139 मिलियन से अधिक लोग जलवायु संकट और कोविड-19 की चपेट में : नया विश्लेषण

climate change

More than 139 million people hit by climate crisis and COVID-19, new IFRC analysis reveals

न्यूयॉर्क, जिनेवा, 18 सितंबर 2021: इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, चरम मौसम की घटनाओं और महामारी ने एक साथ लाखों लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उनका कहना है कि जलवायु और कोविड संकट के संयोजन ने रिलीफ़ (राहत-सहायता प्रतिक्रिया) प्रयासों में बाधा डालने के साथ-साथ अभूतपूर्वमानवीय ज़रूरतें पैदा की हैं।

IFRC की रिपोर्ट के अनुसार, 140 मिलियन लोग – रूस की लगभग पूरी आबादी के बराबर – महामारी के दौरान बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग से प्रभावित हुए हैं। 65 से अधिक या पांच साल से कम उम्र के 660 मिलियन लोग हीटवेव (गर्मी की लहर) की चपेट में आ गए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का लगभग दोगुना है।

The paper also highlights the need of addressing both crises simultaneously as the COVID-19 pandemic has affected livelihoods across the world and has made communities more vulnerable to climate risks.

कोविड की चपेट में आने के बाद से सबसे घातक घटना (जिसके लिए डाटा उपलब्ध है) पश्चिमी यूरोप में 2020 की हीटवेव थी, जिसमें बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और यूके में 11,000 से अधिक मौतें हुईं। जबकि भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 20.6 मिलियन लोगों को प्रभावित करने वाली महामारी के दौरान चक्रवात अम्फान ने सबसे गंभीर जलवायु संकट बनाया। हीटवेवों ने शीर्ष तीन सबसे घातक घटनाओं में से दो को बनाया, और आज होने वाली हर हीटवेव जलवायु परिवर्तन से अधिक संभावित और अधिक तीव्र हो जाती है। जून 2020 में आई बाढ़ से भारत में क़रीब 2000 लोग प्रभावित हुए थे।

The compound impact of extreme weather events and COVID-19

वैज्ञानिक घटना एट्रिब्यूशन अध्ययनों में पाया गया है कि ग्लोबल हीटिंग ने कई विशिष्ट घटनाओं को शक्तिशाली, लंबा या अधिक संभावित बना दिया। कुछ घटनाएं – जैसे कि प्रशांत नॉर्थवेस्ट में 2021 हीटवेवजलवायु परिवर्तन के बिना दुनिया में लगभग असंभवहोती।

जलवायु परिवर्तन मौजूदा संवेदनशीलताओं और खतरों को बदतर बना देता है, और इसने विशेष रूप से उन लोगों को प्रभावित किया है जो पहले से ही महामारी की वजह से संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, सीरिया और इराक़ में जारी सूखा पानी की उपलब्धता और बिजली आपूर्ति दोनों को कम कर रहा है क्योंकि जलविद्युत बांध सूख जाते हैं, जिससे स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवा प्रभावित होती है। होंडुरास और दक्षिण एशिया में तूफ़ान के दौरान, रिलीफ़ (राहत-सहायता) कार्यों को अपने घरों से भागने वालों के लिए अतिरिक्त सार्वजनिक आश्रयों की तलाश करनी पड़ी ताकि सामाजिक दूरी को बनाए रखा जा सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य जगहों पर जंगल की आग से होने वाले धुएं ने लोगों के फेफड़ों को परेशान कर दिया और इससे कोविड के मामलों और कोविड से होने वाली मौतों में वृद्धि हुई।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) का कहना है कि समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रति एडाप्ट होने के लिए और अधिक सहायता की आवश्यकता है, और यह कि जलवायु और महामारी को एक साथ संबोधित करने से आर्थिक रूप से अधिक लचीली रिकवरी होगी।

कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से, जलवायु संबंधी आपदाओं ने कम से कम 139.2 मिलियन लोगों के जीवन को प्रभावित किया है और यह 17,242 से अधिक लोगों की मौत का कारण बनी हैं।

यह एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं और कोविड-19 के मिश्रित प्रभावों पर यह इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) और रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर द्वारा आज प्रकाशित एक नए विश्लेषण की खोज है। और अनुमानित 658.1 मिलियन लोग अत्यधिक तापमान के संपर्क में आए हैं। नए डाटा और विशिष्ट केस स्टडीज़ के माध्यम से, रिपोर्ट दिखाती है कि कैसे दुनिया भर में लोग कई संकटों का सामना कर रहे हैं और ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संवेदनशीलताओं से जूझ रहे हैं।

पेपर दोनों संकटों को एक साथ संबोधित करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है क्योंकि कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में आजीविका को प्रभावित किया है और समुदायों को जलवायु जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है।

The world is facing an unprecedented humanitarian crisis where the climate change and COVID-19 are pushing communities to their limits

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के अध्यक्ष, फ्रांसेस्को रोक्का (The IFRC President, Francesco Rocca), जिन्होंने बीती 16 दिसंबर को न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नई रिपोर्ट पेश की, ने कहा:

“दुनिया एक अभूतपूर्व मानवीय संकट का सामना कर रही है जहाँ जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 समुदायों को उनकी सीमा तक धकेल रहे हैं। COP26 के होने तक के समय में, हम विश्व के नेताओं से न केवल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए, बल्कि जलवायु परिवर्तन के मौजूदा और होनेवाला मानवीय प्रभावों को सम्भोदित करने के लिए भी तत्काल कार्रवाई करने के लिए आग्रह करते हैं।”

रिपोर्ट कोविड-19 संकट के दौरान हुई एक्सट्रीम (चरम) – मौसम की घटनाओं के ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) जोखिमों के प्रारंभिक विश्लेषण[1] के एक साल बाद आई है। महामारी का कहर दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों के साथ जारी है, लेकिन साथ ही बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष प्रभाव भी है, जो थोड़ा-बहुत महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए प्रतिक्रिया उपायों के कारण है। मौसम की एक्सट्रीम (चरम सीमा) के कारण होने वाली खाद्य असुरक्षा को कोविड-19 ने और बढ़ा दिया है। स्वास्थ्य प्रणालियों को उनकी सीमा तक धकेल दिया गया है और सबसे संवेदनशीलत लोगों को ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) सदमों का सामना करना पड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

अफ़ग़ानिस्तान में, भीषण सूखे के प्रभाव संघर्ष और कोविड-19 के कारण और भी बढ़ गए हैं। सूखे ने कृषि खाद्य उत्पादन को अशक्त बना दिया है और पशुधन को कम कर दिया है, जिससे लाखों लोग भूखे और कुपोषित रह गए हैं। अफ़ग़ान रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने सहायता बढ़ाई है, जिसमें लोगों के खाद्य आपूर्ति खरीदने के लिए भोजन और नकद सहायता, सूखा-प्रतिरोधी खाद्य फसलें लगाने और अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए सहायता शामिल है।

होंडुरास में जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव

होंडुरास में, महामारी के दौरान तूफ़ान एटा और आइओटा का सामना करने में, का मतलब अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना भी था। अस्थायी आश्रयों में हजारों लोग बेघर हो गए। उन आश्रयों में एंटी-कोविड-19 उपाय कार्यवाही के लिए शारीरिक दूरी और अन्य सुरक्षात्मक उपायों की आवश्यकता थी, जिनसे क्षमता सीमित हुई।

केन्या में, कोविड-19 के प्रभाव एक साल में बाढ़ और अगले साल सूखे के साथ-साथ टिड्डियों के प्रकोप से टकरा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 2.1 मिलियन से अधिक लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। देश में और पूर्वी अफ्रीका के पार, कोविड-19 प्रतिबंधों ने बाढ़ का सामना करने की सहायता प्रतिक्रिया और प्रभावित आबादी तक आउटरीच को धीमा कर दिया जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ गई।

IFRC (आईएफआरसी) के बारे में

IFRC दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय नेटवर्क है, जिसमें 192 नेशनल रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसाइटी शामिल हैं, जो दुनिया भर में लोगों की जान बचाने और सम्मान को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

दुनिया भर में रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसायटीयां न केवल उन ओवरलैपिंग (अतिव्यापी) संकटों की प्रतिक्रिया में सहायता दे रही हैं बल्कि समुदायों को जलवायु जोखिमों के लिए तैयार करने और उनका अनुमान लगाने में भी मदद कर रही हैं।

उदाहरण के लिए बांग्लादेश में, रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) के नामित धन का उपयोग बाढ़ से संबंधित अर्ली वार्निंग मेसेजेस (पूर्व चेतावनी संदेशों) को लाउडस्पीकर के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रसारित करने के लिए किया है ताकि लोग आवश्यक उपाय कार्यवाही कर सकें और यदि आवश्यक हो तो इवैक्यूएट (इलाक़ा ख़ाली) कर सकें।

RCRC (आरसीआरसी) क्लाइमेट सेंटर की एसोसिएट डायरेक्टर जूली अरिघी ने कहा :

“खतरों को आपदा बनने की ज़रूरत नहीं है। अगर हम स्थानीय स्तर पर संकटों की आशंका, शीघ्र कार्रवाई और जोखिम में कमी लाना जैसे करते हैं इसे बदलते हैं तो हम बढ़ते जोखिमों की प्रवृत्ति का मुक़ाबला कर सकते हैं और जीवन बचा सकते हैं। अंत में, हमें समुदायों को अधिक लचीला बनने में मदद करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से सबसे संवेदनशील संदर्भों में।”

कोविड-19 महामारी का जलवायु जोखिमों पर अधिक देर तक रहने वाला प्रभाव पड़ा है। सरकारों को सामुदायिक एडाप्टेशन, प्रत्याशा प्रणाली और स्थानीय अभिनेताओं में निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध होने की ज़रुरत है।

कोविड-19 रिकवरी में बड़े पैमाने पर खर्च यह साबित करता है कि सरकारें वैश्विक खतरों का सामना करने के लिए तेज़ी से और प्रबलतीव्र रूप से कार्य कर सकती हैं। यह शब्दों को क्रिया में बदलने और उसी ताक़त को जलवायु संकट के लिए समर्पित करने का समय है। हर दिन, हम मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देख रहे हैं। जलवायु संकट यहाँ है, और हमें अभी कार्य करने की आवश्यकता है,” रोक्का ने कहा।

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बच्चों पर जलवायु संकट के प्रभावों का ‘अत्यंत उच्च जोखिम’ : यूनिसेफ

Climate change Environment Nature

One billion children at ‘extremely high risk’ of the impacts of the climate crisis – UNICEF

Almost every child on earth is exposed to at least one climate shock.

In fact, 1 billion children are at extremely high risk – that’s nearly 1/2 of the world’s children. Inaction is not an option: governments must take bold urgent actions to achieve ‘net zero’ emissions by 2050.

नई दिल्ली, 21 अगस्त 2021. अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान में रहने वाले छोटे बच्चों एवं युवाओं को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सबसे अधिक खतरा है, जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के लिए खतरा है।

हाल ही में जारी यूनिसेफ की एक नई रिपोर्ट The Climate Crisis Is a Child Rights Crisis: Introducing the Children’s Climate Risk Index’ में यह दावा किया गया है। इसके अलावा, नेपाल और श्रीलंका विश्व स्तर पर सबसे अधिक प्रभावित शीर्ष 65 देशों में शामिल हैं।

क्या है द क्लाइमेट क्राइसिस इज ए चाइल्ड राइट्स क्राइसिस: इंट्रोड्यूसिंग द चिल्ड्रन क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स (सीसीआरआई)

द क्लाइमेट क्राइसिस इज ए चाइल्ड राइट्स क्राइसिस: इंट्रोड्यूसिंग द चिल्ड्रन क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स (सीसीआरआई) यूनिसेफ का पहला बाल केंद्रित जलवायु जोखिम सूचकांक है। यह आवश्यक सेवाओं तक उनकी पहुंच के आधार पर बच्चों के जलवायु और पर्यावरणीय झटके, जैसे चक्रवात और गर्मी की लहरों के साथ-साथ उन झटकों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के आधार पर देशों को रैंकिंग देता है।

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भारत उन चार दक्षिण एशियाई देशों में शामिल हैं, जहां बच्चों पर जलवायु संकट के प्रभाव का अत्यधिक जोखिम है, जिनकी रैंकिंग क्रमश: 14, 15, 15 और 26 है। नेपाल जहां 51वें स्थान पर है, वहीं श्रीलंका 61वें स्थान पर है। अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले बच्चों के साथ भूटान 111वें स्थान पर है।

चार दक्षिण एशियाई देशों सहित अत्यधिक उच्च जोखिम के रूप में वर्गीकृत 33 देशों में से एक में लगभग एक अरब बच्चे रहते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दक्षिण एशिया के लिए यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक जॉर्ज लारिया-अडजेई के मुताबिक, पहली बार, हमारे पास दक्षिण एशिया में लाखों बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के स्पष्ट प्रमाण हैं। पूरे क्षेत्र में सूखे, बाढ़, वायु प्रदूषण और नदी के कटाव ने लाखों बच्चों को बिना किसी स्वास्थ्य देखभाल और पानी के बेघर और भूखा छोड़ दिया है।

उन्होंने आगे कहा, एक साथ, जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 महामारी ने दक्षिण एशियाई बच्चों के लिए एक खतरनाक संकट पैदा कर दिया है। अब कार्य करने का समय है – अगर हम पानी, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा में निवेश करते हैं, तो हम बदलते मौसम और बिगड़ते पर्यावरण के प्रभावों से उनके भविष्य की रक्षा कर सकते हैं।

रिपोर्ट में पाया गया कि ये दक्षिण एशियाई बच्चे नदी की बाढ़ और वायु प्रदूषण से लगातार खतरे में हैं, लेकिन यह भी पाया गया है कि बाल स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में निवेश से बच्चों को जलवायु परिवर्तन से बचाने में महत्वपूर्ण अंतर आ सकता है।

दक्षिण एशिया 60 करोड़ से अधिक बच्चों का घर है और विश्व स्तर पर यहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। दक्षिण एशियाई देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए विश्व स्तर पर सबसे कमजोर देशों में से हैं।

अत्यधिक जलवायु से संबंधित घटनाएं – हीटवेव, तूफान, बाढ़, आग और सूखा – हर साल क्षेत्र की आधी से अधिक आबादी को प्रभावित करती हैं और दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर बोझ डालना जारी रखे हुए है।

बढ़ते वैश्विक तापमान और बदलते मौसम के मिजाज ने दक्षिण एशिया के जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लाखों बच्चों के भविष्य को लगातार खतरे में डाल दिया है। इससे भी बदतर, इससे पहले कि वे एक आपदा से उबर सकें, दूसरी कोई आपदा हमला कर देती है और इस संबंध में की गई किसी भी प्रगति को उलट देती है।

रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कहां उत्पन्न होता है (Where do greenhouse gas emissions originate?), जहां बच्चे सबसे महत्वपूर्ण जलवायु-संचालित प्रभावों को सहन कर रहे हैं, के बीच संबंध है। 33 अत्यंत उच्च जोखिम वाले देश, जिनमें दक्षिण एशिया के चार देश शामिल हैं, सामूहिक रूप से वैश्विक सीओ2 उत्सर्जन का केवल 9 प्रतिशत उत्सर्जित करते हैं। इसके विपरीत, 10 सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देश सामूहिक रूप से वैश्विक उत्सर्जन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं।

वयस्कों की तुलना में, बच्चों को अपने शरीर के वजन के प्रति यूनिट अधिक भोजन और पानी की आवश्यकता होती है और वे चरम मौसम की घटनाओं से बचने में कम सक्षम होते हैं। यही नहीं, वे अन्य कारकों के बीच जहरीले रसायनों, तापमान परिवर्तन और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए आवश्यक तत्काल कार्रवाई के बिना, बच्चों को सबसे अधिक नुकसान होता रहेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूनिसेफ इंडिया के प्रतिनिधि डॉ. यास्मीन अली हक ने कहा, जलवायु परिवर्तन एक बाल अधिकार संकट है। बच्चों के जलवायु परिवर्तन सूचकांक के आंकड़ों ने पानी और स्वच्छता, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं तक मौजूदा अपर्याप्त पहुंच पर जलवायु और पर्यावरणीय झटकों के तीव्र प्रभाव के कारण बच्चों द्वारा सामना किए जाने वाले गंभीर अभावों की ओर इशारा किया है। यह समझना कि बच्चे कहां और कैसे इस संकट के प्रति विशिष्ट रूप से संवेदनशील हैं, हमारे लचीलेपन के निर्माण और जलवायु परिवर्तन को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

डॉ. हक ने आगे कहा, यूनिसेफ को उम्मीद है कि रिपोर्ट के निष्कर्ष सबसे अधिक जोखिम वाले लोगों की सुरक्षा के लिए कार्रवाई को प्राथमिकता देने में मदद करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि बच्चों को रहने योग्य ग्रह विरासत में मिले।

चक्रवात जैसी आपदाओं की भविष्यवाणी में मौसम विभाग की भूमिका

super cyclone Amphan

Role of Meteorological Department in predicting disasters like cyclones

नई दिल्ली, 28 मई : चक्रवात अपने भीषण रूप में हो तो वह जिंदगी को कई दशक पीछे धकेल सकता है। हाल ही में भारत अरब सागर में उठे ‘ताउते‘ तूफान के कारण हुई तबाही (devastation caused by the Cyclone Tauktae in the Arabian Sea) से पूरी तरह उबर नही सका था कि बंगाल की खाड़ी में आए ‘यास‘ तूफान ने अपनी दस्तक दे दी। चक्रवातों जैसी इन आपदाओं की सटीक जानकारी प्रदान करने में भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मौसम विभाग की सटीक जानकारियों के कारण ही हम जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम कर पाने में सक्षम हो सके हैं।

दुनिया के चक्रवात प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है भारतीय उपमहाद्वीप

भारत एक उपमहाद्वीप देश है। दुनिया के लगभग 10 प्रतिशत उष्णकटिबंधीय चक्रवात इस क्षेत्र में आते हैं, जिससे यह दुनिया के चक्रवात प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में गिना जाता है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में हर साल औसतन लगभग पाँच से छह उष्णकटिबंधीय चक्रवात आते हैं, जिनमें दो से तीन चक्रवात गंभीर चक्रवाती तूफान की तीव्रता (Cyclone intensity) तक पहुँचते हैं। ऐसें में, भारतीय मौसम विभाग (India Meteorological Department -आईएमडी) की महत्ता बढ़ जाती है।

चक्रवाती तूफान क्यों पैदा होते हैं | Why do cyclones form

चक्रवाती तूफानों के पैदा होने की बात की जाए तो यह कोरियॉलिस इफेक्ट की वजह से पैदा होते हैं, जिसका संबंध पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने से है। भूमध्य रेखा के नजदीक जहाँ समुद्र का पानी गर्म होकर 26 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो जाता है, इन च्रकवातों के उद्गम स्थल माने जाते हैं। सूरज की तपिश से जब हवा गर्म होकर ऊपर उठती है, तो वायुमंडल में वहाँ कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। इस खाली जगह को भरने के लिए हवाएं काफी तेज गति से आती हैं, और गोल घूमकर कई बार चक्रवात में तब्दील हो जाती हैं।

पृथ्वी के दोनों गोलार्धों में चक्रवात के मामले देखने को मिलते हैं। दक्षिणी गोलार्ध में यह तूफानी बवंडर घड़ी की सुई की दिशा में घूमने के लिए जाना जाता है। जबकि, उत्तरी गोलार्ध में इसकी दिशा बदल जाती है। यहाँ पर यह घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में घूमता है। यह दोनों में एक बुनियादी फर्क है।

भारत मौसम विभाग के प्रमुख काम | Major responsibilities of India Meteorological Department

भारत जलवायु एवं मौसम की विविधता वाला देश है। यहाँ चक्रवात, बाढ़, सूखा, भूकंप, भूस्खलन, ग्रीष्म एवं शीत लहर सहित विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन प्राकृतिक खतरों के कारण विभिन्न समुदायों के लिए एक खतरा पैदा हो जाता है। इस खतरे को कम करने में प्रभावी पूर्वानुमान को जोखिम प्रबंधन का एक अहम हिस्सा माना जाता है। ऐसे पूर्वानुमानों से चक्रवात जैसी आपदाओं के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्रित करना और उन्हें विभिन्न माध्यमों से जनसामान्य तक प्रेषित करना भारत मौसम विभाग (आईएमडी) का एक महत्वपूर्ण कार्य है। चक्रवातों के संदर्भ में आईएमडी का जोखिम प्रबंधन कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें आसन्न खतरे और कमियों का विश्लेषण, योजना बनाना, पूर्व चेतावनी जारी करना और रोकथाम शामिल हैं।

चक्रवात जैसी आपदा के खतरा को कम करने में एक महत्वपूर्ण घटक उसकी भयावहता और विनाशक प्रवृत्ति का सटीक विश्लेषण कर उसकी उचित तैयारी करने से संबंधित। इसके लिए आईएमडी की कोशिश पूर्व चेतावनी और उसके प्रसार के संबंध में सटीक जानकारी देने की होती है।

मौसम विभाग ने मौसम के पूर्वानुमान और अग्रिम चेतावनी के लिए देशभर में अनेक जगहों पर चक्रवात निगरानी रडार स्थापित किए हैं। ये रडार पूर्वी तट में कोलकाता, पारादीप, विशाखापट्टनम, मछलीपट्टनम, मद्रास एवं कराईकल और पश्चिमी तट में कोचीन, गोवा, मुंबई और भुज में स्थापित किए गए हैं। उपग्रहों के जरिये चक्रवातों की स्थिति की पहचान करने में मौसम विभाग की कार्यप्रणाली पहले की अपेक्षा काफी बेहतर हुई है।

मौसम विभाग की इस छवि को बदलने का श्रेय भारतीय मौसम वैज्ञानिकों को जाता है। आज पूरी दुनिया इस दिशा में भारत की ओर देखती है और मौसम विभाग के सटीक पूर्वानुमान की जानकारी के कारण पड़ोसी देशों को भी जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए काफी मदद मिली है।

भारत में मौसम विभाग की स्थापना ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में हो गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने मौसम के अध्ययन के लिए इसकी स्थापना की थी।

(इंडिया साइंस वायर)

लॉकडाउन के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के चलते भीषण गर्मी, आंधी, तूफ़ान जैसी चरम मौसम घटनाओं की चेतावनी

Environment and climate change

“उत्तरी गोलार्ध में आसमान से बरसती आग और समुद्रों में उठते तूफ़ान का मौसम आ गया

Warning of extreme weather events like severe heat, storm, storm due to lockdown as well as climate change

विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली हीटवेव, उष्णकटिबंधीय तूफान (Heatwave, tropical storm) और आग के मौसम इस वर्ष और भी घातक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन से बिगड़ी घटनाओं की परिस्थितियों कोविड महामारी के चलते हो रहे लॉकडाउन की वजह से और भी बेढब हो जाएँगी।

भारत और बांग्लादेश पहले से ही प्रकृति का प्रकोप झेल रहे हैं | India and Bangladesh are already facing the wrath of nature

गर्मी की शुरुआत के साथ, उत्तरी गोलार्ध के देश खतरे के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले होते हैं जब चरम मौसम के जोखिम सबसे बड़े होते हैं। भारत और बांग्लादेश पहले ही वर्ष के अपने पहले बड़े तूफान, चक्रवात अम्फान (Storm, cyclone amphAn) की चपेट में आ चुके हैं। अमेरिका और कैरिबियन में तूफान का मौसम 1 जून से शुरू होता है, पूर्वानुमान के साथ कि इस साल तूफान सामान्य से अधिक खराब हो सकते है। Pacific  northwest windstorms

उत्तर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में टाइफून (Typhoon in the Northwest Pacific) आमतौर पर मई से तेज होता है।

आम तौर पर जुलाई और अगस्त से आने वाली उत्तरी गोलार्ध की गर्मी के चरम के साथ, आने वाले हफ्तों में अत्यधिक गर्मी और जंगल की आग (Forest fire) का खतरा भी बढ़ जाएगा, और सबसे खतरनाक आग आमतौर पर एक ही समय से शुरू होती है और कभी-कभी कई महीनों तक चलती रहती है। यह संभावना है कि 2020 रिकॉर्ड पर दुनिया का सबसे गर्म वर्ष होगा।

Combined effects of heatwave and COVID-19

डब्लू.एच.ओ. और डब्लू.एम.ओ. के साथ ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (Global Heat Health Information Network) ने इस हफ्ते हीटवेव और कोविड-19 के संयुक्त प्रभाव को संभालने के बारे में तत्काल मार्गदर्शन जारी किया।

दक्षिणी गोलार्ध सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में पहले से ही चरम मौसम का सामना करना पड़ रहा है, उदाहरण के लिए, पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में वर्तमान में भारी बारिश के बाद विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का सामना करना पड़ रहा है, और साथ में सैकड़ों अरबों टिड्डी अभी भी अधिकांश क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों के साथ, चरम मौसम की स्थिति से प्रेरित भाग में।

Carbon emissions promote hazards from hurricanes, heatwaves and fires.

जलवायु परिवर्तन ने चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और गंभीरता में वृद्धि की है, विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन से तूफान, हीटवेव और आग से खतरों को बढ़ावा मिलता है। उच्च तापमान के प्रभावों में लंबे समय तक चलने वाले, अधिक गर्म और अधिक लगातार, हीटवेव होते हैं, जिससे जंगल की आग का खतरा भी बढ़ जाता है, और तूफान जो अधिक बलवान होते हैं और अत्यधिक बहाव में भारी वर्षा जारी करते हैं।

इस साल ये घटनाएं और भी खतरनाक हो सकती हैं, विशेषज्ञों का कहना है, क्योंकि आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ उपाय कोरोनावायरस महामारी से निपटने वाली आबादी के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होंगे। इन उपायों में सांप्रदायिक आपातकालीन आश्रय हैं जो व्यापक रूप से तूफान, बवंडर और अत्यधिक गर्मी से शरणार्थी के रूप में उपयोग किए जाते हैं – लेकिन ये सामाजिक दूरी की आवश्यकताओं से सीमित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह चक्रवात अम्फान के लिए निकासी के दौरान सफल समायोजन किए गए हैं, लेकिन ये आगे कमजोर समुदायों और पहले उत्तरदाताओं के सामने आने वाली चुनौतियों को जटिल बनाते हैं।

Other factors that can increase the risk from extreme weather this year

अन्य कारक इस वर्ष अत्यधिक मौसम से जोखिम भी बढ़ा सकते हैं। बहुत से लोग – विशेष रूप से सबसे कमजोर – वायरस के संपर्क से बचने के लिए अपने घरों को छोड़ने के लिए शायद तैयार नहीं हो सकें, जिससे उन्हें अत्यधिक गर्मी और तूफानों से खतरा झेलने की सम्भावना बढ़ सकती है। कुछ देशों में अति-विस्तारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं मांग में अचानक वृद्धि के साथ असमर्थ हो सकती हैं, जबकि अग्निशामक वायरस के प्रकोप के दौरान विल्डफोर्स का मुकाबला करने के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

महामारी की आर्थिक लागत (Epidemic economic cost) भी इस साल चरम मौसम से प्रभावित लोगों का समर्थन करने और उनके पुनर्निर्माण में मदद करना अधिकारियों के लिए कठिन बना सकती है।

विशेषज्ञों का तर्क है, कि चरम घटनाओं के जोखिम वाले स्थानों पर स्थानीय और राष्ट्रीय प्राधिकरण को महामारी के लिए प्रतिक्रियाओं को कम करने के बिना मौसम की आपदाओं से लोगों की रक्षा के लिए योजनाओं को तुरंत तैयार करना और संवाद करना चाहिए।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि जो कार्बन उत्सर्जन जारी है, और इसके परिणामस्वरूप जो पृथ्वी ग्रह का ताप बढ़ेगा, उससे तेजी से यह होने की संभावना है कि कई आपात स्थिति एक ही समय में होगी, जैसा कि इस गर्मी में हो सकता है – भविष्य में इस तरह की संयुक्त आपदाओं की संभावना को सीमित करने के लिए बढ़ते जोखिमों के सामने लचीलापन में बहुत बड़े निवेशों के साथ कार्बन उत्सर्जन में आमूल-चूल कटौती की आवश्यकता की ज़रूरत है। कोविड -19 वसूली निवेश जीवन काल में अधिक लचीला दुनिया को आकार देने का एक अवसर है।

Climate change itself is a huge risk

डॉ. कैट क्रैमर, ग्लोबल क्लाइमेट लीड, क्रिश्चियन एड, ने कहा :

“ जलवायु परिवर्तन अपने आप में एक बहुत बड़ा जोखिम है, लेकिन यह एक जोखिम गुणक के रूप में भी काम करता है। हमें कोविड से एक ऐसे तरह से वापस निर्माण करने की आवश्यकता है जो समाज और प्राकृतिक दुनिया का लचीलापन बढ़े और तेजी और मौलिक रूप से हमारे उत्सर्जन को कम करे, अन्यथा हम बस एक और आपदा को कम कर रहे हैं।“

We have to deal with both coronavirus and climate crisis simultaneously

नैरोबी स्थित थिंक टैंक पावर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद अडो (Mohamed Adow is the Director of Power Shift Africa, a climate and energy think tank based in Nairobi) ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन से प्रभावित चरम मौसम की घटनाएं पहले से ही कुछ देशों के लिए एक नियमित संकट बन रही हैं। लेकिन जैसे राष्ट्र कोविड -19 का सामना करने की कोशिश और प्रतिक्रिया करते हैं हम जो मानवीय पीड़ा देखनी की उम्मीद कर सकते हैं वो दूसरे स्तर पर होंगे। बचावकर्मियों के लिए सामाजिक रूप से उन लोगों से दूरी बनाना लगभग असंभव है जिन्हें वे बचाने की कोशिश कर रहे हैं और अकसर बचे हुए लोग कुछ समय के लिए तंग परिस्थितियों में रहते हैं। यह अधिक प्रमाण है कि हमें कोरोनावायरस और जलवायु संकट दोनों से एक साथ निपटना होगा और शून्य कार्बन समाज के संक्रमण में तेजी लाने के लिए आर्थिक सुधार निधि तैनात करनी होगी।

यूनिसेफ फ्रांस के जनरल डायरेक्टर सेबास्टियन लियोन ने कहा:

“गर्मी के दिनों में भीषण गर्मी की स्थिति में सबसे अधिक वंचित आबादी सबसे अधिक जोखिम में होती है और वे महामारी के परिणामों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित भी होती हैं। अनिश्चित आवास में रहने वाले लोग, जिनमें से आधे बच्चे या युवा हैं, पहले से ही स्वच्छता, भोजन और बिजली के लिए पानी तक पहुंचने में कठिनाई झेल रहें है। बेघर लोगों को कारावास के दौरान शरण दी गई है पर वो उनसे छिन जाएगी (इसमें युवा और परिवार शामिल हैं), और सड़कों पर रहने की स्थिति और भी कठिन हो सकती है और उनके जीवन को खतरे में डाल सकती है। ”

अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के अर्थ सिस्टम साइंस सेंटर के निदेशक प्रोफेसर माइकल मैन ने कहा :

“जैसा कि हम गर्मियों के महीनों में बढ़ते हैं, हम निस्संदेह चरम मौसम की घटनाओं के एक और हमले को देखेंगे -सुपरस्टॉर्म, बाढ़, सूखा, हीटवेव और वाइल्डफायर-जो हमें और जलवायु परिवर्तन की ओर उजागर करती हैं-अतिरंजित जोखिम। परन्तु इस बार हमारी भेद्यता वर्तमान महामारी से बढ़ गई है क्योंकि हम एक साथ कई संकटों का सामना करने, और अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर अधिक बाधाओं का सामना करने, के लिए मजबूर हैं, जिससे क्षति और स्वास्थ्य खतरों को कम करने की हमारी क्षमता सीमित है। यह ‘खतरों के गुणक’ की अनु स्मारक है, के जलवायु परिवर्तन वास्तव में लगभग हर दूसरे खतरे जिसका हम सामना कर रहें है उससे हमारे लिए बदतर कर रहा है। “

रेड क्रॉस रेड क्रीसेंट क्लाइमेट सेंटर के प्रोफेसर मार्टिन वैन आल्स्ट ने कहा :

“यह महत्वपूर्ण है कि हम कोविड पर तत्काल प्रतिक्रिया कार्य करें, जिसमें सामाजिक दूरी भी शामिल है, लेकिन इस ही समय में हमें निरंतर जलवायु खतरों के लिए तैयार रहना चाहिए और उनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ताकि हमारी आकस्मिक योजनाओं को मौजूदा महामारी की वास्तविकताओं से समायोजित किया जा सके। इस सटीक दुविधा का सामना पहले से ही अमेरिका के बवंडर, दक्षिण प्रशांत के चक्रवात हेरोल्ड, फिलीपींस में टाइफून अम्बो और बांग्लादेश और भारत में चक्रवात अम्फान के साथ हो चुका है।”

“यह महामारी हमारी वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को एक एक्स-रे प्रदान कर रही है, और विशेष रूप से सबसे अधिक खतरों वाले जोखिमों को उजागर कर रही है, अकसर कई खतरों को एक साथ। इन बाढ़ों और तूफानों का सामना करने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि अब बेहतर कार्रवाई का समय है।”

डॉ. निक वाट्स, लैंसेट काउंटडाउन के कार्यकारी निदेशक ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन पहले से ही लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। जबकि कई देश अब चरम घटनाओं से कमजोर लोगों को बचाने में मदद करने के लिए गर्मी और चक्रवात आश्रयों जैसे आपातकालीन उपायों का उपयोग करते हैं, ये उपाय कभी भी चरम घटनाओं से स्वास्थ्य जोखिमों को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पहले से ही खतरनाक गर्मी से अधिक लोगों को उजागर कर रहा है, श्रम उत्पादकता को कम कर रहा है और फसल की उपज क्षमता में कटौती कर रहा है। महामारी इस साल लोगों को चरम घटनाओं से बचाना कठिन बना सकती है, लेकिन केवल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती लोगों को भविष्य के चरम घटनाओं से बचाएगा। “

डॉ. सलीमुल हक, इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डेवलपमेंट, बांग्लादेश के निदेशक ने कहा :

“चक्रवात अम्फान ने कोविड 19 महामारी के साथ-साथ लॉकडाउन और सामाजिक दूरी करने के उपायों को संयोजित कर दिया है। जबकि बांग्लादेश में चक्रवात चेतावनी और चक्रवात आश्रयों की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, उन आश्रयों में सामाजिक दूरी का अभ्यास करना लगभग असंभव है।”

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) में जलवायु और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रमुख गर्नोट लागंदा (Gernot Laganda, Head of Climate and Disaster Risk Reduction at United Nations World Food Program (WFP)) ने कहा :

“कोविड -19 महामारी जलवायु संकट से टकराती रहती है। जबकि कई देशों की तात्कालिक प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा करना और कोविड -19 के प्रसार को रोकना है, ऐसे में सुरक्षा जाल होना आवश्यक है जो कमजोर लोगों को कोविड के दोहरे खतरे और जलवायु प्रभावों से बचाए। हीटवेव, बाढ़, तूफान और सूखा, महामारी के आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों को बढ़ा रहे हैं, जो कि अत्यधिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। इस तरह के परस्पर जोखिम से केवल परस्पर सिस्टम ही निपट सकता है जो खतरे के पूर्वानुमान और सूचना प्रबंधन, निरंतर भेद्यता आकलन और सामाजिक सुरक्षा को सक्षम बनाता है जो जलवायु जोखिम बीमा और पूर्वानुमान आधारित वित्तपोषण के साथ काम करता है। “