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Tag Archives: नयी कविता

निष्प्राण देह बनकर रह गई है हिंदी कविता

Has Hindi poetry become antisocial

Hindi poetry has become a dead body कितनी ही सुंदर हो, कितने ही जेवरात सजे हों, सेज फूलों से लबालब लदी फन्दी हो, अगरबत्ती और चंदन की खुशबू हो, लेकिन उसकी सड़ांध सही नहीं जाती। हिंदी कविता में तत्सम शब्दों का, विशुद्धता का, भाषिक दक्षता का, बाजार की ब्रान्डिंग का, अमेज़न की मार्केटिंग का, इंटरनेट आधारित अंतर्राष्ट्रीयता का, राष्ट्र, धर्म,जाति, …

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