139 मिलियन से अधिक लोग जलवायु संकट और कोविड-19 की चपेट में : नया विश्लेषण

climate change

More than 139 million people hit by climate crisis and COVID-19, new IFRC analysis reveals

न्यूयॉर्क, जिनेवा, 18 सितंबर 2021: इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, चरम मौसम की घटनाओं और महामारी ने एक साथ लाखों लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनका कहना है कि जलवायु और कोविड संकट के संयोजन ने रिलीफ़ (राहत-सहायता प्रतिक्रिया) प्रयासों में बाधा डालने के साथ-साथ अभूतपूर्वमानवीय ज़रूरतें पैदा की हैं।

IFRC की रिपोर्ट के अनुसार, 140 मिलियन लोग – रूस की लगभग पूरी आबादी के बराबर – महामारी के दौरान बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग से प्रभावित हुए हैं। 65 से अधिक या पांच साल से कम उम्र के 660 मिलियन लोग हीटवेव (गर्मी की लहर) की चपेट में आ गए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का लगभग दोगुना है।

The paper also highlights the need of addressing both crises simultaneously as the COVID-19 pandemic has affected livelihoods across the world and has made communities more vulnerable to climate risks.

कोविड की चपेट में आने के बाद से सबसे घातक घटना (जिसके लिए डाटा उपलब्ध है) पश्चिमी यूरोप में 2020 की हीटवेव थी, जिसमें बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और यूके में 11,000 से अधिक मौतें हुईं। जबकि भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 20.6 मिलियन लोगों को प्रभावित करने वाली महामारी के दौरान चक्रवात अम्फान ने सबसे गंभीर जलवायु संकट बनाया। हीटवेवों ने शीर्ष तीन सबसे घातक घटनाओं में से दो को बनाया, और आज होने वाली हर हीटवेव जलवायु परिवर्तन से अधिक संभावित और अधिक तीव्र हो जाती है। जून 2020 में आई बाढ़ से भारत में क़रीब 2000 लोग प्रभावित हुए थे।

The compound impact of extreme weather events and COVID-19

वैज्ञानिक घटना एट्रिब्यूशन अध्ययनों में पाया गया है कि ग्लोबल हीटिंग ने कई विशिष्ट घटनाओं को शक्तिशाली, लंबा या अधिक संभावित बना दिया। कुछ घटनाएं – जैसे कि प्रशांत नॉर्थवेस्ट में 2021 हीटवेवजलवायु परिवर्तन के बिना दुनिया में लगभग असंभवहोती।

जलवायु परिवर्तन मौजूदा संवेदनशीलताओं और खतरों को बदतर बना देता है, और इसने विशेष रूप से उन लोगों को प्रभावित किया है जो पहले से ही महामारी की वजह से संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, सीरिया और इराक़ में जारी सूखा पानी की उपलब्धता और बिजली आपूर्ति दोनों को कम कर रहा है क्योंकि जलविद्युत बांध सूख जाते हैं, जिससे स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवा प्रभावित होती है। होंडुरास और दक्षिण एशिया में तूफ़ान के दौरान, रिलीफ़ (राहत-सहायता) कार्यों को अपने घरों से भागने वालों के लिए अतिरिक्त सार्वजनिक आश्रयों की तलाश करनी पड़ी ताकि सामाजिक दूरी को बनाए रखा जा सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य जगहों पर जंगल की आग से होने वाले धुएं ने लोगों के फेफड़ों को परेशान कर दिया और इससे कोविड के मामलों और कोविड से होने वाली मौतों में वृद्धि हुई।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) का कहना है कि समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रति एडाप्ट होने के लिए और अधिक सहायता की आवश्यकता है, और यह कि जलवायु और महामारी को एक साथ संबोधित करने से आर्थिक रूप से अधिक लचीली रिकवरी होगी।

कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से, जलवायु संबंधी आपदाओं ने कम से कम 139.2 मिलियन लोगों के जीवन को प्रभावित किया है और यह 17,242 से अधिक लोगों की मौत का कारण बनी हैं।

यह एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं और कोविड-19 के मिश्रित प्रभावों पर यह इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) और रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर द्वारा आज प्रकाशित एक नए विश्लेषण की खोज है। और अनुमानित 658.1 मिलियन लोग अत्यधिक तापमान के संपर्क में आए हैं। नए डाटा और विशिष्ट केस स्टडीज़ के माध्यम से, रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे दुनिया भर में लोग कई संकटों का सामना कर रहे हैं और ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संवेदनशीलताओं से जूझ रहे हैं।

पेपर दोनों संकटों को एक साथ संबोधित करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है क्योंकि कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में आजीविका को प्रभावित किया है और समुदायों को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है।

The world is facing an unprecedented humanitarian crisis where the climate change and COVID-19 are pushing communities to their limits

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के अध्यक्ष, फ्रांसेस्को रोक्का (The IFRC President, Francesco Rocca), जिन्होंने बीती 16 दिसंबर को न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई रिपोर्ट पेश की, ने कहा:

“दुनिया एक अभूतपूर्व मानवीय संकट का सामना कर रही है जहाँ जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 समुदायों को उनकी सीमा तक धकेल रहे हैं। COP26 के होने तक के समय में, हम विश्व के नेताओं से न केवल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए, बल्कि जलवायु परिवर्तन के मौजूदा और होनेवाला मानवीय प्रभावों को सम्भोदित करने के लिए भी तत्काल कार्रवाई करने के लिए आग्रह करते हैं।”

रिपोर्ट कोविड-19 संकट के दौरान हुई एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं के ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) जोखिमों के प्रारंभिक विश्लेषण[1] के एक साल बाद आई है। महामारी का कहर दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों के साथ जारी है, लेकिन साथ ही बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष प्रभाव भी है, जो थोड़ा-बहुत महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए प्रतिक्रिया उपायों के कारण है। मौसम की एक्सट्रीम (चरम सीमा) के कारण होने वाली खाद्य असुरक्षा को कोविड-19 ने और बढ़ा दिया है। स्वास्थ्य प्रणालियों को उनकी सीमा तक धकेल दिया गया है और सबसे संवेदनशीलत लोगों को ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) सदमों का सामना करना पड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

अफ़ग़ानिस्तान में, भीषण सूखे के प्रभाव संघर्ष और कोविड-19 के कारण और भी बढ़ गए हैं। सूखे ने कृषि खाद्य उत्पादन को अशक्त बना दिया है और पशुधन को कम कर दिया है, जिससे लाखों लोग भूखे और कुपोषित रह गए हैं। अफ़ग़ान रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने सहायता बढ़ाई है, जिसमें लोगों के खाद्य आपूर्ति खरीदने के लिए भोजन और नकद सहायता, सूखा-प्रतिरोधी खाद्य फसलें लगाने और अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए सहायता शामिल है।

होंडुरास में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

होंडुरास में, महामारी के दौरान तूफ़ान एटा और आइओटा का सामना करने में, का मतलब अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना भी था। अस्थायी आश्रयों में हजारों लोग बेघर हो गए। उन आश्रयों में एंटी-कोविड-19 उपाय कार्यवाही के लिए शारीरिक दूरी और अन्य सुरक्षात्मक उपायों की आवश्यकता थी, जिनसे क्षमता सीमित हुई।

केन्या में, कोविड-19 के प्रभाव एक साल में बाढ़ और अगले साल सूखे के साथ-साथ टिड्डियों के प्रकोप से टकरा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 2.1 मिलियन से अधिक लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। देश में और पूर्वी अफ्रीका के पार, कोविड-19 प्रतिबंधों ने बाढ़ का सामना करने की सहायता प्रतिक्रिया और प्रभावित आबादी तक आउटरीच को धीमा कर दिया जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ गई।

IFRC (आईएफआरसी) के बारे में

IFRC दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय नेटवर्क है, जिसमें 192 नेशनल रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसाइटी शामिल हैं, जो दुनिया भर में लोगों की जान बचाने और सम्मान को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

दुनिया भर में रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसायटीयां न केवल उन ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संकटों की प्रतिक्रिया में सहायता दे रही हैं बल्कि समुदायों को जलवायु जोखिमों के लिए तैयार करने और उनका अनुमान लगाने में भी मदद कर रही हैं।

उदाहरण के लिए बांग्लादेश में, रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के नामित धन का उपयोग बाढ़ से संबंधित अर्ली वार्निंग मेसेजेस (पूर्व चेतावनी संदेशों) को लाउडस्पीकर के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रसारित करने के लिए किया है ताकि लोग आवश्यक उपाय कार्यवाही कर सकें और यदि आवश्यक हो तो इवैक्यूएट (इलाक़ा ख़ाली) कर सकें।

RCRC (आरसीआरसी) क्लाइमेट सेंटर की एसोसिएट डायरेक्टर जूली अरिघी ने कहा :

“खतरों को आपदा बनने की ज़रूरत नहीं है। अगर हम स्थानीय स्तर पर संकटों की आशंका, शीघ्र कार्रवाई और जोखिम में कमी लाना जैसे करते हैं इसे बदलते हैं तो हम बढ़ते जोखिमों की प्रवृत्ति का मुक़ाबला कर सकते हैं और जीवन बचा सकते हैं। अंत में, हमें समुदायों को अधिक लचीला बनने में मदद करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से सबसे संवेदनशील संदर्भों में।”

कोविड-19 महामारी का जलवायु जोखिमों पर अधिक देर तक रहने वाला प्रभाव पड़ा है। सरकारों को सामुदायिक एडाप्टेशन, प्रत्याशा प्रणाली और स्थानीय अभिनेताओं में निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध होने की ज़रुरत है।

कोविड-19 रिकवरी में बड़े पैमाने पर खर्च यह साबित करता है कि सरकारें वैश्विक खतरों का सामना करने के लिए तेज़ी से और प्रबलतीव्र रूप से कार्य कर सकती हैं। यह शब्दों को क्रिया में बदलने और उसी ताक़त को जलवायु संकट के लिए समर्पित करने का समय है। हर दिन, हम मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देख रहे हैं। जलवायु संकट यहाँ है, और हमें अभी कार्य करने की आवश्यकता है,” रोक्का ने कहा।

पर्यावरण हलचल : समुदाय के बिना नहीं बुझाई जा सकती हिमालय की यह आग

forest fire

एमआई 17 हेलीकॉप्टरों की मदद से उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग बुझाई जा रही है।

Uttarakhand News: uttarakhand forest fire latest news and update: उत्‍तराखंड जंगल की आग … Know about उत्तराखंड के जंगलों में आग in Hindi

जंगलों में आग मुख्यतः जमीन पर गिरी सूखी घास-पत्तियों से फ़ैलती है। उत्तराखंड के पहाड़ों में चीड़ के पेड़ों की अधिकता यहां के पहाड़ों में आग फैलने का मुख्य कारण है। चीड़ की पत्तियां जिन्हें पिरूल भी कहा जाता है अपनी अधिक ज्वलनशीलता की वजह से हिमालय की बहुमूल्य वन संपदा खत्म कर रही हैं।

यूकेफॉरेस्ट वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2021 में अब तक जंगल में आग लगने की 1635 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जिस वजह से 4 लोगों की मौत के साथ ही 17 जानवरों की मौत भी हुई है। जंगल में आग लगने की वजह से 6158047.5 रुपए की वन संपदा जल कर ख़ाक हो गई।

https://forest.uk.gov.in/contents/view/6/53/75-forest-fire-info

इसी वेबसाइट पर आप जंगल में आग से प्रभावित स्थानों की लाइव जानकारी (Live information of locations affected by forest fires) भी ले सकते हैं।

‘ब्लैक कार्बन’ बना रहा है जंगल की आग से निकला स्मॉग | Smog from wildfire is making ‘black carbon’

3 मई 2016 में टाइम्स ऑफ इंडिया में विनीत उपाध्याय की छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जंगल की आग से निकला स्मॉग और राख ‘ब्लैक कार्बन’ बना रहा है जो ग्लेशियरों को कवर कर रहा है, जिससे उन्हें पिघलने का खतरा है। गंगोत्री, मिलम, सुंदरडुंगा, नयाला और चेपा जैसे अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक खतरे में हैं और यही ग्लेशियर बहुत सी नदियों के स्रोत भी हैं।

इस आग की वज़ह से पहले ही उत्तर भारत के तापमान में 0.2 डिग्री सेल्सियस की छलांग से मानसून पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है

हिमालय में आग फ़ैलाने के लिए कौन जिम्मेदार | Who is responsible for spreading fire in Himalayas

चीड़ के पेड़ हिमालय में आग फ़ैलाने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी तो हैं पर उन्हें काट देना ही आग रोकने का समाधान नहीं है। चीड़ के बहुत से फायदे भी हैं उसे कई रोगों के इलाज में उपयोगी पाया गया है जैसे इसकी लकड़ियां, छाल आदि मुंह और कान के रोगों को ठीक करने के अलावा अन्य कई समस्याओं में भी उपयोगी हैं।

चीड़ की पत्तियों से कोयला बना और बिजली उत्पादन कर आजीविका भी चलाई जा सकती है।

ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान ( टेरी ) के जैवविविधता विशेषज्ञ डॉ. योगेश गोखले चीड़ के जंगलों में हर वर्ष लगने वाली आग की समस्या पर कहते हैं कि पिरूल के बढ़ने से आग लगने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। नमी की वज़ह से आग को फैलने से रोका जा सकता है। जलती बीड़ी जंगलों में फेंक देना भी जंगल की आग के लिए उत्तरदायी है।

Damage to environment due to pine forest

चीड़ के जंगल से पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान पर डॉ गोखले कहते हैं अक्सर यह माना जाता है कि जहां चीड़ होगा वहां पानी सूख जाता है और देवदार के पेड़ों वाली जगह पानी के स्रोत मिलते हैं। चीड़ की वजह से जंगल में आग लगने से कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है।

आग लगने की वजह से पर्यावरण को जो नुकसान पहुंच रहा है उसे बचाने के लिए डॉ गोखले पिरूल के अधिक से अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहते हैं क्योंकि पिरूल हटने से बाकि वनस्पतियों का विकास होगा और मिश्रित जंगल बनने की वज़ह से भविष्य में आग लगने की घटनाओं में भी कमी आएगी। पालतू जानवरों के लिए चारा उपलब्ध होगा तो ग्रामीण इसके लिए पिरूल के जंगलों में आग भी नहीं लगाएंगे।

आईएफएस एडिशनल प्रिंसिपल, चीफ़ कनसर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट उत्तराखंड डॉ. एस डी सिंह से जब यह पूछा गया कि चीड़ के जंगलों में आग न लगे सरकार इसके लिए क्या कदम उठा रही है तो उन्होंने बताया कि इसके लिए हर वर्ष कार्य योजना बनाई जाती है। फ़रवरी और मार्च में ही तय कर लिया जाता है कि कहां पर फ़ायर क्रू स्टेशन बनाए जाने हैं और साथ में ही संचार साधन भी दुरस्त कर लिए जाते हैं।

जंगल में फ़ायर लाइन बनाते रहते हैं और झाड़ी नहीं होने देते। किसानों को भी साथ लेकर पत्तियां इकट्ठा की जाती हैं और खेतों के किनारे सफ़ाई की जाती है ताकि आग खेतों तक न फैले।

पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग की घटनाओं को नैनीताल हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इसके स्थाई समाधान के लिए जंगलों में पहले से चाल व खाल बनाने के निर्देश दिए हैं।

उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल व खाल कहते हैं, इनकी वज़ह से जमीन में नमी बनी रहती है और आग कम फ़ैलती है।

भारत में औपनिवेशिक काल से पहले लोग वनों का उपभोग भी करते थे और रक्षा भी। अंग्रेज़ों ने आते ही वनों की कीमत को समझा, जनता के वन पर अधिकारों में कटौती की और वनों का दोहन शुरू किया।

जनता के अधिकारों में कटौती की व्यापक प्रतिक्रिया हुई और समस्त कुमाऊँ में व्यापक स्तर पर आन्दोलन शुरू हो गए। शासन ने दमन नीति अपनाते हुए प्रारम्भ में कड़े कानून लागू किए, परन्तु लोगों ने इन कानूनों की अवहेलना करते हुए यहाँ के जंगलों को आग के हवाले करना आरम्भ किया। फलस्वरूप शासन ने समझौता करते हुए एक समिति का गठन किया।

1921 में गठित कुमाऊँ फॉरेस्ट ग्रीवेंस कमेटी का अध्यक्ष तत्कालीन आयुक्त पी.विंढम को चुना गया तथा इसमें तीन अन्य सदस्यों को शामिल किया गया। समिति ने एक वर्ष तक पर्वतीय क्षेत्र का व्यापक भ्रमण किया। समिति द्वारा यह सुझाया गया कि ग्रामीणों की निजी नाप भूमि से लगी हुई समस्त सरकारी भूमि को वन विभाग के नियंत्रण से हटा लिया जाए।

स्वतन्त्र भारत में वनों को लेकर बहुत से नए-नए नियम कानून बनाए गए।

वर्तमान समय में उत्तराखंड की वन पंचायत, जो पंचायती वनों का संरक्षण और संवर्धन खुद करती है, उन्हें अधिक शक्ति दिए जाने की आवश्यकता है।

डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में आदिवासी बहुल क्षेत्र सबसे कम कार्बन उत्सर्जित करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि समुदाय के पास जंगल का नियंत्रण रहने से वहां आग भी कम लगती है क्योंकि वह ही जंगल की रक्षा भी करते हैं।

जंगल में लग रही इस आग के समाधान पर वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि उत्तराखंड के गांवों की चार किलोमीटर परिधि में जंगलों से सरकारी कब्ज़ा हटा कर उन्हें ग्राम समुदाय के सुपुर्द किया जाना चाहिए।

मई-जून की गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में आग सबसे ज्यादा फैलेगी और हेलीकॉप्टर से पानी गिरा आग बुझाना इस समस्या का स्थाई समाधान नही है। न ही चीड़ के पेड़ों को काट-काट कर हम अपने कृत्यों से लगी इस आग को रोक सकते हैं। समुदाय ने मिल कर ही मानव जाति का निर्माण किया है और वह ही इसे और अपने पर्यावरण को बचा भी सकता है।

नुपुर कुलश्रेष्ठ, हिमांशु जोशी।

मानव इतिहास का सबसे गर्म साल था 2020

Climate change Environment Nature

2020 tied with 2016 as the hottest year on record

फ़िलहाल मानव इतिहास में अब तक का सबसे गर्म साल 2016 को माना जाता था। लेकिन अब, 2020 को भी अब तक का सबसे गर्म साल कहा जायेगा।

The Copernicus Climate Change Service, the EU’s Earth Observation Programme, has just announced that 2020 was the warmest year ever recorded tying with 2016, the previous record-holder. The unusually high temperatures throughout 2020 happened despite the occurrence of La Niña, a recurrent weather phenomenon that has a cooling effect on global temperatures.

नई दिल्ली, 09 जनवरी 2021. यूरोपीय संघ के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम (अर्थ ऑब्ज़र्वेशन प्रोग्राम), कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस ने घोषणा कर दी है कि ला-नीना, एक आवर्ती मौसम की घटना जिसका वैश्विक तापमान पर ठंडा प्रभाव पड़ता है, के बावजूद 2020 के दौरान असामान्य उच्च तापमान रहे और पिछले रिकॉर्ड-धारक 2016 के साथ अब 2020 भी सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

यह घोषणा एक चिंताजनक प्रवृत्ति की निरंतरता की पुष्टि करती है, पिछले छह वर्ष लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहे हैं। यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती (Cut greenhouse gas emissions) के लिए देशों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है, जो मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार (Responsible for global warming) हैं। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि पेरिस समझौते को पूरा करने के लिए वर्तमान योजनाएँ अपर्याप्त हैं, चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों ने हाल ही में अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य को सामने रखा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे ग्रह गर्म होता है, कई चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है। 2020 में इसके कई संकेत थे, आर्कटिक में रिकॉर्ड तापमान के साथ, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में बहुत बड़ी वाइल्डफ़ायर (जंगल की आग), और मानसून के मौसम के दौरान कई एशियाई देशों में भारी बरसात के कारण गंभीर बाढ़ें।

माध्य वैश्विक तापमान का विश्लेषण कई वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है। कोपर्निकस के अलावा, नासा, एनओएए, बर्कले अर्त और हैडली की वेधशालाएं पूरे वर्ष वैश्विक तापमान पर निगरानी करती हैं।

क्योंकि वे अलग-अलग तरीकों का उपयोग करते हैं, डाटासेटों के बीच छोटे अंतर होते हैं और यह संभव है कि अन्य समूह 2016 के मुकाबले 2020 को अधिक गरम नहीं समझतें हों। इन छोटी विसंगतियों के बावजूद, सभी विश्लेषण समग्र प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं, और हाल के वर्षों को लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म पाया गया है।

2020 चरम घटनाओं का साल | 2020 year of extreme events

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में दुनिया भर में चरम मौसम की घटनाओं की लागत $150 बिलियन से अधिक है। इन घटनाओं में हीटवेव, वाइल्डफ़ायर, बाढ़ और उष्णकटिबंधीय चक्रवात शामिल थे – ये सभी ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होते हैं।

उच्च तापमान

अत्यधिक तापमान पूरे वर्ष स्थिर रहे और कई पिछले गर्मी के रिकॉर्ड टूट गए। इनमें शामिल है:

• साइबेरिया में रिकॉर्ड पर सबसे गर्म दिन, 38 डिग्री सेल्सियस के तापमान के साथ, आर्कटिक सर्कल के उत्तर में सबसे अधिक दर्ज किया गया तापमान। यह चरम तापमान एक हीटवेव के बीच ज़ाहिर हुआ जो, एक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के बिना “लगभग असंभव” होती।

• पृथ्वी पर अब तक का सबसे ऊँचा तापमान (डेथ वैली, कैलिफोर्निया में 54.4 ° C) दर्ज किया गया।

• उत्तरी गोलार्ध में सबसे गर्म गर्मी का मौसम (NOAA के अनुसार) ।

आग

वाइल्डफ़ायर ने पूरे साल कई सुर्खियां बटोरीं। जलवायु परिवर्तन द्वारा लाये गए अत्यधिक तापमान ने उनमें से कुछ की गंभीरता में योगदान दिया होगा। दुनिया भर में सबसे खराब आग की सूची में शामिल हैं :

• ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की झाड़ियों में लगी आग। रिकॉर्ड पर सबसे महंगी जंगलों की झाड़ियों की आग मानी जाती है, इस आग ने लाखों एकड़ को तबाह कर दिया और अरबों जानवरों को मार डाला। जनवरी 2020 में प्रकाशित एक एट्रिब्यूशन अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला कि जलवायु परिवर्तन ने ऐसी आग के जोखिम को कम से कम 30% बढ़ा दिया है।

• पश्चिमी तट अमेरिका में आग। आग का मौसम कैलिफोर्निया में रिकॉर्ड पर सबसे खराब था, जिसमें 4 मिलियन एकड़ से अधिक भूमि जल गई। अमेरिका के पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्र, जैसे कि ओरेगन और वाशिंगटन, भी प्रभावित हुए। आग का मौसम एक अत्यधिक हीटवेव के बीच पड़ा, जो इस क्षेत्र में बहुत उच्च तापमान लायी।

• दक्षिण अमेरिका में आग। कई दक्षिण अमेरिकी देश 2020 में जंगल की आग से प्रभावित हुए, जिनमें ब्राजील, अर्जेंटीना, बोलीविया और पैराग्वे शामिल हैं। अमेज़ॅन में कई आगें थीं, और पाराना की नदी के डेल्टा और ग्रान चाको के जंगल में भी, जिससे जैव विविधता को महत्वपूर्ण नुकसान हुए।

अत्यधिक वर्षा और बाढ़

कई देशों ने अत्यधिक वर्षा, विशेष रूप से एशियाई मानसून से जुड़ी हुई, के एपिसोड का अनुभव किया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्रह के गर्म होने के साथ मानसून की कुल बारिश में वृद्धि होगी, हालांकि हवा के पैटर्न में बदलाव के कारण कुछ क्षेत्रों में दूसरों के मुकाबले कम बारिश हो सकती है। कुछ प्रभावित देश :

• चीन में बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया, जिससे हजारों विस्थापन हुए और कम से कम 219 लोग मारे गए या लापता हो गए। बाढ़ से नुकसान का अनुमान 32 बिलियन डॉलर है।

• पाकिस्तान में बाढ़ से कम से कम 410 लोग मारे गए और $ 1.5 बिलियन की लागत आई।

• भारत में बाढ़ से मृत्यु दर बहुत अधिक था, जिसमें 2,067 लोग मारे गए थे। नुकसान का अनुमान $ 10 बिलियन है।

• सूडान में बाढ़ ने दस लाख से अधिक लोगों को प्रभावित किया, फसलों को नष्ट कर दिया और कम से कम 138 मौतें हुईं।

ऊष्णकटिबंधी चक्रवात | Tropical cyclone

अटलांटिक और हिंद महासागर दोनों में 2020 के उष्णकटिबंधीय चक्रवात का मौसम बहुत तीव्र रहा है।

• अटलांटिक में 2020 का तूफान का मौसम अब तक का सबसे सक्रिय था, जिसमें 30 नामित तूफान थे। इतिहास में दूसरी बार, तूफानों के नाम के लिए ग्रीक (यूनानी) नामों का इस्तेमाल करना पड़ा।

• सितंबर में, अटलांटिक बेसिन में पांच तूफान एक साथ सक्रिय थे, जो केवल रिकॉर्ड पर एक बार पहले, 1995 में, देखा गया था।

• कुछ क्षेत्रों ने कई तूफानों का अनुभव किया, जिनमें से कई लगभग एक के बाद एक हुए। अमेरिका में, अकेले लुइसियाना में पांच तूफ़ान आये, जिसने इस राज्य के लिए एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया। और मध्य अमेरिका के देश, जैसे होंडुरास और निकारागुआ, कुछ हफ्तों की अवधि में तूफान एटा और इओटा से प्रभावित हुए थे।

• दक्षिण एशिया में, चक्रवात अम्फान ने भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान को प्रभावित किया और 128 मौतों का कारण बना।

• फिलीपींस में, सुपर टाइफून गोनी और वामको ने व्यापक नुकसान पहुंचाया और कम से कम 97 लोगों की मौत हो गई। गोनी वर्ष का सबसे मजबूत उष्णकटिबंधीय चक्रवात था।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जलवायु सेवा केंद्र जर्मनी (GERICS) के वैज्ञानिक, डॉ. करस्टन हौस्टिन, ने कहा, “यह तथ्य कि 2016 के साथ 2020 रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्ष है, एक और कठोर अनुस्मारक है कि मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन बेरोकटोक निरंतर जारी है। यह विशेष रूप से अद्भुत है क्योंकि 2020 का वर्ष एल नीनो के प्रभाव में नहीं था, उष्णकटिबंधीय प्रशांत में प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता का एक मोड जिसने अतिरिक्त गर्मी के साथ वर्ष 2016  को ‘सुपरचार्ज’ करा था। 2020 में ऐसा कोई ‘बूस्ट’ नहीं था, फिर भी यह पिछले रिकॉर्ड धारक से लगभग अधिक था। वास्तव में, केवल एक विशेष रूप से ठंडा दिसंबर (नवंबर की तुलना में) 2020 को नए स्टैंड-अलोन (अकेला) सबसे गर्म वर्ष बनने से रोकता है।

वो आगे कहते हैं, “महामारी के संदर्भ में, वैज्ञानिकों ने पाया है कि आर्थिक स्टिमुलस (प्रोत्साहन) के रूप में  सरकारों द्वारा व्यवसायों को बनाए रखने के लिए (और व्यक्तियों का समर्थन करने के लिए)  लिक्विडिटी (तरलता) समर्थन, पेरिस जलवायु समझौते के अनुरूप कम कार्बन मार्ग पर रहने के लिए आवश्यक वार्षिक ऊर्जा निवेश से कहीं अधिक है। एक बार जब हम एक आपातकालीन स्थिति का सामना कर रहे हैं, तो अचानक असंभव (वित्तीय) कार्रवाई अभूतपूर्व पैमाने पर की जाती है। यह देखते हुए कि हम जलवायु आपातकाल की स्थिति में भी हैं – जिसे किसी टीके के साथ पूर्ववत नहीं किया जा सकता है – स्मार्ट निवेश विकल्प की ज़रुरत है यह देखते हुए की दांव पर क्या है। “

जॉर्जिया एथलेटिक एसोसिएशन के प्रतिष्ठित प्रोफेसर ऑफ एटमॉस्फेरिक साइंसेज एंड जियोग्राफी, डॉ. मार्शल शेफर्ड, ने कहा, “मुझे लगता है यह मुद्दा नहीं है कि रिकॉर्ड पर 2020 सबसे गर्म वर्ष है या नहीं है। हम निरंतर रिकॉर्ड तोड़ वर्षों के युग में हैं। यह अब ब्रेकिंग न्यूज नहीं है, बल्कि मानवीय संकट है।”

लॉकडाउन के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के चलते भीषण गर्मी, आंधी, तूफ़ान जैसी चरम मौसम घटनाओं की चेतावनी

Environment and climate change

“उत्तरी गोलार्ध में आसमान से बरसती आग और समुद्रों में उठते तूफ़ान का मौसम आ गया

Warning of extreme weather events like severe heat, storm, storm due to lockdown as well as climate change

विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली हीटवेव, उष्णकटिबंधीय तूफान (Heatwave, tropical storm) और आग के मौसम इस वर्ष और भी घातक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन से बिगड़ी घटनाओं की परिस्थितियों कोविड महामारी के चलते हो रहे लॉकडाउन की वजह से और भी बेढब हो जाएँगी।

भारत और बांग्लादेश पहले से ही प्रकृति का प्रकोप झेल रहे हैं | India and Bangladesh are already facing the wrath of nature

गर्मी की शुरुआत के साथ, उत्तरी गोलार्ध के देश खतरे के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले होते हैं जब चरम मौसम के जोखिम सबसे बड़े होते हैं। भारत और बांग्लादेश पहले ही वर्ष के अपने पहले बड़े तूफान, चक्रवात अम्फान (Storm, cyclone amphAn) की चपेट में आ चुके हैं। अमेरिका और कैरिबियन में तूफान का मौसम 1 जून से शुरू होता है, पूर्वानुमान के साथ कि इस साल तूफान सामान्य से अधिक खराब हो सकते है। Pacific  northwest windstorms

उत्तर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में टाइफून (Typhoon in the Northwest Pacific) आमतौर पर मई से तेज होता है।

आम तौर पर जुलाई और अगस्त से आने वाली उत्तरी गोलार्ध की गर्मी के चरम के साथ, आने वाले हफ्तों में अत्यधिक गर्मी और जंगल की आग (Forest fire) का खतरा भी बढ़ जाएगा, और सबसे खतरनाक आग आमतौर पर एक ही समय से शुरू होती है और कभी-कभी कई महीनों तक चलती रहती है। यह संभावना है कि 2020 रिकॉर्ड पर दुनिया का सबसे गर्म वर्ष होगा।

Combined effects of heatwave and COVID-19

डब्लू.एच.ओ. और डब्लू.एम.ओ. के साथ ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (Global Heat Health Information Network) ने इस हफ्ते हीटवेव और कोविड-19 के संयुक्त प्रभाव को संभालने के बारे में तत्काल मार्गदर्शन जारी किया।

दक्षिणी गोलार्ध सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में पहले से ही चरम मौसम का सामना करना पड़ रहा है, उदाहरण के लिए, पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में वर्तमान में भारी बारिश के बाद विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का सामना करना पड़ रहा है, और साथ में सैकड़ों अरबों टिड्डी अभी भी अधिकांश क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों के साथ, चरम मौसम की स्थिति से प्रेरित भाग में।

Carbon emissions promote hazards from hurricanes, heatwaves and fires.

जलवायु परिवर्तन ने चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और गंभीरता में वृद्धि की है, विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन से तूफान, हीटवेव और आग से खतरों को बढ़ावा मिलता है। उच्च तापमान के प्रभावों में लंबे समय तक चलने वाले, अधिक गर्म और अधिक लगातार, हीटवेव होते हैं, जिससे जंगल की आग का खतरा भी बढ़ जाता है, और तूफान जो अधिक बलवान होते हैं और अत्यधिक बहाव में भारी वर्षा जारी करते हैं।

इस साल ये घटनाएं और भी खतरनाक हो सकती हैं, विशेषज्ञों का कहना है, क्योंकि आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ उपाय कोरोनावायरस महामारी से निपटने वाली आबादी के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होंगे। इन उपायों में सांप्रदायिक आपातकालीन आश्रय हैं जो व्यापक रूप से तूफान, बवंडर और अत्यधिक गर्मी से शरणार्थी के रूप में उपयोग किए जाते हैं – लेकिन ये सामाजिक दूरी की आवश्यकताओं से सीमित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह चक्रवात अम्फान के लिए निकासी के दौरान सफल समायोजन किए गए हैं, लेकिन ये आगे कमजोर समुदायों और पहले उत्तरदाताओं के सामने आने वाली चुनौतियों को जटिल बनाते हैं।

Other factors that can increase the risk from extreme weather this year

अन्य कारक इस वर्ष अत्यधिक मौसम से जोखिम भी बढ़ा सकते हैं। बहुत से लोग – विशेष रूप से सबसे कमजोर – वायरस के संपर्क से बचने के लिए अपने घरों को छोड़ने के लिए शायद तैयार नहीं हो सकें, जिससे उन्हें अत्यधिक गर्मी और तूफानों से खतरा झेलने की सम्भावना बढ़ सकती है। कुछ देशों में अति-विस्तारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं मांग में अचानक वृद्धि के साथ असमर्थ हो सकती हैं, जबकि अग्निशामक वायरस के प्रकोप के दौरान विल्डफोर्स का मुकाबला करने के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

महामारी की आर्थिक लागत (Epidemic economic cost) भी इस साल चरम मौसम से प्रभावित लोगों का समर्थन करने और उनके पुनर्निर्माण में मदद करना अधिकारियों के लिए कठिन बना सकती है।

विशेषज्ञों का तर्क है, कि चरम घटनाओं के जोखिम वाले स्थानों पर स्थानीय और राष्ट्रीय प्राधिकरण को महामारी के लिए प्रतिक्रियाओं को कम करने के बिना मौसम की आपदाओं से लोगों की रक्षा के लिए योजनाओं को तुरंत तैयार करना और संवाद करना चाहिए।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि जो कार्बन उत्सर्जन जारी है, और इसके परिणामस्वरूप जो पृथ्वी ग्रह का ताप बढ़ेगा, उससे तेजी से यह होने की संभावना है कि कई आपात स्थिति एक ही समय में होगी, जैसा कि इस गर्मी में हो सकता है – भविष्य में इस तरह की संयुक्त आपदाओं की संभावना को सीमित करने के लिए बढ़ते जोखिमों के सामने लचीलापन में बहुत बड़े निवेशों के साथ कार्बन उत्सर्जन में आमूल-चूल कटौती की आवश्यकता की ज़रूरत है। कोविड -19 वसूली निवेश जीवन काल में अधिक लचीला दुनिया को आकार देने का एक अवसर है।

Climate change itself is a huge risk

डॉ. कैट क्रैमर, ग्लोबल क्लाइमेट लीड, क्रिश्चियन एड, ने कहा :

“ जलवायु परिवर्तन अपने आप में एक बहुत बड़ा जोखिम है, लेकिन यह एक जोखिम गुणक के रूप में भी काम करता है। हमें कोविड से एक ऐसे तरह से वापस निर्माण करने की आवश्यकता है जो समाज और प्राकृतिक दुनिया का लचीलापन बढ़े और तेजी और मौलिक रूप से हमारे उत्सर्जन को कम करे, अन्यथा हम बस एक और आपदा को कम कर रहे हैं।“

We have to deal with both coronavirus and climate crisis simultaneously

नैरोबी स्थित थिंक टैंक पावर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद अडो (Mohamed Adow is the Director of Power Shift Africa, a climate and energy think tank based in Nairobi) ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन से प्रभावित चरम मौसम की घटनाएं पहले से ही कुछ देशों के लिए एक नियमित संकट बन रही हैं। लेकिन जैसे राष्ट्र कोविड -19 का सामना करने की कोशिश और प्रतिक्रिया करते हैं हम जो मानवीय पीड़ा देखनी की उम्मीद कर सकते हैं वो दूसरे स्तर पर होंगे। बचावकर्मियों के लिए सामाजिक रूप से उन लोगों से दूरी बनाना लगभग असंभव है जिन्हें वे बचाने की कोशिश कर रहे हैं और अकसर बचे हुए लोग कुछ समय के लिए तंग परिस्थितियों में रहते हैं। यह अधिक प्रमाण है कि हमें कोरोनावायरस और जलवायु संकट दोनों से एक साथ निपटना होगा और शून्य कार्बन समाज के संक्रमण में तेजी लाने के लिए आर्थिक सुधार निधि तैनात करनी होगी।

यूनिसेफ फ्रांस के जनरल डायरेक्टर सेबास्टियन लियोन ने कहा:

“गर्मी के दिनों में भीषण गर्मी की स्थिति में सबसे अधिक वंचित आबादी सबसे अधिक जोखिम में होती है और वे महामारी के परिणामों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित भी होती हैं। अनिश्चित आवास में रहने वाले लोग, जिनमें से आधे बच्चे या युवा हैं, पहले से ही स्वच्छता, भोजन और बिजली के लिए पानी तक पहुंचने में कठिनाई झेल रहें है। बेघर लोगों को कारावास के दौरान शरण दी गई है पर वो उनसे छिन जाएगी (इसमें युवा और परिवार शामिल हैं), और सड़कों पर रहने की स्थिति और भी कठिन हो सकती है और उनके जीवन को खतरे में डाल सकती है। ”

अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के अर्थ सिस्टम साइंस सेंटर के निदेशक प्रोफेसर माइकल मैन ने कहा :

“जैसा कि हम गर्मियों के महीनों में बढ़ते हैं, हम निस्संदेह चरम मौसम की घटनाओं के एक और हमले को देखेंगे -सुपरस्टॉर्म, बाढ़, सूखा, हीटवेव और वाइल्डफायर-जो हमें और जलवायु परिवर्तन की ओर उजागर करती हैं-अतिरंजित जोखिम। परन्तु इस बार हमारी भेद्यता वर्तमान महामारी से बढ़ गई है क्योंकि हम एक साथ कई संकटों का सामना करने, और अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर अधिक बाधाओं का सामना करने, के लिए मजबूर हैं, जिससे क्षति और स्वास्थ्य खतरों को कम करने की हमारी क्षमता सीमित है। यह ‘खतरों के गुणक’ की अनु स्मारक है, के जलवायु परिवर्तन वास्तव में लगभग हर दूसरे खतरे जिसका हम सामना कर रहें है उससे हमारे लिए बदतर कर रहा है। “

रेड क्रॉस रेड क्रीसेंट क्लाइमेट सेंटर के प्रोफेसर मार्टिन वैन आल्स्ट ने कहा :

“यह महत्वपूर्ण है कि हम कोविड पर तत्काल प्रतिक्रिया कार्य करें, जिसमें सामाजिक दूरी भी शामिल है, लेकिन इस ही समय में हमें निरंतर जलवायु खतरों के लिए तैयार रहना चाहिए और उनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ताकि हमारी आकस्मिक योजनाओं को मौजूदा महामारी की वास्तविकताओं से समायोजित किया जा सके। इस सटीक दुविधा का सामना पहले से ही अमेरिका के बवंडर, दक्षिण प्रशांत के चक्रवात हेरोल्ड, फिलीपींस में टाइफून अम्बो और बांग्लादेश और भारत में चक्रवात अम्फान के साथ हो चुका है।”

“यह महामारी हमारी वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को एक एक्स-रे प्रदान कर रही है, और विशेष रूप से सबसे अधिक खतरों वाले जोखिमों को उजागर कर रही है, अकसर कई खतरों को एक साथ। इन बाढ़ों और तूफानों का सामना करने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि अब बेहतर कार्रवाई का समय है।”

डॉ. निक वाट्स, लैंसेट काउंटडाउन के कार्यकारी निदेशक ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन पहले से ही लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। जबकि कई देश अब चरम घटनाओं से कमजोर लोगों को बचाने में मदद करने के लिए गर्मी और चक्रवात आश्रयों जैसे आपातकालीन उपायों का उपयोग करते हैं, ये उपाय कभी भी चरम घटनाओं से स्वास्थ्य जोखिमों को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पहले से ही खतरनाक गर्मी से अधिक लोगों को उजागर कर रहा है, श्रम उत्पादकता को कम कर रहा है और फसल की उपज क्षमता में कटौती कर रहा है। महामारी इस साल लोगों को चरम घटनाओं से बचाना कठिन बना सकती है, लेकिन केवल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती लोगों को भविष्य के चरम घटनाओं से बचाएगा। “

डॉ. सलीमुल हक, इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डेवलपमेंट, बांग्लादेश के निदेशक ने कहा :

“चक्रवात अम्फान ने कोविड 19 महामारी के साथ-साथ लॉकडाउन और सामाजिक दूरी करने के उपायों को संयोजित कर दिया है। जबकि बांग्लादेश में चक्रवात चेतावनी और चक्रवात आश्रयों की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, उन आश्रयों में सामाजिक दूरी का अभ्यास करना लगभग असंभव है।”

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) में जलवायु और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रमुख गर्नोट लागंदा (Gernot Laganda, Head of Climate and Disaster Risk Reduction at United Nations World Food Program (WFP)) ने कहा :

“कोविड -19 महामारी जलवायु संकट से टकराती रहती है। जबकि कई देशों की तात्कालिक प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा करना और कोविड -19 के प्रसार को रोकना है, ऐसे में सुरक्षा जाल होना आवश्यक है जो कमजोर लोगों को कोविड के दोहरे खतरे और जलवायु प्रभावों से बचाए। हीटवेव, बाढ़, तूफान और सूखा, महामारी के आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों को बढ़ा रहे हैं, जो कि अत्यधिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। इस तरह के परस्पर जोखिम से केवल परस्पर सिस्टम ही निपट सकता है जो खतरे के पूर्वानुमान और सूचना प्रबंधन, निरंतर भेद्यता आकलन और सामाजिक सुरक्षा को सक्षम बनाता है जो जलवायु जोखिम बीमा और पूर्वानुमान आधारित वित्तपोषण के साथ काम करता है। “