जस्टिस काटजू ऐसा क्यों लिखते हैं कि आजकल ज्यादातर उर्दू शायरी बकवास होती है

मिर्ज़ा ग़ालिब ने कभी किसी शायर की शायरी को ‘दाद’ नहीं दिया जब तक कि वो संतुष्ट न हो जाते कि शेर सचमुच प्रशंसा के लायक हैं (देखें हाली की ग़ालिब पर जीवनी)।

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क्या भारत को आधुनिक सोच वाली तानाशाही की आवश्यकता है?

जातिवाद और साम्प्रदायिकता सामंती ताकतें हैं, यदि भारत को आगे बढ़ाना है तो इन्हें नष्ट करना होगा, लेकिन संसदीय लोकतंत्र उन्हें और भी जकड़े हुए है। इसलिए इसे एक ऐसी व्यवस्था से बदलना होगा जिसके तहत देश तेजी से आगे बढ़े।

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आरफा खानम शेरवानी को कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार दिए जाने पर जस्टिस काटजू को आपत्ति क्यों हैं?

हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के बीच सामंती, पिछड़ी प्रथाओं की निंदा करनी चाहिए। लेकिन आरफा खानम शेरवानी केवल हिंदू समाज में फैली बुराइयों की आलोचना करती हैं। यह उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ के बारे में सच्चाई है

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विश्व का सबसे महान दोहा

“दीन सभन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय। जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय” अर्थात… “गरीब सभी की ओर देखते हैं (अर्थात मदद

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