कैच द रेन : वर्षा जल सहेजने के लिए संजीदगी जरूरी

Water

Catch the Rain: Seriousness needed to save rainwater

राष्ट्रीय जल दिवस (14 अप्रैल) पर विशेष | Special on National Water Day (14 April)

समय रहते समझें पानी की महत्ता

National Water Day 2021 know its history significance

प्रतिवर्ष भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जयंती (Baba Saheb Bhimrao Ambedkar Jayanti) को ‘राष्ट्रीय जल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसकी घोषणा तत्कालीन केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती द्वारा डा. अम्बेडकर की 61वीं पुण्यतिथि के अवसर पर 6 दिसम्बर 2016 को की गई थी।

दरअसल ब्रिटिश शासनकाल में बाबा साहेब ने देश की जलीय सम्पदा के विकास के लिए अखिल भारतीय नीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और देश की नदियों के एकीकृत विकास के लिए नदी घाटी प्राधिकरण अथवा निगम स्थापित करने की वकालत की थी। देश की जल सम्पदा के प्रबंधन में दिए गए उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए ही केन्द्र सरकार द्वारा 14 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय जल दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।

प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस का आयोजन किया जाता है तथा 14 अप्रैल को राष्ट्रीय जल दिवस का और ऐसे दिवसों की महत्ता आज के समय इसलिए सर्वाधिक है क्योंकि देश-दुनिया में जल संकट की समस्या लगातार गहराती जा रही है।

भारत में तो पानी की कमी (भारत में तो पानी की कमी) का संकट इस कदर विकराल होता जा रहा है कि गर्मी के मौसम की शुरूआत के साथ ही स्थिति बिगड़ने लगती है और कई जगहों पर तो लोगों के बीच पानी को लेकर मारपीट तथा झगड़े-फसाद की नौबत आ जाती है। करीब तीन साल पहले शिमला जैसे पर्वतीय क्षेत्र में भी पानी की कमी को लेकर हाहाकार मचा था और दो वर्ष पूर्व चेन्नई में भी ऐसी ही विकट स्थिति देखी गई थी। महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में लगभग हर साल ऐसी ही परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं। प्रतिवर्ष खासकर गर्मी के दिनों में सामने आने वाले ऐसे मामले जल संकट गहराने की समस्या को लेकर हमारी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त होने चाहिएं किन्तु विड़म्बना है कि देश में कई शहर अब शिमला तथा चेन्नई जैसे हालातों से जूझने के कगार पर खड़े हैं लेकिन जल संकट की साल दर साल विकराल होती समस्या से निपटने के लिए सामुदायिक तौर पर कोई गंभीर प्रयास होते नहीं दिख रहे।

हिन्दी अकादमी दिल्ली के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि देश में जल संकट गहराते जाने की प्रमुख वजह है भूमिगत जल का निरन्तर घटता स्तर।

एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया भर में करीब तीन बिलियन लोगों के समक्ष पानी की समस्या मुंह बाये खड़ी है और विकासशील देशों में तो यह समस्या ज्यादा ही विकराल हो रही है, जहां करीब पचानवे फीसदी लोग इस समस्या को झेल रहे हैं।

पानी की समस्या एशिया में और खासतौर से भारत में तो काफी गंभीर रूप धारण कर रही है।

विश्वभर में पानी की कमी की समस्या तेजी से उभर रही है और यह भविष्य में बहुत खतरनाक रूप धारण कर सकती है। अगर पृथ्वी पर जल संकट इसी कदर गहराता रहा तो यह निश्चित मानकर चलना होगा कि पानी हासिल करने के लिए विभिन्न देश आपस में टकराने लगेंगे तथा उनके बीच युद्ध की नौबत भी आ सकती है और जैसी कि आशंकाएं जताई जा रही हैं कि अगला विश्व युद्ध भी पानी की वजह से लड़ा जा सकता है। अधिकांश विशेषज्ञ अब आशंका जताने भी लगे हैं कि जिस प्रकार तेल के लिए खाड़ी युद्ध होते रहे हैं, उसी प्रकार दुनियाभर में जल संकट बढ़ते जाने के कारण आने वाले वर्षों में पानी के लिए भी विभिन्न देशों के बीच युद्ध लड़े जाएंगे और संभव है कि अगला विश्व युद्ध भी पानी के मुद्दे पर ही लड़ा जाए।

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान कुछ समय पूर्व दुनिया को चेता चुके हैं कि उन्हें इस बात का डर है कि आगामी वर्षों में पानी की कमी गंभीर संघर्ष का कारण बन सकती है।

दुनियाभर में पानी की कमी को लेकर विभिन्न देशों में और भारत जैसे देश में तो विभिन्न राज्यों में ही जल संधियों पर संकट के बादल मंडराते रहे हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच भी पानी के मुद्दे को लेकर तनातनी चलती रही है। उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों के बीच भी पानी को लेकर झगड़े होते रहे हैं। इजराइल तथा जोर्डन और मिस्र तथा इथोपिया जैसे कुछ अन्य देशों के बीच भी पानी के चलते ही अक्सर गर्मागर्मी देखी जाती रही है। दूसरे देशों में गहराते जल संकट और इसे लेकर उनके बीच पनपते विवादों को दरकिनार भी कर दें और अपने यहां के हालातों पर नजर दौड़ाएं तो हमारे यहां भी विभिन्न राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के मामले में पिछले कुछ दशकों से गहरे मतभेद बरकरार हैं, जिस कारण विभिन्न राज्यों के आपसी संबंधों में कड़वाहट घुली है तथा अदालतों के हस्तक्षेप के बावजूद मौजूदा समय में भी जल वितरण का मामला अधर में लटका होने के चलते कुछ राज्यों में जल संकट की स्थिति गंभीर बनी हुई है। एक ओर इस प्रकार के आपसी विवाद और दूसरी ओर भूमिगत जल का लगातार गिरता स्तर, ये परिस्थितियां देश में जल संकट की समस्या को और विकराल बनाने के लिए काफी हैं। एक तरफ जहां भूमिगत जलस्तर बढ़ने के बजाय निरन्तर नीचे गिर रहा है और दूसरी तरफ देश की आबादी तेज रफ्तार से बढ़ रही है, ऐसे में पानी की कमी का संकट तो गहराना ही है।

पर्यावरण संरक्षण पर प्रकाशित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के मुताबिक पृथ्वी का करीब तीन चौथाई हिस्सा पानी से लबालब है लेकिन धरती पर मौजूद पानी के विशाल स्रोत में से महज एक-डेढ़ फीसदी पानी ही ऐसा है, जिसका उपयोग पेयजल या दैनिक क्रियाकलापों के लिए किया जाना संभव है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा में से मात्र तीन फीसदी पानी ही स्वच्छ है और उसमें से भी लगभग दो फीसदी पानी पहाड़ों और ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है जबकि बाकी एक फीसदी पानी का उपयोग ही पेयजल, सिंचाई, कृषि तथा उद्योगों के लिए किया जाता है। शेष पानी खारा होने अथवा अन्य कारणों की वजह से उपयोगी अथवा जीवनदायी नहीं है। पृथ्वी पर उपलब्ध पानी में से इस एक फीसदी पानी में से भी करीब 95 फीसदी भूमिगत जल के रूप में पृथ्वी की निचली परतों में उपलब्ध है और बाकी पानी पृथ्वी पर सतही जल के रूप में तालाबों, झीलों, नदियों अथवा नहरों में तथा मिट्टी में नमी के रूप में उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि पानी की हमारी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति भूमिगत जल से ही होती है लेकिन इस भूमिगत जल की मात्रा भी इतनी नहीं है कि इससे लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें।

हालांकि हर कोई जानता है कि जल ही जीवन है और पानी के बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन जब हर जगह पानी का दुरूपयोग होते देखते हैं तो बेहद अफसोस होता है।

पानी का अंधाधुध दोहन करने के साथ-साथ हमने नदी, तालाबों, झरनों इत्यादि अपने पारम्परिक जलस्रोतों को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसी कारण वर्षा का पानी इन जलसोतों में समाने के बजाय बर्बाद हो जाता है और यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गत दिनों ‘जल शक्ति अभियान: कैच द रेन’ की शुरूआत की गई थी। 30 नवम्बर 2021 तक चलने वाले इस अभियान का एकमात्र उद्देश्य देश के नागरिकों को वर्षा जल के संचयन के लिए जागरूक करना और वर्षा जल का ज्यादा से ज्यादा संरक्षण करना ही है। केवल यह समझने से ही काम नहीं चलेगा कि वर्षा की एक-एक बूंद बेशकीमती है बल्कि इसे सहेजने के लिए भी देश के हर नागरिक को संजीदा होना पड़ेगा। अगर हम वर्षा के पानी का संरक्षण किए जाने की ओर खास ध्यान दें तो व्यर्थ बहकर नदियों में जाने वाले पानी का संरक्षण करके उससे पानी की कमी की पूर्ति आसानी से की जा सकती है और इस तरह जल संकट से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जल संकट आने वाले समय में बेहद विकराल समस्या बनकर न उभरे, इसके लिए हमें समय रहते पानी की महत्ता को समझना ही होगा।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा पर्यावरण मामलों के जानकार हैं और पर्यावरण पर 190 पृष्ठों की पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिख चुके हैं)

ब्रह्मोस बनी तीनों सशस्त्र बलों का बेहद शक्तिशाली हथियार

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ब्रह्मोस : दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक मिसाइल

भारत पिछले करीब तीन माह के दौरान एंटी रेडिएशन मिसाइल ‘रूद्रम-1’ (Anti Radiation Missile ‘Rudram-1’), परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम मिसाइल ‘शौर्य’ सहित कई मिसाइलों का सफल परीक्षण कर चुका है। दरअसल भारत अपने दुष्ट पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान को ईंट का जवाब पत्थर से देने की क्षमता विकसित करने के लिए इन दोनों देशों के साथ सीमा पर जारी तनाव के बीच अपनी ताकत बढ़ाने में जोर-शोर से जुटा है और यही कारण है कि पिछले तीन महीनों से एक के बाद एक भारत द्वारा लगातार क्रूज और बैलेस्टिक मिसाइलों के सफल परीक्षण (Successful test of cruise and ballistic missiles by India) किए जा रहे हैं।

भारत की सामरिक तैयारियां | India’s strategic preparations

भारत की इन सामरिक तैयारियों को इसी से समझा जा सकता है कि जितने मिसाइल परीक्षण (Missile test) विगत दो-तीन माह के अंदर किए जा चुके हैं, उतने तो इससे पहले पूरे वर्षभर में भी नहीं होते थे। भारत और रूस के संयुक्त प्रयासों से बनाई गई सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ (The BrahMos missile is produced by an Indo-Russian joint venture) के भी अलग-अलग संस्करणों के परीक्षण किए गए हैं तथा पहले से बनी इन शक्तिशाली मिसाइलों को अब और ज्यादा शक्तिशाली बनाते हुए भारत पूरी दुनिया को अपनी स्वदेशी ताकत का अहसास कराने का सफल प्रयास कर रहा है।

The range of BrahMos missile system by DRDO has now been increased to 450 km from the existing 290 km.

ब्रह्मोस अपनी श्रेणी में दुनिया की सबसे तेज परिचालन प्रणाली है और डीआरडीओ द्वारा इस मिसाइल प्रणाली की सीमा को अब मौजूदा 290 किलोमीटर से बढ़ाकर करीब 450 किलोमीटर कर दिया गया है। ब्रह्मोस मिसाइल के नौसेना संस्करण का 18 अक्तूबर को अरब सागर में सफल परीक्षण किया गया था। परीक्षण के दौरान ब्रह्मोस ने 400 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद लक्ष्य पर अचूक प्रहार करने की अपनी क्षमता को बखूबी प्रदर्शित किया था।

ब्रह्मोस मिसाइल लेटेस्ट न्यूज़ | BrahMos missile latest news

24 नवम्बर को अंडमान निकोबार में सतह से सतह पर अचूक निशाना लगाने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ के ‘लैंड अटैक वर्जन’ का सफल परीक्षण किया गया। परीक्षण के दौरान एक अन्य द्वीप पर मौजूद लक्ष्य को ब्रह्मोस द्वारा सफलतापूर्वक नष्ट किया गया।

ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता | The firepower of BrahMos missile

इस परीक्षण की खास बात यह रही कि अब ब्रह्मोस मिसाइल के इस संस्करण की मारक क्षमता 290 से बढ़कर 400 किलोमीटर हो गई है, जिसकी रफ्तार ध्वनि की गति से तीन गुना ज्यादा है।

भारत द्वारा चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बीच ब्रह्मोस के इस नए संस्करण को परीक्षण से पहले ही चीन के साथ लगती सीमा पर तैनात किया जा चुका है।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय वायुसेना और नौसेना अगले कुछ दिनों में ब्रह्मोस के कुछ और नए संस्करणों का भी अलग-अलग परीक्षण करेंगी। ब्रह्मोस अब न केवल भारत के तीनों सशस्त्र बलों के लिए एक बेहद शक्तिशाली हथियार बन गई है बल्कि गर्व का विषय यह है कि अभी तक जहां भारत अमेरिका, फ्रांस, रूस इत्यादि दूसरे देशों से मिसाइलें व अन्य सैन्य साजोसामान खरीदता रहा है, वहीं भारत अपनी इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को दूसरे देशों को निर्यात करने की दिशा में अब तेजी से आगे बढ़ रहा है।

ब्रह्मोस मिसाइल को पनडुब्बियों, विमानों और जमीन से अर्थात् तीनों ही स्थानों से सफलतापूर्वक लांच किया जा सकता है, जो भारतीय वायुसेना को समुद्र अथवा जमीन के किसी भी लक्ष्य पर हर मौसम में सटीक हमला करने के लिए सक्षम बनाती है। बेहद ताकतवर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें भारतीय वायुसेना के 40 से भी अधिक सुखोई लड़ाकू विमानों पर लगाई जा चुकी हैं, जिससे सुखोई लड़ाकू विमान पहले से कई गुना ज्यादा खतरनाक हो गए हैं। हाल ही में सुखोई-30 लड़ाकू विमान ने एक ऑपरेशन के तहत पंजाब के हलवारा एयरबेस से उड़ान भरते हुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल से बंगाल की खाड़ी में अपने टारगेट को निशाना बनाया था। उल्लेखनीय है कि सुखोई विमान की दूर तक पहुंच के कारण ही इस विमान को ‘हिंद महासागर क्षेत्र का शासक’ भी कहा जाता है और ब्रह्मोस से लैस सुखोई तो अब दुश्मनों के लिए बेहद घातक हो गए हैं।

Difference between cruise and ballistic missiles

मिसाइलें प्रमुख रूप से दो प्रकार की होती हैं (There are two main types of missiles.), क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल। क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों में अंतर यही है कि क्रूज मिसाइल बहुत छोटी होती हैं, जिन पर ले जाने वाले बम का वजन भी ज्यादा नहीं होता और अपने छोटे आकार के कारण उन्हें छोड़े जाने से पहले बहुत आसानी से छिपाया जा सकता है जबकि बैलिस्टिक मिसाइलों का आकार काफी बड़ा होता है और वे काफी भारी वजन के बम ले जाने में सक्षम होती हैं। बैलिस्टिक मिसाइलों को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए उन्हें छोड़े जाने से पहले दुश्मन द्वारा नष्ट किया जा सकता है।

क्रूज मिसाइल वे मिसाइलें होती हैं, जो कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरती हैं और रडार की आंख से भी आसानी से बच जाती हैं। बैलिस्टिक मिसाइल उर्ध्वाकार मार्ग से लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं जबकि क्रूज मिसाइल पृथ्वी के समानांतर अपना मार्ग चुनती हैं। छोड़े जाने के बाद बैलिस्टिक मिसाइल के लक्ष्य पर नियंत्रण नहीं रहता जबकि क्रूज मिसाइल का निशाना एकदम सटीक होता है।

ब्रह्मोस मिसाइल क्या है | ब्रह्मोस मिसाइल की जानकारी | Brahmos missile in Hindi

ब्रह्मोस मिसाइल मध्यम रेंज की रेमजेट सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे पनडुब्बियों, युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों और जमीन से दागा जा सकता है। यह दस मीटर की ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकती है और रडार के अलावा किसी भी अन्य मिसाइल पहचान प्रणाली को धोखा देने में भी सक्षम है, इसीलिए इसे मार गिराना लगभग असंभव माना जाता रहा है। इस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी तथा रूस की मस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है और इसका 12 जून 2001 को पहली बार सफल लांच किया गया था। यह मिसाइल दुनिया में किसी भी वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है।

ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है और डीआरडीओ अब रूस के सहयोग से इस मिसाइल की मारक दूरी और भी ज्यादा बढ़ाने के साथ ही इन्हें हाइपरसोनिक गति पर उड़ाने पर भी कार्य कर रहा है। दरअसल सुपरसोनिक मिसाइलों की गति ध्वनि की रफ्तार से तीन गुना अर्थात् तीन मैक तक होती है और इनके लिए रैमजेट इंजन का प्रयोग किया जाता है जबकि हाइपरसोनिक मिसाइलों की रफ्तार ध्वनि की गति से पांच गुना से भी ज्यादा होती है और इनके लिए स्क्रैमजेट यानी छह मैक स्तर के इंजन का प्रयोग किया जाता है।

फिलहाल ब्रह्मोस के जो संस्करण उपलब्ध हैं, वे सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें ही हैं, जो ध्वनि के वेग से करीब तीन गुना अधिक 2.8 मैक गति से अपने लक्ष्य पर जबरदस्त प्रहार करती हैं। यह दुनिया में अपनी तरह की ऐसी एकमात्र क्रूज मिसाइल है, जिसे सुपरसॉनिक स्पीड से दागा जा सकता है। दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस अपने लक्ष्य के करीब पहुंचने से मात्र बीस किलोमीटर पहले भी अपना रास्ता बदल सकने वाली तकनीक से लैस है और यह केवल दो सैकेंड में चौदह किलोमीटर तक की ऊंचाई हासिल कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसके दागे जाने के बाद दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता और यह पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकाने को नष्ट कर देती है।

– योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं)

विश्व नदी दिवस : गहलोत की अपील हम सभी हमारी नदियों को साफ़ और स्वच्छ रखने का प्रण लें

River

World River Day: Gehlot’s Appeal Let us all take a pledge to keep our rivers clean

नई दिल्ली, 27 सितंबर 2020. आज विश्व नदी दिवस (World Rivers Day) के अवसर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Rajasthan Chief Minister Ashok Gehlot) ने देशवासियों से देश की जीवनरेखा अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने और उनकी सार-संभाल करने का आह्वान किया है।

क्यों मनाया जाता है विश्व नदी दिवस | Why World Rivers Day is celebrated

बता दें कि विश्व नदी दिवस प्रति वर्ष सितंबर माह के अंतिम रविवार को मनाया जाता है। विश्व नदी दिवस विश्व के जलमार्गों का उत्सव है। 2005 से चल रहा है, विश्व नदी दिवस नदियों के कई महत्व को उजागर करता है और सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने का प्रयास करता है और दुनिया भर में नदियों के बेहतर संचालन की उम्मीद करता है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने जल संसाधनों विशेष तौर पर नदियों के संरक्षण हेतु जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2005 में ‘जीवन के जल दशक’ (Water for Life Decade) की शुरूआत की थी। तब से यह दिवस प्रतिवर्ष मनाया जा रहा। पूरी दुनिया में हर देश में नदियाँ खतरों की एक श्रृंखला का सामना कर रही हैं, और केवल हमारी सक्रिय भागीदारी ही आने वाले वर्षों में नदियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करेगी।

विश्व नदी दिवस पर अशोक गहलोत का संदेश | Ashok Gehlot’s message on World River Day

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने सत्यापित फेसबुक पेज (Verified Facebook page of Rajasthan Chief Minister Ashok Gehlot) पर लिखा –

“विश्व नदी दिवस के अवसर पर हम सभी हमारी नदियों को साफ़ और स्वच्छ रखने का प्रण लें।

प्रकृति ने हमारे देश को गंगा और यमुना जैसी पवित्र और महत्वपूर्ण नदियां दी हैं। यदि हम वास्तव में उनका सम्मान करते हैं तो उनकी देखरेख करें और कभी उन्हें गन्दा नहीं करना चाहिए।

हमारी संस्कृति हमें नदियों सहित प्रकृति की पूजा करना सिखाती है। आइये हम देश की जीवनरेखा अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाएं और उनकी सार-संभाल करें।

#WorldRiversDay”

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जानिए क्यों सूखती हैं बारहमासी नदियां?

Ganga

Know why perennial rivers dry up?

बीसवीं सदी के पहले कालखण्ड तक भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। हिमालय से निकलने वाली नदियों (rivers originating in the Himalayas) को बर्फ के पिघलने से अतिरिक्त पानी मिलता था। पानी की पूर्ति बनी रहती थी इस कारण उनके सूखने की गति अपेक्षाकृत कम थी। नदी के कछार (river bed) के प्रतिकूल भूगोल तथा भूजल के कम रीचार्ज या विपरीत कुदरती परिस्थितियों के कारण, उस कालखण्ड में भी भारतीय प्रायद्वीप की कुछ छोटी-छोटी नदियाँ सूखती थीं। इस सब के बावजूद भारतीय नदियों का सूखना मुख्य धारा में नहीं था।

लगभग मौसमी बनकर रह गई हैं बहुत सारी नदियाँ

पिछले 50-60 सालों से भारत की सभी नदियों खासकर भारतीय प्रायद्वीप की नदियों के प्रवाह (Rivers of the Indian Peninsula) में गम्भीर कमी आ रही है। हिमालयीन नदियों को छोड़कर भारतीय प्रायद्वीप या जंगलों तथा झरनों से निकलने वाली बहुत सारी नदियाँ लगभग मौसमी बनकर रह गई हैं।

नदियों के सूखने के क्या कारण हो सकते हैं? नदियों की वेदना का क्या कारण है?

हिमालयीन नदियों सहित भारतीय प्रायद्वीप की नदियों के प्रवाह की कमी/सूखने के लिये अलग-अलग कारण हो सकते हैं। उन कारणों को मुख्य प्राकृतिक कारण और मुख्य मानवीय हस्तक्षेप (कृत्रिम कारण) वर्ग में वर्गीकृत किया जा सकता है।

नदियां सूखने के मुख्य प्राकृतिक कारण Main natural causes of rivers drying up

बरसात के मौसम में भारतीय नदियों को रन-आफ के माध्यम से पर्याप्त पानी मिलता है। बरसात के खत्म होने के बाद उन्हें, रन-आफ के माध्यम से पानी का मिलना बन्द हो जाता है। सूखे मौसम में उनके प्रवाह का स्रोत जमीन के नीचे संचित भूजल होता है। अगले पैराग्राफों में नदी के प्रवाह की अविरलता, प्रवाह की घट-बढ़ तथा सूखने के कारणों को समझने का प्रयास किया गया है।

भूजल का पुनर्भरण क्या है?

भूजल स्तर की मौसमी घट-बढ़ से सभी परिचित हैं। यह घट-बढ़ प्राकृतिक है। सभी जानते हैं कि हर साल, वर्षाजल की कुछ मात्रा धरती में रिस कर एक्वीफरों में भूजल का संचय (Ground water accumulation in aquifers) करती है। उसे भूजल का पुनर्भरण या रीचार्ज (ground water recharge in Hindi) कहते हैं। यह पुनर्भरण, भले ही उसकी मात्रा असमान हो, पूरी नदी घाटी में होता है।

भूमिगत जल स्तर के नीचे जाने के कारण | cause of the fall of the ground water level

गौरतलब है कि भूजल के पुनर्भरण के कारण भूजल का स्तर सामान्यत: अपनी पूर्व स्थिति प्राप्त कर लेता है। विदित है कि एक्वीफरों में संचित पानी (water stored in aquifers) स्थिर नहीं होता। वह ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर प्रवाहित होता है। इसलिये जैसे ही बरसात खत्म होती है, एक्वीफर को पानी की आपूर्ति बन्द हो जाती है।

एक्वीफर में जल संचय होना रुक जाता है और निचले इलाकों की ओर संचित जल के बहने के कारण भूजल स्तर घटने लगता है। इस कारण सूखे दिन आते ही भूजल स्तर कम होने लगता है। बरसात की वापसी के साथ उसका ऊपर उठना फिर प्रारम्भ हो जाता है।

नदी की अविरलता का क्या कारण है?

भूजल स्तर की घट-बढ़ के सकल अन्तर को भूजल का अधिकतम अन्तर कहते हैं। विदित है कि बरसात के दिनों में रीचार्ज के कारण एक्वीफरों में पानी का संचय होता है। भूजल का स्तर ऊपर उठता है और जब वह स्तर नदी तल के ऊपर आ जाता है तो वह नदी में डिस्चार्ज होने लगता है। उसके डिस्चार्ज होने के कारण नदी को पानी मिलता है और नदी में पानी बहने लगता है। जब तक नदी को डिस्चार्ज मिलना जारी रहता है तब तक नदी प्रवाहमान रहती है। यही नदी की अविरलता का कारण है।

कुदरती डिस्चार्ज के कारण जब भूजल का स्तर नदी तल के नीचे उतर जाता है तो नदी को पानी मिलना मिलना बन्द हो जाता है। नदी का प्रवाह खत्म हो जाता है और नदी सूख जाती है। यह नदी की अविरलता के समाप्त होने या सूखने का कारण है। इसके बावजूद नदी की रेत से पानी का बहना जारी रहता है। जब एक्वीफर पूरी तरह खाली हो जाते हैं तब रेत से होने वाला प्रवाह भी बन्द हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि ढाल की अधिकता के कारण भी नदियाँ सूखती हैं। अधिक ढाल वाले इलाकों में ढाल की अधिकता के कारण बरसाती पानी तेजी से नीचे बहता है। इस कारण बरसात समाप्त होते ही रन-आफ खत्म हो जाता है।

बरसात बाद नदी के सूखने का अर्थ क्या है? (What is the meaning of the river drying up after the rain?)

नदियों में नदी के तल पर और नदी के तल के नीचे प्रवाहित पानी प्राकृतिक जलचक्र का अंग होता है।

उल्लेखनीय है कि नदी में बहने वाले पानी की अवधि की तुलना में नदी तल के नीचे बहने वाले पानी की अवधि अधिक होती है। अर्थात नदी तल के नीचे पानी अधिक समय तक बहता है।

संक्षेप में, बरसात के बाद नदी के सूखने का अर्थ पानी खत्म होना नहीं है। उसका अर्थ है भूजल स्तर का नदी तल के नीचे उतर जाना। नदी के फिर से प्रवाहमान होने का मतलब रन-आफ का मिलना है या भूजल स्तर का नदी तल के ऊपर पुन: उठ आना।

ग्लोबल वार्मिंग से भी सूख रही हैं नदियां | Rivers are drying up due to global warming | ग्लोबल वार्मिंग का नदियों पर प्रभाव

नदियों के सूखने का दूसरा प्राकृतिक कारण ग्लोबल वार्मिंग है। उसके कारण (Effects of global warming on rivers) बरसात की मात्रा, वितरण तथा वर्षा दिवसों में बदलाव हो रहा है। औसत वर्षा दिवस कम हो रहे हैं। बरसात की मात्रा और अनियमितता बढ़ रही है। औसत वर्षा दिवस कम होने के कारण रन-आफ बढ़ रहा है। भूजल की प्राकृतिक बहाली (natural restoration of groundwater) के लिये कम समय मिल पा रहा है। समय कम मिलने के कारण अनेक इलाकों में भूजल की कुदरती बहाली घट रही है। उसकी माकूल बहाली नहीं होने के कारण नदी में प्राकृतिक डिस्चार्ज में कमी आ रही है। उसकी अवधि भी घट रही है। प्राकृतिक डिस्चार्ज के कम होने के कारण प्रभावित इलाकों में गर्मी आते-आते अनेक छोटी-छोटी नदियाँ सूख रही हैं।

मिट्टी का कटाव और नदियों के सूखने का संबंध (The relationship between soil erosion and the drying up of rivers) | भूमि कटाव क्या है?

तीसरा प्राकृतिक कारण मिट्टी का कटाव है। विदित है कि मिट्टी का कटाव (Soil erosion मृदा अपरदन) प्राकृतिक प्रक्रिया है। उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का मानना है कि कछार की उत्पादकता बढ़ाने के लिये वह आवश्यक भी है।

कैचमेंट के वानस्पतिक आवरण में कमी आने के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और मिट्टी की परतों की मोटाई घट रही है। मोटाई कम होने के कारण उनकी भूजल संचय क्षमता घट रही है। भूजल संचय क्षमता घटने के कारण उनका योगदान घट रहा है। योगदान के घटने से नदी का प्रवाह कम हो रहा है और अवधि घट रही है। नदियों के सूखने की सम्भावनाएँ बढ़ रही हैं।

नदियों के सूखने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है मानवीय हस्तक्षेप (Human intervention is the most important reason for the drying up of rivers.)

नदियों के सूखने का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण नदी कछार में भूजल का लगातार बढ़ता दोहन है। उसके प्रभाव से नदी कछार के भूजल स्तर में गिरावट आती है। भूजल का स्तर तेजी से नीचे उतरने लगता है। उसके नदी तल के नीचे उतरने से नदी को पानी मिलना समाप्त हो जाता है और नदी सूख जाती है। यह तीन अलग-अलग परिस्थितियों के कारण होता है। पहली परिस्थिति में कछार में भूजल का दोहन नगण्य है।

भूजल के दोहन के नगण्य होने के कारण भूजल का प्रवाह नदी की ओर अर्थात निचले इलाके की ओर है। नदी को पानी मिल रहा है। नदी में भरपूर प्रवाह है। दूसरी परिस्थिति में कछार गहरे नलकूप खुद गए हैं। उनके द्वारा भूजल को पम्प किया जा रहा है। पानी पम्प किये जाने का भूजल प्रवाह पर असर पड़ा है। इस स्थिति में भूजल की कुछ मात्रा नलकूप को और कुछ मात्रा नदी को मिल रही है।

पानी के विभाजन के कारण नदी का प्रवाह समानुपातिक रूप से प्रभावित हुआ है। तीसरी स्थिति में नदी के करीब नलकूपों द्वारा पानी पम्प किया जा रहा है। नलकूपों के नदी के करीब स्थित होने के कारण उनको पानी की पूर्ति कछार तथा नदी अर्थात दोनों स्रोतों से हो रही है। नदी से पानी की सीधी आपूर्ति के कारण नदी का प्रभाव गम्भीर रूप से प्रभावित हो रहा है। अर्थात प्रवाह घट रहा है।

देश की अनेक नदियों से विभिन्न उपयोगों के लिये पानी पम्प किया जाता है। कई बार नदियों से नहरें निकाल कर बसाहटों की पेयजल आपूर्ति तथा सिंचाई की जाती है। नदी से पानी पम्प करने या नहरों से पानी उठाने के कारण भी नदी के प्रवाह में कमी हो जाती है। यदि इस कमी में भूजल के अति दोहन का कुप्रभाव जुड़ जाता है तो प्रवाह और भी कम हो जाता है। नदियाँ सूखने लगती हैं।

बाँधों के बनने के कारण भी सूख रही हैं नदियां?

तीसरा महत्वपूर्ण कारण है नदी मार्ग पर बाँधों का बनना (construction of dams on river course)। उल्लेखनीय है कि बाँधों के बनने के कारण नदी का मूल प्रवाह न केवल खण्डित होता है वरन नदी के निचले मार्ग में घट भी जाता है। यदि घटते प्रवाह में भूजल दोहन का कुप्रभाव जुड़ जाता है तो प्रवाह और भी कम हो जाता है। उसके असर से कभी-कभी नदियाँ सूख भी जाती हैं।

नदी में घटते प्रवाह और बढ़ते प्रदूषण के असर को मानव शरीर के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।

जैसे पहले तो मानव शरीर में लगातार खून कम हो और घटते खून में खूब सारा जहर मिलाया जाये और उसकी हृदय तक पहुँचने वाली व्यवस्था को पंगु बनाया जाये तो मृत्यु को रोकना लगभग असम्भव हो जाता है। यही नदी के साथ हो रहा है। यही नदियों के सूखने के कारण हैं। यही नदी तंत्र की समस्या है।

कृष्ण गोपाल ‘व्यास’