आपको सिर्फ मुसलमान दिख रहा है जबकि किसान, मजदूर, दलित, पिछड़े और आदिवासी मुसलमानों से पहले मारे जाएंगे !

Shaheen Bagh

अगले पांच साल में बुनियादी ढांचे के विकास (Infrastructure development) के लिए 103 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की सरकार की योजना है। रोज़गार और नौकरियां बढ़ाने के लिए निवेश और विनिवेश का रास्ता चुना गया है, खेती और उत्पादन का नहीं। इस बहाने पीपीपी मॉडल (Ppp model) के विकास और रोज़गार सृजन (Employment generation) की आड़ में कारपोरेट टैक्स (Corporate tax) 35 प्रतिशत से घटते-घटते अब 15 प्रतिशत तक आ गया है। डिविडेंट टैक्स खत्म कर दिया गया है। सावरेन फंड में निवेश पर शत प्रतिशत टैक्स माफ। आडिट नहीं होगी 5 करोड़ के टर्न ओवर तक। बाकी बजट से पहले सात बार प्राइवेट सेक्टर और विदेशी पूंजी के लिए प्रोत्साहन, टैक्स माफी, पंकज की पहले ही घोषणा की जाती रही मंदी के बहाने।

मंदी के बहाने खत्म श्रम कानून की वजह से करोड़ो मजदूर कर्मचारी काम से निकाले गए। छंटनी हुई। व्यापक ले ऑफ और लॉक आउट हुए। देश विदेशी पूंजी का उपनिवेष बन गया।

यह बुनियादी ढांचा क्या है। What is this infrastructure.

बीसवीं सदी की शुरुआत में भी चुनिदा औदयोगिक घरानों को छोड़कर भारत में प्राइवेट सेक्टर का कोई वजूद नहीं था। आजादी से ऐन पहले तक यही स्थिति थी।

What is the plan for India’s economic development or Birla plan

1945 में प्लान फ़ॉर इंडियाज इकोनॉमिक डेवलपमेंट बना, जिसे टाटा बिड़ला प्लान कहा जाता है। उनकी सिफारिश थी कि बुनियादी ढांचे पर भारी सरकारी निवेश किया जाय। दो साल बाद मिली आजादी के बाद पूंजीपतियों को बिना पूंजी लगाए बिल्कुल मुफ्त बुनियादी ढांचा देने के लिए इस सिफारिश को तेज औद्योगिक विकास और शहरीकरण के लिए लागू किया गया।

देश के सारे संसाधन लगाकर, जनता की खून पसीने की कमाई से यह बुनियादी ढांचा तैयार किया जाता रहा है। जिसे 1991 से बिना प्रतिरोध मुक्तबाजार के आर्थिक सुधारों के तहत निजीकरण, उदारीकरण और ग्लोबीकरण के जरिये देसी विदेशी पूँजी के हवाले किया का रहा है।

फिर वही खेल चालू है।

यही हिंदुत्व का पूंजीवादी सामंती साम्राज्यवादी फासिस्ट राम मंदिर एजेंडा है।

नागरिकता कानून (Citizenship Act), श्रम कानून में संशोधन और आधार परियोजना बुनियादी आर्थिक सुधार है। जिसके शिकार होंगे सबसे ज्यादा मेहनत आम लोग, शरणार्थी सीमाओं के आर-पार, देश के अंदर, आदिवासी, पिछड़े, मुसलमान, दलित, स्त्रियां और युवजन।

आपका प्रतिरोध आंदोलन का मतलब क्या है?
पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

आपको सिर्फ मुसलमान दिख रहा है। आप पीड़ितों में सिर्फ मुसलमानों को दिखाकर उन्हें आदिवासियों की तरह अलगाव में डालते हुए किसानों मजदूरों दलितों पिछड़ों आदिवासियों छात्रों युवाओं और स्त्रियों को संघ परिवार की छतरी में धकेल दे रहे हैं, क्योंकि वे आम लोग इस नरसंहारी मुक्तबाजार के हिंदुत्व को आपके ही नजरिये से सिर्फ मुसलमानों की समस्या मानते हैं और कतई नहीं समझते कि निशाने पर वे खुद हैं और मुसलमान से पहले वे ही मारे जाएंगे।

हिंदुओं के मुसलमानों के खिलाफ़ ध्रुवीकरण की राजनीति को आप कामयाब कर रहे हैं और देशी विदेशी पूंजी और कारपोरेट राज के आर्थिक सुधारों के 2991 से लेकर कारपोरेट राजनीतिक दलों की तरह आपने भी कभी कोई विरोध नहीं किया है।

इस नरसंहारी बजट 2020 (Budget 2020) के खिलाफ भी आप खामोश हैं।

पलाश विश्वास

 

अपने ही देश के आठ राज्यों में नहीं जा पा रहे हैं 56” प्रधानमंत्री और गृहमंत्री

Ravish Kumar

नागरिकता क़ानून के पास होते ही गृहमंत्री अमित शाह को मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में दौरा करना पड़ा। क़ायदे से जहां से इस क़ानून की उत्पत्ति हुई है वहाँ जाकर लोगों को समझाना था मगर एक महीना हो गया गृहमंत्री असम या पूर्वोत्तर के किसी राज्य में नहीं जा सके हैं।

अमित शाह दिल्ली के चुनावों में लाजपत नगर का दौरा कर रहे हैं लेकिन डिब्रूगढ़ जाकर लोगों को नागरिकता क़ानून नहीं समझा पा रहे हैं। मुख्यमंत्री से दिल्ली में मिल रहे हैं।

वैसे क्या आपको पता है कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों की कश्मीर नहीं गए हैं। भाषण तो बड़ा दिया था कि कश्मीर के लोग हमारे हैं। हम गले लगाएँगे लेकिन अभी तक जाने का वक्त नहीं मिला।

वैसे प्रधानमंत्री मोदी असम भी नहीं जा पा रहे हैं। 15-16 दिसंबर को जापान के प्रधानमंत्री के साथ ईवेंट था। दौरा रद्द करना पड़ा। तब वहाँ नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध हो रहा था। वो एक महीने बाद तक हो रहा था जिसके कारण वे। आज शुक्रवार को खेलो इंडिया के उद्घाटन करने जाने वाले थे मगर नहीं जा सके।

तो एक महीने हो गए हैं भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आठ राज्यों में नहीं जा पा रहे हैं। दोनों को इन सभी राज्यों में कहीं न कहीं जाकर इस धारणा को तोड़ना चाहिए कि असम और कश्मीर में उनके कदम का विरोध हो रहा है।

यही नहीं नागालैंड के नागा पिपल्स फ़्रंट NPF के राज्य सभा सांसद के जी केन्ये को पार्टी ने बर्खास्त कर दिया है। उन्होंने सदन में नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में वोट किया था। NPF के लोक सभा सांसद ने भी समर्थन में वोट किया था उन पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है।

नागरिकता संशोधन क़ानून में पश्चिमी देशों की आलोचना से बचने के लिए ईसाई को भी जोड़ा गया जबकि उनके भी बहुमत वाले कई देश है। लेकिन इसके बाद भी ईसाई समुदाय इस क़ानून की विभाजनकारी नीयत को समझ गया है। कर्नाटक में ईसाई समुदाय के कई नेताओं ने इस क़ानून का विरोध किया है। बंगलुरू के आर्कबिशप के नेतृत्व में प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया है। इसमें अपील की गई है कि धर्म के आधार पर नागरिकता न देख। ईसाई धर्मगुरुओं ने उन समुदायों के प्रति सहानुभूति जताई है जो इस क़ानून के कारण ख़ुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।

रवीश कुमार

(चर्चित एंकर रवीश कुमार के एफबी पेज से साभार)

Prime Minister and Home Minister are unable to go to eight states of their own country

पूरे छत्तीसगढ़ में किसान-आदिवासी सड़कों पर उतरे, गांवबंदी से 2000 गांव प्रभावित, धमतरी में 1000 लोगों ने दी गिरफ्तारियां, नागरिकता कानून भी बना मुद्दा

Bharat Bandh Farmers on the streets throughout Chhattisgarh

पूरे छत्तीसगढ़ में  गांवबंदी से 2000 गांव प्रभावित

धमतरी में 1000 लोगों ने दी गिरफ्तारियां 

नागरिकता कानून भी बना मुद्दा

In Chhattisgarh, peasants and tribals took to the streets, 2000 villages were affected by the ban, 1000 people arrested in Dhamtari, the Citizenship Amendment Act was also made an issue.

रायपुर, 08 जनवरी 2020. अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, भूमि और वन अधिकार आंदोलन तथा जन एकता जन अधिकार आंदोलन सहित अनेक साझे मंचों से जुड़े देश के सैकड़ों  संगठनों के आह्वान पर छत्तीसगढ़ में एकजुट हुए किसानों, आदिवासियों और दलितों के संगठनों ने केंद्र की मोदी और राज्य की बघेल सरकार की किसान और कृषि विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदेश में जबरदस्त कार्यवाहियां की है। धमतरी में लगभग 1000 मजदूरों और आदिवासी किसानों ने अपनी गिरफ्तारियां दर्ज कराई है। किसान संगठनों ने दावा किया कि उनके आह्वान पर जहां 1000 से ज्यादा गांवों के किसान सड़कों पर उतरे हैं, वहीं गांवबंदी से 2000 से ज्यादा गांव प्रभावित हुए हैं। अधिकांश स्थानों पर किसानों ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के साथ मिलकर प्रदर्शन किए है। इस आंदोलन के दौरान खेती-किसानी के मुद्दों के साथ ही नागरिकता कानून और एनआरसी प्रक्रिया को वापस लेने का मुद्दा भी छाया रहा। किसान आंदोलन के नेताओं ने इसे राज्य की गरीब जनता और आदिवासी-दलितों के हितों के खिलाफ बताया, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कोई कागजी पुर्जा नहीं है।

छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रांतीय अध्यक्ष संजय पराते और किसान संगठनों के साझे मोर्चे से जुड़े विजय भाई ने  जानकारी दी कि आज की हड़ताल में प्रदेश में सबसे बड़ी कार्यवाही धमतरी में हुई, जहां असंगठित क्षेत्र से जुड़े मजदूरों के साथ सैकड़ों आदिवासियों और किसानों ने अपनी गिरफ्तारियां दी। इसका नेतृत्व छग किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और सीटू नेता समीर कुरैशी ने किया।

राजनांदगांव, अभनपुर, अम्बिकापुर, रायगढ़ में भी विशाल मजदूर-किसान रैलियां निकाली गई और उन्होंने कलेक्टर को ज्ञापन दिया। दुर्ग में सैकड़ों किसानों ने गांधी प्रतिमा पर छग प्रगतिशील किसान संगठन के आई के वर्मा और राजकुमार गुप्ता के नेतृत्व में धरना दिया। रायपुर जिले के अभनपुर में  क्रांतिकारी किसान सभा के तेजराम विद्रोही और सौरा यादव के नेतृत्व में धरना दिया गया। रायपुर के तिल्दा ब्लॉक में बंगोली धान खरीदी केंद्र पर, सरगुजा जिले के सखौली और लुण्ड्रा जनपद कार्यालय पर, सूरजपुर जिले के कल्याणपुर और पलमा में, कोरबा में कलेक्टोरेट पर, चांपा में एसडीएम कार्यालय पर, महासमुंद में, रायगढ़ के सरिया में  भी विशाल किसान धरने आयोजित किये गए। इसके अलावा आरंग सहित दसियों जगहों पर प्रशासन को ज्ञापन सौंपे गए है। इन जगजों पर आंदोलन का नेतृत्व जिला किसान संघ के सुदेश टीकम, बाल सिंह, ऋषि गुप्ता, सुरेंद्र लाल सिंह, कृष्णकुमार, सुखरंजन नंदी, राकेश चौहान, एन के कश्यप, पीयर सिंह, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ल, राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति के पारसनाथ साहू, एस आर नेताम, दलित-आदिवासी मंच की राजिम केतवास, नंद किशोर बिस्वाल, सोहन पटेल आदि ने नेतृत्व किया।

उन्होंने बताया कि 2000 से ज्यादा गांव गांवबंदी से प्रभावित हुए हैं, जहां किसानों और ग्रामीण लघु व्यवसायियों ने अपना कामकाज बंद रखकर अपने कृषि उत्पादों को शहरों में ले जाकर बेचने का काम नहीं किया। धमतरी और अभनपुर की कृषि उपज मंडियां पूरी तरह बंद रही, तो 50 से अधिक मंडियों में आवक रोज की तुलना में बहुत कम रही।

किसान नेताओं ने बताया कि उनका ग्रामीण बंद मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ तो था ही, राज्य की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी था। उनकी मुख्य मांगों में मोदी सरकार द्वारा खेती और कृषि उत्पादन तथा विपणन में देशी-विदेशी कारपोरेट कंपनियों की घुसपैठ का विरोध, किसान आत्महत्याओं की  जिम्मेदार नीतियों की वापसी, खाद-बीज-कीटनाशकों के क्षेत्र में मिलावट, मुनाफाखोरी और ठगी तथा उपज के लाभकारी दामों से जुडी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर अमल के साथ ही छत्तीसगढ़ राज्य सरकार से किसानों को मासिक पेंशन देने, कानून बनाकर किसानों को कर्जमुक्त करने, पिछले दो वर्षों का बकाया बोनस देने और धान के काटे गए रकबे को पुनः जोड़ने, फसल बीमा में नुकसानी का आंकलन व्यक्तिगत आधार पर करने, विकास के नाम पर किसानों की जमीन छीनकर उन्हें विस्थापित करने पर रोक लगाने और अनुपयोगी पड़ी अधिग्रहित जमीन को वापस करने, वनाधिकार कानून, पेसा और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करने, मनरेगा में हर परिवार को 250 दिन काम और 600 रुपये रोजी देने, मंडियों में समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने, सोसाइटियों में किसानों को लूटे जाने पर रोक लगाने, जल-जंगल-जमीन के मुद्दे हल करने और सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर हत्या का मुकदमा कायम करने की मांग भी शामिल हैं। ये सभी किसान संगठन नागरिकता कानून को रद्द करने और एनआरसी-एनपीआर की प्रक्रिया पर विराम लगाने की भी मांग कर रहे है।

विकास के नकाब को नोंचती साम्प्रदायिक छवि !

PM Narendra Modi at 100 years of ASSOCHAM meet

विकास के नकाब को नोंचती साम्प्रदायिक छवि !

The communal image noting the mask of development!

भाजपा-मोदी-आरएसएस की तथाकथित देशभक्ति का जो रूप इस समय सामने आया है उसने मोदी ने विकास पुरूष के दावे की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। जो लोग सड़क-पानी-कारखाने-नौकरी के लिए मोदी की ओर आस लगाए बैठे थे, वे सब ठगे महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद आम जनता के एक बड़े वर्ग को मुसलिम विरोधी घृणा के जहर में मीडिया-साइबर सैल ने डुबो दिया है।

Never before has such a deep hatred against Muslims been seen in the history of India.

मुसलमानों के खिलाफ इतनी गहरी नफरत भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गयी। यहां तक कि शिवाजी और महाराणा प्रताफ के शासन में भी मुसलमानों के खिलाफ इस तरह की नफरत नहीं थी। विकास के नाम पर नफरत के जहर को आम जनता के जीवन में उतारकर भाजपा ने भारत की जनता को एक तरह से दण्डित किया है।

The people of India were known all over the world for secularism and Muslim love.

भारत की जनता धर्मनिरपेक्षता और मुसलिम प्रेम के लिए सारी दुनिया में विख्यात थी लेकिन सन् 2014 से लेकर आजतक मोदी सरकार और मीडिया की युगलबंदी ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत और सामाजिक विभाजन को हवा देकर देश की अपूरणीय क्षति की है।

Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

नागरिकता कानून (Citizenship Amendment Act) को लेकर चल रहे आंदोलन के केन्द्र में जहां एक ओर इस नफरत को खत्म करने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर नागरिकता कानून के नाम पर मोदी सरकार की संविधान विरोधीमुहिम को रोकने की बड़ी जिम्मेदारी है। मोदी सरकार और उनके पिछलग्गू गू मीडिया वाले आंदोलनकारियों को हिंसक कहकर कलंकित कर रहे हैं। वे हिंसा के नाम पर आम जनता के लोकतांत्रिक हकों को छीनना चाहते हैं। हिसा के नाम आंदोलनकारियों की संपत्ति कुर्क की जा रही है, उनको तरह तरह से उत्पीड़ित किया जा रहा है।

असम से लेकर यूपी तक भाजपा सरकारें झूठे मुकदमे लगाने, हर्जाना वसूलने में लगी हैं। आंदोलनकारियों की यह भी जिम्मेदारी है कि वे आंदोलन करते समय हिंसा पर नजर रखें। शांतिपूर्ण आंदोलन तेज करें।

हिन्दुस्तान के सभी बड़े-छोटे शहरों में विभिन्न स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रतिवाद निरंतर चलना चाहिए। इस प्रतिवाद का सिलसिला किसी भी कींमत पर रूकना नहीं चाहिए। साथ ही विपक्षी दलों की सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे हर स्तर पर केन्द्र सरकार की मुहिम का विरोध करें।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ पूरे प्रदेश में वामपंथी पार्टियों का विरोध प्रदर्शन कल 19 को

CPIM

Left party protests across the state against Citizenship Act and NRC on 19th December .

रायपुर, 18 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने के खिलाफ पूरे देश मे चल रहे आंदोलन के बर्बर दमन की तीखी निंदा करते हुए कहा है कि जामिया मिलिया मामले से स्पष्ट है कि संघी गुंडे पुलिस की वर्दी पहनकर आगजनी कर रहे हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसा रहे हैं और हिंसा फैला रहे हैं। वामपंथी पार्टियां इसके खिलाफ कल 19 दिसम्बर को रायपुर, दुर्ग, धमतरी, बिलासपुर, चांपा, रायगढ़, कोरबा और अंबिकापुर सहित पूरे प्रदेश में विरोध कार्यवाहियों का आयोजन करेगी।

राजधानी रायपुर में यह प्रदर्शन घड़ी चौक स्थित अम्बेडकर प्रतिमा के सामने शाम 4 बजे आयोजित किया जाएगा।

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने आरोप लगाया है कि संघ नियंत्रित भाजपा सरकार भारत में हिटलर के उन कानूनों को लागू करने की कोशिश कर रही है, जिसके जरिये उसने नस्लीय घृणा के आधार पर समूचे यहूदी नस्ल का सफाया करने की कोशिश की थी। धार्मिक घृणा पर आधारित यह नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर इस देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र खत्म करने और सामाजिक तनाव को बढ़ाने का ही काम करेंगे, जो देश की एकता-अखंडता के लिए खतरनाक साबित होगा और देश के बहुलतावादी चरित्र को ही नष्ट करने का प्रयास है।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने भाजपा की मोदी-शाह सरकार के इस कदम को संविधानविरोधी बताते हुए कहा है कि भारतीय संविधान धर्म या क्षेत्र के आधार पर न नागरिकता तय करती है और न ही एक इंसान के रूप में उनसे कोई भेदभाव करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून स्पष्ट रूप से मुस्लिमों को नागरिक-अधिकारों से वंचित करके हिन्दू राष्ट्र के गठन की आरएसएस की राजनैतिक परियोजना के अनुरूप है, जिसे हमारे देश की जनता और स्वाधीनता संग्राम के नायकों ने कभी स्वीकार नहीं किया है। यह कानून समानता के अधिकार की गारंटी देने वाले अनुच्छेद-14 के भी खिलाफ है।

इस संबंध में उन्होंने केंद्र द्वारा भाजपा-शासित राज्य सरकारों को नजरबंदी शिविर बनाने के निर्देश दिए जाने की भी तीखी आलोचना की है, जहां असम की तरह नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए लोगों को नजरबंद बनाकर रखने की योजना बनाई गई है। उन्होंने कहा कि नागरिकता के संबंध में इस सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदमों

नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ पूरे प्रदेश में वामपंथी पार्टियों का विरोध प्रदर्शन कल 19 को

रायपुर, 18 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने के खिलाफ पूरे देश मे चल रहे आंदोलन के बर्बर दमन की तीखी निंदा करते हुए कहा है कि जामिया मिलिया मामले से स्पष्ट है कि संघी गुंडे पुलिस की वर्दी पहनकर आगजनी कर रहे हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसा रहे हैं और हिंसा फैला रहे हैं। वामपंथी पार्टियां इसके खिलाफ कल 19 दिसम्बर को रायपुर, दुर्ग, धमतरी, बिलासपुर, चांपा, रायगढ़, कोरबा और अंबिकापुर सहित पूरे प्रदेश में विरोध कार्यवाहियों का आयोजन करेगी।

राजधानी रायपुर में यह प्रदर्शन घड़ी चौक स्थित अम्बेडकर प्रतिमा के सामने शाम 4 बजे आयोजित किया जाएगा।

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने आरोप लगाया है कि संघ नियंत्रित भाजपा सरकार भारत में हिटलर के उन कानूनों को लागू करने की कोशिश कर रही है, जिसके जरिये उसने नस्लीय घृणा के आधार पर समूचे यहूदी नस्ल का सफाया करने की कोशिश की थी। धार्मिक घृणा पर आधारित यह नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर इस देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र खत्म करने और सामाजिक तनाव को बढ़ाने का ही काम करेंगे, जो देश की एकता-अखंडता के लिए खतरनाक साबित होगा और देश के बहुलतावादी चरित्र को ही नष्ट करने का प्रयास है।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने भाजपा की मोदी-शाह सरकार के इस कदम को संविधानविरोधी बताते हुए कहा है कि भारतीय संविधान धर्म या क्षेत्र के आधार पर न नागरिकता तय करती है और न ही एक इंसान के रूप में उनसे कोई भेदभाव करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून स्पष्ट रूप से मुस्लिमों को नागरिक-अधिकारों से वंचित करके हिन्दू राष्ट्र के गठन की आरएसएस की राजनैतिक परियोजना के अनुरूप है, जिसे हमारे देश की जनता और स्वाधीनता संग्राम के नायकों ने कभी स्वीकार नहीं किया है। यह कानून समानता के अधिकार की गारंटी देने वाले अनुच्छेद-14 के भी खिलाफ है।

इस संबंध में उन्होंने केंद्र द्वारा भाजपा-शासित राज्य सरकारों को नजरबंदी शिविर बनाने के निर्देश दिए जाने की भी तीखी आलोचना की है, जहां असम की तरह नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए लोगों को नजरबंद बनाकर रखने की योजना बनाई गई है। उन्होंने कहा कि नागरिकता के संबंध में इस सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदमों से साफ है कि वह इस देश की जनता पर धर्मनिरपेक्ष संविधान की जगह मनुस्मृति को लागू करना चाहती है।

माकपा नेता ने कहा कि देश के सामने जो अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा है, उससे आम जनता का ध्यान हटाने के लिए भी यह विभाजनकारी खेल खेला जा रहा है। लेकिन माकपा देश के संविधान और उसके धर्मनिरपेक्ष-जनतांत्रिक स्वरूप और इस देश के बहुलतावादी चरित्र को बचाने के लिए सभी जनवादी ताकतों को साथ लाकर देशव्यापी प्रतिरोध आंदोलन विकसित करेगी और सांप्रदायिक घृणा की ताकतों को शिकस्त देगी।

माकपा नेता ने कहा कि देश के सामने जो अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा है, उससे आम जनता का ध्यान हटाने के लिए भी यह विभाजनकारी खेल खेला जा रहा है। लेकिन माकपा देश के संविधान और उसके धर्मनिरपेक्ष-जनतांत्रिक स्वरूप और इस देश के बहुलतावादी चरित्र को बचाने के लिए सभी जनवादी ताकतों को साथ लाकर देशव्यापी प्रतिरोध आंदोलन विकसित करेगी और सांप्रदायिक घृणा की ताकतों को शिकस्त देगी।

संघ-भाजपा का नागरिकता कानून हिंदू धर्म का दुश्मन है

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नागरिकता कानून हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने का कानून है

Prohibition of the Republic of Secular India is the basic form of citizenship law and citizenship register.

धर्मनिरपेक्ष भारत गणराज्य का निषेध नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर का मूल भाव है। यह हिंदुत्व की दीर्घकालीन राजनीति का हिस्सा है, इसका भी हिंदू धर्म की मूल भावना से विरोध है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि पूरी दुनिया में भारत एक ऐसा देश है जहां हर कोने से आये हर धर्म के लोगों को शरण मिलती है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि नागरिकता कानून महज आर्थिक चुनौतियों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए है। इसका एक दीर्घकालीन लक्ष्य है, इसको नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा।

दरअसल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का इस तरह का कदम चाहें राम मंदिर बनाने का हो या नागरिकता कानून लाने का हो वह भारत के विचार के लोकतांत्रिक उदार मूल्य के विरूद्ध है और वह अधिनायकवादी, कारपोरेट हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को लेकर चल रहा है। हिंदुत्व की यह सनक भरी विचारधारा भारत के नागरिकों से कोई भी कीमत वसूलने से गुरेज नहीं करती है, चाहें वह गांधी जी हत्या हो, राज्य प्रायोजित दंगे हों या कल गृह युद्ध की तरफ देश को धकेल देने को हो।

हिंदुत्व के मुख्य सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर अपने राजनीतिक विचार में अधिनायकवादी हैं। विदेश नीति पर 1 अगस्त 1938 को पूना के एक भाषण में पं. नेहरू के ऊपर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं कि ‘जर्मनी को नात्सीवाद और इटली को फासीवाद अपनाने का पूरा अधिकार है’।‘ हिंदुत्व पर अपने 1923 के लेख में उन्होंने द्विराष्ट्र सिंद्धांत की सबसे पहले वकालत की और भेदभावकारी नागरिकता, राष्ट्रीयता के समर्थक वे आजीवन बने रहे। इस संदर्भ में मोहम्मद अली जिन्ना की हिंदू राष्ट्र व मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा उनसे मेल खाती है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान से आने वाले प्रताड़ित हिंदू, जैन, पारसी, सिख, ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों के लिए बने नागरिकता कानून को देखना चाहिए। मामला महज सताये हुए लोगों के साथ दयाभाव से खड़े होने का होता तो मुसलमानों और यहूदियों को नागरिकता पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता। वैचारिक और राजनीतिक उत्पीड़न झेलने वाले तमिल हिंदुओं, रोहिंग्या मुसलमानों, नास्तिकों की नागरिकता पर भी विचार किया गया होता।

बहरहाल नया नागरिकता कानून बन गया है और यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया है। इसकी वैधता पर उच्चतम न्यायालय क्या निर्णय लेगा, उसके बारे में निश्चित हम कुछ नहीं कह सकते हैं, लेकिन निश्चय ही संविधान की मूल भावना के अनुरूप यह नहीं है।

संविधान का अनुच्छेद 14 स्पष्ट कहता है कि भारत राज्य के क्षेत्र में रहने वाले किसी के साथ भेदभाव नहीं हो सकता है। इस मामले में कानूनी मामलों के जानकार ही अच्छी राय दे सकते हैं, लेकिन 6 मतावलंबियों की नागरिकता तार्किक वर्गीकरण के आधार पर दी जा सकती है, यह कहना सही नहीं लगता है। क्योंकि सामाजिक, शैक्षिक विषमता के आधार पर तार्किक वर्गीकरण की बात तो बनती है लेकिन धर्म के आधार पर अलगाव कर के कुछ को नागरिकता देना और कुछ को न देना समझ से परे है। बहरहाल ऐसे मुद्दों पर न्यायिक निर्णय पर हम पूरी तौर पर निर्भर नहीं हो सकते हैं। धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की राष्ट्रीय आजादी आंदोलन की जो परिकल्पना थी, उसके लिए एक बड़े आंदोलन को खड़ा करने की जरूरत है।

यह अच्छा है कि नागरिकता और राष्ट्रीयता के सहज स्वभाव के अनुरूप, धर्म, नस्ल जाति से ऊपर उठकर नागरिकता कानून के खिलाफ देश में आंदोलन खड़ा हो रहा है।

असम और पूर्वोत्तर में भाषायी, सांस्कृतिक आधार पर लोग एकता कायम कर के कर्फ्यू की परवाह न करते हुए सड़कों पर हैं और कुछ लोगों की जानें भी गई हैं। भाजपा ने शायद ही ऐसा सोचा हो कि सरकार के विरूद्ध इस तरह का आंदोलन असम में चले 80 दशक के आंदोलन से प्रबल होता दिख रहा है। यहां उसकी हिंदू-मुस्लिम विभाजन की विभेदकारी राजनीति पिट रही है।

भाजपा को विश्वास था कि इनरलाईन परमिट सिस्टम यानि सरकार की अनुमति से उस क्षेत्र में जाने के नियम की वजह से और राज्य के अदंर राज्य यानि आटोनामस क्षेत्र के नागरिकों के विरोध से वह बच जायेगी और देर सबेर मणिपुर और मेघालय के अन्य क्षेत्रों को भी इनरलाईन परमिट सिस्टम में लाकर वह नागरिकता कानून के पक्ष में माहौल बना लेगी। लेकिन हुआ उलटा त्रिपुरा व असम में तो अच्छा-खासा विरोध हो ही रहा है, पूरे पूर्वोत्तर भारत ने एनडीए की केंद्र सरकार और नागरिकता कानून के विरूद्ध बोलना शुरू कर दिया है। केंद्र और राज्य सरकारों के विरूद्ध वहां के नागरिकों का अविश्वास बना रहता है क्योंकि उनके अधिकारों पर बराबर अतिक्रमण होता रहता है।

कार्बी आंग्लांग जो असम राज्य के अंदर राज्य के संवैधानिक व्यवस्था में है, के आंदोलन में हमने करीब से देखा है कि कैसे आदिवासी समाज के अधिकारों का अतिक्रमण हुआ और उन्हें अपने प्रदत्त अधिकारों को बनाये रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा है।

पूर्वोत्तर के नागरिकों को यह डर है कि असम के नागरिकता रजिस्टर में दर्ज न हुए लगभग 14 लाख हिंदू शरणार्थियों को उनके यहां बसा कर उन्हें उनके क्षेत्र में ही अल्पसंख्यक बना दिया जायेगा और उनकी एथनिक, भाषायी, सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी। वैसे भी भाजपा ने पूर्वोत्तर में राजनीतिक जगह भले बना ली हो, लेकिन वह हिंदू पार्टी के रूप में ही जानी जाती है।

मुस्लिम संगठनों के अलावा वाम-उदार विचार के लोग नागरिकता कानून के खिलाफ नये सिरे से गोलबंद हो रहे हैं। महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में भी आंदोलन हो रहा है।

नागरिकता कानून के विरूद्ध 19 दिसम्बर 2019 के राष्ट्रव्यापी विरोध के हम हिस्सेदार हैं और इस संघर्ष को आगे बढ़ायेंगे। लेकिन इस संदर्भ में हमें दो बिंदुओं पर जरूर विचार करना होगा।

यह निर्विवाद है कि हिंदुत्व की अवधारणा भारत विचार के केंद्र में स्थित ‘जन’ के विरूद्ध है। जन के सम्मानजनक जीवन के लिए उसका आर्थिक पक्ष जीवन यापन लायक होना चाहिए। नई आर्थिक औद्योगिक नीति के दौर में इस ‘जन‘ की हालत बेहद खराब है। नव उदार अर्थनीति के दुष्परिणाम नौजवानों की बेकारी, किसानों की आत्महत्या, मंहगाई में दिखते हैं। जन के विरूद्ध उपयोग में लाये जाने वाले काले कानून हैं। सुधा भारद्धाज जैसे निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी है, राज्य का बर्बर दमन है।

हमें नागरिकता कानून, नागरिकता रजिस्टर के खिलाफ लड़ते हुए जन के इस लोकतांत्रिक सरोकार को भी उठाना होगा और समग्रता में अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा। दूसरा सवाल पड़ोसी मुल्क खासकर बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगनिस्तान के बारे में धारणा से संबंधित है।

ऐसा नहीं है कि इन देशों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहोदर केवल धार्मिक उत्पीड़क ही रहते हैं, इन देशों में भी उदार, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा और राजनीति के लोग हैं। यह सभी लोग जानते हैं कि आज भले ही बंग्लादेश में इस्लामिक राष्ट्र उनके संविधान में लिखा हो लेकिन 1971 में जब बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर बना था वहां उनकी भी घोषणा एक सेकुलर, लोकतांत्रिक राष्ट्र की थी। इसलिए हमें इन देश के नागरिकों को खलनायक के रूप में पेश करने की भाजपा की जो कोशिश है और उसके जो राजनीतिक निहितार्थ हैं उसे भी पर्दाफाश करना होगा।

अखिलेंद्र प्रताप सिंह,

स्वराज अभियान