मिट्टी के दिये : पैबंद की हँसी

इन दिनों जाने कौन से सफ़र पर हूँ , जहाँ के रास्तों के दोनों ओर लपट उठ रही हैं । चटखती लकड़ियों की आवाज़ें ,

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पैबंद की हँसी : क्यूँ हम लड़कियों के हिस्से में अपने पूरे खेत कभी नहीं आते ?

यूँ तो  महीनों पहले ही  काम पूरा हो गया था, पर बीते दिनों अजीब सा माहौल था- ज़िंदगी मौत की जंग, चारों तरफ़ हाहाकार, लोगों की आँखो में बारिशें ठहर गयीं। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या कहें क्या लिखें, सहमी सहमी आँखों से भाव टप टप बहे जा रहे थे। किताब का क्या सोचती, क़लम की सांसें ही थमी थमी सी थीं। शायद ऑक्सीजन कम हो गयी थी …

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तुम मुझे मामूल बेहद आम लिखना

तुम मुझे मामूल बेहद आम लिखना जब भी लिखना फ़क़त गुमनाम लिखना यह शरारों की चमक यह लहजों की शहद रौशनी की शोहरतें दियों की

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