सरकार की आलोचना और आयकर, ईडी के छापों में क्या अन्तर्सम्बन्ध है ?

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सरकार की आलोचना और आयकर, ईडी के छापों में क्या कोई अन्तर्सम्बन्ध है ?

Is there any connection between the criticism of the government and the Income Tax, ED raids? / Vijay Shankar Singh

आयकर और ईडी के छापे 2014 के पहले भी पड़ते थे और अब भी पड़ रहे हैं तथा आगे भी पड़ते रहेंगे। पर यह छापे अधिकतर व्यापारियों या संदिग्ध लेनदेन करने वालों, आय से अधिक संपत्ति की जांच में दोषी या संदिग्ध पाए जाने वाले अफसरों पर पड़ते थे। तब इन छापों की खबरों पर कोई बहुत ध्यान नहीं देता था और न ही जिन पर यह छापा पड़ता था, उनके प्रति कोई सहानुभूति, अधिकांश जनता के मन मे उपजती थी।

आयकर और ईडी के छापों तथा पुलिस के छापों में क्या अंतर है? | What is the difference between Income Tax and ED raids and Police raids?

आयकर और ईडी के छापों तथा पुलिस के छापों में मूल अंतर यह होता है कि पुलिस के छापे आपराधिक मामलों में लिप्त या संदिग्ध लोगों पर पड़ते हैं और जो भी सूचना मिलती है उसी के आधार पर तत्काल डाले जाते हैं, जबकि आयकर के छापे काफी होमवर्क करने के बाद और निर्धारित टारगेट के सभी ठिकानों पर एक साथ डाले जाते हैं और वे लंबी अवधि तक चलते हैं।

पुलिस के छापों की सफलता का प्रतिशत बहुत अधिक नहीं होता है, जबकि आयकर के छापे कम ही असफल होते हैं क्योंकि वे, छापा डालने के पहले काफी छानबीन करते हैं और उनके छापे विवादित भी कम ही होते हैं।

पर 2014 के बाद पड़ने वाले आयकर और ईडी के छापों के बारे में एक आम धारणा यह बन रही है कि यह छापे विभागीय प्रोफेशनल दायित्व के बजाय जानबूझकर किसी पोशीदा एजेंडा के अंतर्गत डाले जा रहे हैं। जैसे इस समय जो व्यक्ति, संस्थान या संगठन, वर्तमान सत्ता के विपरीत है, या सरकार का आलोचक है उसके यहां छापा पड़ जा रहा है। अब छापे में क्या मिल रहा है या छापे के बाद क्या कार्यवाही हुयी यह तो बाद की बात है, पर छापे के उद्देश्य, टाइमिंग और लक्ष्य पर काफी सवाल सोशल मीडिया में उठाये जाने लगे हैं। अमूमन आयकर या ईडी के विभागों में राजनीतिक दखलंदाजी बहुत अधिक नहीं होती है, विशेषकर उनके प्रोफेशनल कामकाज के संबंध में, और यदि कुछ होता भी है, तो वह हस्तक्षेप दिखता भी कम ही है। पर अब, जैसे ही छापे की खबर आती है, और लक्ष्य का नाम सामने आता है, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रहता है कि वह छापा किस उद्देश्य से डाला गया है और क्यों डाला गया है। ऐसे में सबसे अधिक असहज स्थिति छापा डालने वाले विभागों और उनके अफसरों की होती है जो यदि उचित कारणों से अपनी कार्यवाही कर भी रहे है तो उस पर संशय की अनेक अंगुलियां उठती रहती हैं। संशय की अंगुलियों से असहज हो जाने वाले अफसरों की मनोदशा का अनुमान आप लगा सकते हैं।

2014 के बाद बड़े पूंजीपति या वे पूंजीपति जो सत्ता के नज़दीक हैं, के घर और अन्य ठिकानों पर, आज तक न तो किसी छापे की खबर आई और न ही किसी सर्वे की। यदि कोई यह तर्क दे कि उनके यहाँ कोई अनियमितता या चोरी नहीं होती है तो यह तर्क अपने आप में ही हास्यास्पद बचाव होगा। लेकिन 2014 के बाद छापे पड़े, मीडिया संस्थानों पर, जिन पर अमूमन छापे कम ही पड़ते हैं, उन शख्शियतों पर, जो सरकार के मुखर आलोचक हैं और उन संस्थाओं पर जो सरकार की वैचारिकी से अलग या विपरीत राय रखते हैं।

हाल ही में पड़ने वाले, कुछ महत्वपूर्ण छापों में द वायर, न्यूज़क्लिक, न्यूजलॉन्ड्री, दैनिक भास्कर, भारत समाचार, जैसे मीडिया संस्थानों पर पड़ने वाले छापे हैं।

द वायरतो शुरू से ही सत्ता विरोधी रुख रखता रहा है। उस के कार्यालय में तो, पेगासस जासूसी मामले में लगातार खुलासा करने के कारण, विनोद दुआ का नाम लेकर उन्हें तलाशती हुयी पुलिस भी गयी थी।

दैनिक भास्कर और भारत समाचार पर महामारी से होने वाली मौतों पर लगातार रिपोर्टिंग से सरकार असहज थी, तो उनके यहां भी छापा पड़ा। हालांकि सरकार ने इन छापों को, रूटीन कार्यवाही कहा, पर इस बयान के पीछे छिपे असल निहित और स्वार्थी सरकारी उद्देश्य की पहचान कर लेना कठिन नहीं था। इसमें, भास्कर कोई सत्ता विरोधी मनोवृत्ति का अखबार नहीं है लेकिन जब उसने खबरें सत्ता के खिलाफ छापनी शुरू कीं तो, उस पर भी नज़रें टेढ़ी हुईं।

जहां तक न्यूज़क्लिक और न्यूजलांड्री का सवाल है, यह दोनों वेबसाइट सत्ता के खिलाफ मुखर रहती हैं और इनकी खबरों से सरकार अक्सर असहज भी होती है। इनकी भी खबर सरकार ने ली।

हाल के छापों में न्यूज़क्लिक पर छापा खबरों में बहुत अधिक रहा।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीमें 100 से ज्यादा घंटों तक न्यूजक्लिक के एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ और लेखक गीता हरिहरण (जो कि पोर्टल में शेयरहोल्डर भी हैं) के घर पर छापे मारने के बाद वापस गयीं।

सौ घँटों की अवधि पर हैरान न हों, आयकर और ईडी के छापे अक्सर लंबी अवधि तक चलते हैं क्योंकि वे कर चोरी और वित्तीय अनियमितता से जुड़े होते हैं, अक्सर दस्तावेजों और कम्प्यूटर और अन्य तकनीकी उपकरणों की पड़ताल और उन्हें डिकोड आदि करने में समय लगता है।

न्यूज़क्लिक ऑनलाइन न्यूज पोर्टल के करीब 10 परिसरों पर ईडी का छापा एक साथ शुरू हुआ था। इन छापों के बारे में, ईडी ने कहा है कि न्यूजक्लिक पर छापेमारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ी हुई है और एजेंसी संगठन को विदेशों की संदिग्ध कंपनियों से धन मिलने की जांच कर रही है।

न्यूजक्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे 1977 की इमरजेंसी के समय में, छात्र आंदोलन में जेल भी जा चुके हैं। जबकि, हरिहरण जानी-मानी लेखिका हैं और उन्हें उनके पहले उपन्यास, ‘द थाउजेंड’ के लिए कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज से सम्मानित किया जा चुका है।

न्यूजक्लिक और उसके पत्रकारों के खिलाफ पहली छापेमारी, 9 फरवरी को ही हुयी थी। हाल की इस छापेमारी में, ईडी की अलग-अलग टीमों ने दिल्ली और यूपी के गाजियाबाद में 10 परिसरों में छापा डाला। इनमें न्यूजक्लिक का दक्षिण दिल्ली स्थित सुलाजाब स्थित ऑफिस भी शामिल था। इसके अलावा न्यूजक्लिक की पैरेंट कंपनी पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो पर भी छापेमारी की गई।

अब इधर सबसे बडी खबर छापों के बारे में आयी कि रिटायर्ड आईएएस अफसर हर्ष मन्दर के यहां छापा पड़ा है। 16 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पूर्व आईएएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के घर और दफ्तर पर छापेमारी की है। ईडी ने सुबह करीब आठ बजे वसंत कुंज स्थित उनके घर, अधचीनी में उनके एनजीओ सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज और महरौली स्थित बाल गृह पर छापेमारी की है। यह कार्यवाई तब हुई है जब हर्ष मंदर और उनकी पत्नी नौ महीने की फेलोशिप के लिए जर्मनी के रोबर्ट बोस्च अकादमी गए हैं।

पता चला है, कि यह छापेमारी मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले को लेकर की गई है। फरवरी में सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीएसई) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। यह केस दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज किया गया था।

हाल ही में हर्ष मंदर ने एक किताब, ‘दिस लैंड इज माइन, आई एम नॉट ऑफ दिस लैंडका संपादन किया था। यह किताब सीएए और नागरिकता पर लिखे लेखों का संग्रह है।

साल 2020 में दिल्ली पुलिस ने हर्ष का नाम उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों से संबंधित चार्जशीट में भी दर्ज किया था। इसकी निंदा करते हुए देश भर के करीब 160 प्रमुख शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और कलाकारों ने उनके समर्थन में बयान जारी किया था।

अक्टूबर 2020 में एनसीपीसीआर ने दिल्ली में दो बाल गृहों- उम्मीद अमन घर और खुशी रेनबो होम पर छापा मारा था, यह जानने के लिए कि कहीं यहां से किसी ने नागरिकता (संशोधन) बिल के विरोध में भाग तो नहीं लिया था।

इन्हीं छापों के क्रम में एक चर्चित छापा फ़िल्म अभिनेता सोनू सूद के यहाँ पड़ा छापा है। सोनू ने लॉकडाउन के दौरान कामगारों के पलायन (workers migration during lockdown) के समय खुलकर समाज सेवा से जुड़े थे। सरकार तो उस अवसर पर कहीं दिखी ही नहीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री की घोषणा कि, बंदी के दौरान कामगारों को उनका वेतन दिया जायेगा, पर भी सरकार अमल नहीं करा सकी। जब सुप्रीम कोर्ट में पलायन का मामला उठा तो सरकार ने झूठ बोला कि कोई मजदूर सड़क पर नहीं है। जबकि लगभग 700 कामगार सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल या जो भी साधन मिला, उससे अपने घर जाते हुए रास्ते मे ही मर गए।

जब पूंजीपतियों ने सुप्रीम कोर्ट में बंदी की अवधि का वेतन देने में वित्तीय असमर्थता का रोना रोया तो, सरकार उंस समय गरीब कामगारों के पक्ष में नहीं, बल्कि वह पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ी हुई और वेतन देने के लिये सरकार ने पूंजीपतियों पर कोई ज़ोर नहीं दिया।

ऐसे कठिन समय में देश की बहुत सी सामाजिक संस्थाएं और लोग कामगारों की मदद के लिये आगे आये थे। सोनू सूद भी उनमें से एक थे। सोनू अपनी सक्रियता से लोकप्रिय भी हुये। इस समय वह आम आदमी पार्टी से जुड़े हैं। ऐसे समय में, उन पर, अचानक पड़ा यह छापा सरकार के इरादे के खिलाफ संदेह ही दर्शाता है।

जिनके यहां छापा पड़ा है, हो सकता है उनके खिलाफ शिकायतें भी हों और उन शिकायतों में दम भी हो, पर जिनके यहां छापा पड़ा है, उन सबमें एक चीज समान है कि सभी की विचारधारा सरकार विरोधी हैं।

आखिर क्या कारण है कि जो प्रतिष्ठान, संस्था और व्यक्ति सरकार के मुखर आलोचक हैं, उनके ही खिलाफ शिकायतेँ मिली हैं और उन्हीं के खिलाफ छापे भी पड़े हैं ?

ऐसा तो है नहीं कि, आजतक, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी आदि न्यूज चैनल और दैनिक जागरण जैसे अखबार, जो सरकार के प्रचार माध्यम तंत्र के रूप में लगभग बदल चुके हैं, वित्तीय रूप से बेहद साफ सुथरे हैं और उनके यहां कोई वित्तीय अनियमितता नहीं है ? क्या सरकार ने उनके यहां सर्वे कर के उन्हें पाक साफ पा लिया है, या वे सरकार के पाल्य हैं ? यदि यही छापे सभी मीडिया संस्थान और अखबारों पर उनकी वित्तीय अनियमितता के बारे में छानबीन के लिये पड़ते तो इन छापों पर शायद ही चर्चा होती। पर यह छापे छांट छांट के बेहद ग़ैरपेशेवर तरीके से सिर्फ उन्हीं लक्ष्यों पर डाले जा रहे हैं जो सरकार के खिलाफ हैं तो, संदेह तो उठेगा ही और चर्चा भी होगी।

अगर भ्रष्टाचार की बात करें तो पनामा पेपर्स का खुलासा साल 2017 के अप्रैल में हुआ था। पनामा पेपर्स की लिस्ट में विश्वभर के तमाम लोगों के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नाम सामने आया था। पनामा पेपर्स में नाम होने के कारण आइसलैंड के प्रधानमंत्री को भी अपनी कुर्सी गवानी पड़ी थी।

इस लिस्ट में भारत की भी 500 से ज्यादा नामी गिरामी हस्तियों के नाम मौजूद हैं जो भारत से लगभग हर क्षेत्र से हैं। इनमें अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन का नाम है तो बड़े कॉर्पोरेट घरानों में डीएलएफ के मालिक केपी सिंह तथा उनके परिवार के 9 सदस्य, अपोलो टायर्स और इंडिया बुल्स के प्रमोटर और गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी का नाम भी इस सूची में शामिल है। बंगाल के एक नेता शिशिर बजोरिया के अलावा लोकसत्ता पार्टी के नेता अनुराग केजरीवाल का भी नाम सामने आया है। तब तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संसद में कहा था कि, भारतीयों की जांच करने के लिए एक मल्टी-एजेंसी ग्रुप (मैग) का गठन किया गया था और वह अपना काम भली भांति कर रही है।

अब यही यह सवाल उठता है इस पनामा लीक मामले की जांच में क्या कार्यवाही हुयी ? कोई दोषी मिला या नहीं ? क्या इस मामले में जुड़े व्यक्ति, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विनोद अडानी या अन्य के ऊपर सर्वे या छापा जो भी आप कह लें मारने की हिम्मत आयकर या ईडी में है ? आज की स्थिति में तो बिल्कुल ही नहीं है।

अक्सर कहा जाता है कि, छापों से करचोरी और वित्तीय अनियमितता करने वालों में भय उपजता है और ईमानदारी से कर अदा करने वाले विधिपालक नागरिकों में सिस्टम के प्रति सम्मान पैदा होता है। यह बात सही भी है। पर छापे ही किसी सिस्टम से नहीं, या सिस्टम तोड़ कर, डाले जाएं तो इनका क्या असर जनता और ईमानदार कर दाताओं पर पड़ेगा ?

 क्या यह छापे वित्तीय अनियमितता को उजागर करने के लिये डाले जा रहे हैं या इस छापों के माध्यम से सत्ता विरोधी खेमे में यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि, यदि खिलाफ हुए तो बख्शे नहीं जाओगे। वर्तमान समय मे जो भी छापे आयकर और ईडी के डाले जा रहे हैं उनसे इसी बात की पुष्टि होती है कि यह छापे भयादोहन की रणनीति के अंतर्गत है, विशेषकर वे छापे जो अखबारों औऱ मीडिया के ऊपर डाले जा रहे हैं।

लंबे समय मे पुलिस में राजनीतिक दखलंदाजी की चर्चा होती रहती है औऱ उंस दखलंदाजी को कम करने के रास्ते सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभाग के आला अफसर तक ढूंढ रहे हैं। पर न तो वह दखलंदाजी कम हो रही है और न ही विभाग हिज मास्टर्स वॉयस के संक्रमण से बाहर आ रहा है। अब यही दखलंदाजी आयकर और ईडी में भी संक्रमित हो रही है। सीबीआई तो तोता घोषित हो ही चुकी है। लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ और प्रतिशोध के रूप में यदि होता रहा तो इन संस्थाओं के पेशेवर कामकाज पर बहुत विपरीत असर पड़ेगा। इससे उन अफसरों और कर्मचारियों के मनोबल पर भी असर पड़ेगा, जो एक प्रोफेशनल तरीके से अपना दायित्व औऱ कर्तव्य निभाना चाहते हैं।

राजनीतिक दलों को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, कानून लागू करने वाली एजेंसियों को राजनीतिक द्वेष, प्रतिशोध और लाभ हानि का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिये। इसका परिणाम घातक ही होगा। यह प्रतिशोध का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू कर देगा, जो राजनीतिक जमात के लिये भी कम घातक नहीं होगा और अपने उद्देश्य के लिये गठित यह लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियां, अपने लक्ष्य, दायित्व और कर्त्तव्य से विचलित हो जाएंगी।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं

© विजय शंकर सिंह

प्रताप भानु मेहता की समकालीन राजनीति पर शैक्षणिक अटकलबाजियां

Apurvanand talks with Pratap Bhanu Mehta on 'The Wire'

कथित ‘कुलीनतावाद-विरोध’ और जनतंत्र में आबादी के तर्क का सच !

संयोग से हमने आज ही द वायर’ पर प्रताप भानु मेहता से अपूर्वानंद की साल भर पुरानी वार्ता (Apurvanand talks with Pratap Bhanu Mehta on ‘The Wire’) को सुना। वार्ता साल भर पुरानी होने पर भी राजनीति शास्त्र में दैनंदिन राजनीतिक घटनाक्रमों से सिद्धांत-निर्णय की अकादमिक क्रियाशीलता पर विचार की दृष्टि से गंभीर विचार की अपेक्षा रखती है।

प्रतापभानु मेहता तब दुनिया में दक्षिणपंथ के उदय के पीछे राजनीति में सर्व-समावेशी बहुलतावादी दृष्टि पर आधारित कथित ‘कुलीनतावाद’ की बौद्धिक और राजनीतिक साख के ख़त्म होने की बात को दोहरा रहे थे। जब हम आज साल भर पहले की उनकी उस स्थापना पर गौर करते हैं तो ज़ाहिर हो जाता है कि वह पूरा सिद्धांत जिस ट्रंप के उदय के काल की जिन परिस्थितियों में गढ़ा गया था, आज वही ट्रंप इतिहास के कूड़े के ढेर पर पड़ा हुआ, बतौर एक बदनाम अपराधी राजनीतिज्ञ की तरह, अपने जीवन के दिन गिनता हुआ दिखाई दे रहा है। अर्थात् कहा जा सकता है कि कथित ‘कुलीनतावादी कुटिलता’ के तिरस्कार पर टिका हुआ एक राजनीतिक परिघटना की व्याख्या का सिद्धान्त भी आज ट्रंप की तरह ही शहर के बाहर फेंक दिए जाने वाले कूड़े के ढेर पर पड़ा हुआ दम तोड़ रहा है।

इसी प्रकार, मेहता अपनी वार्ता में लगातार बहुसंख्यकवाद को जनतंत्र में ‘गिनती’ के महत्व (Importance of ‘counting’ in democracy) की कथित ‘मूलभूत’ सच्चाई से जोड़ रहे थे। भारत में बहुसंख्यकवादी हिंदुत्व के उदय को वे एक प्रकार से बुनियादी तौर पर उसे हिंदू आबादी की संख्या की जनतंत्र की स्वाभाविक उपज बताने की कोशिश कर रहे थे। जब वे यह कह रहे थे, तब भी 2019 के चुनाव में मोदी की जीत के बावजूद उसे देश में हिंदुओं की आबादी (Hindus population in the country) के अनुपात के आधे मत भी नहीं मिल पाए थे !

Man is never just a count or a body

सच यह है कि मनुष्य कभी भी सिर्फ़ एक गिनती या एक शरीर नहीं होता है। मनुष्य की प्राणीसत्ता शरीर के साथ ही उसके भाषाई प्रतीकात्मक जगत से नैसर्गिक तौर पर जुड़ी हुई है। उसकी क्रियाशीलता में अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कहानी के संकेतकों का खिंचाव काम करता है, सिर्फ़ उसका शरीर नहीं। कामोद्दीपन की तरह का अबूझ उल्लास भी शरीर के किसी अभाव के मूल्य से प्रेरित होता है। सांकेतिकता के संजाल की प्रेरणाओं के बिना मनुष्य मनुष्य नहीं बनता है। सभ्यता के विकास की पूरी कहानी इसी की गवाही देती है और जनतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था सभ्यता की उसी विकास यात्रा का एक सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसीलिए मनुष्य को मवेशियों की तरह मूलत: महज़ एक गिनती मानने वाला सांप्रदायिक सोच जनतंत्र में सिर्फ़ एक बर्बर भटकाव हो सकता है, उसकी स्वाभाविक उत्पत्ति नहीं। यह माल्थसवादी प्रतिक्रियावादी सोच का ही एक प्रकार कहलाएगा।

आज अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की पराजय और डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बायडन की जीत तथा बायडन के द्वारा ट्रंप के तमाम प्रतिगामी प्रशासनिक फ़ैसलों को कलम की एक नोक से ख़ारिज कर दिये जाने के बाद ‘कुलीनतावाद-विरोधी’ सिद्धांतों के महल की बुनियाद ही ख़त्म हो चुकी है।

बायडन को अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान के पारंपरिक कथित कुलीन हलके का बहुत ही जाना-माना प्रतिनिधि कहा जा सकता है। अर्थात्, मात्र चार साल में कुलीनतावाद के अंत ने कुलीनतावाद के लिए जगह बना दी !

ट्रंप ने अमेरिकी राजनीति में जिस अभाव की सृष्टि की उस अभाव की क्रियात्मकता से अमेरिकी उदारतावाद के अपने सत्य के आवर्त्तन में बहुत ज़्यादा समय नहीं लगा।

भारत में भी 2019 के बाद बहुत जल्द ही मोदी कंपनी को सड़क से लेकर संसद तक में कम बड़ी चुनौतियाँ नहीं मिल रही है। भारत के किसानों का आंदोलन विश्व इतिहास की एक अनोखी घटना है जो अब न सिर्फ़ मोदी सरकार के पूरे अस्तित्व को ही चुनौती दे रहा है, बल्कि पूंजीवाद के विरुद्ध एक सभ्यतामूलक संघर्ष की पीठिका तैयार कर रहा है।

लोक सभा चुनावों में जीतने के बाद भी अब तक एक के बाद एक तमाम विधान सभा चुनावों में मोदी की पराजयों का सिलसिला चुनाव के मोर्चे पर भी उसे मिल रही चुनौतियों को दर्शाता है। यह आश्चर्य की बात नहीं होगी कि मोदी कंपनी भी ट्रंप की तरह ही पराजित हो कर यहाँ शीघ्र ही इतिहास के कूड़े पर सड़ती हुई अपने दिन गिनती दिखाई देने लगे। और, प्रताप भानु की दृष्टि में आरएसएस की ‘सर्व-व्यापी’ ईश्वरीय सत्ता भी देखते ही देखते भ्रष्ट तत्त्वों का जमावड़ा साबित हो कर पूरी तरह से श्रीहीन हो कर हवा में विलीन हो जाए।

हम आरएसएस की रणनीति के उस पूरे इतिहास से वाक़िफ़ है, जिसमें अनुकूल अवसरों पर वह अपनी शक्ति को श्री कृष्ण के ‘विराट रूप’ की तरह बेहद बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है, और थोड़ी सी प्रतिकूलता में ही संस्कृति की खाल में दुबक कर बैठ ज़ाया करता है।

कुल मिला कर, जो सामने दिखाई दे, उसे ही सनातन सत्य मान कर सिद्धांतों के महल तैयार करना एक प्रकार की बौद्धिक दुकानदारी, साफिस्ट्री है। बौद्धिकता का असली काम हमेशा प्रत्यक्ष की दरारों में झांक कर सभ्यता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में उसकी गति के लक्षणों को खोजना होता है। वह एक द्वंद्वमूलक क्रियाशीलता है। प्रताप भानु की उस वार्ता को अधिक से अधिक समकालीन राजनीति पर शैक्षणिक अटकलबाजियों का एक अधुना उदाहरण भर कहा जा सकता है।

प्रताप भानु मेहता खुद यह स्वीकार रहे थे कि मोदी कंपनी को चुनावों में पराजित करना कोई कठिन काम नहीं है। यह तो विपक्षी दलों और वामपंथियों की अदूरदर्शिता है, जिसकी वजह से यह पूरी तरह संभव नहीं हो पाता है।

इसीलिए, हमारा कहना है कि विपक्ष के राजनीतिक दलों की कार्यनीतिगत कमज़ोरियों के लिए आबादी की संरचना और सभ्यता के मूल्यों में निहित कथित कमज़ोरियों की चर्चा से सिद्धांतों के बड़े-बड़े महल तैयार करना एक ऐसा अकादमिक व्यायाम है जो वैचारिक धुँध के अलावा नया कुछ भी देने में असमर्थ होता है।

-अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

मोदी जैसों का सच सात पर्दों के पीछे से भी बोलने लगता है — सुनिये तवलीन सिंह के मोहभंग की कहानी

Narendra Modi new look

तवलीन सिंह का यह साक्षात्कार (Interview of Tavleen Singh) सचमुच उल्लेखनीय है। पिछले छ: सालों में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के उनके स्तंभ (Tavleen Singh’s column in ‘Indian Express’) में कई बार मोदी की तारीफ़ में उनकी बातें इतनी छिछली और भक्तों के प्रकार की हुआ करती थी कि उन पर तीखी टिप्पणी करने से हम खुद को रोक नहीं पाते थे। बाद में तो उनके स्तंभ की ओर झांकना ही बंद कर दिया था।

लेकिन इधर कुछ दिनों से उनके इस भक्त-छाप रुख़ में क्रमिक बदलाव की लोग चर्चा किया करते रहे हैं। ख़ास तौर पर कहा जाता है जब पिछले साल उनके प्रसिद्ध पत्रकार बेटे आतिश तासीर की ‘टाइम’ पत्रिका की कवर स्टोरी ‘India’s Divider-in-chief’ छपी थी, मोदी ने आतिश के ख़िलाफ़ अपनी प्रतिशोधमूलक मानसिकता का नंगा परिचय देते हुए कार्रवाई की और उनका भारतीय पासपोर्ट रद्द कर दिया, तभी से तवलीन सिंह के लेखन में मोदी-विरोधी रुझान दिखाई देने लगा था।

Tavleen Singh’s book on ModiMessiah Modi: A Tale of Great Expectations’

इसी बीच तवलीन सिंह की मोदी पर एक मुकम्मल किताब आ गई है – ‘Messiah Modi: A Tale of Great Expectations’। यह किताब मोदी के सत्ता में आने के बाद से अब तक के उनके पूरे उस सफ़रनामा की कहानी है, जिसमें वे क्रमश: अपनी सच्चाई पर से, अपनी चरम संघ वालों की ख़ास अज्ञानता से पर्दा उतारते चलते है। मोदी की इस अपने को नग्न रूप में रख देने की अब तक की यात्रा को देख कर तवलीन सिंह सचमुच अवाक् हो गईं। वे आरएसएस के डीएनए को हमेशा से जानती थी। संघियों की मूर्खताओं और उनके अंदर की मुसलमान-विरोधी घृणा की गंदगी को भी पहचानती थी। लेकिन कई साल तक गुजरात जैसे प्रदेश का मुख्यमंत्री रहने के बाद भारत का प्रधानमंत्री बन जाने पर भी मोदी उन सारी बुराइयों को न सिर्फ़ अपने पर लादे रहेंगे, बल्कि उसके सबसे जघन्य रूपों का परिचय देते जाएँगे, यह उनकी समझ के बाहर था।

यह सिर्फ उनका नहीं, हमेशा तत्काल के उत्सव में मग्न रहने वाले पत्रकारों की कमजोर तत्त्व मीमांसक दृष्टि का दोष था।

बहरहाल, तवलीन सिंह को पहला बड़ा झटका मोदी की नोटबंदी की शक्ति प्रदर्शनकारी विध्वंसक अश्लीलता से लगा।

वे कहती हैं कि इनके पास किसी समझदार से सलाह करने जितनी भी बुद्धि नहीं है। इसके बाद पशुवत लिंचिंग की एक के बाद एक घटनाएं और उनके प्रति मोदी की मौन स्वीकृति। और इन सबके चरम पर अब कश्मीर और नागरिकता क़ानून !

जिन चीजों को सामान्य शीलाचरण के तहत भी ढंक कर रखा जाता है, मोदी ने उन्हीं का जैसे सबके सामने नंगा प्रदर्शन कर दिया है। आज की दुनिया में हिटलर शासन की बुराइयों का, एक राक्षसी सरकार का चरम उदाहरण है।

जनतंत्र में कोई भी शासक अपनी सारी बुरी महत्वाकांक्षाओं बावजूद हिटलर तक पहुँचने से डरता है। लेकिन मोदी और आरएसएस में उतनी सी सभ्यता भी नहीं है। उन्होंने नंगे तौर पर हिटलर के रास्ते का ही पालन करते हुए नागरिकता के विषय को अपने घृणा पर टिके शासन का हथियार बना कर भारत के मुसलमानों के खिलाफ उसका हुबहू उसी प्रकार प्रयोग करना शुरू कर दिया जिस प्रकार हिटलर ने जर्मनी के यहूदियों के विरुद्ध किया था। यह इस विशाल समुदाय को राज्यविहीन स्थिति में डाल कर उसके व्यापक जन-संहार की परिस्थितियाँ तैयार करने का खुला अभियान है।

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

तवलीन सिंह को मोदी की इन कारस्तानियों को समझने में कोई कष्ट नहीं हुआ। शुरू के दिनों में वे अपने इतिहास-बोध को ताक पर रख कर जिस प्रकार मोदी को कांग्रेस शासन की कथित कमज़ोरियों से निजात के एक औज़ार के रूप में समझ रही है, छ: साल के अनुभवों से उन्होंने जान लिया कि मोदी किसी बीमारी का इलाज नहीं है, वे स्वयं एक लाइलाज बीमारी है।

उनकी किताब पर केंद्रित करण थापर के साथ बातचीत में तवलीन सिंह ने इन सारी बातों को बड़ी स्पष्टता और शालीनता के साथ भी रखा है।

कुलीनता का जो शील न्याय के अनेक मामलों में बहुत क्रूर नज़र आता है, वहीं कुछ नितांत मानवीय और स्वातंत्र्य के मूल्यों के निर्वाह के मामले में बहुत दृढ़ भी होता है। तवलीन सिंह की बातों से इस सचाई का भी एक परिचय मिलता है।

यह किताब इस बात का भी प्रमाण है कि तवलीन सिंह के मोहभंग के पीछे उनका कोई नितांत व्यक्तिगत कारण भर काम नहीं कर रहा है।

करण थापर से तवलीन सिंह की इस बातचीत को सुनना अच्छा अनुभव रहा। आप भी इसे सुनें :

अरुण माहेश्वरी