदल गया है, हमेशा के लिए

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रॉक्सी मैथ्यू कोल

लगभग हर सात साल में, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) द्वारा इसपर एक रिपोर्ट जारी की जाती है कि कैसे मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बढ़ रही है और इसकी वजह से चरम मौसम की घटनाएं हमारे दरवाजों पर दस्तक दें रही हैं। तो, 9 अगस्त 2021 को जारी IPCC की छठी असेसमेंट रिपोर्ट में नया क्या है?

इस रिपोर्ट से मुख्य निष्कर्ष यह है कि पेरिस समझौते के माध्यम से राष्ट्रों द्वारा प्रस्तुत मिटिगेशन रणनीतियाँ वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C या 2°C भी की सीमा के भीतर रखने के लिए अपर्याप्त हैं। यह भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि विश्व स्तर पर, हम उत्सर्जन पर प्रतिबद्ध प्रतिबंधों के क़रीब भी पहुंचने में विफल रहे हैं। यह इस भयानक तथ्य की ओर इशारा करता है कि हम निकट भविष्य में और अधिक चुनौतीपूर्ण जलवायु चरम स्थितियों का सामना करने जा रहे हैं। IPCC रिपोर्ट हमें बताती है कि इनमें से कुछ बदलाव अपरिवर्तनीय हैं, और यदि भविष्य में कुछ हज़ार साल तक नहीं तो सदियों तक तो रहेंगे।

तापमान वृद्धि को 1.5°C के भीतर सीमित करना क्यों आवश्यक है? वर्तमान में, वैश्विक औसत तापमान वृद्धि 1.1°C है और भारत जैसे देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं जहां हम पहले से ही चक्रवात, बाढ़, सूखा और हीट-वेव जैसी गंभीर मौसम की घटनाओं की बढ़ती संख्या का सामना कर रहे हैं। भारत विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील क्यों है? भारत का भूगोल ऐसा है कि यह तीनों तरफ हिंद महासागर के गर्म उष्णकटिबंधीय पानी और उत्तर में हिमालय से घिरा हुआ है। यह देश की खूबी हुआ करती थी लेकिन अब समुद्र और पहाड़ बदल गए हैं।

चक्रवातों की आवृत्ति में 50% से अधिक की वृद्धि हुई है, और मानसून की अत्यधिक बारिश में तीन गुना वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये घटनाएं ऊर्जा और नमी का स्रोत महासागरों से प्राप्त करती हैं—और महासागर गर्म हो गए हैं। दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग से 93 प्रतिशत से अधिक गर्मी महासागरों में चली गई है, और हिंद महासागर सबसे तेज़ दर से गर्म हो रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण हिमालय के ग्लेशियर भी तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे डाउनस्ट्रीम समुदायों के जीवन और कृषि को खतरा है।

यह सिर्फ भारत में ही नहीं; हम दुनिया भर में अभूतपूर्व स्तरों से भी बड़े पैमाने पर बाढ़ और हीट-वेव झेल रहे हैं। चीन और जर्मनी में भी इतनी बाढ़ अभूतपूर्व और विनाशकारी थी कि जर्मन चांसलर एंजेल मर्केल ने कहा कि उनके पास मौसम की घटना की मात्रा का वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं। पश्चिमी कनाडा और अमेरिका ने जून 2021 में चिलचिलाती हीटवेव दर्ज की, जिसमें ब्रिटिश कोलंबिया के एक स्टेशन में 49.6°C का आंकड़ा देखा गया जो औसत तापमान से 5°C अधिक था। अनुसंधान दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन के बिना ये घटनाएँ असंभव थीं।

जलवायु मॉडल दिखाते हैं कि ये सभी गंभीर मौसम की स्थिति वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ-साथ और लगातार, तीव्र और व्यापक हो जाएगी। कई कारक जलवायु संकट को बदतर कर रहे हैं। हमारे शहर और पहाड़ियाँ और नदियाँ अनियोजित और निरंतर विकास देख रही हैं, जो पर्यावरण को एक ऐसी स्थिति में बदल रहा है जो अब बाढ़ के पानी या गर्मी को अवशोषित नहीं कर सकता है। दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में, जहां अनियोजित भूमि-उपयोग परिवर्तन व्यापक हैं, भूस्खलन में वृद्धि हुई है।

हमें एक देश-व्यापी असेसमेंट की आवश्यकता है जो जलवायु में परिवर्तन के आधार पर जोखिमों का तत्काल मानचित्रण करे। इन जोखिमों के असेसमेंट के आधार पर ही किसी भी तरह के विकास की योजना बनाई जानी चाहिए—चाहे वह सार्वजनिक बुनियादी ढांचा हो, या फिर खेत या घर हो। हमें अपने शहरों को नया स्वरूप देना पड़ सकता है। हमें भारत के हर जिले को डिज़ास्टर प्रूफ़ (आपदा को रोकने लायक) करने की आवश्यकता है क्योंकि हलाकि जलवायु परिवर्तन वैश्विक है, चुनौतियां हमेशा स्थानीय होती हैं। हमारे पास किसी भी क्षेत्र के लिए जोखिमों की मॉनिटरिंग और मात्रा निर्धारित करने के लिए डाटा और उपकरण हैं—ऐसा करने से हमें क्या रोक रहा है? हमें विशेष रूप से बाढ़ और चक्रवात जैसी गंभीर मौसम की घटनाओं के बढ़ते खतरे का अध्ययन करने के लिए एक शोध केंद्र की भी आवश्यकता है—हमारे पास अभी यह नहीं है।

एक जलवायु वैज्ञानिक के रूप में, मैं अक्सर ग्रह की उस डरावनी छवि को बार-बार बनाने में शर्म महसूस करता हूं। कुछ आशावादी शब्दों को अंत में फेंकने से मदद नहीं मिलती है। मुझे खेद है, मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। जबकि कोविद वक्र टीकाकरण और सावधानियों के साथ समतल हो सकता है, जलवायु परिवर्तन एक ऊपर की ओर जाने वाली ढलान पर है जो निकट भविष्य में समतल नहीं होगा। हमें उत्सर्जन पर अंकुश लगाना चाहिए, सस्टेनेबल विकास और प्राकृतिक सुरक्षा को अपनाना चाहिए—और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें पर्यावरण के साथ कुछ भी करने से पहले जोखिम का असेसमेंट करने की आवश्यकता है।

रॉक्सी मैथ्यू कोल भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान में एक जलवायु वैज्ञानिक और हालिया IPCC रिपोर्टों के प्रमुख लेखक, योगदानकर्ता और समीक्षक हैं।

(Dr. Roxy Mathew Koll is a Climate Scientist at the Indian Institute of Tropical Meteorology. He did his PhD in Ocean and Atmospheric Dynamics from Hokkaido University, Japan. Roxy is currently leading research on climate change—how it extends to the rapid warming in Indo-Pacific oceans—and impacts the global rainfall pattern, the monsoon and the marine ecosystem. He is the Chair of the CLIVAR Indian Ocean Region Panel, and a Lead Author of the IPCC Reports.)

जलवायु परिवर्तन के कारण बदल रहा है भारत के मानसून का मिजाज़

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The mood of India’s monsoon is changing due to climate change

फ़िलहाल भारत में मानसून आ चुका है, लेकिन मानसून के मिजाज़ बदले बदले से हैं इस मौसम की घटना के। वैसे भी भारतीय मानसून एक जटिल परिघटना है और विशेषज्ञों की मानें तो जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने मानसून के बनने की परिस्थिति पर और तनाव डाल दिया है। आंकड़े बताते हैं कि बारिश का रिकॉर्ड हर साल पहले के रिकॉर्ड को पार कर गया है।

The impact of climate change on monsoon is a worrying thing.

मानसून पर जलवायु परिवर्तन का असर एक चिंताजनक बात है। स्थिति कितनी गम्भीर है ये समझाते हुए क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशिका आरती खोसला कहती हैं,

देश भर में वर्षा भारतीय मानसून द्वारा संचालित होती है क्योंकि वार्षिक वर्षा का 70% से अधिक इस मौसम के चार महीनों के दौरान प्राप्त होता है। भारत में जून से सितंबर तक के मानसून के मौसम के दौरान 881 mm वर्षा दर्ज की जाती है। जुलाई और अगस्त सबसे ज़्यादा सराबोर महीने हैं, जिनमें मौसम की 2/3 वर्षा प्राप्त होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून कृषि क्षेत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के GDP (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सेदार है।”

इन बताये गये आंकड़ों से स्थिति साफ़ है कि कितना महत्वपूर्ण है मानसून और कितना असर है उसका हमारी अर्थव्यवस्था पर और फिर देश के विकास पर।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department IMD) के अनुसार, 2020 में, +0.29°C का भारत का वार्षिक तापमान प्रस्थान 1901 में राष्ट्रीय रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से आठवां उच्चतम था। +0.71°C का तापमान प्रस्थान रखते हुए भारत का सबसे गर्म वर्ष 2016 था। 2006 के बाद से भारत के 15 सबसे गर्म वर्षों में से बारह वर्ष हुए हैं।

वैश्विक तापमान प्रोफ़ाइल में वृद्धि की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह अनुमान है कि हम बिज़नेस एज़ यूजुअल परिदृश्य में, 2050 तक, कुल मिलाकर 1.5°C या इससे अधिक की वृद्धि का अनुमान लगा सकते हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और निरंतर एल नीनो के संयोजन ने वर्ष 1950 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से भारत में असामान्य रूप से गर्म मौसम की स्थिति पैदा की है।

NASA (नासा) के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज़ का कहना है कि, 2016 के सामान (जो सबसे गर्म वर्ष के लिए पिछला रिकॉर्ड था), 2020 रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्ष था।

पिछले 30 वर्षों के रुझान स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि वैश्विक तापमान में वृद्धि ज़्यादातर मानव-प्रेरित गतिविधियों के कारण होती है, जिससे जलवायु पैटर्न और वार्षिक मौसम प्रणाली बदलते हैं।

जी.पी. शर्मा, पूर्व-AVM मौसम विज्ञान, भारतीय वायु सेना और Skymet Weather (स्काईमेट वेदर) में अध्यक्ष-मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन, ने कहा,

मानसून बड़े पैमाने पर समुद्री तापमान से संचालित होता है, इसलिए मानसून का आगमन, वापसी और निरंतरता मुख्य रूप से महासागरीय ताप सामग्री से निर्देशित होती है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण समुद्र के तापमान में वृद्धि हुई है, जिसने भारतीय मानसून के पैटर्न को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है। 2020 में महासागर असाधारण रूप से गर्म थे क्योंकि वार्षिक वैश्विक समुद्री सतह का तापमान 20-वीं सदी के औसत से 1.37 °F ऊपर रिकॉर्ड पर तीसरा सबसे अधिक था – केवल 2016 और 2019 इससे ज़्यादा गर्म वर्ष थे। जहाँ पहले हर 15 साल में औसत सूखा 1 बार पड़ता था, लेकिन पिछले एक दशक में तीन बार सूखा पड़ा हैं।”

एल नीनो और ला नीना | El nino and La Nina effect

बहुचर्चित समुद्र-वायुमंडलीय परिघटनाओं, एल नीनो और ला नीना, में भी वृद्धि हो रही हैं। जबकि एल नीनो का भारतीय मानसून वर्षा के साथ विपरीत संबंध है, ला नीना अच्छी मानसून वर्षा के साथ जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए, भारत में एल नीनो की वजह से 2014 और 2015 में भीषण सूखा पड़ा था, जबकि 2020 में ला नीना की मौजूदा स्थितियों के कारण सामान्य से अधिक बारिश हुई थी।

हालांकि मौसम विशेषज्ञ एल नीनो को सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग की एक शाखा के रूप में नहीं देखते हैं, पर ग्लोबल वार्मिंग के कारण महासागरों के गर्म होने से एल नीनो की घटनाओं की तीव्रता, आवृत्ति और अवधि बढ़ रही है।

अद्भुत रूप से, एल नीनो और ला नीना की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिसका सीधा प्रभाव मानसून पर पड़ता है। इन दोनों घटनाओं के बारे में सबसे बुरी बात यह है कि इनका शुरुआती संकेत बहुत देर से आता है। एल नीनो की बढ़ती संख्या और जलवायु परिवर्तन के साथ, सूखा पड़ना केवल कृषि और ग्रामीण आजीविका से संबंधित अनिश्चितताओं को बढ़ाएगा,” जी.पी. शर्मा ने कहा।

मानसून वर्षा में गिरावट | Monsoon rain fall

एल नीनो की आवृत्ति, कमज़ोर मानसूनी परिसंचरण, वायु प्रदूषण में वृद्धि और हिंद महासागर के गर्म होने जैसे कारक वर्षा की अवधि को प्रभावित कर रहे हैं।

एक रिपोर्ट, प्रोपोरशनल ट्रेंड्स ऑफ़ कन्टिन्यूअस रेनफॉल इन इंडियन समर मानसून मानसून (भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून में निरंतर वर्षा के आनुपातिक रुझान), के अनुसार 1951 से 2018 तक वर्षा की प्रवृत्ति मानसून की शुरुआत के पहले 45 दिनों (1 जून से 15 जुलाई) में गिरावट की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है। चावल की फसल के मौसम में बारिश के दिनों की कुल संख्या (यानी, पहले 45 दिन, फसल का मौसम, मानसून की शुरुआत से) भारत में, शुरुआती अवधि की तुलना में, देर की अवधि के दौरान आधे दिनों से कम हो जाती है।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में मॉनसून वर्षा परिवर्तनशीलता सीधे तौर पर वर्षा आधारित फसलों की वृद्धि और सामाजिक-आर्थिक संरचना को प्रभावित करती है। यह देखा गया है कि मानसून के दौरान वर्षा का वितरण अब अनियमित हो गया है। मानसून के अनिश्चित व्यवहार और उसकी अनियमितताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के एक जलवायु वैज्ञानिक, डॉ रॉक्सी मैथ्यू कोल, ने कहा,

“1950 से 2015 तक मध्य भारत की वार्षिक वर्षा में गिरावट और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। मध्य भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि का प्रमुख कारण अरब सागर से नमी की आपूर्ति में वृद्धि है। वार्षिक वर्षा में कमी का श्रेय भारतीय मानसून परिसंचरण के कमज़ोर होने और निम्न दबाव प्रणालियों के घटने को दिया जाता है।”

प्रोपोरशनल ट्रेंड्स ऑफ़ कन्टिन्यूअस रेनफॉल इन इंडियन समर मानसून मानसून (भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून में निरंतर वर्षा के आनुपातिक रुझान) रिपोर्ट के अनुसार, 1985 से 2018 तक वर्षा के दिनों की संख्या भारत के सभी क्षेत्रों में जुलाई के दौरान गिरावट दर्शाती है। कुल मिलाकर, वर्षा के दिनों की संख्या भारत में, जून को छोड़कर, गर्मी के मौसम और महीनों में घटती प्रवृत्ति दर्शाती है।

चरम मौसम की घटनाएं | Extreme weather events

मॉनसून की बारिश में न सिर्फ कमी आई है, बल्कि बारिश की बौछारों का पैटर्न भी असंगत हो गया है। यह सीधे तौर पर भारी और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि से संबंधित है। 1951-2005 की अवधि के दौरान वर्षा के दैनिक आंकड़ों का उपयोग करते हुए पश्चिमी तट और मध्य भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।

CEEW की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रेपरिंग इंडिया फॉर एक्सट्रीम क्लाइमेट इवेंट्स (अत्यधिक जलवायु घटनाओं के लिए भारत की तैयारी), माइक्रो (सूक्ष्म) तापमान में निरंतर वृद्धि के कारण मानसून कमज़ोर हो गया है। भारत के 40 प्रतिशत से अधिक जिलों में चरम घटनाओं जैसे बाढ़-प्रवण क्षेत्रों का सूखा-प्रवण हो जाना और इसके विपरीत पैटर्न, दोनों बदल गए हैं।

महाराष्ट्र, कर्नाटका और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गर्मी के दौरान रिकॉर्ड तोड़ तापमान और कमज़ोर मानसून के कारण 2015 के दौरान पानी की गंभीर कमी देखी गई। राजकोट, सुरेंद्रनगर, अजमेर, जोधपुर और औरंगाबाद, और अन्य कुछ ऐसे जिले हैं, जहां हमने बाढ़ से सूखे की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति देखी। बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के कुछ जिलों में सूखा और बाढ़ की घटनाएं एक साथ देखी गयी। रुझान खतरनाक हैं और स्थानीय स्तर पर व्यापक जोखिम मूल्यांकन की मांग की ज़रुरत रखते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग का कृषि पर प्रभाव | Impact of global warming on agriculture

इन ग्लोबल वार्मिंग की वजह से होने वाली चरम घटनाओं का कृषि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से भारत के लिए जहां अभी भी खेती की भूमि का एक बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर है।

भारत एक कृषि संचालित अर्थव्यवस्था है, जिसकी अधिकांश आबादी कृषि और संबंधित गतिविधियों में लगी हुई है।

मानसून के पैटर्न में चल रहे बदलावों का किसानों पर बहुत प्रभाव पड़ता है, जो अंततः कृषि उत्पादकता तक जाता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून के उदासीन व्यवहार को देखते हुए इसकी गतिकी को समझने के लिए अधिक से अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। अब तक, मानसून की अस्थिर प्रकृति के कारण कृषि-जोखिम का निकट भविष्य में कोई महत्वपूर्ण मिटिगेशन नहीं दिखाई दे रहा है।